सांझी खेती
आज किसानी पर संकट बहोत गहरा सै। किसान आत्म हत्या करण लागरे सैं। कोए उनकी सुध लेवणिया बी कोन्या। इसे हालात मैं यू सांझा खेती का अनुभव रोशनी दिखा सकै सै हमनै।
किसान कोओपरेटिव बाण्डा हेड़ी हिसार की स्थापना लगभग वर्ष 2004 में एक बड़े परिवार के लगभग 10 किसानों के समूह नै की। मुंढाल हरियाणा के लगभग मध्य मैं स्थित चौबीसी पंचायत खाप के तहत आने वाला 250-300 वर्ष या इससे भी पुराना गांव सै। वर्तमान मैं इसमें तीन पंचायते हैं - मुंढाल खुर्द व कलां दो पंचायतें भिवानी जिला में सैं जबकि बांडा हेड़ी पंचायत हिसार जिला में पड़ै सै। देखने में व बस्ती के हिसाब से पूरा गांव एक ही लगता है और पहले पंचायत भी एक ही हुया करदी। ईब तीनों गामां की कुल आबादी लगभग 15 हजार होगी।
वर्ष 1995 में आई बाढ़ की वजह से लगभग पूरे गांव और विशेष तौर पर बाण्डाहेड़ी के खेतों में जो सोरखी गांव की तरफ हिसार-दिल्ली मार्ग के साथ पड़ते हैं, खड़ी फसलों में भारी नुकसान हुया था। सितम्बर मास के शुरू में आई बाढ़ तै सावनी की फसल की बिजाई भी बड़े हिस्से में नहीं हो पाई। असल में काफी सालों के बाद इतनी ज्यादा बरसात एकदम हुई थी, इस दौरान बनी सड़कों व छोटी नहरों तथा नालियों के कारण जमीन के कुदरती लेवल में अन्तर होने से बरसाती पानी के बह कर आगे निकल जाने के कुदरती रास्ते बन्द होगे इसलिए पानी लम्बे समय तक वहीं खड़या रहया। बस्ती के कुछ हिस्से में भी पानी घुसा, बीमारियां भी आई, बाढ़ के पानी को निकलवाने के सरकारी इन्तजाम भी काफी नहीं थे। वैसे यह बाढ़ की समस्या अकेले बान्डा हेड़ी व मुंढाल की न होकर पूरे क्षेत्र की थी और इसने जमीनी पानी के स्तर को ऊंचा कर दिया था। मतलब चौआ ऊपर आग्या। नहरों के साथ तो समस्या और भी ज्यादा थी। इस ढाल हर साल बरसात में पानी भरने की समस्या स्थाई हो गई। पानी भराव के कारण इससे फसलों का नुकसान भी हर वर्ष होवण लाग्या। इन वर्षों में खेती की लागत तो नई कृषि नीतियों के कारण बढ़ती गई पर पैदावार इस क्षेत्र में अनिश्चित होती गयी जिसनै अपने आप मैं एक नये संकट को जन्म दिया।
छोटी जोत के किसानों की समस्या तो और भी गम्भीर थी। अकेले-अकेले वह न तो अपने खेत से पानी निकालने के लिए पम्प सेट आदि लगा सकता था और ना ही डरेनेज विभाग से कोई मदद ले सकता था। कुछ प्रभावशाली राजनेताओं के रिश्तेदार बड़े जमींदारों के यहां तो खेतों में डरेनेज विभाग ने बड़े पम्प सेट सरकारी खर्च पर लगा दिये थे परन्तु ये जमींदार अपने खेतों के साथ लगते दूसरे छोटे किसानों के बरसाती पानी को इन पम्प सेटों से नहीं निकलने देते थे। ऐसे हालात में वर्ष 2003 में एक बार फिर जुलाई में भारी वर्षा हुई और खेतों में 4-5 फुट तक पानी खड़ा हो गया। वर्तमान में किसान कोओपरेटिव से जुड़े हुए किसानों, जिनके खेत एक परिवार होने की वजह से साथ-साथ थे, अपने सामूहिक, खर्च व मेहनत से बाढ़ का पानी निकालने की ठान ली। इस पानी को लिफट करके 15 एकड़ दूर नहर में डालने में ये लोग कामयाब रहे। इस परिवार से जुड़े स्वयं खेती करने वालों के अलावा शहर में रह रहे दूसरे सदस्यों ने भी सहयोग दिया जो अपनी जमीन हिस्से या ठेके पर दिया कर दे। सामूहिक प्रयास करने का सुझाव इन शहर में रहने वालों में से ही आया।
