किस्सा कोठी का
सत्ते, फत्ते, नफे, सविता, कविता, सरिता अर भरपाई शनिवार नै आ बैठे भरपाई के घर मैं। चर्चा चाल पड़ी। नफे नै बूझ लिया - सत्ते कित गया था काल? सत्ते बोल्या - शहर मैं कोठ्ठी पै गया था छोरे की भरती खातर। फत्ते बोल्या - आजकल तो कोठियां का ए बोलबाला सै। हर ज़िले मैं एक कोठ्ठी मशहूर सी होरी सै अर डीसी का आधा दफ्तर तो कोठ्ठी पर तै ए चालै सै। मैं तो एक ज़िले की कोठ्ठी का कसूता भुगतभोगी रह्या सूं। 1999 का साल रह्या होगा। सीनियर सैकेंडरी की वार्षिक परीक्षा मैं बतौर केंद्र अधीक्षक के मेरी ड्यूटी आगी। मैं इसे ढाल की ड्यूटी तै हमेश्या बचण की कोशिश करया करूं। मनै एकाध बर इसे ढाल की ड्यूटी दी सै। वा भी जिब दी जिब इसतै बचण का कोए रास्ता नहीं बच्या। थारे दिमाग मैं सवाल उठ्या होगा अक मैं इस ड्यूटी तै क्यों बचना चाहूं सूं। सीधी सी बात सै अक मैं इसके काबिल नहीं सूं। इम्तिहाना तै दो दिन पहलम बेरा लागै सै अक इबकै ड्यूटी कड़े की सै। कुछ लोग तो पहलमै बेरा पाड़लें सैं अक उनकी ड्यूटी कित लागी सै। अर कुछ तो अपनी पसंद की जगहां भी ड्यूटी लुवा ए लेवैं सैं। कई बर तो कुछ विद्यालयों के इन्चार्ज अपनी मर्जी तै अपनी पसंद के केंद्र अधीक्षकां की ड्यूटी लुवा ले सैं। एक-दो बर मेरे तै भी इसे तरां की ड्यूटी खातर ऑफर आई, फेर मैं ऑफर एक्सैप्ट कोनी कर पाया। ईबकै मेरी ड्यूटी देवशाला केंद्र पै लागगी। परीक्षा तै एक दिन पहलम मनै पहोंचना था। मैं तड़कै 10 बजे देवशाला की खातर लिकड़ लिया। कैम्प पै पहोंच कै कमरयां की निगरानी, लिपिक की व्यवस्था अर पहले पेपर की पूरी तैयारी करी। इतनी वार मैं एक महाशय आये अर मनै न्यों बोले अक मैं थामनै लेणे शहर गया था थारे घरों अपनी गाड्डी (कार) लेकै। थाम रोज क्यूं दुखी होवो आण-जाण मैं। थामनै मैं लियाया अर छोड़ाया करूंगा। उसनै कहया अक ये सारे बालक अपने सैं। मेरी तो याहे इच्छा सै अक इनका क्यूकरै भला होज्या। मनै उसका धन्यवाद करया अर उसका ओ प्रस्ताव स्वीकार कोनी करया। मैं तो घरां उल्टा आग्या। पाछे तै उस महाशय नै उन मास्टरां तै संपर्क साध्या जो सुपरवाइजर के रूप मैं उस सेंटर में ड्यूटी पे आणे थे। वे सारे नेड़े-धोरे के गामां के थे। उन मास्टरां गेल्यां के बात करी इसका बेरा मनै कोन्या लाग्या उस बख्त।
आगले दिन पहला पर्चा शुरू हुया। सारे बालक खुल्लम-खुल्ला नकल करना चाहवैं थे। मैं नहीं चाहूं था अक इस ढाल खुल्लम-खुल्ला नकल होवै सैंटर मैं। कुछ तो धरया ढक्या रैहणा ए चाहिए। फेर मेरे सारे के सारे सुपरवाइजर बगावत पै उतरेंगे। वे खुल्लम-खुल्ला नकल के हक मैं थे। मेरी बात नै कानां पर कै टाल जां थे। जिब मैं दीख ज्याऊं तो नकल रोक्कण का दिखावा सा कर दें ना तो कोए लेना-देना नहीं था। मेरी बी फिरकी बनगी। एकै बर मैं सारे कमरयां मैं जाणां पड़या। मेरी दिल तै इच्छा थी अक नकल नहीं होवण द्यूं। फेर रोकूं तै रोकूं क्यूकर? स्कूल का हैडमास्टर चाहवै, सुपरवाइजर चाहवैं, बालक चाहवैं अर उनके मां-बाप चाहवैं नकल करवाणा। मनै बी बेरा था अक मैं नकल पूरी तरियां कोन्या रोक पारया। हां, कुछ कंट्रोल जरूर कर पारया था। सांझ नै जब घरां उल्टा आवण लाग्या तो धमकी दी गई। फेर दो पेपर तो मनै किसे