बुधवार, 7 दिसंबर 2016

हरियाणा बिक लिया

हरियाणा बिक लिया
बिजली बेच दी, बीमा कम्पनी बेचण की तैयारी सै, बैंक बेच दिये, हवाई जहाजां आला म्हकमा बेच्या जावण लागरया सै, टी.वी. बेच दिया, पब्लिक सैक्टर की और कई कम्पनी बेच दी, देश का सोना बेच दिया, देश का भाईचारा बेच खाया, देश की रेल बेचण की तैयारी करण लागरे फेर बी सरकार रूक्के मारै सै अक हम भारत माता नै चांद पै पहोंचा के दम लेवांगे। वाह रै मेरी प्यारी सरकार इसके गैहणे बेच के इसके लत्ते बेच कै अर इसकी इज्जत आबरू बेच कै चांद पै पहोंचावण का तरीका बहोत काम्मल टोहया।
देश की शिक्षा बेच खाई - यूनिवर्सिटी बेच खाई, देश का स्वास्थ्य बेच खाया - अस्पताल बेच खाये - हल्दी नीम अर बैंगन बेच खाये।
सब किमै बेच कै भी ढाक के वे हे तीन पात। विकास नै रफ्तार नही पाकड़ ली सै इब ताहिं। अड़ कै खड़या सै। म्हारी सरकार फेर बी रूक्कै मारै सै अक घबराओ मतना हम आर्थिक सुधारां की नई खेप ल्यावण लागरे सां। पहलड़े सुधार तै लिये दिये पड़ते ना आगलयां का और टोकरा ठा लिया म्हारी सरकार नै। एक बै एक माणस कितै गाम में बदमाशां कै फंसग्या। उन्नै उसका खंडुआ तार लिया, जूती कढ़वा ली अर लांगड़ काढ़ दी अर अड़बन्द कान्ही हाथ घाल दिया। माणस नै सोची अक बहोत भूंडी बनी या तै। उसनै हांगा सा मारया अर छटवा कै भाज लिया। गाम मैं आया तै सांस चढ़रे उसकै। लोग बूझण लागगे अक रै नफे के बात हुई?
माणस बोल्या - खंडवा तार लिया, जूती कढ़वा ली, लांगड़ काढ़ दी बदमाशां नै। पर मैं बी के बस मैं आऊं था। पछन्डे पछान्डे मार कै इज्जत बचा कै भाजे आया। म्हारी सरकार गेल्यां बी किमै इसी एसी बात होरी दीखे सै। अक यो बी बेच दिया अर वो बी बेच दिया पर फेर भी हम अपणे पाह्यां पै खड़े सां अर स्वदेशी, पुकारण लागरे सां। कई न्यों कैहदे सैं अक देश बिक लिया तो बिकै सौ बै, इसका म्हारी सेहत पै के असर पड़ैगा? ईब उस आडू नै कूण समझावै अक देश के बिकण का असर टाटा बिड़ला की सेहत पै घाट पड़ैगा अर म्हारी थारी सेहत पै सबतै फालतू पड़ैगा। देश बिक लिया होगा फेर हरियाणा क्यूकर बिक लिया? म्हारा इतना काम्मल मुख्यमन्त्री यो के हरियाणा नै बिकण दे सै। ईब पहली बात तो या सै अक जिब देश बिक लिया तो हरियाणा बिकण तै क्यूकर बचैगा?
नहीं बचै ना, अक फेर बी थारे जंचै सै अक बच ज्यागा तो म्हारे थारे बरगा आडू माणस कूण हो सकै सै? हमनै ताश खेलण तै फुरसत ना। हमनै एक दूसरे की टांग खिंचण तै फुरसत ना, हम फांचर ठोक तै बण सका सां, हम कढ़ी बिगाड़ भी हो सकां सां, हम स्मैकिये बी हो सकां सां, हम चोर जार भी हो सकां सां, हम बलात्कारी भी हो सकां सां, हम कसूते दारू के गुलाम हो सकां सां, हम बस्ता ठाऊ हो सकां सां, हम किसे मन्त्री के दलाल हो सकां सां फेर हम माणसै नहीं हो सकदे, हम एक नागरिक नहीं हो सकते? क्यूं? इस क्यूं का जवाब तै खूंटा ठोक धोरै भी कोण्या। ईब के बताऊं देश बिक लिया, हरियाणा बिकण लागरया अर हम बैठे ताश खेलण लागरे? भला क्यूं?
इस क्यूं का जवाब एक ना एक दिन ढूंढणा पड़ैगा। चाहे आज चाहे काल अर चाहे परसों। सोचणा पड़ैगा यू समाज कड़ै जावण लागरा सै? इसका इलाज के सै? इलाज सै ए कोण्या या बात नहीं सै। बैठ कै सोचना पड़ैगा, लड़ना पड़ैगा, समाज बदलना पड़ैगा। काम टेढ़ा सै। फेर सब किमै बिके पाछै न्यों मतना कैह दिये - ओहले हमनै के बेरा था न्यूं बण ज्यागी।
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