मंगलवार, 30 मई 2017

अपनी मर्जी का मतलब

सत्ते नफे कविता सविता अर सरिता धापां ताई की बैठक मैं शनिवार की साँझ कै फेर कठ्ठे होंगे | नफे का मुँह किमै उतरया उतरया सा था | सत्ते बोल्या -- के बात नफे आज किमै ढीला ढीला सा नजर आवै सै ? कविता --इतना उदास तो तूँ कदे बी कोण्या देख्या | बस कविता का तो नयों कहना था अर नफे तो फफक फफक कै रो पड़या | सारे हैरान अक या के बणी ? फत्ते बोल्या -- भाई नफे बात बता किमैं तो जी हलका होवैगा | नफे बोल्या -- के बताऊँ  बूझै मतना | ओ छोटना भाई नहीं सै सज्जन उसनै पुलिस पकड़ कै लेगी अर उसकी बहोत पिटाई करी | सरिता बोली-- बिना बात पुलिस नै पिटया या तो माड़ी बात सै नफे | बिन बात पुलिस क्यों पीट्टण   लागी ?  ,नफे बोल्या--ओ सज्जन अपनी बुआ कै जारया था माछरौली | उड़ै म्हारी बुआ का छोरा सै श्यामलाल उसपै गाम आल्यां  नै  इलजाम ला राख्या था अक पड़ौस की गोसाइयाँ की छोरी भजा लेग्या श्यामलाल | सरिता बोली -- गाम की गाम मैं यू काम बहोत माड़ा करया श्यामलाल नै | नफे बोल्या -- फेर आगै तो इसतैं भी माड़ी बात हुई | सत्ते बोल्या-- के बात हुई? नफे-- श्यामलाल के बाबू गणेशी नै अर श्यामलाल के छोटे भाई नै अर मेरले  भाई सज्जन नै पुलिस पाकड़ कै लेगी |  थानेदार नयों कहवै था अक इनकी मिलीभगत तैं भजा कै लेग्या सै श्यामलाल छोरी नै | सरिता-- जिसकी छोरी चाली गई वो फ़िक्र तो करैएगा अर नयों भी चाह्वैगा अक वा तावली सी पाज्या |
कविता -- श्यामलाल की उम्र कितनी सै ? नफे बोल्या -- 21 -22 बतावैं सैं | कविता के मुँह तैं एकदम लिकड़ग्या जिब मियां बीबी राजी तो के करैगा काज्जी | नफे -- ले मनै राम की सूँह सज्जन नै कटी नहीं बेरा उनका अक  चाले गए |
   सविता -- फेर पुलिस आले उणनै क्यों पकड़ कै लेगे ? नफे -- पूछ ताछ खातर थाणे मैं बुलावैं तो देखी  जा |  थानेदार नै तो म्हारा फूफा उन बाळकां कै साहमी उघाड़ा करकै पुलिसिया पिटाई करी छिक कै | बालक बोले तो वे दोनूं भी धुन दिए अच्छी तरियां | नफे -- जब उपरले अफसरां धोरै गए  तो उणनै भी सीधे मुँह बात कोण्या करी | उणनै अपने निशान दिखाए पिटाई के अर थानेदार के खिलाफ कार्यवाही की मांग करी |  फेर गाम का सरपंच अर और पांच छह छटैल एसपी कै जा पेश हुए थानेदार के हक़ मैं |  एसपी भी करै तो के करै ? सत्ते -- एसपी नै तो सही बात की तरफदारी करनी चाहिए थी | सविता -- ईब पहलम आले अफसर कड़ै रैहरे सैं |  नफे -- उनका मैडीकल करवावण खातर भी कोर्ट की शरण मैं जाना पड़या | डॉक्टरां नै भी कई बै मसकौड़े से मार कै पर्चा काटया | परचा कटग्या तो पुलिस आलयाँ नै केस दर्ज नहीं करया | उल्टा पुलिस नै दूसरी ढालां का दबाव और बनाना शुरू कर दिया |  ईब पुलिस कै खिलाफ इस्तगासा करां तो फूफा का इतना ब्योंत कोन्या पीस्याँ का |
ऊपर तैं गाम की  इज्जत कै बट्टा लावण के नाम पै रोज गाम मैं पंचायत होवण लागरी सैं |  पंचायत नै कह्या अक कै तो छोरे छोरी नै इनके माँ बाप पेश करैं नहीं तो इनका होक्का पाणी बंद | कविता- नफे  जनवादी महिला समिति का बी किमै ब्यान था अक जै बालिग छोरा छोरी सैं अर जै वे अपने हिसाब तैं ब्याह करकै रैहना चाहवैं सैं तो भारत का संविधान इसकी इजाजत देवै सै तो गाम आलयाँ नै बीच मैं रोड़ा नहीं बनना चाहिये |
  नफे -- समिति आली बहनजियां करकै तो उनका मैडीकल का परचा बणया ना तो हमनै के रह पावै था | भला हो उनका | फेर  गाम आले  ये पंचायती तो उनकै भी खिलाफ होरे सैं | सत्ते -- लुहार के छोरे नै अर गोसाईं की उसे गाम की छोरी नै साथ रैहवन का मन बना लिया तो इसपै कई सवाल खड़े होंसें |  इन सवालों पै बहस होनी चाहिए अर उनके खिलाफ पंचायत जै कानून अपने हाथ मैं लेवै सै तो प्रशासन नै हरकत मैं आणा चाहिए | पुलिस नै बेकसूरों की पिटाई करी उसपै पुलिस कै खिलाफ एक्शन हो अर छोरा छोरी ताहिं प्रशासन नै सुरक्षा देनी चाहिए | कदे वे रेल तलै कट्टे पावैं |
खूंटा ठोक उर्फ़ रणबीर 

हमनै तो ताश खेलण तैं फुर्सत कोण्या

हमनै तो ताश खेलण तैं फुर्सत कोण्या
खूंटा ठोक
हरियाणा मैं आज के दिन महिलावां की जिंदगी तनाव , असुरक्षा , अभाव ,अर असहायता मतलब लाचारी मैं डूबती जाण लागरी सै |  कोय कह सकै सै अक महिलावां नैं खेलां मैं तम्बू गाड़ दिए |  ठीक |  पर वे इस करकै नहीं गाड़ पाई अक हमनै गामां मैं खेलण कूदण  का उन ताहिं कोये माहौल बना कै दिया हो , वे अपनी लग्न अर खुबात  तैं जीत ल्याई मैडल |  औरत पै तो शिकंजा और मजबूत होंता आवै सै |  इस्री भ्रूण हत्या , दहेज़ हत्या , इज्जत के नाम पै हत्या का ग्राफ ऊपर नै जावण लागरया सै |  यौन उत्पीड़न ,बलात्कार , छेड़ छाड़ ,डराना -धमकाना ,घरेलू हिंसा ,औरतां का अपमान , असुरक्षा अर घुटन इस हद ताहिं बढ़गे अक नेतावां  नै और लोगां नै न्यूँ मान लिया अक ये तो आम बात सैं | आर्थिक संकट आज दरवाजे पै आकै खड़्या होग्या अर परिवार टूटते जावण लागरे सैं |  जीवन के साफ़ सुथरे साधन बचे नहीं तो खुली छिप्पी वैश्यावृति कांहीं भी औरत सारे कै धकेली जावण लागरी सैं |
    अराजकता और मनमानेपन का जो माहौल आड़ै बण्या सै उसमैं महिलावां नै 'सस्ते मैं उपलब्ध अर 'आसानी तैं उपलब्ध शिकार'  के  रूप मैं देख्या जावै सै |  इस आर्थिक असमानता अर सामजिक  असमानता के चालतें ताकतवर तबके महिलावां की गेल्याँ कुछ भी अर किसे भी हद ताहिं बेरा ना कितना घृणित काम कर सकैं सैं | के  कुल मिला कै सौ का तोड़ यूं सै अक महिलावां का अवमूल्यन हुआ सै |  गरीब तैं गरीब तबक्यां मैं भी उनके अपने समुदाय और परिवार के बीच मैं भी इन महिलावां पै अत्याचार बढ़े सैं |  औरतां नै ' क्षणिक मजे की चीज ' की ढालां देखना अर इस तथाकथित मजे खातर इन औरतां नै मौका लागते की साथ घेर लेना बड़ी आसान और आम बात होगी |  पिछले दिनों मैं हरियाणा मैं परित्यक्ताओं   और औरतों के साथ संबंधों मैं धोखाधड़ी बहोत बधी सै |  ब्याह के कुछ दिन पाछै लड़कियां पै हिंसा बढ़ी सै और क़त्ल और आत्म हत्या के केस साहमी आये सैं |   दूजे कांहीं लिंग अनुपात मैं विषमता के कारण लड़कियां दूर दूर तैं खरीद कै ल्याई औरत पसंद नहीं आयी तो उसनै उल्टा छोड़ आये अर उसकी बाहण नै  लियाये उसकी जागां  | ईब तै औरतां के खरीद फरोख्त के धंधे मैं दलाल भी पैदा होंगे |  या खरीद फरोख्त तेजी  तैं रफ़्तार पकड़ण लागरी सै अर औरतां के हक़ मैं बोलनिया मनस कै जनवादी महिला समिति बरगी संस्था बहोत थोड़ी सैं |  हरियाणा के समाज मैं संघर्ष करण आली महिलावां की खातर 'स्पोर्ट सिस्टम 'की बहोत कमी सै |  जितनी सामाजिक असुरक्षा बढ़ती जाण लागरी सै उसके हिसाब तैं यूं एक दो नारी निकेतन का मामला कोणी रेहरया  |  परित्यक्ताओं , एकल माओं ,अविवाहित महिलाओं ,यौन उत्पीड़न की शिकार उजड़ी औड़ महिलाओं ,बच्चियों की  जरूरतों नैं ध्यान राख कै समझ कै समाज मैं उनका स्थान बनाना बहोत जरूरी होग्या |  शार्ट स्टे होम , कामकाजी महिला हॉस्टल ,लड़कियों के हॉस्टल , मुफ्त जच्चा बच्चा केंद्र , कानूनी सहायता केंद्र , सलाह केंद्र, तनाव मुक्ति केंद्र , मनोचिकित्सा केंद्र, कौशल विकसित करण आले कार्यक्रम , एकल माओं के बच्चों की शिक्षा के लिए अनुदान और कर्ज की सुविधा , महिला स्वास्थ्य केंद्र , व्यायामशालायें , सामूहिक रसोईघर , की मांग जरूरी होगी | हिंसा की शिकार महिलावां की खातर कानून और स्वास्थ्य से संबंधित आपातकालिक व जल्द सेवाओं गंभीरता तैं की मांग समाज मैं ठावनी बहोत जरूरी होगी |  जौण बी जड़ै सै उसनै ईसे स्पोर्ट सिस्टम के खड़या करण मैं आपणी मदद जरूर करणी चाहिए |  इसके साथ साथ सरकार पै भी दबाव बढ़ाना चाहिए इस स्पोर्ट सिस्टम के विकास की खातर |
   हरियाणे मैं पढ़े लिखे लोगां मैं लिंग अनुपात एक हजार पुरुषां पै छह सौ सतरह महिलावां का पहोंच लिया था कुछ साल पहले |  या खतरे की घंटी बाज ली हरियाणा मैं |  पर लोगां नै ताश खेलण तैं फुर्सत कोन्या , कै गाल की दो फुट जमीन पै कब्ज़ा करण की जुगाड़ बाजी मैं सैं | इन सारी  बातां पर गाम अर शहर की महिलावां नै अर पुरुषां नै  गंभीरता तैं सोच्चण की जरूरत सै 

लत्ता कोन्या औढूं

लत्ता कोन्या औढूं
आठ-दस किल्ले। चौखा काम चाल रहया। तीन भाई दो बाहण। बड्डे का ब्याह होरया। एक दिन किसे बात पर सल्फास की गोली खा कै जात्ता रहया। मां-बाप बहोत दुखी। छोटा छोरा नफे 16 साल का दसमीं मैं पढ़ै। एक कान्ही तो उस ताहिं न्यों कहया करदे अक बड्डी भाभी मां बरोबर। तेरहवीं आले दिन तै दो दिन पहलम सुगबुगाहट शुरू होगी अक नफे का लत्ता उढ़ावांगे। कमला की उमर 27 साल की अर वो सोलह साल का। कमला नाटगी लत्ता औढ़ण तै। ढाल-ढाल की चरचा। म्हारी परम्परा की नाक कटा दी अर और बेरा ना के-के। कितै और निशाने साध राखे सैं। आजकाल म्हारे जाट गोतां के कुछ भाईयां नै हरियाणा की संस्कृति की चिंता बहोत सतावण लागरी सै। गांव का ताना बाणा छिन्न-भिन्न होत्ता जावण लागरया इसकी बहोत चिन्ता सै। परम्परा का कौण सबतै बड्डा रुखाला इसका बहोत बड्डा कम्पीटिशन-सा होरया सै। 18 तारीख नै रात नै एनडीटीवी चैनल पर तो एक पंचायती नै आड़े ताहिं कह दिया अक हमनै हिन्दुआं की पुरानी किताबां तै कोए लेना-देना नहीं। हमतो आर्य सैं। वैदिक संस्कृति नै मानां सां हम तो। किसे नै कहया अक स्वामी दयानन्द नै तो छुआछूत के खिलाफ संघर्ष करया तो उस पर तो माट्टी गेर दी। पंचातियां धोरै कोए जवाब नहीं था। फेर सवाल आया अक ईब ताहिं एक बी इसा केस हो जित बहन-भाई नै आपस मैं ब्याह करया हो? तो भी घुमा-फिरा कर बात करी, सीधा जवाब कोन्या दिया अक यो केस सै बहन अर भाई के ब्याह का। गाम के गाम मैं अर गोत के गोत मैं ब्याह का भी बस एकला मनोज अर बबली का केस सै ओर कोए इसा केस नहीं बता पाए पंचायती। बार-बार दुहाई दी जा रही थी अक भाईचारे के गोतों में शादी करने से हमारी परम्पराओं का अपमान होता है। खेड़े के गोत का सम्मान करना हमारी परम्परा रही है। सीम कै लागदे दूसरे गोत के गाम मैं भी शादी न करना म्हारी परम्परा रही सै। चार गोतों को छोड़कर शादी करना म्हारी परम्परा रही है। तीन दिन की शादी करना हमारी परम्परा रही है। आर्य समाज के शादी के नियम कहते हैं कि शादी के वक्त बराबरी की हैसियत से लड़का लड़की एक-दूसरे के साथ पति-पत्नी का संबंध स्वीकार करेंगे। विवाह व्यवस्था कसूते संकट मैं सै। गोत-नात जात-पात सब कुछ देख द्याख कै करे औड़ ब्याह एक-दो साल के भीतर तलाक पर आकै खड़े होज्यां सैं। क्यों? के जवाब सै म्हारे धोरै? समाज मैं कुदरतन विकास के कारण जो बदलाव आवैं सैं उनको रोकना ठीक नहीं होत्ता। जनता कै जिब समझ मैं आज्या सै तो वा बदलाव स्वीकार करले सै म्हारे पंचायती भाई स्वीकार करो चाहे मत करो। चाहे कितने ए फरमान जारी करल्यो? फरमान की आड़ मैं कत्ल करने आल्यां नै बचावण की कोशिश करनियां नै या कुदरत माफ कोन्या करै। या जद्दोजहद सदियां तै चालती आई सै इस समाज मैं, इसनै कोए नहीं रोक सकदा। रोक सकदे तो बल्दां की खेती तै के थोड़ा प्यार था हमनै। फेर बख्त बदल लिये। समझदार हैं वो लोग जो वक्त से पहले वक्त की धार पहचान कर अपने आप को बदल लेते हैं। इसलिए लत्ता औढ़ण तै इन्कार करण आली महिला को कुलच्छनी कहने की बजाए उसको शाबाशी देओ अक उसनै आज के बख्ता मैं इस अन्यायकारी परम्परा कै खिलाफ आवाज बुलन्द करी। बेमेल विवाह तो है ही यह। कई बार जवान होने पर देवर अपनी मर्जी की शादी भी कर लेता है। उस औरत को अपनी मर्जी से चुनाव करने का कोई हक नहीं है। इन परम्पराओं की समीक्षा आज के समय की मांग है। लोग इसमें मौजूद अन्याय की जगहों को अब पहचानने लगे हैं। देखना यही है कि इस विवाह संस्था के संकट से हम किस तरह से निबटते हैं। समाज को आगे ले जाने वाले रास्तों का चुनाव करते हैं या पीछे ले जाने वाले रास्तों का?

