सवाल हरियाणवी भाषा का
एक दिन मनै देखा अक मेरे पास छह-सात चिट्ठी आई सैं। एक चिट्ठी थी पलवल के एक कालेज मैं पढ़ने वाले गाभरू छोरे की। उसनै लिख्या था अक थारी खरी-खोटी पै कुछ खरी-खरी बातें कहना चाहता हूं। इसमें लिखी बात पढ़ना बहोत मुश्किल हो ज्यावै है। कई शब्द बहोत गूढ़ होवै हैं। अंदाजे से बात का सार तो समझ मैं आवै है पर देर बहोत लग ज्यावै है। बात तो थारी ठीक ठ्याक होती हैं। पढ़ने की दिक्कत बहोत है, कुछ समाधान करो। हमारी लिखी बातों पर कुछ ध्यान धरो। हरियाणवी भाषा में लिखो रोहतकी भाषा में मत लिख्या करो। थोड़े लिखे को ज्यादा समझना। ज्यादा फूंक मत ले जाना। दूसरी चिट्ठी थी सिरसा के नेशनल कालेज की बीए अंतिम साल में पढ़ने वाली छात्रा की। उसकी भी यही शिकायत थी कि आप हरियाणवी में तो लिखते ही नहीं, ठेठ रोहतक वालों की भाषा में लिखते हो। सिरसा के लोकां नूं इनूं पढ़ण विच दिक्कत आन्दी ए। असी पढ़णा चाहन्दे हां पर पढ़ नहीं पान्दे। किसी रोहतकी तो पढ़वानी पैन्दी ए। कई कर्मचारी ने तुहाडे इलाके दे ओ पढ़के सुनान्दे ने। गलां तां चंगियां लिखदे हो पर की करिये तुसी हरियाणवी चे लिखिया करो। तीसरी चिट्ठी मिली, जो रेवाड़ी और महेंद्रगढ़ के बार्डर पर बसे एक गांव के बुजुर्ग की तरफ से थी। उसने शाबाशी दी थी। पहले तो कि अलग-अलग मुद्दों पर हर इतवार को खरी-खोटी में कुछ न कुछ नई बात पढ़ने को मिलती है। फेर पढ़ण मैं बहोत मुश्किल होती है। आहिस्ता-आहिस्ता पढ़ता हूं। बात गहरी होती हैं। फेर दिक्कत तो या है कि हरियाणा की अपनी एक हरियाणवी भाषा तो कोए सै कोनी, न्यारी-न्यारी बोली सैं और हर बीस कौस पै बोली मैं फरक आ जावै है तो कई शब्द जो रोहतक मैं बोले जावैं हैं वे रिवाड़ी वालों के समझ कोनी आते। पलवल और फरीदाबाद में बृज बोली की रंगत है, मेवात में उर्दू भाषा की संगत है, म्हारी तरफ रिवाड़ी, महेंद्रगढ़ में राजस्थानी बोली की महक दिखाई देवै है तो हिसार मैं भी इसकी परछाई है। सिरसा, अंबाला, करनाल में पंजाबी की चासनी दिखाई देती है।
पानीपत, रोहतक, सोनीपत, जींद, झज्जर की अपनी रोहतकी बोली है। जींद और रोहतक मैं भी फरक नजर आवै है। पांच-छह ढाल की रंगत की न्यारी-न्यारी बोलियां नै शामिल करके साझला बाजा बजाना बहोत मुश्किल काम है रणबीर। पर मुन्नाभाई लगे रहो वाली बात है। बुजुर्ग नै आगे लिखा कि एक बात समझ नहीं आती कि पंजाब में भी बोली तो कई बोली जाती हैं - मुल्तानी, झंगी, खड़ी पंजाबी पर उन सबको मिलाकर पंजाबी भाषा का साझला बाजा बाज सकै सै तो हरियाणवी भाषा का विकास क्यों नहीं हो सकदा? इसी भाषा जिसमैं गुड़गांव, पलवल भी हो, जिसमैं मेवात भी हो, रेवाड़ी, महेंद्रगढ़ भी हों, हिसार, सिरसा, जींद हों। एक और चिट्ठी मैं लिख्या था अक हरियाणवी भाषा का विकास कोनी हो सकदा आज की तारीख मैं, म्हारी अपनी राजधानी ना, कोए सांस्कृतिक संस्थान नहीं, कोए आपसी संवाद नहीं। हां, इन सारी बोलियां के शब्द हिन्दी भाषा में शामिल करकै खड़ी हिन्दी का विकास करकै ही हरियाणवी साझला बाजा बन सकता है। सपना खुल ग्या। देख्या तो कड़ै चिट्ठी थी। पर साची साच बताऊं सूं ये चिट्ठी सपने मैं पढ़कै मेरा आगला कालम