तरियां बिना नकल के करवा दिये। तीसरे दिन उड़नदस्ते मैं एक बड़े शिक्षा अधिकारी आगे। उनके साथ एक अध्यापक भी थे। मैं उस अध्यापक जी नै बहोत आच्छी तरियां जानूं। शिक्षा अधिकारी जी नै पहलम तो चारों कान्ही का केंद्र का दौरा करया। दिखावे खातर मेरे तै बूझया भी अक केंद्र किसा चालण लागरया सै? उननै इन्सपैक्सन बुक मैं टिप्पणी भी बढ़िया कर दी। फेर वे अपनी कार मैं जाकै बैठगे। उननै उस अध्यापक के कानां मैं कुछ घुस-फुस करी अर मेरे को अपने पास बुलाया। अधिकारी बोल्या - फते सिंह। मैं हैरान था अक अधिकारी नै मेरे नाम का क्यूकर बेरा लाग्या। खैर उस अध्यापक नै ए बताया होगा मेरा नाम। अधिकारी नै मेरै तै कह्या अक केंद्र नै ठीक-ठ्याक चला ल्यो। इस ठीक-ठ्याक का मतलब था मैं कुछ ढील द्यूं। फेर अधिकारी आगै बोल्या अक काल कोठ्ठी पै गाम की पंचायत आरी थी। कोठ्ठी पै या चर्चा थी अक इसा केंद्र अधीक्षक देवशाला गाम के केंद्र पै ठीक नहीं। यो कोठ्ठी का चुनावी हलका सै। आड़ै इतनी सख्ताई ठीक कोन्या। अधिकारी आगै बोल्या अक कोठ्ठी पर तै मेरी ड्यूटी लागी सै अक कै तो केंद्र ने ठीक-ठ्याक चलवाद्यो मतलब नकल होवण द्यो के फेर अधीक्षक नै हटा कै कोए बढ़िया अधीक्षक लगा दयो। अधिकारी विकल्प के रूप मैं पिवानी स्कूल तै एक भौतिकी का अध्यापक गेल्यां लैके भी आरे थे। मनै कहया अक मैं तो केंद्र नै ठीक-ठ्याक चलावण लागरया सूं। नकल तो मैं कोन्या होवण द्यूं। भला हो अधिकारी का। उसनै तुरत-फुरत मेरे ताहिं रिलिविंग चिट पकड़ा दी। बाकी दिनां की परीक्षाएं कोठ्ठी के मुताबिक हुई।
सत्ते, फत्ते, नफे, सविता, कविता, सरिता अर भरपाई शनिवार नै आ बैठे भरपाई के घर मैं। चर्चा चाल पड़ी। नफे नै बूझ लिया - सत्ते कित गया था काल? सत्ते बोल्या - शहर मैं कोठ्ठी पै गया था छोरे की भरती खातर। फत्ते बोल्या - आजकल तो कोठियां का ए बोलबाला सै। हर ज़िले मैं एक कोठ्ठी मशहूर सी होरी सै अर डीसी का आधा दफ्तर तो कोठ्ठी पर तै ए चालै सै। मैं तो एक ज़िले की कोठ्ठी का कसूता भुगतभोगी रह्या सूं। 1999 का साल रह्या होगा। सीनियर सैकेंडरी की वार्षिक परीक्षा मैं बतौर केंद्र अधीक्षक के मेरी ड्यूटी आगी। मैं इसे ढाल की ड्यूटी तै हमेश्या बचण की कोशिश करया करूं। मनै एकाध बर इसे ढाल की ड्यूटी दी सै। वा भी जिब दी जिब इसतै बचण का कोए रास्ता नहीं बच्या। थारे दिमाग मैं सवाल उठ्या होगा अक मैं इस ड्यूटी तै क्यों बचना चाहूं सूं। सीधी सी बात सै अक मैं इसके काबिल नहीं सूं। इम्तिहाना तै दो दिन पहलम बेरा लागै सै अक इबकै ड्यूटी कड़े की सै। कुछ लोग तो पहलमै बेरा पाड़लें सैं अक उनकी ड्यूटी कित लागी सै। अर कुछ तो अपनी पसंद की जगहां भी ड्यूटी लुवा ए लेवैं सैं। कई बर तो कुछ विद्यालयों के इन्चार्ज अपनी मर्जी तै अपनी पसंद के केंद्र अधीक्षकां की ड्यूटी लुवा ले सैं। एक-दो बर मेरे तै भी इसे तरां की ड्यूटी खातर ऑफर आई, फेर मैं ऑफर एक्सैप्ट कोनी कर पाया। ईबकै मेरी ड्यूटी देवशाला केंद्र पै लागगी। परीक्षा तै एक दिन पहलम मनै पहोंचना था। मैं तड़कै 10 बजे देवशाला की खातर लिकड़ लिया। कैम्प पै पहोंच कै कमरयां की निगरानी, लिपिक की व्यवस्था अर पहले पेपर की पूरी तैयारी करी। इतनी वार मैं