सोमवार, 29 मई 2017

हरियाणा की तिग्गी

हरियाणा की तिग्गी
तिग्गी का मतलब तीन चीजां का तिग्गड्डा मतलब तीन चीज इकट्ठी। एक तिग्गी का मतलब ताश की तिग्गी। पान की तिग्गी, ईंट की तिग्गी, चिड़ी की तिग्गी अर हुकम की तिग्गी। दूसरी तुरुप की तिग्गी। तुरुप की तिग्गी साधारण इक्के ने बी पढ़ण बिठादे सै। कई बै तिग्गी की ट्रेल दो इक्यां के पेयर का भी भूत बणादे सै। या ताशां की तिग्गी माणसां का बहोत सत्यानाश करै सैं। फेर जै ताशां की तिग्गी जब समाज का धुम्मां ठा सकै तो माणसां की असली तिग्गी समाज का के कर सकै सै या बात हरियाणा के हरेक माणस कै आसानी तै समझ मैं आ सकै। हरियाणा की किस्मत कहवां अक बदकिस्मत मेरे कम समझ मैं आवै सै। म्हारे हरियाणा मैं गऊ, गऊ का गोबर अर गऊमूत्र की तिग्गी नै सदियां तै गुल खिलाये सैं अर ईब तो हद होगी अक दुलिना मैं गउआं के बदलै 5 माणसां की बलि चढ़ाकै बहुत खुश हुये म्हारे समाजी भाई। हालांकि आज ताहिं सिद्ध नहीं हो लिया अक एक बी गऊ उन मरण आल्यां नै मारी थी। हरियाणे के समाज मैं एक तिग्गी और बताई - दलित विरोध, महिला विरोध और विज्ञान विरोध की तिग्गी। इस तिग्गी नै तो पढ़े लिखे माणसां के दिलां मैं भी घणी डूंगी जड़ जमा राखी सै वट वृक्ष की ढालां। इस तिग्गी का काम सै अक मजाल सै जै तर्क अर विवेक की खुली हवा किसे खिड़की के म्हां कै घर कै भीतर चली जावै। इसे ढाल कई ढाल की तिग्गी सैं जिन करकै हरियाणा में आर्थिक विकास तो होग्या फेर सामाजिक विकास कै कसूती कैंची मार राखी सै इन तिग्गियां नै। कई बर तो ये पिछाण मैं ए कोन्या आत्ती। आज ताहिं जिसनै इन तिग्गियां नै छेड़न की हिमाकत करी सै तो छेड़निया का ए नुकसान हुया सै। मजे की एक बात और सै अक तर्क, विवेक और वैज्ञानिक रुझान की तिग्गी नै सदिया तै इन सामाजिक अवरोध पैदा करण आली तिग्गियां ताहिं चुनौती दी सै अर आज बी देवण लागरी सैं। जब ब्रूनो नै कहया अक सूरज धरती के चारों तरफ कोनी घूमता बल्कि धरती सूरज के चारों कान्हीं घूमै सै तो ब्रूनो को धर्म, राष्ट्र अर परंपरा की तिग्गी नै जिंदा जला दिया था। आज बी कोए कैहकै तो देखो अक जिब कोए चीज जलै से तो कार्बनडायक्साइड पैदा हो सै मतलब वातावरण में असुद्धि पैदा हो सै फेर हवन मैं भी तो चीज जलैं सैं तो शुद्धि क्यूंकर होवै सै? खैर इसपै फेर कदे सही।
बात तिग्गियां पै चाल रही थी। हरियाणा मैं एक खास बात और देखण मैं आवै सै। राजनीति के दंगल मैं भी म्हारे हरियाणा महान मैं तिग्गियां की गलेट लागैं सैं। एक दौर सै हरियाणा मैं लाल तिग्गी का इसनै चाहे पान की तिग्गी कहवां चाहे ईंट की तिग्गी। मतलब बंसीलाल, भजनलाल अर देवीलाल की तिग्गी। इस तिग्गी का नतीजा सै यू अधखबड़ा हरियाणा। अधखबड़ा क्यूंकर? यो न्यों अक आर्थिक तरक्की मैं तो गोआ पाछै इसका दूसरा नंबर अर सामाजिक तरक्की मैं यू सबतै फिसड्डी। इसा हरियाणा का मॉडल या लालां की तिग्गी ए रच सकैं थी और किसे के बाक्स की बात नहीं थी या। इस तिग्गी नै समझले हरियाणा पै 1966 सै लैकै 1985 ताहिं राज करया। इस तिग्गी मैं भी फेर आगै तिग्गी देखी जा सकैं सैं। बंसीलाल, सरोज अर सुरिंदर की एक तिग्गी। कई साल पूरा हरियाणा इननै खूब मोर की ढालां नचाया। मजाल किसकी अक कोए चूं बी करज्या। न्योंए फेर एक तिग्गी उभरी देवीलाल, ओमप्रकाश चौटाला अर रणजीत सिंह की। फेर देवीलाल के रैहन्ते इस तिग्गी का एकछत्र राज कोन्या चाल्या। फेर जिब औम प्रकाश चौटाला, अभय अर अजय की तिग्गी आई तो हरियाणा के एक बै फेर भाग जाग्गे। विकास के कामां का ढूं मार के गेर दिया। मजाल सै जै किसी चौथे माणस के कैहंते पत्ता बी हिलज्या हरियाणा मैं। फेर हरियाणे आल्यां की यादाश्त बहोतै कमजोर सै अर थोड़े से दिनां मैं पाछली बातां नैं भूल ज्यावै सैं। इस तिग्गी नै हरियाणा मैं के के गुल खिलाये इसका किसनै नहीं बेरा। फेर बख्त तो परिवर्तनशील सै। इसे दौर में भजनलाल, चंद्रमोहन अर कुलदीप बिश्नोई की तिग्गी आई। या तिग्गी अपनी तुरुप चाल मैं फेल होगी अर इस ताहि एक दूसरी तिग्गी नै मात दे दी। या मात देवण आली तिग्गी बड़े कमाल की सै। या तिग्गी सै भूपेंद्र हुड्डा, दीपेंद्र हुड्डा अर आशा हुड्डा की हरियाणा मैं पड़गहाट उठरया सै। इस तिग्गी की चौधराहट के नशे-नशे मैं दो साल तो काढ दिये। फेर ईब मुशीबत होरी सै लोगां नैं। निरी चौधराहट तै कद पेट भरया सै। आई किम्मै समझ मैं हरियाणा की तिग्गी अक नहीं। म्हारे भारत देश मैं भी तिग्गी की अवधारणा कदे कदीमी तै चाल्ली आवै सै। ब्रह्मा शिव गणेश की तिग्गी नै कोण नहीं जानता। फेर ईब देखना योहे सै अक तर्क विवेक, वैज्ञानिकता की तिग्गी क्यूंकर हरियाणा मैं पैर फैलावै इन ढाल ढाल की तिग्गियां जो विकास विरोधी अर मानव विरोधी सैं उनतै निजात मिले। फेर हरियाणा आल्यां कै ईबै जच नहीं ली सै अक इस तिग्गी की जकड़न तै छुटकारा मिल सकै सै।

बहुत दुःख है

बहुत दुःख है
बहुत दुःख की बात है कि सरकार शिक्षा मैं आरक्षण लागू कर रही है। ऊंची जातियों वाले, अमीर परिवार वाले दुःखी हैं। मीडिया वाले, कारपोरेट वाले दुःखी हैं। राजनीति में पक्ष-विपक्ष वाले दुःखी हैं। सब ज्ञानीजन दुःखी हैं। ऐसा लगता है कि इस समय दुःख ही देश की कथा है।
ऊंची जातियों वाले दुःखी हैं कि हमने क्या बिगाड़ा था वी पी सिंह का और क्या बिगाड़ा था अर्जुन सिंह का। पहले उन्होंने मंडल लागू किया। अब ये मंडल लागू कर रहे हैं। पहले उन्होंने नौकरियों में पिछड़ों को आरक्षण दिया। अब ये शिक्षा में पिछड़ों को आरक्षण दे रहे हैं। यह दुःख उनका है जिन्हें शिक्षा और रोजगार में सदियों से आरक्षण हासिल रहा। सत्ताईस या उनचास फीसद नहीं। पूरे सौ फीसद।
खैर, उनका यह दुःख धीरे-धीरे गुस्से में बदलता है। गुस्से में वे जूते पालिश करने लगते हैं और सड़कों पर झाडू. लगाने लगते हैं। वे दिखाना चाहते हैं कि देखो आरक्षण लागू हुआ तो हम ऐसे ही घटिया काम करने को मजबूर होंगे। यह गुस्सा उनका है जिन्हें कभी इस अन्याय पर, इस समाज व्यवस्था पर गुस्सा नहीं आया कि कोई सदियों से झाडू. लगा रहा है और उनकी गंदगी साफ कर रहा है, कि कोई सदियों से उनके जूते पालिश कर रहा है।
फिर उनका यह गुस्सा नस्लवादी अहंकार में बदलता है। वे ऐंठते हुए कहते हैं कि ये पिछड़े, दलित और आदिवासी तो ऐसे ही रहेंगे। वे शिक्षा में हमारी बराबरी कैसे कर लेंगे? वे मैरिट में हमारा मुकाबला कैसे कर लेंगे? वे योग्यता में हमारे सामने कहां टिकेंगे। यह अहंकार उनका है जो कभी कोई कबीर पैदा नहीं कर सके, कभी कोई रैदास पैदा नहीं कर सके, रामचरितमानस के रचयिता तुलसी बाबा को जिन्होंने मस्जिद में शरण लेने पर मजबूर किया और भूले से भी ज्ञान की बात सुनने वाले शूद्रों के कानों में पिघला शीशा डलवाया।
पिछड़ों के लिए आरक्षण के खिलाफ यह दुःख, यह गुस्सा, यह नस्लवादी अहंकार उन लोगों का है जिन्होंने प्राइवेट मैडिकल और इंजीनियरिंग कालेजों में पैसे वालों के लिए सौ फीसद आरक्षण का कभी विरोध नहीं किया। कभी जुलूस नहीं निकाला, कभी कोई प्रदर्शन नहीं किया। वहां मैरिट नहीं होती। थैली होती है। यह दुःख, यह गुस्सा और यह अहंकार उन लोगों का है जिन्होंने डालर वाली एनआरआई औलादों के लिए जितना मांगो, उतने आरक्षण का कभी विरोध नहीं किया। वहां भी मैरिट नहीं होती। डालर होते हैं। यह दुःख, यह गुस्सा और यह अहंकार उन लोगों का है जो कहते हैं कि मैरिट और प्रतिभा का आदर नहीं किया गया तो घटिया डॉक्टर और इंजीनियर ही पैदा होंगे। मैरिट के इन दावेदारों ने प्राइवेट मैडिकल और इंजीनियरिंग कालेजों में कभी मैरिट नहीं मांगी। इन कालेजों से कितने योग्य डॉक्टर और इंजीनियर निकल रहे हैं, पूछिए।
आज वे पैसेवाले भी दुःखी हैं, जो हजारों-लाखों का डोनेशन देकर अपने बच्चों का अंग्रेजी स्कूलों में दाखिला कराते हैं। लाखों रुपए फीस और हजारों रुपए ट्यूशन देते हैं। हजारों रुपए कोचिंग सेंटरों में खर्च करते हैं ताकि उनके बच्चे मैरिट ले आएं। डाक्टर बनें, इंजीनियर बनें, वकील बनें, मैनेजर बनें। पर आरक्षण मिल गया दलितों को, आदिवासियों को और पिछड़ों को। उन्हें लगता है जैसे उनके सामने रखी नोटों की गड्डियां दलित, आदिवासी और पिछड़े ले उड़े।
मीडिया वाले भी दुःखी हैं कि देखो फिर से मंडल आ गया। वीपी सिंह गया तो अर्जुनसिंह आ गया। उनका दुःख है कि उस मंडल जैसा मंडल तो आया, पर उस मंडल जैसा मंडलविरोध नहीं आया। आत्मदाह तक नहीं हो रहे। कोई विजुअल ही नहीं मिल रहा। उन्होंने बड़ी स्टोरियां छापीं कि जिन्हें आरक्षण मिल रहा है, वे ही आरक्षण नहीं चाहते। कि आरक्षण से दाखिला पाने वाले चल ही नहीं पाते और वे बीच में ही छोड़कर भाग जाते हैं। उन्होंने बड़ी स्टोरियां छापी कि आरक्षण के विरोध में छात्र सड़कों पर उतर रहे हैं। एसएमएस अभियान चल रहा है। सारे देश के आरक्षण विरोधी छात्र दिल्ली में इकट्ठा हो रहे हैं। उन्होंने गुब्बारे में खूब हवा भरने की कोशिश की। ये दुःख उन लोगों का है जिनका दावा है कि वे प्रगतिशील हैं, न्याय के पक्षधर हैं।
कारपोरेट वाले भी दुखी हैं कि देखो इससे मैरिटवाले प्रतिभावान लोग आगे नहीं आ पाएंगे। इससे विकास और प्रगति पर बुरा असर पड़ेगा। अभी हम आर्थिक महाशक्ति बनने जा रहे हैं। दुनिया में अपने झंडे गाड़ने जा रहे हैं। यह दुःख उन लोगों का है जिन्हें कदम-कदम पर आरक्षण चाहिए। इनसेंटिवों के नाम पर। जिन्हें सरकारी बैंकों से कर्जे लेकर डकार जाने का आरक्षण चाहिए। जिन्हें सरकारी कारखाने और कंपनियां मिट्टी के मोल हथिया लेने का आरक्षण चाहिए।
सरकारी पक्ष दुःखी है। कमलनाथ दुःखी है। कपिल सिब्बल दुःखी है। वे कहते हैं कि हम आरक्षण के खिलाफ नहीं हैं। पर यह प्रतिभा की कीमत पर नहीं होना चाहिए। विपक्ष दुःखी है। भाजपा तो बहुत ही दुःखी है। तब वाले मंडल का मुकाबला तो रथयात्रा से कर लिया था, पर अब वाले मंडल का मुकाबला कैसे करें। अब तो रथयात्राओं को बीच में छोड़ना ही पड़ रहा है। वे कहते हैं कि समाज बंटना नहीं चाहिए। वैसे हम आरक्षण के खिलाफ नहीं हैं। यह दर्द उनका है, जिन्हें पिछड़ों, दलितों और आदिवासियों का वोट बैंक अवश्य चाहिए।
अब तो ज्ञानीजन भी दुःखी हो गए। ज्ञानीसम्राट सैम पित्रोदा कह रहे हैं कि ज्ञान उपयोग के आठ में से छह ज्ञानी आरक्षण के खिलाफ हैं। वे कहते हैं कि वैसे हम आरक्षण के खिलाफ नहीं हैं, पर ऐसे आरक्षण के हम खिलाफ हैं। यह दुःख उन सैम पित्रोदा का है, जो भारत के नागरिक तक नहीं हैं।
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स्कूल कड़ै जा लिये ?

स्कूल कड़ै जा लिये ?
फत्ते बोल्या - इन स्कूलां का सत्यानाश जा लिया। सविता बोली - बहोत तावली बेरा लाग्या। कविता बोली - स्कूलां की किसै नै चिंता ए कोन्या दीखती। सरपंच के बालक प्राइवेट स्कूल मैं जावैं। हैडमास्टर जी के दोनूं बालक दिल्ली पढ़ैं। डाक्टर प्रदीप नै अपने बालक स्नावर मैं भरती करवा दिये। सविता बोली - कदे बख्त थे जिब स्कूल की पूरी की पूरी बिल्डिंग रिटायर्ड फौजी रिसाल सिंह साहब नै अर पूरे गांम नै खड़े हो कै बनवाई थी। बाजे भगत का सांग तीन दिन हुया था गाम मैं अर ढाई लाख रुपये कट्ठे होगे थे उन बख्तां मैं। फत्ते बोल्या - आज कोए ढाई आने देकै राज्जी कोन्या। सत्ते बोल्या - असल मैं सरकारी स्कूलां मैं पढ़ाई का भी तो भट्ठा बैठ लिया। फत्ते बोल्या - भट्ठा बिठाया किसनै? कविता बोली - भट्ठा बिठाया म्हारी शिक्षा की नीतियां नै अर रही सही कसर गाम आल्यां नै पूरी करदी। स्कूलां मैं जाकै इनकी संभाल करनी बंद करदी। गुटबाजी होगी गाम मैं। बदमाशां नै सिर जोड़ लिये अर घणी ठाड्डी यूनियन बणाली अपनी। सविता - के नाम सै इनकी यूनियन का? कविता - यूनियन का नाम कोन्यां फेर असामाजिक तत्वां की यूनियन सै ऊपर ताहिं। ये स्कूल का माहौल खराब राखैं सै अर इननै बचावण नै ऊपर आले तैयार रहतै सैं। महिला टीचरां गेल्यां बहोत बुरा बर्ताव होरया सै स्कूलां मैं। सत्ते - ईबतै महिलावां अर छोरियां गेल्यां पूरे समाज में बुरा बर्ताव होरया सै। फत्ते - बात सही सै फेर जै स्कूलां मैं ये सिरफिरे मास्टर जिनकी संख्या मुट्ठी भर सै जै लड़कियां गेल्यां यौन उत्पीड़न करैं सैं तो या तो घणी माड़ी बात सै ना। कविता - 6 तैं 19 फरवरी के एक पखवाड़े में हरियाणा के सरकारी स्कूलां में कई मास्टरां द्वारा छात्रावां का यौन शोषण लगातार करण करकै आठवीं, नौवीं की मासूम लड़कियां के गर्भवती होवण की खबरां नै मेरा तो दिल हिला कै धर दिया। मनै थारा बेरा ना। फत्ते - झकझोर कै तो हम भी धर दिये। शिक्षक-शिष्य संबंध नै म्हारे आड़ै सारे संबंधां मैं सबते पवित्र संबंध मान्या जावै सै। सविता - 6 तारीख नै ढराणा झझर, 8 तारीख नै दुर्जनपुर जींद, 9 तारीख नै रानिया, 17 तारीख नै बराड़ा अंबाला तै ये खबर ज्यूकर चारों कान्हीं तै आई तै हरियाणा का चूची बच्चा हिलग्या। फत्ते - जित माणस बणण की शिक्षा दी जावै, उड़े इतनी घिनौनी हरकत? मेरै तो जणों सन्नपात सा मारग्या।
कविता - मेरी कई बर स्कूल, कालेज अर यूनिवर्सिटी मैं पढ़ण आली लड़कियां तैं बात हुई सै। ये एक दम तै हुई चाण चक आली घटना कोन्या। हकीकत या सै अक स्कूल तै ले कै यूनिवर्सिटी ताहिं मैं प्रेक्टिकल के नम्बर कम लावण की, लैक्चर शार्ट करण की, इन्टरनल एसैसमेंट खराब करण की, खेलां में सलेक्शन ना होवण देवण की, पेपरां में पास ना होण देवण की, प्रवेश परीक्षावां मैं फेल करण की, पीएचडी पूरी ना होवण देण की आड़ लेकै छात्रावां का कई अध्यापकां अर कर्मियां द्वारा यौन शोषण एक घणी गहरी अर दूर-दूर ताहिं फैली समस्या है। जै इनै घटनावां नै देखां तो एक-एक स्कूल में इस हिंसा का शिकार होवण आली छात्रावां की बड़ी संख्या, स्कूलां मैं पाये गये कंडोम, गर्भपात की दवाइयां, चौकीदार तै लेकै डीईओ ताहिं का इसे काले कामां मैं शामिल होना, इसे कोढ़ी मास्टरां पै बख्त रहन्ते कार्रवाई करण के पंचायतों के प्रस्तावां तक की डीईओ बरगे अफसरां द्वारा अनदेखी, ऊंची जागां पै बैठे लोगों की आम अध्यापकों के बारे मैं बयानबाजी अर इन कोढ़ी मास्टरां नै बचावण की तलै ए तलै कोशिश बहोत किमै कहवै सै।
सविता बोली - म्हारी सरकार अर प्रशासन इन घटनावां नै अध्यापकां की नैतिक गिरावट, मानसिक विकार आदि कहकै अर एकाध अपराधी के खिलाफ आधी-अधूरी कार्रवाई करकै आंख्यां मैं धूल झोंकण की कोशिश करैं सैं। फत्ते बोल्या - मनै सुन्या सै लड़कियां के स्कूलां मैं पुरुष अध्यापक नहीं लाये जावैंगे। सत्ते बोल्या - घर मैं मां तो रहै सै, इस हिसाब तै बाबू काका अर पड़ोसी बी ताहने पड़ैंगे फेर तो। सविता बोली - मेरे आर्य समाजी भाई तो न्यों बी कहवैं थे अक सहशिक्षा नहीं होनी चाहिये। इसनै सत्यानाश कर दिया म्हारा फेर उनतै कोए न्यूं बूझै एक फेर बीर मरद नै गाड्डी के दो पहिये क्यों बताया करैं? कमला चुपचाप सुनै थी वा बोली - न्यों बी कैहन्ते पाज्यांगे अक आज काल ये छोरी बी कम कोन्या रैहरी। तरां-तरां की बेसिर पैर की बात बी सुणण मैं आरी सैं। न्यों कहवैं सैं अक लुगाई की जागां घर मैं सै। बाहर जाणा ए खतरे तै खाली कोन्या। सविता बोली - घर मैं कड़ै सुरक्षित सै या? घरेलू हिंसा के थोड़ी सै? बलात्कार की घटनावां मैं आधा कोढ़ घरक्यां कै रिश्तेदारां कै ए तो जिमै लागै सै। महिला ना बाहर सुरक्षित ना घर मैं सुरक्षित तो कड़ै जावैं? कविता - जावैं कड़ै फांसी खावैं अर सुरग मैं जागां पावैं।
फत्ते बोल्या - फांसी खायें कोन्या काम चालै। महिला पुरुष दोनूआं नै मिलकै लड़ना पड़ैगा। जिबै कोए राह लिकड़ैगा। सत्ते - और के इन घटनावां के खिलाफ बी तो लोगां नै राह रोके, स्कूल बंद करे, इन कोढ़ियां कै खिलाफ कार्रवाई की आवाज ठाई सै। कविता - फत्ते या बात तो सही सै अर शुभ संकेत बी सै फेर निहित स्वार्थां नै, असामाजिक तत्वां नै हालात काबू कर लिये अर ‘गाम की इज्जत’ की दुहाई दे कै न्याय की पुकार पै बर्फ की सिल्ली धर दी। सत्ते - जातिवादी पंचायत बी गाम भाईचारे अर इज्जत की दुहाई दे कै उत्पीड़ित लड़कियां के परिवार आल्यां नै अपने बयान बदलन खातर मजबूर करण लागरी सैं। रोहतक जिले का मातो भैणी गाम सै उसके स्कूल की पांचमी क्लास की दो छात्रावां नै हैडमास्टर कै खिलाफ लिखित बयान दरज करवाये। धर्म सिंह जो बाद मैं आया था बोल्या - फेर कुछ हुआ नहीं उस हैडमास्टर का? सविता - ना के होना था। एमएलए की दाब मैं दोनों पक्षों का समझौता होग्या। फत्ते - मतलब बलात्कार करो अर फेर समझौता करल्यो? सत्ते - पूरे समाज में सड़ांध मारण लागली। फेर राह कोए दीखता ना। कमला बोली - मेरै तो उन ज्ञान विज्ञान आल्यां की बात समझ मैं आई। कविता - के कहया था उननै जिब पाछै सी गाम मैं आरे थे। कमला - उसनै कहया था अक म्हारी लड़ाई कोए दूसरा लड़ण कोनी आवै। म्हारी अपनी लड़ाई हमनै खुद लड़नी पड़ैगी अर गाम-गाम मैं नये समाज सुधार आंदोलन की खातर शरीफ, ईमानदार, गरीब, अमीर, दलित, महिला, युवा सबनै सिर जोड़ कै न्यारी लीक पाड़नी पड़ैगी अर हाल साल का जो यो खरना सै यूं बदलना पड़ैगा।