रोहतकी मैं लिखने का साहस माड़ा सा बी कोनी बच्या। दो दिन और दो रात सोचें गया अक इन चिट्ठियों मैं जो बात लिख राखी सै उनके हिसाब तै तो मैं रोहतक, झज्जर और सोनीपत के लोगां की खातर कलम घिसाई करण लागरया सूं। बाकी का हरियाणा? पता नहीं उनकी खातर किसा लिखूं के करूं? सन् 66 मैं हरियाणा बन्या। हमनै बड़े-बड़े काम कर दिये। बहोत विकास करया। आदर्श हरियाणा बना कै छोड्या हमनै। हरित क्रान्ति लियाये। फेर हरियाणवी भाषा कित सै? मेरे तै घणे स्याणे, मेरे तै फालतू ज्ञानी ध्यानी, हरियाणा अर हरियाणवी संस्कृति के ठेकेदार, हरियाणा के भीतर हों चाहे हों इसके बाहर, सबतै रणबीर का हाथ जोड़ कै नमस्कार, मेरी बातां पै थोड़ा घणा बैठकै करियो कदे विचार, हरियाणवी बोलियां कैसे बनैं हरियाणवी भाषा रूपी हार, रणबीर को रहवैगा हमेशा थारे सुझावां का इंतजार। यू मसला सै टेढ़ा इसका मनै सै पूरा-पूरा ख्याल, म्हारे थारे सबके स्याहमी सै यो एक गम्भीर सवाल - हरियाणा असल मैं हरियाणा सै बी अक नहीं अक सूके बजावां-सा गाल, हरियाणा आल्यो सवाल का जवाब पड़ै ढूंढना आज नहीं तो काह्ल। हिन्दी भाषा करैगी म्हारी सम्भाल अक हरियाणवी भाषा दिखावैगी अपना कमाल। हट हट कर मेरे कानों मैं गूंजै सै सपने मैं पढ़ी चिट्ठियों मैं ठाया गया सवाल। अपनी तरफ तै पांचों-छहों रंगत की बोलियां का ध्यान राखूंगा अर कोशिश करूंगा अब रोहतकी बोली तै थोड़ा-बहोत बाहर आ पाऊं। पास फेल की बात न्यारी, जतन करने की जिम्मेदारी म्हारी, थाम बी खरी-खोटी आये इतवार पढ़ने का प्रयास राखियो जारी।
एक दिन मनै देखा अक मेरे पास छह-सात चिट्ठी आई सैं। एक चिट्ठी थी पलवल के एक कालेज मैं पढ़ने वाले गाभरू छोरे की। उसनै लिख्या था अक थारी खरी-खोटी पै कुछ खरी-खरी बातें कहना चाहता हूं। इसमें लिखी बात पढ़ना बहोत मुश्किल हो ज्यावै है। कई शब्द बहोत गूढ़ होवै हैं। अंदाजे से बात का सार तो समझ मैं आवै है पर देर बहोत लग ज्यावै है। बात तो थारी ठीक ठ्याक होती हैं। पढ़ने की दिक्कत बहोत है, कुछ समाधान करो। हमारी लिखी बातों पर कुछ ध्यान धरो। हरियाणवी भाषा में लिखो रोहतकी भाषा में मत लिख्या करो। थोड़े लिखे को ज्यादा समझना। ज्यादा फूंक मत ले जाना। दूसरी चिट्ठी थी सिरसा के नेशनल कालेज की बीए अंतिम साल में पढ़ने वाली छात्रा की। उसकी भी यही शिकायत थी कि आप हरियाणवी में तो लिखते ही नहीं, ठेठ रोहतक वालों की भाषा में लिखते हो। सिरसा के लोकां नूं इनूं पढ़ण विच दिक्कत आन्दी ए। असी पढ़णा चाहन्दे हां पर पढ़ नहीं पान्दे। किसी रोहतकी तो पढ़वानी पैन्दी ए। कई कर्मचारी ने तुहाडे इलाके दे ओ पढ़के सुनान्दे ने। गलां तां चंगियां लिखदे हो पर की करिये तुसी हरियाणवी चे लिखिया करो। तीसरी चिट्ठी मिली, जो रेवाड़ी और महेंद्रगढ़ के बार्डर पर बसे एक गांव के बुजुर्ग की तरफ से थी। उसने शाबाशी दी थी। पहले तो कि अलग-अलग मुद्दों पर हर इतवार को खरी-खोटी में कुछ न कुछ नई बात पढ़ने को मिलती है। फेर पढ़ण मैं बहोत मुश्किल होती है। आहिस्ता-आहिस्ता पढ़ता हूं। बात गहरी होती हैं। फेर दिक्कत तो या है कि हरियाणा की अपनी एक हरियाणवी भाषा तो कोए सै कोनी, न्यारी-न्यारी बोली सैं और हर बीस कौस पै बोली मैं फरक आ जावै है तो कई शब्द जो रोहतक मैं बोले जावैं हैं वे रिवाड़ी वालों के समझ कोनी आते। पलवल और फरीदाबाद में बृज बोली की रंगत है, मेवात में उर्दू भाषा की संगत है, म्हारी तरफ रिवाड़ी, महेंद्रगढ़ में राजस्थानी बोली की महक दिखाई देवै है तो हिसार मैं भी इसकी परछाई है। सिरसा, अंबाला, करनाल में पंजाबी की चासनी दिखाई देती है।
