मंगलवार, 6 दिसंबर 2016

रोग कसूता के करूं

रोग कसूता के करूं
हरियाणा के विद्वानों, राम-राम!
मेरी उम्र सै याणी सी। मैं सौला सतरा साल का बालक सूं। जवानी पहरे मैं पां धरया ए था अक एक दूसरी दुनिया मैं आग्या जणो तै। म्हारी गाल मैं आठ जणे सां म्हारी उम्र के। म्हारी गाल मैं चार छोरी सैं म्हारी उम्र की। मेरे तै पहलम तीनां गेल्यां तीनां की यारी थी। चौथी गेल्यां मेरा बी याराना होग्या। सारी हाण डर लाग्या रहवै। अपणे घरक्यां का डर कदे छोरी के घरक्यां का भय कदे गाम के लोगां का भय। पर या लुका छिपी म्हारी दो तीन साल चाली। एक दो बर उनके घरां मैं थ्यावन्ता थ्यावन्ता बच्या। इस सारी बातां का बेरा ना मेरे दिमाग नै बोझ मान्या अक के बात हुई मेरा तै करंट खत्म होग्या। वैद धोरै दवाई ली। शक्ति क्लीनिक मैं धक्के खाये। जुनेजा क्लीनिक बी गाह कै गेर दी। मेरठ मैं एक हकीम बताया उसकी दवाई बी बेअसर रही। मनै सहज सहज यार दोस्तां तै जिकर करया तै उन मां तै बी कईयां नै बताई अक म्हारे बी गोड्डे से टूटे रहवैं सैं। किसे काम मैं जी लागता ना। सरीर मैं कमजोरी आगी। सवाल सै अक मैं ठीक हो ज्यांगा अक नहीं? एक बात और सै मेरी बातां नै मजाक मैं मतना लियो या एकला मेरा सवाल नहीं सै। मनै तै होंसला करकै विद्वानां कै साहमी अपनी किताब खोल कै धरदी पर घणे सैं जिनकी किताब बन्द सै। सोचो किमै अर बताइयो हमनै। मैं करूं तै के करूं?
म्हारी गली का कर्मबीर सै। उसकै बी यो रोग था। उसनै सर्मान्ते नै अपणे घरक्यां आगै या बात बताई कोण्या। उसका ब्याह होगा फेर उसे दिन तै भाई तो और भी घणा कमनू सा रैहवण लागग्या। उसकी घर आली नै अपणी सासू ताहिं बतादी सारी बात अर वा कर्मबीर नै ठायें ठायें हान्डै सै। कदे कितै तै झाड़ा लुवा कै ल्यावै सै अर कदे किते तै गन्डा ताबीज बन्धवा कै ल्यावै सैं। पर उसकी घर आली दो बरस तै अपणे घरां बैठी सै। कर्मबीर कै और घणा सदमा होग्या। एक दिन तै ओ सल्फास की गोली खाग्या था। बड़ी मुस्किल तै मैडीकल आल्यां नै पांच छह दिन की खुबात करकै बचाया। उसकी घर आली बी आई कै आणा पड़या उसनै।
पर मनै तो बहोतै घणी चिन्ता होरी सै। इस चिन्ता नै दीखै मेरा और बी घणा भट्ठा बिठा दिया। कर्मबीर तै होंसला लेकै मैं भी मैडीकल मैं गया। उड़े तै डाक्टरां नै बस इसा ए सा देख्या अर गोली लिख दी। मेरे कोए आराम कोन्या हुया। मुंह की हाड्डी चिलकण लागगी। बेरी मैं एक वैद बताया इस बीमारी का उस धोरै दवाई ल्याया। छह म्हिने दवाई खाई। मुस्किल ते नकल नुकल मारकै बी.ए. करली इब आगै कोए राह नहीं दीखता अक करूं तै के करूं?
नौकरी ना कितै। कोए काम धन्धा चलाऊ तै पीस्सा कोन्या। ऊं बी हिम्मत सी कोन्या बनती। दो चारां नै अपणा काम धन्धा सुरू करया था। सारे के सारे तीस-तीस अर कै पचास-पचास हजार तलै आगे अर ईब ठन-ठन गोपाल हुये हांडैं सैं।
तो मेरी हरियाणा के विद्वानां तै, याड़े के कद्रदानां तै, म्हारे नेता महानां तैं जो ईब लैक्सन लड़ण आवैंगे या हाथ जोड़ कै प्रार्थना सै अक मेरा मार्ग दर्सन करो। मैं किस धोरे अपणा इलाज कराऊं? मैं कित तै रोटी खाऊं? अर क्यूकर अपणा ब्याह रचाऊं? मनै इन्तजार सै थारी सलाह का। मेरा पता बूझणा चाहो सो? तो मेरा पता सै हरियाणे के हर गाम मैं मेरे बरगे तीस-चालीस नौजवान जरूर पा ज्यांगे, उनके किसे के नाम तै एक चिट्ठी मैं लिख कै बता दियो समझो वा चिट्ठी मेरे धोरै पहोंच ज्यागी।

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