लकीर हाथ की

लकीर हाथ की
पंडित देशराज नै धर्मवीर की दाईं हथेली अपने हाथ मैं पकड़ी, उसे ध्यान से सब तरफ से देख्या अर बोल्या - तुम बहोत भाग्यशाली हो। तुम्हारी विद्या रेखा बहोत साफ सै। तुम जरूर डाक्टर बनोगे। नौजवान धर्मबीर ने राज्जी होकै बूझ्या - या कौन-सी लकीर सै? देख या रही - पंडित जी नै दिखाई। धर्मबीर पंडित जी तै बोल्या - फेर या तो लकीर म्हारे लख्मी दादा कै तो कति नहीं रही होगी? मैं जाकै देखूंगा अक मेरी दादी अर दादा कै या लकीर सै अक नहीं सै। वे तो एक हरफ बी कोनी पढ़े। हाथ की लकीरों का इस तरिया मजाक नहीं उड़ाना चाहिए। यो भी एक विज्ञान सै।
धर्मबीर बोल्या - ना! ना! मैं मजाक नहीं उड़ाऊं था। फेर साच माच का सवाल उठ्या था मेरे मन मैं। आच्छा पंडित जी न्यों बताओ अक मैं कद मरूंगा? पंडित जी नै उम्र आली लकीर की जांच-पड़ताल करी अर बोल्या - 72 साल तै पहलम कोनी मरदा। फेर तेरी मौत कैंसर तै होवैगी। धर्मबीर बोल्या - मैं कितना किस्मत आला सूं। ईब मैं बिल्कुल चिंतामुक्त जीवन जी सकूं सूं। मनै एड्स की बीमारी लगने की भी कोए चिंता नहीं रही। मेरै कोए गोली या बम मारकै मन्ने नहीं मार सकता इस करकै मैं सेना मैं अफसर बन सकूं सूं। पंडित जी कुछ नाराज होगे। धर्मबीर ने तसल्ली देनी चाही - नहीं मैं मजाक नहीं कर रहा। थारी बातां तै साच माच मैं मेरी चिंता दूर होगी। ईब मनै एक और जरूरी बात भी बूझनी सै अक के इसी कोए भी संभावना सै अक मनै पुलिस पकड़ कै ले ज्यावै, मुकदमा चलावै अर जेल की हवा खिलावै?
पंडित जी नै पूरे विश्वास तै जवाब दिया - नहीं कोए संभावना कोनी। तूं एक बड्डा अफसर बनैगा। धर्मबीर बोल्या - बहुत बढ़िया। ईब मैं निडर होकै उस बदमाश की हत्या कर सकता हूं अर फेर सेना मैं भर्ती हो ज्यांगा। पंडित जी नै बूझी - किस बदमाश की? धर्मबीर बोल्या - उस धोखेबाज नर सिंह की। मनै पक्का यकीन है अक मेरा मोबाइल उसनै ए चोरी करया सै। पंडित जी - फेर इतनी छोटी-सी चीज की खातर किसे ताहिं मार देना अपराध सै। जै पुलिस नै बेरा लाग्या तो? धर्मबीर - लेकिन आपने ही तो कह्या सै अक इसी कोए संभावना नहीं अक पुलिस मनै पकड़ सकै। असल मैं अपराध बरगी कोए चीज नहीं होन्ती। पंडित जी - अपराध बरगी कोए चीज नहीं होन्ती? क्या बकते हो? धर्मबीर - हमारे पैदा होने से पहले ही हमारा भाग्य तय हो चुका है। तो अगर मैं उसको मार भी डालता हूं तो यो पहले से तय है। किसे बड्डी ताकत नै तय करया। सारे उस बड़ी शक्ति के आदेशां पै काम करण लागरे सैं।
पंडित जी बोले - मनै बेरा पटग्या अक तूं नास्तिक सै। धर्मबीर - नाराज मत हो। मैं तो मजाक करूं था। किसे नै भी मेरा मोबाइल नहीं चुराया। क्या आपको मालूम है कि हमारी हथेली मैं इतनी लकीरें क्यों होती हैं? पंडित जी - भविष्य बताने के लिए और किस लिए? धर्मबीर - अपना हाथ ढीला करो। अपनी हथेली की चमड़ी को चुटकी मैं पकड़ कै खींचो। या काफी लचीली अर ढीली सै। ईब रेखाओं नै खींच कै देखो। ये नहीं खींचरी क्योंकि रेखाओं पर चमड़ी नीचे की मांसपेशियों से मजबूती से जुड़ी हैं। क्यों? क्योंकि यदि आप हथेली से कुछ भी पकड़ना चाहते हैं तो आपको इसे मोड़ना होगा। मोड़ने से मांसपेशियां फूल जाती हैं और चमड़ी ढीली पड़ जाती है। मगर चमड़ी हर जगह ढीली होगी तो पापड़ की तरह फूल जायेगी अर आप कुछ भी नहीं पकड़ सकोगे। इनसान के विकास के समय ये गोड़ रेखायें बनी थीं। पंडित जी - तो हाथ पढ़ना मूर्खता है? धर्मबीर - मूर्खता नहीं तो क्या है? जरा सोचो मेरे भाई अर मनै बी बताइयो अक जितने हजारों लोग सुनामी मैं मरे उन सबकी एक जिसी आयु रेखा रही होगी के?

बल्ले बल्ले रेशनलाइजेशन

बल्ले बल्ले रेशनलाइजेशन
कई दिनांतै एक शब्द पढ़ण अर सुणन मैं आ वै सै - रेशनलाइजेशन। बेरा सै के मतलब सै इसका? शिक्षा के जगत मैं इसका मतलब सै शिक्षा जगत का सुधारीकरण। स्कूली शिक्षा मैं जितने बिगाड़ पैदा होगे उन सबकी एकै राम बाण दवाई सै अर वा सै शिक्षा का सुधारीकरण अर सुधारीकरण का मतलब सै शिक्षा का निजीकरण। कहवण नै कहया जा सै अक शिक्षा मैं सुधार करया जागा अर गुणवत्ता ल्याई जावैगी। बालकां की पढ़ाई लिखाई अर उनका ठीक-ठ्याक सा रोजगार येहे दो चिंता सैं घणखरे मां-बापां की। शिक्षा का गिरता स्तर, आपाधापी अर नकल, पेपर लीकेज, प्रमाण पत्र अर डिग्रीयां की बिक्री स्कूल स्तर तै ले करके उच्च स्तर ताहिं की प्रतियोगी परीक्षावां के परीक्षा परिणामां में हेराफेरी अर और बेरा ना के-के होवण लागरया सै। एक बर की बात सै अक रमलू ताई की चाक्की राहवण चाल्या गया। घरां ताई एकली थी। पानी ल्यावण का बख्त होरया था। ताई ने सोच्ची अक इतनै रमलू चाक्की राहवै इतनै पाणी की दोघड़ भर ल्याऊं। ताई पाणी नै चाली गई। रमलू नै भूख लागरी थी। भूख-भूख मैं जोर की चोट लागगी अर चाक्की के पाट के तीन टूक होगे। सोची ले रोटी खा ल्यूं। बोइहया मैं तै रोटी ले ली तो ऊपर नै उठ्या तो ऊपर घीलड़ी लटकै थी उसकै सिर लाग्या अर वा पड़कै फूटगी। फेर सोच्ची अक कढावणी मां तै मलाई तारके उसकी गेल्यां रोटी खाल्यूं। कढावणी मैं तै मलाई तारण लाग्या तो कढ़ावणी लुढकगी अर सारा दूध गया हारे मैं। इतनै बाहर ताई की आवाज सुणी रमलू नै तो उसनै सोच्ची चाल भाजले आली ताई। भाजते-भाजते रमलू ताई की गेल्यां देहलियां पै भिड़ग्या। ताई की दोघड़ पड़कै फूटगी। तो ताई माथै हाथ मारकै बोली - रे रमलू तनै रोल्यूं। तो रमलू छुटद्या ए बोल्या - ताई ईब्बै कैसे ज्यूं-ज्यूं भीतर बड़ैगी त्यूं त्यूं रोवैगी। फेर बात थी म्हारी स्कूली शिक्षा की हालत की तो जितना गहराई मैं जावांगे जितना भीत्तर बड़कै देखांगे उतना ए रोवणा बी फालतू आवैगा।
सवाल यू है सै अक करया के जावै? हाथ पै हाथ धरकै बैठे रहवां। हाथ-पां हिलावां तो किन मुद्या पै हिलावां? गैलयां बात या बी सै अक आपां सबतै पहलम इस समस्या नै ठीक-ठीक जागां तै समझल्यां। हां तै इस रेशनलाईजेशन के नाम पै अध्यापक छात्र अनुपात 1ः60 कर दिया अर इस ढालां अध्यापकां का भी वर्क लोड बढ़ा दिया। एक और तरीका सै। मान लिया प्लस टू के स्कूल जिनमैं साइंस बी सै सौ स्कूल सैं। इनमैं 55 बायोलोजी के, चालीस कैमिस्ट्री के अर 35 फिजिक्स के लैक्चरर सैं। इसमैं होना तो यू चाहिये था अक कम तै कम 25 स्कूलां मैं तो तीनों सबजैक्टां के टीचर लाये जात्ते। उलटा ये सौ टीचर सौ स्कूलां मैं न्यारे-न्यारे ला दिये। जिस स्कूल मैं कैमिस्ट्री का टीचर कोन्या। तो बालक क्यूं दाखला लेंगे $2 मैं साइंस मैं। जिब बालकां नै दाखिला नहीं लिया तो उस स्कूल मैं वो फिजिक्स आला टीचर बी सरप्लस होग्या।
म्हारे हरियाणा मैं कितने स्कूल सैं बेरा सै के? कोनी बेरा। मास्टर जी धोरै बूझ कै देख। उसनै बी कोनी बेरा। हां तै हरियाणा मैं 8710 प्राथमिक, 1455 माध्यमिक, 1751 उच्च अर 1090 वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय सैं। इन मां तै बहुत से स्कूलां के मुखिया पद कई-कई बरस तै खाली पड़े सैं। मिडल स्कूल मैं 8 साल पहलम मुख्याध्यापक लाये थे। उस पाछै कोए पदोन्नति नहीं करी। प्राथमिक विद्यालयों के हैड टीचर के पद समाप्त करण की गुप्त योजना घड़ी जावण लागरी बताई। स्कूल का स्तरोन्यन (दर्जा बढ़ाई) राजनैतिक आधार पै करी जावै सै अर उड़ै अध्यापकां के पद स्वीकृत नहीं करे जान्दे। प्राध्यापक कोन्या भेजे सरकार नै इस कर कै ज्यादातर ग्रामीण विद्यालयों मैं विज्ञान अर वाणिज्य संकाय बंद करने पड़े सैं। गुणवत्ता बढ़ावण के नाम पै पहली जमात तैए अंग्रेजी पढ़ावण अर कम्प्यूटर शिक्षा देवण का काम बहोत बड़ी उपलब्धी के रूप में पेश करया जावै सै। अंग्रेजी शिक्षा शुरू करण का दावा आत्मवंचना के अलावा कुछ नहीं सै। कोरा थोथा नारा सै। सच्चाई तो या सै अक छटी तै दसवीं जमात तक अंग्रेजी अनिवार्य विषय बताया, फेर पूरे प्रदेश मैं अंग्रेजी अध्यापक का एक बी पद स्वीकृत नहीं सै, पहली तै ले के दसवीं जमात ताहिं। देख्या कमाल। दूजे कान्हीं कम्प्यूटर शिक्षा के जरिये डाटा इन्फोटेक व हाइट्रोन का धंधा जरूर जमवा दिया अर गेल्यां ए अपणा बी जमा लिया। कम्प्यूटी की फीस न दे पावण करकै निर्धन बालक पढ़ाई छोड़ देवण की खातर मजबूर करे जावैं सैं। खासकर दलित वर्ग के बालक अर लड़कियां इसके सबतै बड्डे शिकार सैं। दो बरस हो लिए फेर किसे बी नये खोले गये अर कै स्तरोन्नत करे गये। विद्यालय मैं अध्यापकां-प्राध्यापकां के पद स्वीकृत नहीं हो लिये। क्यों? इसका जवाब कौन देवै। बिल्ली के गल मैं घंटी कौन बांधै? दूसरे स्कूलां मां तै प्रतिनियुक्ति पै अध्यापक भेज राखे सैं। नतीजा यू हुया अक कौवा चल्या हंस की चाल, अपणी बी भूल बैठ्या, ना पुराने स्कूल मैं ठीक पढ़ाई चाल रही अर नये मैं तो चालै ए क्यूकर थी।
सैमस्टर प्रणाली बिना सोचे-समझे लियाये। इम्तिहान मैं आब्जैक्टिव टाइप विधि लियाये। तैयारी कोए कर नहीं राखी। डीपीईपी प्रोग्राम पढ़ण बिठा दिया, ईब सर्व शिक्षा अभियान नै पढ़ण बिठा देंगे। बेरा ना जनता इननै कद पढ़ण बिठावैगी अर पहलम की ढालां स्कूल अपनी रहनुमाई मैं चलावैगी। ओ दिन एक ना एक दिन आवैगा जरूर। मेरे बीरा ताश खेलते-खेलते इन बातां पै बी चरचा तो करे लिया करो। आम तौर पै कहया जा सै अक मास्टर पढ़ाते कोन्या स्कूलां मैं। याहे बात न्यों बी कही जा सके सै अक म्हारी सरकार अर म्हारी जनता कोन्या चाहती अक सरकारी स्कूलां मैं पढ़ाई हो। जिस दिन ये दोनूं धड़े चाहवैंगे, उस दिन स्कूलां की हालत जरूर सुधरैगी अर असल मैं असली रेशनलाइजेशन शिक्षा जगत मैं होवैगा।

किस्सा कोठी का

किस्सा कोठी का
सत्ते, फत्ते, नफे, सविता, कविता, सरिता अर भरपाई शनिवार नै आ बैठे भरपाई के घर मैं। चर्चा चाल पड़ी। नफे नै बूझ लिया - सत्ते कित गया था काल? सत्ते बोल्या - शहर मैं कोठ्ठी पै गया था छोरे की भरती खातर। फत्ते बोल्या - आजकल तो कोठियां का ए बोलबाला सै। हर ज़िले मैं एक कोठ्ठी मशहूर सी होरी सै अर डीसी का आधा दफ्तर तो कोठ्ठी पर तै ए चालै सै। मैं तो एक ज़िले की कोठ्ठी का कसूता भुगतभोगी रह्या सूं। 1999 का साल रह्या होगा। सीनियर सैकेंडरी की वार्षिक परीक्षा मैं बतौर केंद्र अधीक्षक के मेरी ड्यूटी आगी। मैं इसे ढाल की ड्यूटी तै हमेश्या बचण की कोशिश करया करूं। मनै एकाध बर इसे ढाल की ड्यूटी दी सै। वा भी जिब दी जिब इसतै बचण का कोए रास्ता नहीं बच्या। थारे दिमाग मैं सवाल उठ्या होगा अक मैं इस ड्यूटी तै क्यों बचना चाहूं सूं। सीधी सी बात सै अक मैं इसके काबिल नहीं सूं। इम्तिहाना तै दो दिन पहलम बेरा लागै सै अक इबकै ड्यूटी कड़े की सै। कुछ लोग तो पहलमै बेरा पाड़लें सैं अक उनकी ड्यूटी कित लागी सै। अर कुछ तो अपनी पसंद की जगहां भी ड्यूटी लुवा ए लेवैं सैं। कई बर तो कुछ विद्यालयों के इन्चार्ज अपनी मर्जी तै अपनी पसंद के केंद्र अधीक्षकां की ड्यूटी लुवा ले सैं। एक-दो बर मेरे तै भी इसे तरां की ड्यूटी खातर ऑफर आई, फेर मैं ऑफर एक्सैप्ट कोनी कर पाया। ईबकै मेरी ड्यूटी देवशाला केंद्र पै लागगी। परीक्षा तै एक दिन पहलम मनै पहोंचना था। मैं तड़कै 10 बजे देवशाला की खातर लिकड़ लिया। कैम्प पै पहोंच कै कमरयां की निगरानी, लिपिक की व्यवस्था अर पहले पेपर की पूरी तैयारी करी। इतनी वार मैं एक महाशय आये अर मनै न्यों बोले अक मैं थामनै लेणे शहर गया था थारे घरों अपनी गाड्डी (कार) लेकै। थाम रोज क्यूं दुखी होवो आण-जाण मैं। थामनै मैं लियाया अर छोड़ाया करूंगा। उसनै कहया अक ये सारे बालक अपने सैं। मेरी तो याहे इच्छा सै अक इनका क्यूकरै भला होज्या। मनै उसका धन्यवाद करया अर उसका ओ प्रस्ताव स्वीकार कोनी करया। मैं तो घरां उल्टा आग्या। पाछे तै उस महाशय नै उन मास्टरां तै संपर्क साध्या जो सुपरवाइजर के रूप मैं उस सेंटर में ड्यूटी पे आणे थे। वे सारे नेड़े-धोरे के गामां के थे। उन मास्टरां गेल्यां के बात करी इसका बेरा मनै कोन्या लाग्या उस बख्त।
आगले दिन पहला पर्चा शुरू हुया। सारे बालक खुल्लम-खुल्ला नकल करना चाहवैं थे। मैं नहीं चाहूं था अक इस ढाल खुल्लम-खुल्ला नकल होवै सैंटर मैं। कुछ तो धरया ढक्या रैहणा ए चाहिए। फेर मेरे सारे के सारे सुपरवाइजर बगावत पै उतरेंगे। वे खुल्लम-खुल्ला नकल के हक मैं थे। मेरी बात नै कानां पर कै टाल जां थे। जिब मैं दीख ज्याऊं तो नकल रोक्कण का दिखावा सा कर दें ना तो कोए लेना-देना नहीं था। मेरी बी फिरकी बनगी। एकै बर मैं सारे कमरयां मैं जाणां पड़या। मेरी दिल तै इच्छा थी अक नकल नहीं होवण द्यूं। फेर रोकूं तै रोकूं क्यूकर? स्कूल का हैडमास्टर चाहवै, सुपरवाइजर चाहवैं, बालक चाहवैं अर उनके मां-बाप चाहवैं नकल करवाणा। मनै बी बेरा था अक मैं नकल पूरी तरियां कोन्या रोक पारया। हां, कुछ कंट्रोल जरूर कर पारया था। सांझ नै जब घरां उल्टा आवण लाग्या तो धमकी दी गई। फेर दो पेपर तो मनै किसे तरियां बिना नकल के करवा दिये। तीसरे दिन उड़नदस्ते मैं एक बड़े शिक्षा अधिकारी आगे। उनके साथ एक अध्यापक भी थे। मैं उस अध्यापक जी नै बहोत आच्छी तरियां जानूं। शिक्षा अधिकारी जी नै पहलम तो चारों कान्ही का केंद्र का दौरा करया। दिखावे खातर मेरे तै बूझया भी अक केंद्र किसा चालण लागरया सै? उननै इन्सपैक्सन बुक मैं टिप्पणी भी बढ़िया कर दी। फेर वे अपनी कार मैं जाकै बैठगे। उननै उस अध्यापक के कानां मैं कुछ घुस-फुस करी अर मेरे को अपने पास बुलाया। अधिकारी बोल्या - फते सिंह। मैं हैरान था अक अधिकारी नै मेरे नाम का क्यूकर बेरा लाग्या। खैर उस अध्यापक नै ए बताया होगा मेरा नाम। अधिकारी नै मेरै तै कह्या अक केंद्र नै ठीक-ठ्याक चला ल्यो। इस ठीक-ठ्याक का मतलब था मैं कुछ ढील द्यूं। फेर अधिकारी आगै बोल्या अक काल कोठ्ठी पै गाम की पंचायत आरी थी। कोठ्ठी पै या चर्चा थी अक इसा केंद्र अधीक्षक देवशाला गाम के केंद्र पै ठीक नहीं। यो कोठ्ठी का चुनावी हलका सै। आड़ै इतनी सख्ताई ठीक कोन्या। अधिकारी आगै बोल्या अक कोठ्ठी पर तै मेरी ड्यूटी लागी सै अक कै तो केंद्र ने ठीक-ठ्याक चलवाद्यो मतलब नकल होवण द्यो के फेर अधीक्षक नै हटा कै कोए बढ़िया अधीक्षक लगा दयो। अधिकारी विकल्प के रूप मैं पिवानी स्कूल तै एक भौतिकी का अध्यापक गेल्यां लैके भी आरे थे। मनै कहया अक मैं तो केंद्र नै ठीक-ठ्याक चलावण लागरया सूं। नकल तो मैं कोन्या होवण द्यूं। भला हो अधिकारी का। उसनै तुरत-फुरत मेरे ताहिं रिलिविंग चिट पकड़ा दी। बाकी दिनां की परीक्षाएं कोठ्ठी के मुताबिक हुई।