एक महाशय आये अर मनै न्यों बोले अक मैं थामनै लेणे शहर गया था थारे घरों अपनी गाड्डी (कार) लेकै। थाम रोज क्यूं दुखी होवो आण-जाण मैं। थामनै मैं लियाया अर छोड़ाया करूंगा। उसनै कहया अक ये सारे बालक अपने सैं। मेरी तो याहे इच्छा सै अक इनका क्यूकरै भला होज्या। मनै उसका धन्यवाद करया अर उसका ओ प्रस्ताव स्वीकार कोनी करया। मैं तो घरां उल्टा आग्या। पाछे तै उस महाशय नै उन मास्टरां तै संपर्क साध्या जो सुपरवाइजर के रूप मैं उस सेंटर में ड्यूटी पे आणे थे। वे सारे नेड़े-धोरे के गामां के थे। उन मास्टरां गेल्यां के बात करी इसका बेरा मनै कोन्या लाग्या उस बख्त।
आगले दिन पहला पर्चा शुरू हुया। सारे बालक खुल्लम-खुल्ला नकल करना चाहवैं थे। मैं नहीं चाहूं था अक इस ढाल खुल्लम-खुल्ला नकल होवै सैंटर मैं। कुछ तो धरया ढक्या रैहणा ए चाहिए। फेर मेरे सारे के सारे सुपरवाइजर बगावत पै उतरेंगे। वे खुल्लम-खुल्ला नकल के हक मैं थे। मेरी बात नै कानां पर कै टाल जां थे। जिब मैं दीख ज्याऊं तो नकल रोक्कण का दिखावा सा कर दें ना तो कोए लेना-देना नहीं था। मेरी बी फिरकी बनगी। एकै बर मैं सारे कमरयां मैं जाणां पड़या। मेरी दिल तै इच्छा थी अक नकल नहीं होवण द्यूं। फेर रोकूं तै रोकूं क्यूकर? स्कूल का हैडमास्टर चाहवै, सुपरवाइजर चाहवैं, बालक चाहवैं अर उनके मां-बाप चाहवैं नकल करवाणा। मनै बी बेरा था अक मैं नकल पूरी तरियां कोन्या रोक पारया। हां, कुछ कंट्रोल जरूर कर पारया था। सांझ नै जब घरां उल्टा आवण लाग्या तो धमकी दी गई। फेर दो पेपर तो मनै किसे तरियां बिना नकल के करवा दिये। तीसरे दिन उड़नदस्ते मैं एक बड़े शिक्षा अधिकारी आगे। उनके साथ एक अध्यापक भी थे। मैं उस अध्यापक जी नै बहोत आच्छी तरियां जानूं। शिक्षा अधिकारी जी नै पहलम तो चारों कान्ही का केंद्र का दौरा करया। दिखावे खातर मेरे तै बूझया भी अक केंद्र किसा चालण लागरया सै? उननै इन्सपैक्सन बुक मैं टिप्पणी भी बढ़िया कर दी। फेर वे अपनी कार मैं जाकै बैठगे। उननै उस अध्यापक के कानां मैं कुछ घुस-फुस करी अर मेरे को अपने पास बुलाया। अधिकारी बोल्या - फते सिंह। मैं हैरान था अक अधिकारी नै मेरे नाम का क्यूकर बेरा लाग्या। खैर उस अध्यापक नै ए बताया होगा मेरा नाम। अधिकारी नै मेरै तै कह्या अक केंद्र नै ठीक-ठ्याक चला ल्यो। इस ठीक-ठ्याक का मतलब था मैं कुछ ढील द्यूं। फेर अधिकारी आगै बोल्या अक काल कोठ्ठी पै गाम की पंचायत आरी थी। कोठ्ठी पै या चर्चा थी अक इसा केंद्र अधीक्षक देवशाला गाम के केंद्र पै ठीक नहीं। यो कोठ्ठी का चुनावी हलका सै। आड़ै इतनी सख्ताई ठीक कोन्या। अधिकारी आगै बोल्या अक कोठ्ठी पर तै मेरी ड्यूटी लागी सै अक कै तो केंद्र ने ठीक-ठ्याक चलवाद्यो मतलब नकल होवण द्यो के फेर अधीक्षक नै हटा कै कोए बढ़िया अधीक्षक लगा दयो। अधिकारी विकल्प के रूप मैं पिवानी स्कूल तै एक भौतिकी का अध्यापक गेल्यां लैके भी आरे थे। मनै कहया अक मैं तो केंद्र नै ठीक-ठ्याक चलावण लागरया सूं। नकल तो मैं कोन्या होवण द्यूं। भला हो अधिकारी का। उसनै तुरत-फुरत मेरे ताहिं रिलिविंग चिट पकड़ा दी। बाकी दिनां की परीक्षाएं कोठ्ठी के मुताबिक हुई।
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