सांस्कृतिक थानेदारी
कई माणसां की त्यौड़ी ऊपर नै होगी होंगी सांस्कृतिक थानेदारी के शब्द पढकै अर बात ठीक बी सै थानेदार की थानेदारी तै कदे कदीमी तै झेलते आये पर ईब या सांस्कृतिक थानेदारी कड़े तै आ टपकी? एक मई 1998 नै ‘कुछ लोगां’ नै चित्रकार एम एफ हुसैन के मुंबई आले घर मैं बड़कै घणी कसूती तबाही मचा दई। उनके बनाए औड़ चित्रां कै आग लादी। इसतै पहलम अक्तूबर 96 मैं इन ‘कुछ लोगां’ नै अहमदाबाद मैं भी हुसैन की पेंटिंगां का नाश मारया था। ये पेंटिंग 20-25 बरस पहलम बनाई गई थी। अर ये ‘कुछ लोग’ न्यों बी कैहन्ते बताये अक जै हुसैन हिन्दुस्तान मैं बड़ सकै सै तो हम उसके घर मैं क्यों नहीं बड़ सकदे। कमाल की बात या भी सै अक इन ‘कुछ लोगां’ पै भारत देश के कायदे कानून बी कोन्या लागू होन्दे। इन हमल्यां मैं जो लोग पुलिस नै पाकड़े वे एक हजार रुपइये की जमानत पै छोड़ दिये। इसे बख्तां खात्तर म्हारे संविधान मैं अनाधिकार प्रवेश, दाब धोंस अर संपत्ति नष्ट करण की धारा सैं बेरा ना पुलिसिया इननै क्यूकर भूलगे? जित ये धारा ना लावण की हों उड़ै तो सैड़ दे सी लायें पावैं सैं अर जित लावण की हों उड़ै चुप!
13 जुलाई 1999 नै दोफारे पाछै इन मुट्ठी भर ‘कुछ देश भगतां’ नै होटल मेरिडियन के साहसी प्रदर्शन करया अर खुल्लम खुला भारत देश के न्यामी गिरामी अभिनेता दिलीप कुमार का पुतला जलाया। पुलिस घणी ए थी पर थानेदारी के मूड़ मैं नहीं थी उड़ै सांस्कृतिक थानेदारी का बोलबाला था। ज्याहें तै इस होटल के साहमी यो सबकिमैं होग्या। दिलीप कुमार तै बढ़िया ‘हीरो’ किसे बख्तां मैं कोए नहीं था। उसनै के इनाम मिल्या अर कद मिल्या अर उसनै ओ उल्टा करै ना करै यो उसका अपणा निजी मामला था फेर हमनै यो आम मामला बणावण मैं वार कोन्या लाई।
पहली मई 1999 नै इन ‘कुछ लोगां’ नै पार्षद एम नागराज की रहनुमाई मैं कर्नाटक के एक थियेटर ग्रुप समुदाय पै उस बख्त हमला करया जब बंगलौर के धोरै अनेकल नाम के कस्बे मैं ओ एक नाटक दिखावण लागरया था। इसे ढालां ये ‘कुछ लोग’ 26 अप्रैल 1998 नै मुंबई के एक होटल के उस हाल मैं जा धमके जिसमैं पाकिस्तानी गायक गुलाम अली गावण लागरे थे। उनका माइक्रोफोन खोस लिया अर दादागिरी दिखा कै आयोजकां पै यू कार्यक्रम बन्द करवा कै दम लिया। शैक्षिक परिसरां मैं बी इन ‘कुछ लोगां’ की सांस्कृतिक थानेदारी खूब देखण मैं आवै सै। 20 जुलाई 1998 नै 100 हथियार बन्द लोग रैगिंग रूकवावण के बाहनै अहमदाबाद के सैंटर फॉर एन्वायरमेंटल प्लानिंग एंड टेक्नोलोजी (सी.ई.पी.टी.) के परिसर मैं बड़कै ऊधमस तारगे। गुजरात के दोहद जिले के रंधिकपुर के 59 मुस्लिम परिवार दो आदिवासी लड़कियां का ब्याह मुसलमान लड़कां गेल्या हो जाए पाछे जून के आखिर मैं अपणे घर बार छोड़ कै जावण नै मजबूर कर दिये गए। फायर फिल्म पै फायर करण आले ये ‘कुछ लोग’ माइकल जैकसन का डांस करवावण मैं अपणी श्यान मानैं सैं। फायर फिल्म पै हमला रचनात्मक अभिव्यक्ति कै खिलाफ तत्ववादी हेकड़ी तै न्यारा के माण्या जा सकै सै। इन कुछ लोगां मैं तै एक न्यों बोल्या ‘‘जन्म दिन की पार्टियां मैं अपणे बालकां नै केक काटते देख कै अर मोमबत्तियां बुझाते देख कै मनै बहोत घृणा हो सै। यो म्हारी संस्कृति का हिस्सा कोण्या।’ इस तै कोए बूझै अक फूफा कोका कोला तो विदेशी संस्कृति सै फेर नाभिकीय बम के म्हारी पुरानी भारत की परम्परा सै? अर कमाल की बात एक और सै अक इन ‘कुछ लोगां’ मां तै घणखरे ईसाई स्कूलां मैं पढ़रे सैं। एक तो कराची के सैंट पैट्रिक स्कूल का छात्र था। इनका मुखिया बी नैनीताल के सैंट जोसफ स्कूल मैं पढ़रया सै और तो और म्हारे देश की एक पार्टी के 180 सांसद जो पाछली संसद मैं थे उनमां तै कम तै कम आधे ईसाइयां के चलाये औड़ संस्थानां मैं पढ़रे सैं।
येहे वे ‘कुछ लोग’ सैं जिननै 1998 मैं जम्मू मैं कबीर की साखियां की सरेआम होली जलाई थी। ये लोग आपणा नकाब तार कै मैदान मैं आगे सैं ईब म्हारी थारी खैर नहीं सै थाम अर हम जै इनकी बातां तै सहमत नहीं होए तो ये गात की खाल तारकै उसमैं भुस भरवा सकैं सैं। इतिहास गवाह सै इन ‘कुछ लोगों’ के पूवजों नै इसे शुभ काम खूबै करे सैं, करण लागरे सैं अर आगै और घणे कुकरम करैंगे अर हम भी शामिल हो लिए इन जुल्मां मैं। रै किमै तो दिमाग पै जोर देकै सोचण की कोशिश करां अक इस सांस्कृतिक थानेदारी के आगै गोड्डे टेकण का मन बणा लिया?
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