बढ़िया ब्यौंत, घटिया सेहत

बढ़िया ब्यौंत, घटिया सेहत
भारत देश में दुनियां मैं सबतै फालतू मैडीकल कालेज सैं। विकासशील देशां मैं भारत सबतै फालतू डाक्टर तैयार करै। इन डाक्टरां का निर्यात कर्या जावै सै कई देशां मैं अर हुनर के हिसाब तै भी ये डाक्टर ‘बेस्ट’ माने जावैं सैं दुनियां मैं। भारत देश मैं ‘मैडीकल टूरिज्म’ का व्यापार बढ़ता आवै सै। दूसरे देशां के लोग आड़ै अपणा इलाज करवावण की खातर आवैं सैं। इसका मतलब आड़ै की स्वास्थ्य सेवाएं घाट नहीं सैं किसे तै। दूसरे देशां के लोग जिन अस्पतालां मैं इलाज करवावैं सैं इनका मुकाबला दुनिया के ‘बेस्ट’ अस्पतालां तै कर्या जा सकै सै। म्हारा भारत देश महान दवाई बणावन मैं चौथे देश के नम्बर पै आवै सै अर आड़ै बणे औड़ दवाइयां का बी बड़े पैमाने पै निर्यात कर्या जावै सै। एड्स की दवाई तो विकसित देशां के मुकाबले मैं बहोतै सस्ती बनावै सै भारत देश की सिपला कम्पनी। कड़ थेपड़ण की खातर बहोत सैं इतनी काम्मल काम्मल बात। बाहर आले लोगां के स्वास्थ्य की तो जिम्मेदारी ठाली फेर भारत देश की जनता के स्वास्थ्य की के हालत सै? इसमैं कोए शक की बात नहीं सै अक ये सारे काम करने की खातर ‘रिसोरसिज’ की जरूरत तो होए सै। पीस्यां की बी अर माणसां की बी।
इसमैं बी कोए शक नहीं सै अक लोग स्वास्थ्य के ऊपर खर्च करने में वार कोनी लान्ते अर दूसरे विकासशील देशां के मुकाबले मैं फालतू खर्च करैं सैं। म्हारे धोरै इस क्षेत्र में इतने मार्के के ‘रिसोरसिज’ होन्ते होए भी जब कई गामां मैं अर शहरां मैं जाकै जनता के स्वास्थ्य के बारे मैं जानना चाह्या तो बहोत ताज्जुब हुया जब न्यों देख्या अक इन सबके बावजूद बड़ी तादाद मैं जनता की पहुंच तै दूर सैं ये क्वालिटी स्वास्थ्य सेवाएं। इसे करके स्वास्थ्य के क्षेत्र के आंकड़े भी बढ़िया कोन्या भारत देश के दूसरे देशां के मुकाबले मैं। टीकाकरण का स्तर घणा ए नीचै सै। हांगा लाकै 50 प्रतिशत तै भी कम बालकां का पूरा टीकाकरण हो पाया सै। इसे तरियां गर्भवती महिला के तीन चैक-अप होने चाहिये। फेर 50 प्रतिशत गर्भवती महिलाओं के न्यूनतम चैक-अप बी कोन्या होन्ते। जो स्वास्थ्य सेवाएं म्हारे धौरे सैं भी उनकी ‘असैस’ उपलब्धता मैं भारी असमानता पाई जा सै। जो जितना अमीर सै उस खातर उतनी बढ़िया अर खर्चीली स्वास्थ्य सेवाएं हाजिर सैं। फेर ग्रामीण क्षेत्रां मैं तो बची खुची खुरचन के हिसाब की रूडिमैंटरी स्वास्थ्य सेवाएं भी उपलब्ध कोन्या। दाखिल होवण आले मरीजां मैं अमीरां की संख्या कम तै कम छह गुणा फालतू सै गरीबां के मुकाबले मैं। देखी म्हारी ‘क्वालिटी’ स्वास्थ्य सेवाएं?
इतना भारी भरकम दवा उद्योग भारत देश मैं जो पूरी दुनिया के कई देशां मैं इन दवाइयां का निर्यात करण लागर्या जबकि भारत की दो तिहाई जनता नै आवश्यक ‘एसैनसियल’ दवाइयां का बी टोटा सै। भारत देश ‘पैरोडोक्सिज’ का अद्भुत देश सै। एक कान्हीं तो अमीर घरां की औरत ‘अननैसेसरी सिजेरियन’ आपरेशनां ते दुखी। शहरां में आधी ‘डेलिवरी’ जाप्पा आपरेशन तै होवै सैं जबकि ग्रामीण क्षेत्रां की गरीब महिलाएं बच्चे नै जन्म देवण के बख्त बहोत बर मरज्यां सैं, इसे सिजेरियन आपरेशन की सुविधा उड़ै ना होवण करकै। हालांकि जनता स्वास्थ्य पै बहोत खर्च करै सैं। गरीब तै गरीब परिवार भी अपनी कुल आमदनी का आठवां हिस्सा स्वास्थ्य पै खर्च करै सै अर सरकार जनता के स्वास्थ्य पै तो बहोत कम खर्च करै सै। भारत देश मैं स्वास्थ्य पै कुल खर्च का हर स्तर की सरकार पांचवां हिस्सा खर्च करै सै फेर बाकी का सारा का सारा खर्च बीमार की जेब तै होवै सै। इसतै या बात साफ सै अक भारत देश का स्वास्थ्य ढांचा दुनियां का सबतै ज्यादा ‘प्राइवेटाज्ड’ ढांचा सै। इस ढाल कह्या जा सकै सै अक भारत देश बहोत पैराडोक्सिस आला देश सै। साइनिंग इंडिया अर सफरिंग इंडिया साफ-साफ नजर आवै सै आज के दिन। सफरिंग इंडिया का ख्याल करनिया बहोत थौड़े लोग सैं। फेर एक बात साफ सै अक यो मैडीकल टूरिज्म अर ये अपोलो अर फोरटिस बरगे अस्पताल सरकारी अस्पताल का सत्यानाश करण लागरे सैं अर वो दिन दूर नहीं जिब लोग अपने स्वास्थ्य की देखभाल की खातर सड़कां पै उतरैंगे अपनी बढ़िया सेहत की मांग की खातर। अर ले कै मानैंगे।

हरियाणा मैं महिलाएं

हरियाणा मैं महिलाएं
हरियाणा मैं हरित क्रांति के चालते अर छोटा प्रदेश होवण करकै जो आर्थिक प्रगति हुई सै इसके चलते हरियाणा नै स्टेट के विकास के मॉडल की ढालां आज पेश करया जावै सै। फेर या तो आधी सच्चाई सै, पूरी सच्चाई कोन्या विकास की। सामाजिक क्षेत्र का आकलन कुछ दूसरी ही तसवीर पेश करै सै। यह विरोधाभास क्यूं सै, यो जटिल अर गम्भीर मुद्दा सै। फेर हरियाणा के प्रबुद्ध बुद्धिजीवी वर्ग नै वो पक्ष देखण के कम प्रयास करे दीखैं सैं। इसे करकै हरियाणा के आर्थिक विकास का बोलबाला ए चारों कान्ही दिखाई देवै सै। समाज का बहोत बड़ा हिस्सा, समाज के वंचित तबके, दलित, महिलांए व युवा वर्ग इस विकास प्रक्रिया के दायरे मैं नहीं आ लिया बल्कि इन तब्कयां ताहिं तो और बी हाशिये पै धकेल्या जावण लागरया सै। इसे संदर्भ मैं जो हरियाणा मैं महिलावां की हालत दिखावण आले आंकड़यां पै नजर दौड़ाई जावै तो शायद तसवीर का दूसरा रूप भी थोड़ा-बहुत सामनै उभरकर आ सकै सै। एक तरफ दीखै सै अक छोरियां की संख्या मैडीकल रोहतक मैं भी बधगी, एमडीयू मैं भी पहलम तै बधगी, दूजे कान्ही तसवीर कुछ और ए सै - हरियाणा के बारे में मशहूर सै ‘हरया भरया हरियाणा जित दूध दही का खाना।’ फेर महिलावां मैं खून की कमी के आंकड़े कुछ और हकीकत बयान करैं सैं। खून की कमी काफी ज्यादा महिलावां मैं सै। शहरी महिलावां मैं खून की कमी का प्रतिशत 45.8 सै अर देहात की महिलावां मैं यू प्रतिशत 47.5 था। गुड़ महिलावां की पहुंच तै बाहर, बथुआ अर हरी सब्जियां भी इसका मतलब इननै नसीब नहीं सैं। इसे करकै और बीमारी भी घेरे रहवैं सैं। इसे ढालां बालकां के लालण-पालण मैं भी बराबरी का हक लड़की को नहीं मिल पाया।
जैविक रूप मैं बीमारी तै लड़ण की ताकत छोरियां मैं फालतू हो सै। फेर बी लड़क्यां मैं शिशु मृत्यु दर 52.9 प्रतिशत सै अर लड़कियां मैं या दर 66.0 प्रतिशत सै। ग्रामीण क्षेत्रों में घरेलू आबादी मैं 25.4 प्रतिशत पुरुष निरक्षर सैं अर स्त्रियां मैं या निरक्षरता 50.2 प्रतिशत सै। उच्चतर माध्यमिक शिक्षा पुरुषां मैं 7.3 प्रतिशत घरेलू आबादी मैं सै अर महिलावां मैं या दर 1.9 प्रतिशत बताई। इसे ढाल हरियाणा मैं च्यार मैं तै एक पत्नी के साथ मारपीट की कम तै कम एक वजह स्वीकार करी गई सै। पांच मैं तै दो महिलाएं मतलब 39 प्रतिशत इसी सैं जिननै पाछले 12 म्हीने मैं हिंसा का अनुभव करया कै जिनकी पिटाई हुई सै। ये सारे आकड़े एनएफएचएस द्वितीय, 1998-1999 तै लिए गए सैं। 0-6 साल की उम्र मैं 1000 लड़क्यां पै 820 लड़कियां सैं हरियाणा मैं। पूरे भारत मैं लिंग अनुपात के सबतै तरले 10 जिल्यां मैं तीन हरियाणा के सैं। कुरुक्षेत्र मैं यो अनुपात 770 सै, सोनीपत मैं 783 सै और अंबाला का 784 सै। 0-6 की उम्र के बालकां मैं 331773 छोरियां की कमी सै छोरयां के मुकाबले मैं। हरियाणा मैं पुरुष साक्षरता दर 79.25 प्रतिशत सै अर महिलावां मैं या दर 56.31 प्रतिशत सै। मतलब दोनूआं का अंतर 22.94 प्रतिशत का सै। इसमैं जै दलित महिलावां के आंकड़ों का आंकलन करया जावै तो अंतर और भी घणा होगा। दलित महिलावां मैं साक्षरता की दर 34.82 सै।
ये आंकड़े असल मैं एक तसवीर पेश करै सैं। इसकी गेल्यां ए एक आंकड़ा और उभर कै आवण लागरया सै अक ज्यादातर गामां मैं दस-दस, पन्दरा-पन्दरा महिलाएं खरीद कै ल्याई जावण लागरी सैं दूसरे प्रान्तां तैं। कुल मिला कै कहया जा सकै सै अक महिला का अवमूल्यन बड़े पैमाने पै होवण लागरया सै। दूसरी तरफ कल्पना चावला, संतोष यादव अर और दो-च्यार नाम गिनवा कै कहया जावै सै अक देखो हरियाणा की महिला कितनी आगै जा ली। या बात सही सै अक इन महिलावां नै अर औरां नै भी हरियाणा का मान-सम्मान बढ़ाया सै फेर हरियाणा की सारी महिलावां का स्तर भी ऊंचा होग्या या बात ठीक नहीं लागती। यो जुमला भी खूबै सुनने मैं आवै सै अक ‘लुगाइयां नै घणा सिर पै मत चढ़ाओ।’ हकीकत मैं उनको नीचेे गिराया जा रहया सै अर कहया कुछ और जा रहया सै। कुल मिलाकै स्थिति आच्छी कोन्या। एक खास बात और सै अक आज चारों कान्ही महिला सशक्तीकरण पै जोर दिया जावण लागरया सै। ईसा लागै सै अक यू शब्द बी एक तकिया कलाम-सा बणग्या हो। जो बी सरकार आवै सै वा ‘अपनी बेटी अपना धन’ अर कै ‘लाडली’ स्कीम अर और बी कुछ स्कीम लागू करै सै। फेर ये लागू कितनी हों सैं एक बात। दूसरी बात या सै अक महिला का अवमूल्यन इस ढाल की स्कीमां तै घणा सा रुक्कण आला नहीं सै। इस सामाजिक लिंग-भेद का खातमा सामाजिक संरचनाओं मैं मूलभूत बदलाव ल्याकै अर लोगां की सोच मैं बदलाव ल्याकै ए सम्भव सै। पीस मील मैं इस ढाल की सामाजिक समस्यावां का समाधान आधा-अधूरा ए रहवैगा। आशा की बात या सै अक महिलावां नै अपना दबाव बढ़ाया सै, अपनी अभिव्यक्ति, अपने मान सम्मान अर अपनी सामाजिक सुरक्षा की खातर। फेर यू मामला सिर्फ महिलावां का मामला कोन्या, यू पूरे समाज का मामला सै। या एकली महिलावां की लड़ाई कोन्या यह पूरे समाज की लड़ाई सै। एक नये समाज सुधार आंदोलन की दरकार सै। नवजागरण का आंदोलन हरियाणा मैं कमजोर सै पर सै, उसनै तगड़ा करण की जरूरत सै। आई किमै समझ मैं अक नहीं?