इस हालात में इस पानी निकालने की सामूहिक कोशिश ने सांझी खेती करने की सोच रहे किसान सभा कार्यकर्ता ने सभी से व्यक्तिगत तौर पर भी सामूहिक खेती से होने वाले फायदों पर बातचीत करी। वकील का समर्थन तो उसे पहले ही था। इस कल्पना को पहले तो गांव में रहने वाले सदस्यों ने असम्भव व अजीब मान्या। उनमें से कुछ शंकित भी थे। परन्तु क्योंकि बाढ़ का पानी सामूहिक रूप से निकालने में वे सफल रहे थे तो एक ललक भी मन मैं आई। अगली ही फसल जो वर्ष 2003 व 2004 के सैसन की साढ़ी की फसल थी जिसकी बिजाई वे बहुत लेट कर पाये थे और पानी की वजह से पूरे खेत में नहीं हुई थी उसमें आपसी तालमेल-सहयोग शुरू कर दिया। इस प्रकार वर्ष 2004-2005 के सैसन के लिए सांझी खेती करने की शुरुआत की गई। के बी सी का गठन हुआ। एक संविधान बनाई गई और शुरूआत हुई।
बाढ़ की समस्या का स्थाई हल निकल सका। रेही से खराब जमीन का सुधार हुआ। सिंचाई बेहतर हुई। साधन कृषि औजार जुटाना आसान हुआ। उत्पादन में बढ़ोतरी हुई। 2004-2005 का प्रति एकड़ उत्पादन 14 हजार रुपये का था। 2005-2006 में 17 हजार रुपये प्रति एकड़ हो गया। 2006-2007 में यह 25 हजार का हुआ। दूसरी तरफ खेती की लागत कम हो गई। आपां मारें पार पड़ैगी। आई किमै समझ में अक नहीं। वार होण लागरी सै देर करदी तो तबाही तै या सांझी खेती बी कोन्या बचा पावैगी।
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आज किसानी पर संकट बहोत गहरा सै। किसान आत्म हत्या करण लागरे सैं। कोए उनकी सुध लेवणिया बी कोन्या। इसे हालात मैं यू सांझा खेती का अनुभव रोशनी दिखा सकै सै हमनै।
किसान कोओपरेटिव बाण्डा हेड़ी हिसार की स्थापना लगभग वर्ष 2004 में एक बड़े परिवार के लगभग 10 किसानों के समूह नै की। मुंढाल हरियाणा के लगभग मध्य मैं स्थित चौबीसी पंचायत खाप के तहत आने वाला 250-300 वर्ष या इससे भी पुराना गांव सै। वर्तमान मैं इसमें तीन पंचायते हैं - मुंढाल खुर्द व कलां दो पंचायतें भिवानी जिला में सैं जबकि बांडा हेड़ी पंचायत हिसार जिला में पड़ै सै। देखने में व बस्ती के हिसाब से पूरा गांव एक ही लगता है और पहले पंचायत भी एक ही हुया करदी। ईब तीनों गामां की कुल आबादी लगभग 15 हजार होगी।
वर्ष 1995 में आई बाढ़ की वजह से लगभग पूरे गांव और विशेष तौर पर बाण्डाहेड़ी के खेतों में जो सोरखी गांव की तरफ हिसार-दिल्ली मार्ग के साथ पड़ते हैं, खड़ी फसलों में भारी नुकसान हुया था। सितम्बर मास के शुरू में आई बाढ़ तै सावनी की फसल की बिजाई भी बड़े हिस्से में नहीं हो पाई। असल में काफी सालों के बाद इतनी ज्यादा बरसात एकदम हुई थी, इस दौरान बनी सड़कों व छोटी नहरों तथा नालियों के कारण जमीन के कुदरती लेवल में अन्तर होने से बरसाती पानी के बह कर आगे निकल जाने के कुदरती रास्ते बन्द होगे इसलिए पानी लम्बे समय तक वहीं खड़या रहया। बस्ती के कुछ हिस्से में भी पानी घुसा, बीमारियां भी आई, बाढ़ के पानी को निकलवाने के सरकारी इन्तजाम भी काफी नहीं थे। वैसे