कीसी बहस
हर बात मैं खामखा अडं़गा अड़ाणा कोए आच्छी बात नहीं बताई। फेर कई फांच्चर ठोक हरियाणा के गामां मैं इसे पाज्यांगे अक कितना ए अच्छा अर बढ़िया काम हो, पर इन लोगां नै फांच्चर जरूर ठोकणी अपणी। भाई न्यों बी भूल ज्यागा अक बड्डे बडेरयां की बातां मैं अड़ंगा नहीं अड़ाणा चाहिये अर ओ बी म्हारे प्रधानमंत्री अटल बरगे बुजुर्ग की बातां मैं। इब अटल जी नै कह्या अक बहस होनी चाहिये धर्मातरण पै। कोए बहस खातर तैयारै कोण्या इसतै भारत की प्राचीन परम्परा का उल्लंघन ठीक कोण्या। श्रवण माता-पिता की सेवा मैं ज्यान गलाग्या अर हम बहस करण नै बी तैयार कोणया। मनैं वाजपेयी जी पै बहोते घणा तरस आया अर मैं चाल पड़या अपणा डोगा ठाकै बहस करण की खातर। राह मैं एक सड़क पै एक मजदूर तै मुलाकात होगी। ‘‘राम, राम भाई मंगलू’’ मनैं कह्या। मंगलू के हाथ काम करते करते थमगे - ‘‘राम-राम दादा गणेशी। कुछ काम था के?’’ ‘‘हां भाई, थोड़ी सी बहस करनी थी,’’ मैं सहज सी बोल्या। ‘‘दादा क्यों मेरा बी अर अपणा बी टेम खराब करै सै। ओ देख औ कीकर तलै म्हारा ठेकेदार बैठया सै। जै बहस करनी सै तो उसतै जाकै माथा मार अक ओ हमनै पूरी मजदूरी क्यों नहीं देन्ता।’’ मैं बोल्या, ‘‘मैं मजदूरी की बहस कड़ै करूं सूं? मैं तै धर्मांतरण पै बहस करण का मंडासा मारकै घर तै लिकड़या सूं। ‘‘या कोई नई बला आगी कै?’’ मंगलू नै मजाक कर्या। ‘‘अरै म्हारे प्रधानमंत्री नै नहीं कह्या था कुछ दिन पहलम अक धर्म पै बहस का घघाटा ठा द्यो।’’ मनै बताई। मंगलू बोल्या, ‘‘दादा ईब पहलम तनै तो मेरे ताहिं यो प्रधानमंत्री का हिसाब किताब समझाना पड़ैगा।’’ मैं छोह मैं आकै बोल्या, ‘‘अरै तूं अटल बिहारी नै बी नहीं जानता। अरै और मन्दिर आला अटल रै ओ फूलछाप आली पाल्टी का सै। देश पै राज करै सै।’’ मंगलू बोल्या, ‘‘दादा म्हारा तै प्रधानमंत्री यू ठेकेदार है। फूल छाप अक बिना छाप। जिसका बी राज आया इसनै ठेका जरूर मिलग्या। म्हारे पै तै इसका राज चालै सै।’’ ठेकेदार नै मंगलू कान्हीं घुड़की घाली तै मंगलू दड़ मारग्या।
गाम के गोरै सी पहोंच्या तै गमलू सब्जी ले कै आया था साइकिल पै मण्डी मां तै। मनै गमलू टोक लिया। गमलू बोल्या, ‘‘बोल दादा के चाहिये सै? ताजा आलू सैं, टमाटर सैं, भिंडी सै अर गोभी है। मैं बोल्या, ‘‘रै मनै सब्जी ना चाहवन्ती। मनै तो थोड़ी सी बहस करनी थी तेरी गेल्यां।’’ मुंह फेर कै गमलू बुड़बुड़ाया, ‘‘दीखै सै दीमाग खराब हो ग्या दादा का।’’ फेर सुणाकै बोल्या, ‘‘दादा अड्डे पै ताश खेलते पावैंगे उन तै जा कै भिड़ले, मेरी तै ईबै बोहनी बी ना होली सै।’’ न्यों कहकै गमलू नै साइकिल के पैडल घुमा दिये।