सवाल हरियाणवी भाषा का

सवाल हरियाणवी भाषा का
एक दिन मनै देखा अक मेरे पास छह-सात चिट्ठी आई सैं। एक चिट्ठी थी पलवल के एक कालेज मैं पढ़ने वाले गाभरू छोरे की। उसनै लिख्या था अक थारी खरी-खोटी पै कुछ खरी-खरी बातें कहना चाहता हूं। इसमें लिखी बात पढ़ना बहोत मुश्किल हो ज्यावै है। कई शब्द बहोत गूढ़ होवै हैं। अंदाजे से बात का सार तो समझ मैं आवै है पर देर बहोत लग ज्यावै है। बात तो थारी ठीक ठ्याक होती हैं। पढ़ने की दिक्कत बहोत है, कुछ समाधान करो। हमारी लिखी बातों पर कुछ ध्यान धरो। हरियाणवी भाषा में लिखो रोहतकी भाषा में मत लिख्या करो। थोड़े लिखे को ज्यादा समझना। ज्यादा फूंक मत ले जाना। दूसरी चिट्ठी थी सिरसा के नेशनल कालेज की बीए अंतिम साल में पढ़ने वाली छात्रा की। उसकी भी यही शिकायत थी कि आप हरियाणवी में तो लिखते ही नहीं, ठेठ रोहतक वालों की भाषा में लिखते हो। सिरसा के लोकां नूं इनूं पढ़ण विच दिक्कत आन्दी ए। असी पढ़णा चाहन्दे हां पर पढ़ नहीं पान्दे। किसी रोहतकी तो पढ़वानी पैन्दी ए। कई कर्मचारी ने तुहाडे इलाके दे ओ पढ़के सुनान्दे ने। गलां तां चंगियां लिखदे हो पर की करिये तुसी हरियाणवी चे लिखिया करो। तीसरी चिट्ठी मिली, जो रेवाड़ी और महेंद्रगढ़ के बार्डर पर बसे एक गांव के बुजुर्ग की तरफ से थी। उसने शाबाशी दी थी। पहले तो कि अलग-अलग मुद्दों पर हर इतवार को खरी-खोटी में कुछ न कुछ नई बात पढ़ने को मिलती है। फेर पढ़ण मैं बहोत मुश्किल होती है। आहिस्ता-आहिस्ता पढ़ता हूं। बात गहरी होती हैं। फेर दिक्कत तो या है कि हरियाणा की अपनी एक हरियाणवी भाषा तो कोए सै कोनी, न्यारी-न्यारी बोली सैं और हर बीस कौस पै बोली मैं फरक आ जावै है तो कई शब्द जो रोहतक मैं बोले जावैं हैं वे रिवाड़ी वालों के समझ कोनी आते। पलवल और फरीदाबाद में बृज बोली की रंगत है, मेवात में उर्दू भाषा की संगत है, म्हारी तरफ रिवाड़ी, महेंद्रगढ़ में राजस्थानी बोली की महक दिखाई देवै है तो हिसार मैं भी इसकी परछाई है। सिरसा, अंबाला, करनाल में पंजाबी की चासनी दिखाई देती है।
पानीपत, रोहतक, सोनीपत, जींद, झज्जर की अपनी रोहतकी बोली है। जींद और रोहतक मैं भी फरक नजर आवै है। पांच-छह ढाल की रंगत की न्यारी-न्यारी बोलियां नै शामिल करके साझला बाजा बजाना बहोत मुश्किल काम है रणबीर। पर मुन्नाभाई लगे रहो वाली बात है। बुजुर्ग नै आगे लिखा कि एक बात समझ नहीं आती कि पंजाब में भी बोली तो कई बोली जाती हैं - मुल्तानी, झंगी, खड़ी पंजाबी पर उन सबको मिलाकर पंजाबी भाषा का साझला बाजा बाज सकै सै तो हरियाणवी भाषा का विकास क्यों नहीं हो सकदा? इसी भाषा जिसमैं गुड़गांव, पलवल भी हो, जिसमैं मेवात भी हो, रेवाड़ी, महेंद्रगढ़ भी हों, हिसार, सिरसा, जींद हों। एक और चिट्ठी मैं लिख्या था अक हरियाणवी भाषा का विकास कोनी हो सकदा आज की तारीख मैं, म्हारी अपनी राजधानी ना, कोए सांस्कृतिक संस्थान नहीं, कोए आपसी संवाद नहीं। हां, इन सारी बोलियां के शब्द हिन्दी भाषा में शामिल करकै खड़ी हिन्दी का विकास करकै ही हरियाणवी साझला बाजा बन सकता है। सपना खुल ग्या। देख्या तो कड़ै चिट्ठी थी। पर साची साच बताऊं सूं ये चिट्ठी सपने मैं पढ़कै मेरा आगला कालम रोहतकी मैं लिखने का साहस माड़ा सा बी कोनी बच्या। दो दिन और दो रात सोचें गया अक इन चिट्ठियों मैं जो बात लिख राखी सै उनके हिसाब तै तो मैं रोहतक, झज्जर और सोनीपत के लोगां की खातर कलम घिसाई करण लागरया सूं। बाकी का हरियाणा? पता नहीं उनकी खातर किसा लिखूं के करूं? सन् 66 मैं हरियाणा बन्या। हमनै बड़े-बड़े काम कर दिये। बहोत विकास करया। आदर्श हरियाणा बना कै छोड्या हमनै। हरित क्रान्ति लियाये। फेर हरियाणवी भाषा कित सै? मेरे तै घणे स्याणे, मेरे तै फालतू ज्ञानी ध्यानी, हरियाणा अर हरियाणवी संस्कृति के ठेकेदार, हरियाणा के भीतर हों चाहे हों इसके बाहर, सबतै रणबीर का हाथ जोड़ कै नमस्कार, मेरी बातां पै थोड़ा घणा बैठकै करियो कदे विचार, हरियाणवी बोलियां कैसे बनैं हरियाणवी भाषा रूपी हार, रणबीर को रहवैगा हमेशा थारे सुझावां का इंतजार। यू मसला सै टेढ़ा इसका मनै सै पूरा-पूरा ख्याल, म्हारे थारे सबके स्याहमी सै यो एक गम्भीर सवाल - हरियाणा असल मैं हरियाणा सै बी अक नहीं अक सूके बजावां-सा गाल, हरियाणा आल्यो सवाल का जवाब पड़ै ढूंढना आज नहीं तो काह्ल। हिन्दी भाषा करैगी म्हारी सम्भाल अक हरियाणवी भाषा दिखावैगी अपना कमाल। हट हट कर मेरे कानों मैं गूंजै सै सपने मैं पढ़ी चिट्ठियों मैं ठाया गया सवाल। अपनी तरफ तै पांचों-छहों रंगत की बोलियां का ध्यान राखूंगा अर कोशिश करूंगा अब रोहतकी बोली तै थोड़ा-बहोत बाहर आ पाऊं। पास फेल की बात न्यारी, जतन करने की जिम्मेदारी म्हारी, थाम बी खरी-खोटी आये इतवार पढ़ने का प्रयास राखियो जारी।

पैरेलल इकोनोमी

पैरेलल इकोनोमी
सत्ते, फत्ते, नफे, सरिता, कविता, सविता और ताई भरपाई शनिवार नै पहोंचगे जन चेतना केंद्र मैं। सरिता बोली - इस जन चेतना केंद्र मैं हमै हम आवां सां हमनै और माणस बी बुलाने चाहियें। सविता बोली - हम तो शनिवार नै आवां सां। बाकी दिनां मैं भी इसमैं कुछ ना कुछ प्रोग्राम होन्ते रहवैं सैं। म्हारै रविता बतावै थी दस बारा दसमी की छोरी कठ्ठी होकै लाइब्रेरी मैं किताब का वाचन कर्या करैं। पाछले मंगलवार नै सदगति कहानी की किताब पढ़कै चरचा करी थी, उसनै। म्हारी चर्चा मंडल तो इस जन चेतना केंद्र तै भी पुराना सै। खैर आज की बातचीत पै आगे। सत्ते बोल्या - आज पैरेलल इकोनोमी पै चरचा करनी थी अर तैयारी करके आनी थी सविता नै। सविता बोली - इसनै समानान्तर अर्थ व्यवस्था भी कहदे सैं। यह सालाना घरेलू उत्पाद का 40 प्रतिशत मतलब 12,00,000 करोड़ रु. जरूर सै। कविता बोली - हे मनै राम की सूं। इतना घणा काला धन तिजोरियां मैं क्यूकर आवै सै? सविता बोली - 12,00,000 करोड़ रु. धरण की खातर बेरा ना कितने गोदाम बनाने पड़ैंगे? रुपइया धर्या नहीं जाता यो इन्वैस्ट कर्या जा सै - धन्ध्यां मैं कै फेर बैंका मैं। काला धन राखण आले लोग इस धन नै धरती मैं गाड कै कोनी राखते, इस पीस्से तै और धन कमावैं सैं अर ब्याज बणावैं सैं। फत्ते बोल्या - न्यौ क्यूकर? सविता बोली - उसे दुकानदार कै मिल मालिक नै लेल्यां सैं जिसनै बिलटी घोटाले तै काला धन बनाया था। उसनै कई जागां खुद घूस देनी पड़ै सै। सेल्स टैक्स, एक्साइज इंस्पैक्टर, पुलिस, बाबू लोग, लोकल नेता, ये सब सम्भालने पड़ते हैं। पर नकद! काले धन का इस्तेमाल एक समानान्तर नकद अर्थ तंत्र में होता है जड़ै नकद चालै सै।
ताई भरपाई बोली - बोरियां मैं, थैलियां मैं, सूटकेसां मैं - मनै फिल्मां मैं देख्या सै - नकद नारायण। फत्ते - चलो फिल्मां तै कुछ तो सीख मिली तनै। सरिता बोली - और के बैंक मैं खाता खुलवाना हो तो कितने पापड़े बेलने पड़ैं सैं - स्थाई पता, दूसरे खाते आले की सिफारिस आदि। शहरां मैं लाखां का रहवण का ठिकाना ए कोन्या तो बैंक खाता कड़े तै खुलै था। नकद ही बढ़िया सै। सबकी खातर बराबर...। सविता बोली - ठीक कह्या सरिता नै। इसतै न्यारा गाम मैं भी नकद का चलण बहोत सै। भारत के बैंकां मैं कुल जमा राशि लगभग 15 लाख करोड़ रु. सै अर सालाना उत्पाद मतलब एक साल की कृषि, उद्योग अर सब कुछ की उपज ही लगभग 30 लाख करोड़ रु. सै जिसमां तै बचत दर जै 20 प्रतिशत (असल मैं 18 प्रतिशत सै) भी मान ली जा तो इसका मतलब यू हुआ एक साल मैं 6 लाख करोड़ रु. की बचत हैवे सै। मगर बैंका मैं जमा राशि की सालाना बढ़त सिर्फ लगभग 45 हजार करोड़ रु. सै। फत्ते बोल्या - सविता सारा हिसाब किताब आजैए सिखावैगी के। बहोत कसूती तैयारी करकै आरी दीखै सै। न्यों बता या समानान्तर अर्थ व्यवस्था के हमेशा न्यारी रहवै सै? सुन्या सै आज काल काला धन भी सफेद बनाया जा सकै सै?
सविता बोली - तेरे कान तो बहोत तेज सैं फत्ते। तनै ठीक सुन्या सै। काला धन हमेशा काला नहीं रैहन्ता। अनेक रास्त्यां तै गुजर कै बहोत सा काला धन बैंकों मैं आकै सफेद होज्या सै। फत्ते बोल्या - सविता ये बैंक तो सरकारी सैं। ये बैंक इस काले धन नै पकड़ क्यों नहीं लेन्ते? सविता बोली - या बात समझण की सै अक बैंक सरकारी होन्ते हुये भी अलग संस्थान सैं। सरकार का कर विभाग न्यारा सै। बैंकिंग कानून के हिसाब तैं पैसा जमाकर्त्ता तै यो नहीं पूछया जान्ता अक यो धन घोषित सै अक अघोषित सै। साथ-साथ एक बात और सै अक बैंक जै काला धन पकड़ण कै पकड़वावण लागै तो उसके पास पीस्सा जमा कूण करावैगा? सरिता बोली - फेर ये बैंक यो काला धन धंधों मैं क्यूकर लावैं सैं? काला धन्धा तो नहीं करते ये? सविता बोली - एक बर बैंक में जमा हुए पाछै धन काला कै सफेद नहीं, बस धन हो सै। यो व्यापार, उद्योग, कृषि के कामां मैं ब्याज पै उधार दिया जावै सै। सत्ते बोल्या - एक मिनट सविता। पहलम न्यों बता अक यू काला धन बैंकां मैं आवै सै क्यूकर? बोर्यां मैं भरकै जमा कराया जावै सै के? सविता बोली - तम न्यों बूझो सो एक काला धन सफेद क्यूकर होसै? बैंक मैं आण का मतलब सै धन का घोषित हो जाना, सफेद हो जाना। यो बहोत बड़ा ही धन्धा सै। पहली तो बात या सै अक भारत मैं हम 20 हजार रुपये तै ज्यादा की भुगतान नकदी मैं नहीं कर सकदे, बैंक मैं जमा नहीं करा सकदे। बाहर के देशां की बात और सै...। सत्ते - ज्यूकर स्विस बैंक के खाते? सविता - हां, बोरियां मैं ले ज्या कै पीस्से जमा हो सकैं सैं। कैहण का मतलब यू सै अक या पैरेलल इकोनोमी काबू आवण की कोन्या जब ताहिं हम तम सारे इसनै आच्छी ताहि नहीं समझल्यांगे। हमनै ताश खेलण तै फुरसत कोन्या।

बालकां नै बोझ मत समझो

बालकां नै बोझ मत समझो
आजकाल जिसनै देखो वोहे अपने बालकां की शिकायत करदा पावैगा। जणों मां बाप धोरै और कोए कामै कोन्या रहया करने की खातर। न्यों कहवैंगे अक बालक तो एकदम हाथ तै लिकड़ लिये, बड्यां नै गोलते ए कोन्या, म्हारी कोए बात नहीं मानते। हाईफाई घरां के बालकां की नकल करना सीख गये। उन्हें बरगा खाना-पीना-औढ़ना-पहरना चाहते हैं। वही फरमाइसें फरमाते हैं? उन्हीं की तरियां मौज-मस्ती करना चाहते हैं। स्कूल ताहिं जो बालक थोड़े-घणे तलै रहते हैं वे भी कालेज मैं जाते की साथ पर काढ़ जाते हैं। उननै कालेज जाने अर घूमने के लिए अपनी न्यारी कार चाहिए। कार नहीं तो मोटर बाइक तो जरूर चाहिए। ऊपर तै भारी-भरकम जेब खर्च चाहिए चाहे इसके बोझ तै मां-बाप की कड़ टूट जाओ। घर मैं ढाल ढाल के गैजेट्स तै भरया औड़ अपना न्यारा निखालस कमरा चाहिए। अपना एकांत चाहिए। अपनी आज़ादी चाहिए। मां बाप नै उनको कुछ कहने का, उनसे कुछ पूछण का कोए अधिकार नहीं। फेर उननै यो पूरा अधिकार है अक माता-पिता उनकी सारी मांग पूरी करैं। अर वे अपना यो अधिकार मांग कै नहीं लड़कै लेते हैं। जो माता-पिता उनकी मांगें पूरी नहीं कर पाते तो उनको वे मुंहफट होकर कहते हैं - ‘जै तम म्हारी जरूरत पूरी नहीं कर सको थे तो हम पैदा ए क्यों करे थे? इस दुनिया का मुंह क्यों देखण दिया था। जै पैदा करे सां तो ईब अपनी जिम्मेदारी तै क्यों भाज लिए। चोरी करो अर चाहे डाका मारो फेर हमनै आछी ढालां पालो।’ एक बै तो न्यों लागै सै अक बहोत सही बात सैं ये बालकां के बारे मैं। फेर यू तसवीर का एक पहलू सै। इस ढाल की शिकायत आमतौर पै एक तरफा हों सैं अर बढ़ा-चढ़ा कै कही जावैं सैं। एक बात तो या सै अक ना तो सारे बच्चे ए ईसी मांग करते अर ना सारे मां-बाप ये मांग पूरी कर सकदे। बालक जै हाईफाई बालकां की नकल करते भी हैं तो अपने मां-बाप की सीमा उननै दीखै सैं उनके दायरे मैं रह कै करैं सैं। कई बालक तो पढ़ाई के साथ-साथ कुछ कमाई भी करैं सैं अर उसनै खर्च करना चाहवैं सैं। बालकां नै अपना करिअर बनाने के लिए, इम्तिहान मैं दूसरे तै फालतू नंबर लेने के लिए, दिन-रात पढ़ाई मैं लगे रहना पड़ै सै। घर मैं ए टीवी कंप्यूटर, इंटरनेट अर मोबाइल फोन तै कुछ मनोरंजन कर सकैं तो करलें सैं, बाहर जाकै वार ताहिं मौज-मस्ती करने की फुरसत किसनै सै? अर वे इतने नासमझ, हृदयहीन या गैर जिम्मेदार भी नहीं होन्ते अक माता-पिता की मजबूरियां नै नहीं समझते हों। कई तो उनमैं तै या कोशिश बी करैं सैं अक कोए पार्ट टाइम काम करकै कुछ कमा लेवैं ताकि मां-बाप पै उनका बोझ घणा ना पड़ै। मध्यवर्गीय लड़कियां तो ज्यादातर इतनी समझदार अर जिम्मेदार होवैं सै अक वे खुद इस अहसास से दबी रहती हैं कि वे माता-पिता पै बोझ सैं। जिनके मां-बाप दोनों कामकाजी हों सैं वे लड़कियां तो अपनी पढ़ाई-लिखाई के साथ-साथ घर के काम अर छोटे भाई-बहन की देखभाल भी करैं सैं।
जै दोनों कान्ही का ध्यान करया जावै तो बेरा पाटैगा अक अपने बालकां नै गैर जिम्मेदार बतावण आले मां-बाप खुद कहीं ज्यादा गैर ज़िम्मेदार हों सैं। वे अपने बालकां नै एक बोझ समझैं सैं, एक ईसा बोझ जो मानो जबरदस्ती उनपै लाद दिया गया हो। उनमें से जो ‘समझदार’ होते हैं वे तो जरूरत तै फालतू बोझ ठाते ए कोन्या। वंश चलावण की खातर उननै एक बेटे की जरूरत हो सै इस करकै वे पहलमै गर्भस्थ शिशु की जांच करवा लेते हैं अर जै वा लड़की सै तो उसकी भ्रूण हत्या करवा कै उसतै छुट्टी पा लैं सैं। बेटी जो पैदा बी हो जावै तो वे उसके खिलाने-पिलाने, पढ़ाने-लिखाने, बीमारी मैं उसका इलाज करवाने आदि पै कम तै कम खर्च करैंगे। उसपै करे गये खर्च की भरपाई खातर उसपै ज्यादा तै ज्यादा काम करवायेंगे। अर जितनी जल्दी हो सकै उसका ब्याह करकै अपने सिर तै बोझ तारण की कोशिश करैंगे। कई मां-बाप तो इकलौते बेटे नै भी बोझ समझते हैं। उसका पालन-पोषण उननै झंझट का काम दीखै सै। उनकी आजादी पै असर पड़ता दीखै सै। उननै लागै सै अक बालक के कारण वे अपना कैरिअर बनाने, नौकरियां बदलने, आमतौर पै घर तै बाहर रहने, अपना कामकाज करने अर मौज-मस्ती करने की खातर आज़ाद नहीं रहते। जै उनका ब्यौंत हो सै तो बालकां नै पालण खातर वे अपने मां-बाप, सास-ससुर, नौकर-चाक्कर या बोर्डिंग स्कूल पै गेर कै अपनी आज़ादी खरीद लेवैं सैं। बालक उनके प्यार, साथ अर देखभाल तै वंचित रहता है तो रहवै, उनकी बला तै। इस पै भी वे बालकां नै बोझ समझना अर बताना जारी राखैं सैं। बालक तो अपनी बात कह नहीं सकता अर कहवै भी तो उसकी सुनने वाला कौन है? इस तरियां बालक बोझ समझे जावैं सैं अर इस विचार नै बढ़ावा देवै सै वा अर्थनीति अर राजनीति जो गरीबां नै दुनिया पै लद्या एक बेकार का बोझ मानती है। जनसंख्या नै या राजनीति एक महामारी के रूप मैं पेश करती है। इस करकै आण आला हर बालक दुनिया पै आ पड़ण आला एक बेकार का बोझ-सा लागै सै। असल में अमीर नहीं चाहन्ते अक ये गरीब दुनिया मैं रहवैं फेर उनकी मजबूरी सै गरीबां बिना उनकी अमीरी नहीं टिक सकदी। बात असल याहे सै अक बालक नै बोझ समझना ठीक नहीं। अर बालकां का मां-बाप नै बोझ समझना ठीक नहीं सै। जमाना तेजी तै बदलण लागरया सै। इसकी रफ्तार देखना के के गुल खिलावैगी? बालकां नै अर माता-पिता नै समझण की जरूरत सै।