यह बाढ़ की समस्या अकेले बान्डा हेड़ी व मुंढाल की न होकर पूरे क्षेत्र की थी और इसने जमीनी पानी के स्तर को ऊंचा कर दिया था। मतलब चौआ ऊपर आग्या। नहरों के साथ तो समस्या और भी ज्यादा थी। इस ढाल हर साल बरसात में पानी भरने की समस्या स्थाई हो गई। पानी भराव के कारण इससे फसलों का नुकसान भी हर वर्ष होवण लाग्या। इन वर्षों में खेती की लागत तो नई कृषि नीतियों के कारण बढ़ती गई पर पैदावार इस क्षेत्र में अनिश्चित होती गयी जिसनै अपने आप मैं एक नये संकट को जन्म दिया।
छोटी जोत के किसानों की समस्या तो और भी गम्भीर थी। अकेले-अकेले वह न तो अपने खेत से पानी निकालने के लिए पम्प सेट आदि लगा सकता था और ना ही डरेनेज विभाग से कोई मदद ले सकता था। कुछ प्रभावशाली राजनेताओं के रिश्तेदार बड़े जमींदारों के यहां तो खेतों में डरेनेज विभाग ने बड़े पम्प सेट सरकारी खर्च पर लगा दिये थे परन्तु ये जमींदार अपने खेतों के साथ लगते दूसरे छोटे किसानों के बरसाती पानी को इन पम्प सेटों से नहीं निकलने देते थे। ऐसे हालात में वर्ष 2003 में एक बार फिर जुलाई में भारी वर्षा हुई और खेतों में 4-5 फुट तक पानी खड़ा हो गया। वर्तमान में किसान कोओपरेटिव से जुड़े हुए किसानों, जिनके खेत एक परिवार होने की वजह से साथ-साथ थे, अपने सामूहिक, खर्च व मेहनत से बाढ़ का पानी निकालने की ठान ली। इस पानी को लिफट करके 15 एकड़ दूर नहर में डालने में ये लोग कामयाब रहे। इस परिवार से जुड़े स्वयं खेती करने वालों के अलावा शहर में रह रहे दूसरे सदस्यों ने भी सहयोग दिया जो अपनी जमीन हिस्से या ठेके पर दिया कर दे। सामूहिक प्रयास करने का सुझाव इन शहर में रहने वालों में से ही आया।
इस हालात में इस पानी निकालने की सामूहिक कोशिश ने सांझी खेती करने की सोच रहे किसान सभा कार्यकर्ता ने सभी से व्यक्तिगत तौर पर भी सामूहिक खेती से होने वाले फायदों पर बातचीत करी। वकील का समर्थन तो उसे पहले ही था। इस कल्पना को पहले तो गांव में रहने वाले सदस्यों ने असम्भव व अजीब मान्या। उनमें से कुछ शंकित भी थे। परन्तु क्योंकि बाढ़ का पानी सामूहिक रूप से निकालने में वे सफल रहे थे तो एक ललक भी मन मैं आई। अगली ही फसल जो वर्ष 2003 व 2004 के सैसन की साढ़ी की फसल थी जिसकी बिजाई वे बहुत लेट कर पाये थे और पानी की वजह से पूरे खेत में नहीं हुई थी उसमें आपसी तालमेल-सहयोग शुरू कर दिया। इस प्रकार वर्ष 2004-2005 के सैसन के लिए सांझी खेती करने की शुरुआत की गई। के बी सी का गठन हुआ। एक संविधान बनाई गई और शुरूआत हुई।
बाढ़ की समस्या का स्थाई हल निकल सका। रेही से खराब जमीन का सुधार हुआ। सिंचाई बेहतर हुई। साधन कृषि औजार जुटाना आसान हुआ। उत्पादन में बढ़ोतरी हुई। 2004-2005 का प्रति एकड़ उत्पादन 14 हजार रुपये का था। 2005-2006 में 17 हजार रुपये प्रति एकड़ हो गया। 2006-2007 में यह 25 हजार का हुआ। दूसरी तरफ खेती की लागत कम हो गई। आपां मारें पार पड़ैगी। आई किमै समझ में अक नहीं। वार होण लागरी सै देर करदी तो तबाही तै या सांझी खेती बी कोन्या बचा पावैगी।
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