मनै सोची अक मंगलू बी विपक्ष के हत्थे चढ़ग्या दीखै सै। अड्डे कान्ही सरक लिया मैं। उड़ै एक लुगाई मूंगफली के ढेर धोरै बैठी मूंगफली बेचै थीं। मनै सोची अक ले या तो बहस करै ए करैगी। वा बोली, ‘‘खस्ता करारी मूंगफली सैं पंडत जी। पांच की सौ ग्राम। बोहनी का बखत सै चार की दे द्यूंगी।’’ मनै तै बहस करनी थी।’’ मैं दुखी हो लिया था। ‘‘के?’’ वा चिल्लाई। घरां मां बाहण कोणया पंडत जी जो मेरी साथ इसी बात करो।’’ मैं तै बखत बिचार कै तावला सा आगे नै सरक लिया। इतने मैं पाछे तै होलदार नै कान्धे पै हाथ धर दिया। मेरा तै तले का सांस तलै अर ऊपर का ऊपर। होलदार बोल्या, ‘‘इस उमर मैं भी...।’’ मैं बोल्या, ‘‘हवलदार साहब वा बात ना सै जुणसी तम लारे सो।’’ ‘‘तो फेर कुणसी सै?’’ छेड़छाड़ के मुकदमे मैं आजकल जमानत बी सिफारिसां तै हो सै।’’ होलदार अकड़ सी गया। मनै तो बीस रुपइये काढ़ कै होलदार ताहिं पकड़ा दिये अक ले चा पानी के सैं। मुस्किल तैं होलदार तै पैंडा छुटवाया। मेरी समझ मैं आग्या अक अनपढ़ां कै हत्थे चढ़ग्या। इननै ना तै धर्मातरण का बेरा, ना देश प्रेम नै समझते अर राष्ट्रीय बहस तै इनके सिर पर कै जा सै। इननै ए तो देश का भट्टा बिठा दिया दादा गणेशी के वाजपेयी के कर सकै सै। साहमी के स्कूल मैं चाल्या गया। अर प्रिंसीपल तै दिल की बात बताई। प्रिंसीपल बोल्या, ‘‘बहस पाछै पहलम न्यों बता अक तेरा ब्यौंत कितना सै? आग्या बालक नै दाखल करवावण। न्यों बेरा ना अक यो पब्लिक सकूल सै। मैं बोल्या, ‘‘मनै तो धर्मांतरण पै बहस करनी थी। प्रिंसीपल बोल्या, ‘‘जा तै प्रधानमंत्री धोरै जा बहस करण। मनै तै ईबै आठमी जमात मैं पढ़ावण जाणा सै। अर प्रिंसीपल साहब चाल पड़े खड़े हो कै। मैं अड्डे पै पहोंचग्या। उड़ै चा की दुकान पै च्यार पांच बैठे बहस करण लागरे थे। मनै सोच्या अब बढ़िया मौका हाथ आग्या। बहस जारी थीं। एक बोल्या, ‘‘या सरकार तै जाण आली सै।’’ दूसरा बोल्या, ‘‘सवाले पैदा ना होन्ता।’’ तीसरे नै बूझ्या, ‘‘क्यों भला।’’ ‘‘इननै सरकार चलावणी ए ना आन्ती।’’ चौथा बोल्या, ‘‘यो अटल तो फलाप हो लिया,’’ एक बीच मैं बोल्या, ‘‘और के! न्यों कहवैं सैं धर्मांतरण पै बहस करो।’’ दूसरा बोल्या, ‘‘या हुई ना काम की बात,’’ मैं बीच मैं उछल कै पड्या। ‘‘दादा तूं बीच मैं मतना बोलै।’’ मैं बोल्या, ‘‘मैं भी धर्मांतरण आली बहस करनी चाहूं सूं।’’ आच्छा तै तूं कद तै संघी हो लिया दादा। फेर इनका जमाना तै लद लिया। एक बै अजमाने थे सो आजमा लिये। प्याज साठ रुपये खवादी अर आलू बीस। या काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ्या करती। मैं बोल्या, ‘‘एक बै धर्मांतरण पै बहस करल्यो भाई।’’ एक बोल्या, ‘‘करल्यो रै दादा बिचारा इतनी कहवै सै तै।’’ दूसरा बोल्या, ‘‘या बिचारा कोण्या। ये संघी अपने मतलब की खातर बिचारे बणज्यां सैं। वोट बड़े बिचारे बणकै मांग लेंगे अर महंगाई बधा दी अर ईब धरम पै बहस करवावैं सैं। म्हारे धोरै कड़ै बखत सै ईसी फिजूल की बहसां खातर।’’
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