बिहारी बहू

बिहारी बहू
एक दिन मैडीकल की ओपीडी में एक मरीज पहोंच्या। उसके बारे मैं कहया जा सकता है कि वह ‘चहणिया मैं जावण नै होरया था। उसका नाम था रिसाल सिंह। उम्र लगभग 70 साल रही होगी। जिब उसका नंबर आया तो बोल्या - ‘डाक्टर साहब शरीर मैं तेजी कम आवै सै।’ डाक्टर उसकी बात सुनकर बहोत हैरान हुआ। डाक्टर रिसाल सिंह को अंदर मरीज देखने वाले कमरे में ले गया। उसकी बीमारी की पूरी जानकारी लई कुछ सवाल भी पूछे। करीब-करीब आधा घंटा दोनों की बातचीत हुई। डाक्टर नै उसका पूरा मुआयना किया। डाक्टर की हैरानी बेचैनी मैं बदलगी। डाक्टर सोच रहा था कि पहलम उसकी कौन सी बीमारी का इलाज करै। लम्बा पर पतला सा बुजुर्ग था रिसाल सिंह। वह ‘डोगे’ के सहारे चल पा रहा था। डाक्टर को पता लग्या अक उसके छह लड़कियां पैदा हुई। सभी लड़कियों की शादी हो चुकी। छोटी लड़की की उम्र 17 साल सै। रिसाल सिंह की दिली इच्छा सै अक एक छोरा तो होना ए चाहिये। ‘पुत्र लालसा’ बहोत जबरदस्त देखी उसमैं डाक्टर नै। रिसाल सिंह डाक्टर नै बात-बातां मैं बताता है - मेरे पास पंदरह एकड़ जमीन सै। उसका वारिस कौन होगा डाक्टर साहब। मेरी पत्नी नै कहया भी था अक दो-दो एकड़ लड़कियां मैं बांट दे अर तीन एकड़ अपने पास राख ले। बताओ डाक्टर साहब जो उन छोरियां मैं जमीन बांट दी तो छहों गाम मैं आकै बसैंगी। जै वे आई तो छह गोत और ले करके आवैंगी अपनी साथ। गाम का ढांचा ए बदल जागा। दो तीन साल मैं बहोत परेशान रहया अर आखिर कार अपनी परेशानी का रास्ता मनै काढ़े लिया। मनै गाम मैं एक बिचौलिया पकड़ लिया अर बिहार के जहानाबाद जिले से एक चौदह-पंदरह साल की लड़की खरीद कै लियाया। मैं गाम का बड्डा पंचायती ठहरया इसे करकै गाम का कोए आदमी नहीं बोल्या कुछ बी। मेरा भाई सै करतार सिंह साठ-पैंसेठ साल का ओ भी साझी कर लिया मनै। उसनै बी रोटी पानी का सुख होग्या। पहली बर जिब मैं बिहारी बहू नै थारे पास लेकै आया था तो आपनै उसको कहया था - बेटा अपने दादा की सेहत का ख्याल राख्या करो। मेरै बहोत हंसी आई थी थारी बात पै डाक्टर साहब। मनै बी ब्याह पाछै पता लग्या अक बिहारी बहू का दलित परिवार सै अर उसके मां-बाप इस दुनिया मैं कोन्या आज के दिन। मनै सोच्ची ले इस बहानै एक दुखिया छोरी नै साहरा मिल ज्यागा। एक खास बात बताऊं डाक्टर साहब अक हमनै फैसला कर लिया अक बिहारी बहू के कमरे के आगै जो मेरी जूती लिकड़ी पावै तो करतारा नहीं आवैगा उस कमरे मैं अर जै उसकी जूती लिकड़ी पाज्यां तो मैं नहीं जाऊंगा। यो रिवाज तो पहलम भी था म्हारे कई गामां मैं। एक तगड़ा सा माणस छांट लिया करते अर उसकी जूती जिस घर के बारणै लिकड़ी पा ज्यांती उस घर के मरद माणस घर मैं नहीं जाया करदे।
दूसरे किसे दिन बिहारी बहू मैडीकल गई और रिसाल सिंह के घरू डाक्टर से मिली। बिहारी बहू नै डाक्टर को बताया अक रिसाल सिंह नै कल उसकी खूब पिटाई करी। सारे शरीर मैं नील पड़रे सैं डाक्टर साहब। रोवण लागगी डाक्टर के आगै अर बोली - दो दो मरद। सारा घर का काम धंधा, खेत का काम अर ऊपर तै या पिटाई। शादी के बख्त तो कहा था घबराओ मत तुम तो रानी बन कर रहोगी म्हारे घर मैं। डाक्टर साहब कुछ करो। डाक्टर साहब नै ध्यान तै बात सुनी और दवाई लिख दी। डाक्टर नै बड़ा बेबस अर लाचार महसूस करया। सोच्या उसनै अक मैं कुछ करना बी चाहूं तो के कर सकूं सूं? उसने पूछा - रिसाल ने तुम्हें क्यों पीटा? बिहारी बहू ने बताया - इनके पड़ौस में एक लड़का है वह कभी-कभी इनके घर भी आ जाता है। मैंने भी दो चार बात उससे करली तो मेरी पिटाई। खैर दो साल के बाद बिहारी बहू ने एक लड़के को जन्म दिया। बिहारी बहू दो दिन मैडीकल में रही। वहां उसके बेटे के खून का ग्रुप टैस्ट करने पर ‘बी’ था और बिहारी बहू का अपना ग्रुप भी ‘बी’ था। डाक्टर ने टेक्नीशियन को कह कर रिसाल और करतार सिंह के खून का ग्रुप भी टैस्ट करवा दिया। टेक्नीशियन ने आके बताया - सर उन दोनों का ग्रुप तो ‘ओ’ है। डाक्टर सुनकर बहुत हैरान हुआ। एक पल तो समझ ही नहीं पाया। रिसाल सिंह बहुत खुश था क्योंकि उसका वंश चलाने वाला आ गया था। कैसे आया कहां से आया यह जानते हुए भी रिसाल सिंह अनजान बना रहना चाहवै था। फेर बिहारी बहू की मुसीबत दिन ब दिन बधती गई। वंश चलावण आला जिब दो साल का होग्या तो बिहारी बहू रिसाल सिंह नै तीस हजार मैं बेच दी। ब्याज समेत मूल वसूल कर लिया। गाम मैं चरचा याहे थी अक बिहारी बहू तो चरित्रहीन लिकड़ी। वा अपने प्रेमी के संग भाजगी। अखबारां मैं बी सुरखियां मैं याहे खबर छपी थी अक बिहारी बहू प्रेमी संग रिसाल सिंह को छोड़कर भाग गई। रिसाल सिंह डाक्टर कै गया अर बोल्या - चलो कुल का वंश चलावणिया बी मिलग्या अर उस बिहारी बहू तै बी पैंडा छूटग्या। रिसाल सिंह को कोई पछतावा नहीं था अपने किये पर। डाक्टर बहोत बेचैन हुआ रिसाल सिंह की बात सुनकर। हरियाणा के इस बदलते और विकृत होते सामाजिक सांस्कृतिक माहौल पर बहोत गुस्सा-सा आया। सारा हरियाणा महिला सशक्तिकरण - महिला सशक्तिकरण पुकारता नहीं थकता अर असल मैं महिला का स्थान तो और तले नै जान्ता जावण लागरया सै। ‘उडीसी बहू’, ‘बंगाली बहू’, ‘आसामी बहू’, ‘बिहारी बहू’ ये महज शब्द नहीं सैं ये हरियाणा के सामाजिक सांस्कृतिक परिदृश्य पै उभरते वे शब्द सैं जिनके पाछै म्हारी संस्कृति की विकृति साफ-साफ दिखाई देवै सै। फेर इस सच्चाई नै देखण की, इसका सामना करण की हिम्मत करणिया कितने सैं हरियाणा मैं? रिसाल सिंह की अनैतिकता नै समझणिया चुप क्यों सै? या चुप्पी हरियाणा नै और बी पाछै खींचण लागरी सै एक तरां तै अर येहे अनैतिक के नाम पै महिला पै अंकुश लावन्ते वार नहीं लावन्ते। दूजी कान्ही बाजार व्यवस्था नै भी इस रिसाल सिंह की अनैतिकता तै हाथ मिला लिया दीखै सै।

जाणकै छोरी भ्रूणहत्या

जाणकै छोरी भ्रूणहत्या
हरियाणा मैं 1000 छोरयां पै 820 छोरीयां का रह जाना उन्नति अर विकास के खोखले अर अमानवीय चेहरे की तरफ चिंताजनक पहलू सै। पढ़ै लिखे लोगां मैं यू और बी कम बताया जा सै। हम अंतर्राष्ट्रीय स्तर का ‘एजुकेशन सिटी’ बनावण की बात रोज करां सां। ईब ताहिं जो शिक्षा हरियाणा मैं दी गई उसनै तो म्हारे ताहिं छांट कै महिला भ्रूणहत्या करण मैं ए पारंगत करया सै। यो केवल महिलावां की संख्या कम होवण का मामला ए कोन्या बल्कि किसे बी सभ्य समाज मैं इनसानी मूल्यों की गिरावट अर पाशविकता नै ए दिखावै सै। हरियाणा मैं पाछले कुछ सालां तै यौन अपराध, दूसरे प्रदेशां तै महिलावां का खरीद कै ल्यावणा अर उनका सामूहिक शोषण तथा बाल विवाह का चलना चिंताजनक रूप तै बढ़त पै सैं। इसकी साथ की साथ सर्वखाप पंचायतें भी जाति, गोत, संस्कृति, मर्यादा आदि के नाम पै महिलावां के नागरिक अधिकारां का भयंकर रूप तै हनन करण लागरी सैं। अपना गलबा कायम रखने की खातर एक कान्ही ये जातिवादी पंचायतें घूंघट, मार-पिटाई, शराब, नशा, लिंग पार्थक्य, जात के नाम पर अपराधियों ताहिं संरक्षण देणा आदि सबतै पिछड़े विचारां की हिमायत करैं से उड़ै ए दूसरी कान्ही ये साम्प्रदायिक ताकतां की गेल्यां मिलकै युवा लड़कियां की पहलकदमी अर रचनात्मक अभिव्यक्ति को रोकण की खातर तरां-तरां के फतवे जारी करती रहवैं सैं। युवा लड़कियां केवल बाहर ही नहीं परिवार मैं भी उनके अपने लोगां द्वारा भी यौन हिंसा अर दहेज हत्या का शिकार होवण लागरी सैं। इस बाबत दलाली, भ्रष्टाचार अर रिश्वतखोरी तै पीस्सा कमावण आले नवधनिक वर्ग अर उनके लड़के खासकर कै अपराधियां की ढालां साहमी आवण लागरे सैं। अपने मौज मजे अर दिल बहलाव की खातर छेड़खानी अर बलात्कार इनकी खातर मामूली बात सैं। अर सशक्तिकरण की सजावटी बात बहोत होवण लागगी फेर सच्चाई या सै अक ताकत अर गैर बराबरी पै टिक्या म्हारा समाज आज भी महिलावां नै नीची नजर तै देखै सै अर उननै पूरे इनसान अर कै स्वतंत्र नागरिक का दर्जा कोनी देता। आज मीडिया अर बाजार मैं भले ही औरत के शरीर का मूल्य बधग्या हो फेर उसके काम, उसके बौद्धिक विकास अर रचनात्मक क्षमताओं की आज भी भारी अनदेखी सै। कितै बी अपने श्रम का उचित मूल्य उननै नहीं मिलता। दुनिया का 70 फीसदी काम औरत करैं सैं फेर दुनिया की आमदनी का सिर्फ 10 प्रतिशत हिस्सा उन ताहिं पहोंचै सै अर पूरी दुनिया मैं औरत सिर्फ एक फीसदी संपत्ति की हिस्सेदार सैं। काम अर संसाधनां के इस असमान बंटवारे अर दोयम दर्जे की सामाजिक हैसियत के कारण महिलाएं सामाजिक रूप तै असुरक्षित सैं अर उनपै हिंसा बढ़ती जावण लागरी सै।
दुनिया के स्तर पै शुरू होई वैश्वीकरण की प्रक्रिया नै आर्थिक, राजनीतिक अर सामाजिक असमानता की एक भयंकर खाई पूरी दुनिया मैं पैदा कर दी सै, जिसके चालते अमीर देश गरीब देशां पै अर अमीर तबके गरीब तबक्यां पै कहर ढावण लागरे सैं। गरीबी, बेरोजगारी, हिंसा अर असमानता के अराजक ढंग तै बधते चले जावण का कारण यहि असमानता सै। असल मैं या नाबराबरी जितनी बढ़ती जावै सै विकास उतना ए असंतुलित अर विकृत होन्ता जावै सै। इस विकृत विकास की सबतै फालतू मार महिलावां नै झेलनी पड़ै सै। खेती, कारखाने अर कुटीर उद्योगां के चौपट होवण करकै लाखां महिलावां की जीविका छिनगी अर ईबै औरां की बी छिनैगी। कृषि अर उद्योग मैं नई तकनीक अर नई मशीनां के इस्तेमाल तै महिलाएं विशेष रूप तै छंटनी की शिकार हुई सैं। आए दिन बढ़ती महंगाई अर आर्थिक तंगी के कारण महिलावां नै बहोत कम दामों पै अर बहोत असुरक्षित हालातां मैं काम करण पै मजबूर होवणा पड़रया सै। इन आर्थिक नीतियां की गेल्यां वाहे गली सड़ी संस्कृति आई सै जो महिलावां के शरीर के भद्दे प्रदर्शन, नशे अर हिंसा पै टिकी सै। भारतीय संस्कृति की दुहाई देन्ती हुई साम्प्रदायिक ताकतें भी इसे अन्ध उपभोग्तावादी संस्कृति तै हाथ मिलावण लागरी सैं। दहेज हत्याएं, छेड़खानी, अपहरण, बलात्कार, अर यौन उत्पीड़न का महामारी की तरियां फैलना इस संस्कृति का अभिन्न हिस्सा सै। इस ढालां आर्थिक क्षेत्र में गरीबी करण अर सामाजिक क्षेत्र मैं वस्तुकरण तै महिलावां की स्थिति और खराब होन्ती आवै सै। छांट के महिला भ्रूण हत्या महिलावां के इसी अवमूल्यन का सूचक सै। यो हरियाणा का दुर्भाग्य ए कहया जावैगा अक जडै महिलावां के संदर्भ मैं परम्परा अर आधुनिकता दोनां के सबतै पिछड़े अर सबतै बर्बर रूप एक होगे। सौंदर्य प्रतियोगिता अर दहेज हत्याएं गैल-गैल चाल रही सैं। एक कान्ही महिला सशक्तिकरण का डंका बाजै सै। दूजी कान्ही अनेक पुरात्नपंथी धारणावां अर धार्मिक अनुष्ठानां का बड़े पैमाने पै महिमा मंडन करया जाण लागरया सै। अंध उपभोग्तावाद के साथ सबसे पिछड़े विचारां को समाज का और राज्य का पूरा समर्थन हासिल सै। पितृ-सत्ता के साथ नई तकनीक के नापाक गठबंधन नै जिस प्रकार लड़कियों को खत्म करने के ‘सुसभ्य’ और ‘साफ-सुथरे’ तरीके निकाले हैं उससे ही लिंग अनुपात खतरनाक ढंग से बिगड़ चुका है। महिलाओं के प्रश्न असल मैं सभ्य अर नागरिक समाज बणावण के प्रश्न सैं। हरियाणा आर्थिक स्तर पै विकसित होग्या फेर नागरिक समाज तो कोनी बनाया हमनै। सोचां किमै। गेर रै गेर पत्ता गेर।

हरियाणा कड़ै जाण लागरया ?

हरियाणा कड़ै जाण लागरया ?
हिसार का विश्वास स्कूल, दूसरे गामां के स्कूल, म्हारे शहर अर गाम, मोहल्ले अर सैक्टर, अर इनमैं रहवण आल्यां का भाईचारा, म्हारी इज्जत, म्हारे बालक, गुहांड, म्हारी बेटा-बेटी, म्हारी बहु, म्हारे बाहण अर भाई, म्हारे घर, अर इन सारयां के बीच के रिश्तयां का खोखलापन सबकै साहमी आ लिया। मकान अर कोठी तो बहोत बड्डे बनगे फेर इनमैं रहवण आल्यां के दिल बहोत छोटे होगे। इन खोखले अर मरणशील रिश्तयां की कै तो आपां कोली भरें बैठे सां अर कै इननै त्याग कै अमरीका की जीवन पद्धति की नकल करकै खुदगर्ज इनसान बनते जावण लागरे सां। फेर गाम की इज्जत के बारे में म्हारी के समझ सै इसपै बहस तो होनी चाहिए। लिखैं खापां के चौधरी बी अखबारां मैं वे क्यूकर देखैं सैं इस मसले नै अर म्हारे आर्य समाजी भाइयां नै भी अपनी बात लोगां मैं रख कै अपना स्टैंड बताना चाहिए। इन सतसंगा आल्यां नै बी बताना चाहिए अक इस जन्म मैं दुखिया गरीब की गरीबी क्यूकर दूर होवै। आज गामां का के हाल हो लिया? इतना बुरा हाल क्यों हो लिया? महिला भ्रूण हत्या क्यों बधगी? दहेज प्रथा क्यों बधती जावै सै? घुंघट मैं आज बी औरत क्यूं जकड़ राखी सै? भ्रष्टाचार म्हारे जीवन का स्वीकृत हिस्सा क्यूं बणग्या? म्हारे मन तो साफ सैं फेर क्यों इतनी गंदगी फैलगी? लड़कियां पै होवण आले यौन उत्पीड़न अर यौन हिंसा पै के कहना सै इन सबका? दुलिना, गोहाना, हरसौला अर गुड़गावां कांड क्यों होवण लागरे सैं म्हारे समाज मैं? महिलावां की खरीद फरोख्त, वेश्यावृत्ति क्यों बधती जावै सै म्हारे समाज मैं? के गीता का पाठ अर गऊ की पूंछ इन समस्यावां का समाधान कर सकैं सैं? इन सारी बातां पै जिकरा होवै तो कैहदें सैं अक हम के कर सकां सां म्हारी नीयत मैं तो कोए खोट नहीं। फेर बलात्कार करण आले लोगां की हिम्मायत मैं एस पी अर डी सी कै ट्रॉली भरकै कूण ल्यावै सै? दारू पीवणिया, पीस्से खावणिया, लड़की की गेल्यां छेड़खानी करनिया नै सरपंच कूण बणावै सै? गाम मैं सुलफा, दारू अर स्मैक कूण बिकवावै सै? गाम मैं युवा औरतां नै वेश्यावृत्ति मैं धकेलनिया का साथ कूण निभावै सै? गाम की बहुआं गेल्यां भद्दे मजाक अर टोन्ट कौन करै सै? बाहण की गेल्यां चाचा का छोरा, मामा का छोरा, पड़ोसी का छोरा, चाचा ताऊ अवैध संबंध क्यूं बणावैं सैं अर माट्टी गेरण के नाम पै अर गाम की इज्जत के नाम पै इननै कूण बचावैं सैं? बहू की गेल्यां सुसरा क्यों गिरकावै सै? एकली देख कै बहु की इज्जत पै हाथ क्यों ठावै सै?
खेत क्यार मैं कमजोर तबक्यां की औरतां की साथ जोर जबरदस्ती कूण करता पावै सै? एड्स की बीमारी गामां मैं क्यों बढ़ती जावै सै? आज के नौजवानां मैं नामर्दी की शिकायत क्यों बढ़ती जावै सै? बाहण भाई के रिश्ते बच कड़ै रहे सैं? ब्याह शादी तोड़ण के फतवे देवण तै न्यारा इन सारी बातां पै के कहना सै म्हारे गाम के अर म्हारी कौमां के ठेकेदारां का? आज ताहिं फांसी का फतवा म्हारी इन तथाकथित पंचायतां नै किसे ऊंची जाति के खाते पीते परिवार के छोरे ताहिं क्यों ना दिया। यू खाते पीते परिवारां का छोरा गाम के नाक मैं दम करदे कोए बात ना। यू बिगाड़ करण मैं सबतै आगे पावैगा। सबनै बेरा। सब चुप। तलैए तले सब किमै चालै सै। ऊपर दिखाई नहीं देना चाहिए। जै इतनी ए चिंता सै गाम की इज्जत की तो इनपै क्यूं ना फांसी का हुकम? इतनी खामी आगी गामां मैं उन पर तो कदे पंचायत नहीं कोए चर्चा नहीं, अर जो नौजवान अपनी मर्जी तै ब्याह करकै घर बसाना चाहवैं सै वे समाज मैं बिगाड़ करते दीखै सैं इन असली गाम बिगाडुआं नै। एक हरिजन का छोरा अर किसे बड्डी जात की छोरी उसे गाम की आपस मैं ब्याह कर लें तो उन ताहिं मौत का फतवा दे दिया जावै सै। जहर दे कै मार दिये जावैं सैं। छोरी नै मामा कै खन्दा देंगे, अर दस पंदरा दिन पाछै कै म्हिने पाछै बेरा आवैगा गाम मैं अक बिमला के पेट मैं चाणचक दर्द हुआ अर वा मरगी। सारा गाम जानै सै अक वा मारी गई सै फेर कोए नहीं सवाल ढावन्ता अक उसके मारण आल्यां ताहिं वा मारण का हक किसनै दिया? अन्तर्जातीय ब्याह रचाया, दोनूं 18 साल तै ऊपर की उमर के तो गाम तीसरा तेली कूण? कानून कहवै सै अक 18 साल तै ऊपर के दो वयस्क आपस मैं ब्याह कर सकैं सैं तो फेर ये पंचायत क्यूं रोज मौत के फतवे देवण लागरी सैं। इन नौजवान युवा लड़के-लड़कियां ताहिं? म्हारा कानून, म्हारे अफसर, म्हारी पुलिस अर म्हारे नेता क्यूं इन फांसी का हुकम सुणावण आले सफेदपोश बदमाशां का विरोध नहीं करते? क्यूं इन पर कानूनी शिकंजा नहीं कस्या जांता? क्यूं सरकार इनकै खिलाफ दरज मुकदमे वापस ले ले सैं? आपस में ब्याह करना जुल्म कड़ै सै? सै जुल्म नहीं तो फेर ये ब्याह करणिये रोज क्यूं फांसी तोड़े जावण लागरे सैं? क्यूं हम चुप्पी साधरे सां? हमनै के हक सै किसे की ज्याण लेवण का? बहोत हो लिया। इब तो इस बर्बरता का खात्मा होणा चाहिए। किसे नै किसे नै तो इन नौजवान युवक-युवतियां की हिम्मायत मैं आगै आणा पड़ैगा।