पानीपत, रोहतक, सोनीपत, जींद, झज्जर की अपनी रोहतकी बोली है। जींद और रोहतक मैं भी फरक नजर आवै है। पांच-छह ढाल की रंगत की न्यारी-न्यारी बोलियां नै शामिल करके साझला बाजा बजाना बहोत मुश्किल काम है रणबीर। पर मुन्नाभाई लगे रहो वाली बात है। बुजुर्ग नै आगे लिखा कि एक बात समझ नहीं आती कि पंजाब में भी बोली तो कई बोली जाती हैं - मुल्तानी, झंगी, खड़ी पंजाबी पर उन सबको मिलाकर पंजाबी भाषा का साझला बाजा बाज सकै सै तो हरियाणवी भाषा का विकास क्यों नहीं हो सकदा? इसी भाषा जिसमैं गुड़गांव, पलवल भी हो, जिसमैं मेवात भी हो, रेवाड़ी, महेंद्रगढ़ भी हों, हिसार, सिरसा, जींद हों। एक और चिट्ठी मैं लिख्या था अक हरियाणवी भाषा का विकास कोनी हो सकदा आज की तारीख मैं, म्हारी अपनी राजधानी ना, कोए सांस्कृतिक संस्थान नहीं, कोए आपसी संवाद नहीं। हां, इन सारी बोलियां के शब्द हिन्दी भाषा में शामिल करकै खड़ी हिन्दी का विकास करकै ही हरियाणवी साझला बाजा बन सकता है। सपना खुल ग्या। देख्या तो कड़ै चिट्ठी थी। पर साची साच बताऊं सूं ये चिट्ठी सपने मैं पढ़कै मेरा आगला कालम रोहतकी मैं लिखने का साहस माड़ा सा बी कोनी बच्या। दो दिन और दो रात सोचें गया अक इन चिट्ठियों मैं जो बात लिख राखी सै उनके हिसाब तै तो मैं रोहतक, झज्जर और सोनीपत के लोगां की खातर कलम घिसाई करण लागरया सूं। बाकी का हरियाणा? पता नहीं उनकी खातर किसा लिखूं के करूं? सन् 66 मैं हरियाणा बन्या। हमनै बड़े-बड़े काम कर दिये। बहोत विकास करया। आदर्श हरियाणा बना कै छोड्या हमनै। हरित क्रान्ति लियाये। फेर हरियाणवी भाषा कित सै? मेरे तै घणे स्याणे, मेरे तै फालतू ज्ञानी ध्यानी, हरियाणा अर हरियाणवी संस्कृति के ठेकेदार, हरियाणा के भीतर हों चाहे हों इसके बाहर, सबतै रणबीर का हाथ जोड़ कै नमस्कार, मेरी बातां पै थोड़ा घणा बैठकै करियो कदे विचार, हरियाणवी बोलियां कैसे बनैं हरियाणवी भाषा रूपी हार, रणबीर को रहवैगा हमेशा थारे सुझावां का इंतजार। यू मसला सै टेढ़ा इसका मनै सै पूरा-पूरा ख्याल, म्हारे थारे सबके स्याहमी सै यो एक गम्भीर सवाल - हरियाणा असल मैं हरियाणा सै बी अक नहीं अक सूके बजावां-सा गाल, हरियाणा आल्यो सवाल का जवाब पड़ै ढूंढना आज नहीं तो काह्ल। हिन्दी भाषा करैगी म्हारी सम्भाल अक हरियाणवी भाषा दिखावैगी अपना कमाल। हट हट कर मेरे कानों मैं गूंजै सै सपने मैं पढ़ी चिट्ठियों मैं ठाया गया सवाल। अपनी तरफ तै पांचों-छहों रंगत की बोलियां का ध्यान राखूंगा अर कोशिश करूंगा अब रोहतकी बोली तै थोड़ा-बहोत बाहर आ पाऊं। पास फेल की बात न्यारी, जतन करने की जिम्मेदारी म्हारी, थाम बी खरी-खोटी आये इतवार पढ़ने का प्रयास राखियो जारी।
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