हिसाब कद मांगोगे

हिसाब कद मांगोगे
पीडीएस मतलब पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम। जिब हरियाणा बन्या तो 1518 फेयर प्राइस शॉप थीं, 988 ग्रामीण अर 530 शहरी। 15 लाख राशनकार्ड आले थे। ईब हरियाणा के कोने-कोने पे फेयर प्राइस शॉप उपलब्ध सैं। 31 3 2005 के आंकड़े बतावैं सै अक ईब 7571 फेयर प्राइस शॉप सैं हरियाणा मैं। 5189 ग्रामीण अर 2382 शहरी। 45 लाख कार्डधारकां की जरूरत पूरी करती बताई। कितनी करैं सै अक नहीं करैं सैं ये तो उपभोग्ता बता सकैं सैं। हाल में टारगेटिड पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम स्कीम के तहत 35 किलोग्राम गेहूं हर म्हीने गरीबी की रेखा से नीचे के परिवारां को 4.65 रुपये प्रति किलो के हिसाब तै दिया जा रह्या सै। क्लेम कर्या जावै सै अक यह सिस्टम हरियाणा मैं आच्छी तरिया संगठित सै। हरियाणा मैं गरीबी दूर करने वाली तथा सेवा की दूसरी स्कीमें भी लागू की जारी सैं। गरीबां मैं भी और गरीब परिवारों को चयनित किया जा रहा है और उन्हें अंतोदय अन्न योजना के तहत गुलाबी कार्ड दिये जावण लागरे सैं। ये कार्ड क्यूकर बणै सैं। अर किसके बणै सैं या बतावण की बात कोन्या। यह केंद्र की स्कीम सै अर हरियाणा मैं 2001-2002 में लागू करी गई थी। इस स्कीम के तहत गुलाबी कार्ड आले परिवार नै हर म्हीने 2 रुपये किलो के हिसाब तै 35 किलो गेहूं दिया जावै सै। दिया जावै सै अक नहीं। जिस परिवार नै नहीं मिलदा ओ दैनिक ट्रिब्यून के संपादक के नाम एक चिट्ठी लिखण का कष्ट तो करियो। इस गेहूं के ल्यावण का खर्चा अर डीलर का खर्चा 50 पैसे प्रति किलो के हिसाब तै हरियाणा सरकार द्वारा किया जावै सै। इस स्कीम के तहत केंद्र सरकार 6353 मीट्रिक टन गेहूं हर म्हीने हरियाणा को देवै सै। गुलाबी कार्ड 192008 अंतोदय परिवारां को दिये जा चुके सैं। इनके हिसाब तै 6720280 कि.ग्रा. गेहूं हर म्हीने इन परिवारां ताहिं दिया जावण लागर्या सै। अपने इलाके के डिपो धोरै सूचना के अधिकार के तहत न्यों बूझ्या जाना चाहिए अक यू नाज किस किस नै मिल्या? यो आंकड़ा मार्च 2005 का सै। इसके अलावा स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना के तहत 1715.83 लाख रुपइये 2004-05 में बजट मैं दिये गये जिनमां तै 14132 स्वरोजगारियां को 1595.25 लाख रुपइये उपलब्ध करवाये गये। 2005-06 में इस स्कीम में 16 करोड़ खर्च करने की योजना थी। 14000 गरीब परिवारां पै खर्च कर्या जागा यू पीस्सा। इंदिरा आवास योजना के तहत 8845 घर बनाये गये अर 651 बणण लागरे थे 2004-05 मैं। 2215.56 लाख रुपइये खर्च करे गये। 2005-06 में 29.8 करोड़ से 11930 नये घर बणावण खातर और खर्च करे जाणे थे। असल मैं जमीनी हकीकत के सैं इसका क्यूकर बेरा लागै। साक्षर महिला समूह सै हरेक गांव में उननै बेरा पाड़ण की कोशिश करनी चाहिए। बहोत से गामां में साक्षरता आल्यां नै जनचेतना केंद्र खोले सैं उननै बी इस बारे में कुछ ना कुछ तो करना ए चाहिए नहीं तो यू पीडीएस का गेहूं न्योंए मंडियां में बिकदा रहवैगा।
एक स्कीम और सै संपूर्ण ग्रामीण योजना। इस योजना के तहत काम करने वाले को 10 किलो गेहूं 5.50 रुपये प्रति कि.ग्रा. के हिसाब तै अर 35 रुपइये नगद मजदूरी के दिये जावैं सैं। 2004-05 में कुल इस स्कीम पै 6794.28 लाख की राशि खर्च हुई। अर 70.12 लाख काम के दिवस उपलब्ध करवाये गये। ये कागजों मैं दिखा दिये अक असल में लोग काम पै लाकै उनपै काम करवाकै दिये गये। यू बड्डा सवाल था। महेन्द्रगढ़ जिले में ‘नेशनल फूड फार वर्क प्रोग्राम’ 2004-05 से लागू हुया सै। इसके तहत 600.00 करोड़ रुपये 2005-06 में खर्च करे जाने थे। इसे ढाल एक बैकवर्ड डिस्ट्रिक्ट इनिशिएटिव के तहत एक योजना सिरसा में शुरू करी गई। यो 3 साल का प्रोजेक्ट सै। 45 करोड़ की सहायता 3 साल मैं दी जावैगी। इसके अलावा लोकल एरिया स्कीम के तहत स्थानीय एमपी को 2 करोड़ रुपये प्रति वर्ष दिये जावैं सैं।
फेर असली सवाल यू सै अक गाम ताहिं ये स्कीम कितनी पहोंचै सै? अखबारां में खबर थी अक एक बै राजीव गांधी नै संसद मैं कह्या था अक गाम के विकास की खातर दिल्ली तै जै एक रुपइये चाल्लै सै तो 15 पीस्से पहोंचै सैं बाकी 85 पीस्से बीच मैं रैहज्यां सैं। कई साल पहलम की बात होली उस पाछै तौ घणा ए पानी सिर ऊपर कै जा लिया। ग्राम का बड़ा हिस्सा जनता का निराश सै निष्क्रिय सै। 85 पीस्से आल्यां कै जनता की निष्क्रियता बहोत सूत आरी सै। जो सक्रिय सैं वे आपस में एक-दूसरे का सिर फोड़ण लागरे सैं। 15 पीस्से बी ढंग तै गाम के विकास मैं कोन्या लागण देत्ते। गेर रै गेर पत्ता गेर। म्हारा अर इन बातां का के काम। हम राजनीति कोन्या करते। ताश खेलण तै फुरसत कोन्या। जै फुरसत लागै सै तो खाप पंचायत की चौधर तै फुरसत कोन्या। अंतर्जातीय ब्याहां पै फतवे जारी करण तै फुरसत कोन्या। इन असली बातां पै गाम कद चरचा करनी शुरू करैगा? चरचा बिना कोए राह बी कोन्या पावै। राह बी तो हमनें ए टोहवणा पड़ैगा। म्हारे गाम का संकट और कोए आकै क्यूं दूर करैगा। हमनै ऐ करना पड़ैगा। गेरद्यो ताशां नै करल्यो माड़ी घणी चरचा।

म्हारा हरियाणा महान!

म्हारा हरियाणा महान!
एक अखबार मैं खबर पढ़ी थी जिसके हिसाब तै म्हारे भारत देश महान के मध्य प्रदेश प्रांत मैं आदिवासी कबील्यां नै एक बाईस साल की कुआंरी कन्या की बलि इस कारण दे दी अक दरिया के निर्माणाधीन बांध की शक्ति को विश्वसनीय बनाया जा सकै। पाछै सी म्हारे प्रदेश के मुख्यमंत्री जी अर उनकी धर्मपत्नी जी भी सूर्य ग्रहण आले दिन कुरुक्षेत्र के ब्रह्मसरोवर मैं डुबकी लावण लागरे थे पुण कमावण की खातर। सूर्य ग्रहण पै भी बहुत से अन्ध विश्वास और भी सैं। इसे ढाल की बातां करकै ‘पुजारी श्रेणी’ अस्तित्व मैं आई लागै सै। प्राचीन मनुष्य जो अपने शिकार करे औड़ जानवरां का मांस खा कै गुजारा करया करता जिब वो किसान बनकै खेती करण लाग्या तो उसनै अधिक अन्न भी पैदा करना शुरू कर दिया। इन प्राचीन किसानां मैं ते ज्यादातर तो मानवतावादी थे, ममता थी उनके दिल मैं, निर्बला अर मासूमां की रक्षा करया करते, परोपकारी थे, सदाचारी थे, कुछ गल्त कर देते तो पश्चाताप करया करते, आत्म बलिदानी थे फेर कुछ कामचोर थे, चालाक थे, लालची थे, ईष्यालू थे, घमंडी थे, मूढ़ विश्वासी थे। इन चालाक माणसां ने परजीवियां की ढालां ज्यूकर अमर बेल जीवै न्यू रहना शुरू कर दिया। इन्नै अधिक पैदावार हड़पनी शुरू कर दी। इसका बाहना उननै यो बनाया अक उनके धोरै अलौकिक शक्ति सै अर वे किसानां की मौत पाछै उनका जीवन बढ़िया बणावण मैं उनकी सहायता कर सकैं सै। समाज मैं इस चमत्कारिक शक्ति नै इन चालाक लोगां की फालतू अन्न हड़पन की चाल ताहि ल्हकोवन का अर सामाजिक मान्यता प्रदान करण का काम करया दीखै सै। इस ढाल कल्पित देवताओं का जन्म इस संसार में हुआ। लोग पूजा, प्रार्थनावां मैं अर समाधियां मैं अपना कीमती वक्त खर्च करण लाग्गे। काम करण आले अच्छे भले पुरुष अर महिलाएं काम करण के घण्ट्या के दौरान अपने इस अध्यात्मिक अभ्यास द्वारा आये साल अनगिणत मानवीय घंटे बरबाद कर देते हैं। बुद्धिमान लोग जब अपना कोए नया काम शुरू करैं सैं तो वे वैज्ञानिकां, अनुशासनधीन अर्थशास्त्रियां, इंजीनियरां, तकनीशियनां आदि धोरै सलाह लेवैं सैं फेर म्हारे देश भारत महान मैं आज भी चाहे हम कितने ए पढ़े-लिखे क्यों ना होवां, एक ज्योतिषी की ‘हरी बत्ती’ के बिना अपने नये, उन्नति आले काम नै कति शुरू नहीं करांगे। पूजा, शुभ अवसर अर प्रार्थनाएं म्हारे विकास कार्यों की खातर विज्ञान अर टेक्नालाजी तै अधिक महत्वपूर्ण सैं।
जै सूखा पड़ज्या तो म्हारे आड़ै यज्ञ अर हवन करवाये जावैं सैं ताकि देवतावां तै आर्शिवाद प्राप्त करकै मींह बरसवाया जा सकै अर इस अन्ध विश्वास पूर्व काम मैं जो लोग तल्लीन हों सैं वे अनपढ़ लोग नहीं होन्ते बल्कि इक्कीसवीं शताब्दी मैं रहवण आले विद्वान, सभ्य अर पढ़े-लिखे लोगै हों सैं। एक प्रसिद्ध इंजीनियर की जन्म शताब्दी पै एक बार सिंचाई अर ऊर्जा मंत्री की ओर तै एक मंदिर कम्पलैक्स का नींव पत्थर धरण के प्रबंध करे जावण लागरे थे। इस मंदिर का देवता उस क्षेत्र मैं एक रक्षक के तौर पै मान्या जाया करता। नदियां के तल के ऊपर बनाये जावण आले प्रोजैक्टां की पूर्ण सफलता की खातर इसे देवता तै आशिर्वाद लिया जाना था। के वो दूरदर्शी इंजीनियर या बात सोच सकै था अक उसकी मौत पाछै ‘अन्तरिक्ष युग’ मैं भारत के कुछ लोग लोगां तै टैक्सां द्वारा वसूल करे गये धन नै मंदिर की स्थापना पै बरबाद कर देंगे इस उम्मीद मैं अक देवता के आशिर्वाद तै बिजली ऊर्जा प्राप्त होवैगी, वो देवता जिस का कोए अस्तित्व असल मैं नहीं सै। यो देवी-देवतावां का खेल कदे कदीमी तै मान्य जावै सै जबकि सच्चाई या सै अक म्हारा आचरण मनुष्य अर जानवरां के क्रम विकास की सांझी उपज सै अर इस आचरण का जन्म किसे भी संगठित धर्म की उत्पति होवण तै बहोत समय पहलम हो लिया था। बाद मैं नैतिक व्यवहार के नियम आत्मावांवां मैं विश्वास, मूर्ति पूजा, देवताओं के अविष्कार की साथ जोड़ के बनाये गये। ज्यूकर कहया गया अक स्त्रियां केवल मनुष्य की काम-तृप्ति का ही साधन हैं तथा जब वे उनने संतुष्ट करना बंद कर दें तो उसे बख्त उन ताहिं त्याग देना चाहिए। धर्म अर अपराध के आपसी संबंधां के बारे मैं वकील अर लेखक फैंक स्वैनकारा नै एक खोज करी सै जिसमैं सिंगसिंम मैं 100 सालां के दौरान जिन लोगां ताहिं कत्ल के जुर्म मैं फांसी दी गई उनमैं तै 65 प्रतिशत कट्टर रोमन थे, 21 प्रतिशत प्रोटैस्टैंट थे, 6 प्रतिशत हीब्रूज थे, दो प्रतिशत मूर्ति पूजक थे अर एक प्रतिशत तै भी कम नास्तिक थे। ईब हटकै फेर अध्यात्मवाद का बोलबाला बढ़ता जावण लागरया सै। हर पांच-दस मील पै हरियाणा मैं एक मंदिर बणता पाज्यागा सड़कां के किनारे। बेरा ना इन मंदिरां खातर धरती कूण से कानून के तहत मिलज्या सै? मनै दीखै सै मंदिर बनावण खातर किसै सरकार तै, किसे पंचायत तै, किसे विभाग तै कुछ बुझण की जरूरत नहीं सै। अर इसे करकै इस बेरोजगारी के जमाने मैं दो रोटियां का जुगाड़ करण का अर फेर सुलफे दारू ताहिं पहोंचण का आसान रास्ता बणगे ये मंदिर। देखियों इन अन्ध विश्वासां तै कद सी अक पैन्डा छूटेगा म्हारे हरियाणा प्रदेश महान का।

अंधविश्वास

बोलबाला अंधविश्वास का
माणस की स्थिति का सार यो सै अक वो एक इसे वातावरण मैं जीवै सै अक जो उसके प्रति आज्ञाकारी ना होके बाधक का काम करै सै, एक ईसा वातावरण जिसपै नियंत्रण राखण की खातर माणस नै लगातार प्रयासरत रहना होवै सै। जिसपै माणस पूरा प्रभुत्व स्थापित कोन्या कर सकदा। माणस का भौतिक तथा सामाजिक स्थितियां हमेशा कार्य प्रस्तुत करती रहवैं सैं। जिसनै पूरा करण की खातर उसनै चतराई के साथ साधन जुटाने पड़ैं सैं। मानवीय विवेक अर तर्कशीलता के अभाव मैं मानवीय सभ्यता संभव कोन्या थी क्योंकि सभ्यता का विकास विश्व नै जानने एवं नियंत्रित करण के, माणस के अथक, अनवरत प्रयास तै हुआ - ईसा उसनै तर्क आधारित बिचारां अर क्रियाकलापां के साहरै करया। अरस्तू पहला विचारक था जिसने म्हारे ताहिं तर्क की विवेक की विधि बताई। विज्ञान का एक ताकत के रूप में उद्भव गैलिलियो के बख्तां मैं हुआ। विवेक अर तर्कवाद का उद्देश्य माणसां के दिमागां पै छाये अंधविश्वासां के जाले दूर करना सै। यो मांग करै सै अक सारे ढाल के विश्वास अर आस्थाएं बुद्धि अर विवेक पर आधारित होने चाहिएं अर बुद्धि अर विवेक का मतलब है अक हम सारी बातां पै विवेक अर तर्क के हिसाब तै विचार करैं। यो अंधविश्वास के बुतां नै नष्ट करै सै। अनुसन्धेय, जांच पड़ताल-रहित, पूछताछ रहित, सूफीवाद (रहस्यवाद), रूमानी भावुकतावाद, संस्कारवाद, चमत्कार आदि के बुतां का खात्मा वैज्ञानिक जीवन पद्धति करै सै। दो हरफां मैं वो सब कुछ जो खुद नै तर्क अर धैर्यपूर्ण जांच पड़ताल के साहमी असेध समझै सै उसनै वैज्ञानिक चेतना धराशायी करण का काम करै सै। इस म्हारे समाज मैं स्वार्थी तत्वां नै अंधविश्वासां ताहिं स्थाई बनाया अर नये-नये अंधविश्वासां ताहिं जन्म दिया। मानव समाज नै तब ताहिं सभ्य नहीं बनाया जा सकदा जब ताहिं, धार्मिक कट्टरता, पारम्परिक अर रूढ़िवादी विश्वासां अर आस्थावां तै उसका संबंध विच्छेद नहीं हो जान्ता। माणस नै सभ्य बणावण की खातर वैज्ञानिक दृष्टिकोण अर माणस मैं जो कुछ भी उदात्त सै अर बढ़िया सै उसे अपनाना होगा।
असल मैं अंधविश्वास सै के? प्रमाण के होते होए भी विश्वास ना करना अर कै प्रमाण के ना होन्ते होएं भी विश्वास करना अंधविश्वास के खाते मैं आवै सै। दूसरी बात किसे एक रहस्य का स्पष्टीकरण किसे दूसरे रहस्य के मांह कै प्रस्तुत करना। इस बात मैं विश्वास करना कि संसार का कारोबार दैवयोग अथवा सनकी तरीके तै चालण लागरया सै। तीजी बात सै कार्य-कारण के बीच के वास्तविक संबंध की अवहेलना करना। चौथी बात विचार, आकांक्षा, उद्देश्य, रूपरेखा नै प्रकृति के अस्तित्व का कारण बनाना। पांचमी बात अक यू विश्वास करना अक बुद्धि नै पदार्थ की उत्पत्ति करी अर बुद्धि ए इसका संचालन करै सै। बल नै पदार्थ तै न्यारा मानना अथवा पदार्थ को बल तै न्यारा मानना। छठी बात चमत्कारां, मंत्र-तंत्र अर भाग्य, सपन्यां अर भविष्य वाणियां मैं विश्वास करना। सातमी बात अलौकिक मैं विश्वास करना। यू अंध विश्वास अज्ञानता की नींव पै टिक्या होवै सै, धार्मिक कट्टरवाद इसकी आधी स्वता होवै सै अर दुराशा इसका गुम्बद हो सै। अंधविश्वास अज्ञान का शिशु हो सै अर कष्टां का जन्मदाता। आम तौर पै हरेक दिमाग मैं अंधविश्वास का कुछ ना कुछ अंश पाया जावै सै। बर्तन धोन्ती हाण किसे औरत के हाथ तै बर्तन धोवण आला कपड़ा गिर जावै सै तो वा इसका मतलब काढै सै - कोए आवण आला सै। कपड़े के धरती पै गिरने अर मेहमान के आवण के बीच कोए संभव होने योग्य संबंध नहीं सै। गिरया औड़ कपड़ा उन लोगां के मन मैं जो उड़ै हाजिर कोन्या मुलाकात की इच्छा उत्पन्न नहीं कर सकता। हजारों लोग शुभ अर अशुभ दिनों, अंकां, शकुन, राशि तथा मणि एवं कीमती पत्थरां मैं विश्वास करैं सैं। बहोत से लोग शुक्रवार नै अशुभ मानैंगे तै दूसरे शनिचर नै अशुभ मानैंगे। इस ढाल अनेक लोगां का विश्वास सै अक तेरह माणसां नै कट्ठे होकै भोजन नहीं करना चाहिये। जै तेरां का अंक एक खतरनाक अंक है तो छब्बीस का अंक तो दोगुणा खतरनाक हुआ। हम अपने चारों कान्ही नजर मारकै देखां अक कितने अंधविश्वास बिखरे पड़े सैं। हम अपने मन मैं झांक कै देखां अक कितने अंधविश्वास म्हारे भीतर जगहां बनाये बैठे सैं। बिल्ली राह काटज्या तो कसौण, खाली दोघड आली फेट ज्या तो कसौण। अनेक शताब्दियां तक इसा मान्या जान्दा रह्या अक सूर्यग्रहण अर चंद्रग्रहण महामारी अर अकाल की पूर्व सूचना होते हैं। फेर आज तो इसी बात कोन्या। इसे तरियां ताबीज, तंत्र-मंत्र, भूत प्रेत मैं विश्वास करना कोरा अंधविश्वास सै। आई किमै समझ मैं। हरियाणा मैं अंधविश्वास बढ़ते जावण लागरै सैं। सोचियो किमै तो।

मनोज बबली जिंदाबाद

मनोज बबली जिंदाबाद, नहीं दबैगी थारी आवाज
सते, फते, नफे और सविता, कविता, सरिता, और ताई भरपाई सही सांझ के पांच बजे पहोंचगे जनचेतना केंद्र मैं। सरिता बोली - मनोज अर बबली के कत्ल की खबर सुणकै बहोत दर्द हुया दिल मैं। फत्ते छूटता ए बोल्या - दर्द क्यूं हुया? गाम की गाम मैं ब्याह करकै कितना गल्त काम करया सै उननै। सरिता बोली - कूणसे कानून का उल्लंघन कर दिया फत्ते उननै। कौनसी धारा तोड़ दी उननै? फत्ते बोल्या - कानून-वानून का तो मनै बेरा ना फेर करया बहोत माड़ा काम। न्यों भाण-भाई का ब्याह करना म्हारा हरियाणा का समाज कोन्या मानै। यो काम म्हारी परम्परा की संगत मैं कोन्या। सरिता बोली - कौन सी परम्परा की बात करै सै फत्ते? नल-दमयन्ती की परम्परा मैं तो दमयन्ती नै उन बख्तां मैं स्वयंबर रचया था अर अपने मनपसंद के माणस के गल मैं माला पहराई थी। आज अपनी मर्जी तै ब्याह करनियां गेल्यां ये खाप पंचायत के करैं सैं पूरा संसार जानै सै अर थू-थू करै सै इनपै। फते बोल्या - जिब नल दम्यन्ती के एक गाम के थे? सरिता बोली - दो गाम आल्यां की लव मैरिज नै स्वीकार करलें सै ये थारी तालिबानी पंचायत तो बड़ी आच्छी बात। दूसरी बात परम्परा की सै, वा या सै अक पूरे भारत मैं हर इस हरियाणा आले इलाके मैं भी कदे इसे बख्त थे जिब परिवार की मुखिया औरत हुया करती। फते बोल्या - सरिता बे सिर-पैर की बात करकै के मनोज अर बबली की हिमायत कराई जा सकै सै। औरत कद हुया करती घर की चौधरी।
सरिता बोली - घर की चौधरी तो थी ए थी वे छोरे नै ब्याह कै अपणे घर मैं ल्याया करती। इसे परम्परावादी सो तै इन परम्परावां नै ये तालिबानी क्यों भूलगे फत्ते। ये परम्परा का साहरा ले कै म्हारी भावनावां तै खिलवाड़ करैं सैं ये पंचायती। अर इन पंचायतियां की हिस्ट्री खोल कै धरदी तो भीड़ी धरती हो ज्यागी इननै। दूसरी बात या सै अक एक मिनट आपां इस बात नै न्यारी करकै देखां अक यू ब्याह गल्त था अक ठीक। मैं कहूं सूं अक मनोज बबली नै ठीक करया था फत्ते कहवै गल्त करया। फेर जो बी हो कानून अपने हाथ मैं लेवण का हक किसनै सै? जिननै कोए कानून नहीं तोड़या भारत के संविधान का उननै तो इतनी कसूती निर्मम हत्या बख्शी इन पंचातियां नै अर जिननै सरासर सबकै साहमी दिन धौली भारत के संविधान की, भारत के कानून की धज्जियां उड़ा दी उनकी मेर मैं आण खड़ी थी ये तालिबानी पंचायत। म्हारी सरकार कै अर म्हारे नेतावां कै बी सांप सूंघग्या। सन्नपात सा मारग्या, कुछ बोलते कोन्या। मान लिया एक मिनट की खातर उन नौजवान युवक-युवती नै गल्ती कर दी (असल मैं बहुत वीरता का काम करया) तो इसका यो मतलब कड़ै सै अक ये तालिबानी पंचायत कानून अपने हाथ मैं ले कै जंगल का राज चलावैं। मनोज के मां-बापां का के कसूर। चंद्रपति विधवा औरत सै उसकी बेटी सीमा सै उनतै या पंचायत बहिष्कार करकै के बताना चाहवै सै समाज नै? फत्ते धोरै कोए जवाब नहीं था इन बातां का। न्यौं बोल्या यो बहिष्कार का दबाव तो इस खातर बनाया सै अक समझौता होज्या। कातिलां के खिलाफ दर्ज केस वापस ले ले चंद्रपति अर उसका परिवार। इसतै घटिया अर अनैतिक बात और कोए नहीं हो सकती।
फते बोल्या - सरिता तूं इन ज्ञान विज्ञान आल्यां कै हत्थै तो नहीं चढ़गी सै। वे गोत की गोत मैं अर गाम की गाम मैं ब्याह करवात्ते हांडैं सैं। सरिता बोली - उनतै पहलम तो अपणा ताऊ देवीलाल चौटाला गाम की गाम मैं ब्याह बेरा नी कितने अक करवाग्या। अर और भी घणे गाम सैं जित गाम की गाम मैं ब्याह होज्यां सैं। दूसरे एक गाम मैं मान लिया जाटां के 16 गोत सैं इनमैं एक गोत खेड़े का सै। तो इस गोत के लोग तो बाकी 15 गोतां की छोरी ब्याह कै ल्या सकैं सैं, फेर इन 15 गोतां के लोग उस खेड़े आले गोत की छोरी ब्याह कै नहीं ल्या सकते। फत्ते बोल्या - जै उनके गोत की छोरी बहू बणकै आ ज्यागी तो के कहवैंगे वे उसनै? सरिता बोली - जिब ये खेड़े गोत के लोग इन 15 गोतां की छोरियां नै ब्याह कै उस गाम मैं ल्यावैं सैं तो ये के कहवैंगे उस छोरी नै? फत्ते चुप होग्या। फेर नफे बोल्या - देख सरिता या गाम की गाम मैं ब्याह की बात बी देखी जा, फेर उसे गोत मैं ब्याह की बात तो गलै कोन्या उतरती। सरिता बोली - भाई-बहन का ब्याह तो यो सै कोन्या कुनबे तो न्यारे-न्यारे थे इनके। बाकी ब्राह्मण समुदाय मैं उस गोत मैं ब्याह होवण लागरे। जै वशिष्ठ का आपस मैं सूत बैठज्या तो ये शास्वत बदल कै ब्याह करण का राह बना लें सैं इसा सुन्या सै। अर न्योंए बनिया समुदाय मैं भी, जै सिंघल के छोरा-छोरी ब्याह करना चाहवैं तो फांसी के तालिबानी फैंसले कोन्या बनाये जात्ते। फत्ते बोल्या - के वे उसे गोत-नात मैं ब्याह कर लेवण देवैं सैं? सरिता बोली - हाथ कंगण नै आरसी के अर पढ़े लिखे नै फारसी के। बूझले चाल इैबै बनियां के घरां चालकै। सरिता और फत्ते बनिया के यहां चले जाते हैं।
ताई राम प्यारी कहती है - देखो, बेबे उन बालकां नै चाहे जो कुछ बी करया हो फेर उनकी हत्या तो किसे तरियां बी गलै कोन्या उतरती। इतनी वार मैं सरिता अर फत्ते बी आगे। नफे बोल्या - के बताई लाला जी नै। फत्ते तो चुप रहया। उसकी तो नानी सी मररी थी। सरिता बोली - जै सिंघल छोरा हो अर छोरी बी सिंघल हो तो छोरी अपना गोत छोड़ कै मां का गोत अपना ले सै अर उनकी मर्जी का ब्याह होज्या सै। कोए तालिबानी फैसला नहीं होता इन समुदायां मैं। सविता बोली - ईब बताओ? तालिबानी पंचातियो थारी वा हिंदू संस्कृति कौन सी सै जो उन मानसां नै जिननै प्यार के रिश्ते को अंजाम दिया उननै फांसी देयो कै नहर में फैंक कै मार दयो। ब्राह्मण अर बनिया तै बड्डा हिंदू कौन सै हरियाणा के समाज मैं? देखना यो है सै अक मनोज अर बबली की शहादत नै कितने लोग शहादत के रूप मैं देखैं सैं अर कातिलां नै सबक सिखावण की खातर इनकी साथ खड़े होवैं सैं। बख्त माफ नहीं करैगा।

सेज अधिनियम 2005

के कहवै से सेज अधिनियम 2005 ?
सते, फते, नफे, सरिता, कविता, सविता, अर ताई भरपाई जन चेतना केंद्र मैं आगे। नफे बोल्या - नाश कर दिया इस सेज नै किसानां का। फते बोल्या सेज का बेरा बी सै अक न्योंए हांकै सै? नफे चुप। सन्नाटा सा छाग्या। अधिनियम तो पढ़े कोन्या राख्या। ना इसकी हिम्मत करनिया नै पूरा बेरा अर ना विरोध करनिया नै। बस जुट रे सैं अपने-अपने सुर मैं। सविता बोली - आज मैं ल्याई सूं इस अधिनियम की मोटी-मोटी बात थाम ध्यान तै सुणो अर सविता शुरू होगी - 1. विशेष आर्थिक क्षेत्र की स्थापना केंद्र सरकार, राज्य सरकार संयुक्त रूप तै या अलग-अलग अर कै किसे व्यक्ति द्वारा करी जा सकै सै। 2. सेज की स्थापना का इच्छुक व्यक्ति या अन्य, इलाके का चुनाव स्वतंत्रता तै करैगा अर राज्य सरकार कै सीधे बोर्ड को अपना प्रस्ताव भेज सकै सै। 3. धारा 7 के तहत सेज मैं स्थित कोए भी इकाई या डवलपर्स घरेलू शुल्क क्षेत्र के करों, ड्यूटी व अधिभार तै मुक्त होगा। 4. केंद्र सरकार भारत मैं कार्यरत उप सचिव स्तर के किसी अधिकारी को सेज का विकास आयुक्त नियुक्त करेगी, जो सेज से संबंधित मामलों का सर्वे-सर्वा होगा। 5. विशेष आर्थिक क्षेत्रों में अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र खोलने की अनुमति केंद्र सरकार दे सकती है। 6. धारा 23 मैं यो प्रावधान सै कि जिस राज्य मैं सेज स्थित सै उस राज्य के उच्च न्यायालय मुख्य न्यायाधीश की सहमति तै उस राज्य की सरकार एक या अधिक न्यायालयों को सेज से उत्पन्न असैनिक प्रकृति के मुकद्दमे व अधि सूचित अपराधों की सुनवाई के लिए अधिकृत कर सके सैं। इसके अलावा कोए भी अन्य न्यायालयों मैं मुकद्दमे की सुनवाई या ट्रायल नहीं कर सकदा। 7. किसे कंपनी द्वारा किये गये अपराध के मामले मैं कंपनी के साथ-साथ उस प्रभारी या उत्तरदाई पर भी मुकद्दमा चलाया जा सकता है बशर्ते वह यह सिद्ध कर देता है कि कथित अपराध उसकी जानकारी के बिना हुआ सै। 8. धारा 26-31 तक सेज के लिए विशेष कर संबंधी प्रावधान है जिसमें स्पष्ट अंकित किया गया सै कि (8.1) सेज के अंदर अथवा उसकी इकाइयों के द्वारा आयातित सामान अथवा सेवाओं पर कस्टम अधिनियम 1962, कस्टम कर अधिनियम 1975 अर कस्टम कर टैरिफ एक्ट 1975 के तहत कस्टम शुल्क में छूट होगी। 8.2 - घरेलू कर क्षेत्र से सेज के अंदर, लाये जाने वाले सामान पर सैंट्रल एक्साइज एक्ट 1944 के तहत आबकारी शुल्क मैं छूट होगी। 8.3 - घरेलू कर क्षेत्र से सेज में या उसकी इकाइयों में लाये जाने वाले सामान, भारत के बाहर सेज क्षेत्र में लाये जाने वाले सामान व सेवाओं को वे सभी छूट मिलेंगी जो विदेशी निवेशकों को मिलती हैं। 8.4 - सेज क्षेत्र व इसकी इकाइयों की खातर सेवाकर, सिक्योरिटी ट्रांजिशन टैक्स, केंद्रीय बिक्री कर व इनकम टैक्स की छूट भी प्राप्त होगी। 8.5 - इन क्षेत्रों में ऐसा सामान जो घरेलू कर क्षेत्रों पर ले जाया जायेगा उन पर एंटी डम्पिंग, काउंटर ब्रैलिंग, सुरक्षात्मक कर एवं सीमा शुल्क उसी दर से लगाया जायेगा, जिस दर से आयात कर लगाया जावै सै। 9. धारा 50 मैं विभिन्न राज्यों की सरकारों को यह अधिकार दिया गया सै कि वह अपने राज्य मैं टैक्स, लेवी व चंुगी तै सेज नै मुक्त कर सकैं सैं। 10. धारा 27 मैं आयकर कानून मैं 1961 मैं संशोधन किया गया सै जिसमैं स्पष्ट किया गया सै कि आयकर अधिनियम की धारा 115(0) मैं संदर्भित लाभांश को, सेज के मामले में कुल आय मैं सम्मिलित नहीं किया जावैगा।
इसे तरियां धारा 10(ए) मैं उपधारा 7(बी) जोड़ी गई सै जिसमैं 1 अप्रैल के बाद शुरू होवण आले कर निर्धारण वर्ष से 5 वर्ष तक लाभांश को 100 प्रतिशत छूट तथा आने वाले 5 वर्षों में 50 प्रतिशत छूट दी गई सै। इसे ढाल धारा 80एबी(1) मैं सेज मैं निवेश करने वाले विकासकर्ता को, व्यक्ति को आने वाले दस वर्षों तक 100 प्रतिशत छूट दी गई है। 11. सेज को अपने क्षेत्र मैं ऑफ शोर बैंक इकाइयां खोलने व संचालन करने की अनुमति दी गई सै। 12. सेज को अपने क्षेत्र मैं अपना स्वयं का सुरक्षा तंत्र चलावण की अनुमति दी गई सै। 13  धारा 49 मैं केंद्र सरकार को यो अधिकार दिया गया सै कि ‘अधिसूचना जारी करकै यह घोषित कर सकती है कि केंद्र सरकार के अन्य कानून यथा ट्रेड यूनियन एक्ट, औद्योगिक एवं श्रम विवाद, प्रोविडेंट फंड, एम्पलायर लायबलिटिज, वृद्धावस्था पेंशन, मजदूर भू-प्रसव कालीन सुविधा आदि से सेज को मुक्त कर सकै सै। कविता बोली  - ये सेज किसे खातर फूलां की सेज अर म्हारी खातर म्हारी अर्थी। कितने कमाल की बात सै अक सेज भारत की जमीन पर विकसित ऐसे क्षेत्र हैं जिन्हें विदेशी क्षेत्र के रूप मैं मान्यता प्राप्त होगी और भारत के समस्त देशी कानूनां तै मुक्ति होगी। न्यों कहवैं सैं अक देश मैं 403 सेजां नै मंजूरी मिल चुकी सै अर कमेटी कै साहमी 2700 प्रस्ताव विचाराधीन सैं। सते बोल्या - जब भारत आजाद हुआ था तो देश मैं 450-500 रियासत हुआ करती। फेर जब सेज पूरी तरियां लागू हो ज्यागा तो पूरे देश मैं 3000 तै फालतू इसी रियासत होंगी अर उनके किले होंगे। ज्यूंकर अंग्रेजी का पिट्ठू उन बख्ता मैं थे न्योंए सेज आल्यां के टीक्कड़ तोड़ सेज के विरोध नै खुंडा करण लागरे सैं। सवाल यू सै अक सेज किस कीमत पै? किसान, मजदूरां नै उजाड़ कै अक उनका बसेबा बी गैल की गैल करकै? या सोच्चण की बात सै। हरेक जनचेतना केंद्र पै, हरेक महिला समूह मैं, होक्के पै, चौपाड़ मैं, सारे कै, अर हां ताश खेलती हाण, इस सेज पै चरचा जरूर होनी चाहिये। पूरा सोच विचार करना चाहिये। इसकी खामियां के खिलाफ आवाज़ बुलंद करनी चाहिये।

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