सोमवार, 26 सितंबर 2016

पुलिस हरियाणा की

पुलिस हरियाणा की
     रोज अखबारां मैं पढ़ां सां अक आज पुलिस नै गुडगामां मैं फटे चक दिये अर आज अमृतसर विच मंडी वाले कुट दिते। कुछ दिन पहले पटना मैं कर्मचारियों को तमाशा दिखा दियो। जड़ जित देखो वहीं पै पुलिस आने आले साल 2006 मैं के होगा इसका ट्रेलर से दिखाती पाई 2005 मैं। थाण्यां में बलात्कार, मार-पिटाई, हिरासत मैं माणस की मौत, एनकाउनटर मैं फलाणा बदमाश ढेर कर दिया, गरीब घूमदे रहे फेर केस दरज नहियो किता, रात नै पुलिस चौकी जाना पड़या तो ड्यूटी पै तैनात पुलिसिया पूरा टुन था अर सही सुर मैं बोल्या, गजब है हरियाणा की पुलिस। अखबारां मैं और बेरा ना किसे किसे तरां की खबर पढ़ने को मिल्ज्यांगी। हम इसी किसी ट्रेनिंग देवण लागगे इन पुलिस आल्यां नै? नेतावां के आगै बिछण मैं कोए शरम नहीं महसूस करदे आपां। सिफारिस हो तैं बंदूक का लाइसेंस दो दिन मैं बणज्या अर उल्टी सिफारिस हो तै दो घंटे मैं हथियार जब्त। पुलिस का पहलम आला खारणा रह्या ना अर नये की के कहवां जो भरती ते पहलम अर भरती के बाद मैं पुलिस का नौजवान भुगतै सै उसकी चरचा नहीं कितै। पुलिस के सिपाही की आतम छवि बिगाड़ण मैं म्हारे पूरे समाज की भूमिका सै। एक कहावत सै अक रक्षक बणगे भक्षक देश के, बाड़ खेत नै खावै आज, दुखी माणस दुख अपना, कित जाके सुनावै आज। म्हारे घरां मैं चाचा का छोरा पुलिस सब इंस्पेक्टर सै। कई बर खाली बैठे हों तो ओ पुलिस महकमें की भीतर बाहर की सारी बात बता दिया करै। कई बर तो पुलिस नै संदक पता हो सै अक कतल किसनै कर्या फेर पचास हजार गोज मैं घलगे तो नजर घूमैए कोनी कातिल की तरफ। दूसरी बात या बी हो सकै सै अक ऊपर तै फोन की घंटी बाजै अक फलाने का नाम निकाल दिया जाये तो मिन्टां मैं नाम बाहर। फेर बी फिकर की कोए बात नहीं सै हरियाणा तरक्की करण लागर्या सै, चारों तरफ सुरक्षा ए सुरक्षा सै। बदमाशां की हरियाणा मैं कोए जागां नहीं सै। दूसरे देशां मैं जाकै पाछा देख्या सै कईयां नै तो। पुलिस नै सब किमै ‘टाइट’ करकै धर दिया, जो कुछ गलत होर्या था वो सब ‘राईट’ कर दिया। काला काम हो चाहे हो भूरा सब ‘व्हाइट’ कर दिया, जो दिन मैं नहीं हुया वो पूरा ‘नाईट’ मैं कर दिया। खत्म सभी ‘फाईट’ कर दिया। हरियाणा का पूरा लम्बा ‘हाईट’ कर दिया। जिसनै बैक ‘बाईट’ करी उसकी ढबरी ‘टाईट’ करकै जेल मैं डाल दिया अर उड़ै उसकी ‘डाईट’ बंद करवा दी। के कहने म्हारी पुलिस के!
     फेर एक बात सै कितै कितै आज बी पुलिस में मानवता मिल ज्या सै। एक बर एक पुलिस इंस्पेक्टर कै जिम्मे एक कतल के केस मैं तीन मुजरिमां नै पकड़ कै ल्याने की ड्यूटी लागगी। थानेदार गेल्यां तीन सिपाही देख कै एक महिला नै दरवाजा खोल दिया। आंख मलदे तीनों माणस गहरी नींद तैं उठकै आगे अर पेश होंगे। एकबै इनस्पेक्टर नै आव देख्या ना ताव देख्या अर हथकड़ी लादी तीनूओं कै। चाल्लण की तैयारी करली। जीप मैं बैठण तै पहलम इंस्पेक्टर के मन मैं ख्याल आया अक जिसनै कतल कर राख्या हो ओ अपने घर मैं न्यूं ताणके गहरी नींद मैं कोनी सो सकदा। उसने तीनू माणस छोड़ दिये। थानेदार पै बहोत दाब आई उननै पकड़ण को फेर थानेदार कोनी मान्या। इन्कवारी दूसरे थानेदार ताहिं दे दी। ओ तीनूआं नै पाकड़ कै लियाया अर मुकदमा शुरू होग्या। इन तीनूआं के वकील नै जज साहिब ते मांग करी अक पहलम आला थानेदार गवाही खतर बुलाया जा। ओ हाजिर होग्या। वकील नै बूझया - थामने ये पकड़े क्यू ना? थानेदार बोल्या - मेरे दिल नै गवाही दी अक ये मुजरिम कोन्या। ये तो घर मैं गहरी नींद सोवण लागरे थे। कातिल इतनी गहरी नींद अर वो बी अपने घर में नहीं सो सकदा। जज कै बात सही समझ मैं आगी अर उसने तीनूं बरी कर दिए।
     न्योंए एक आई जी पुलिस बताया। पूलिस आला कोए बी गुण कोनी उसमैं। पुलिस सुधार प्रोग्राम के लाग्या रहवै सै अक पुलिस की छवि सुधरनी चाहिये। कितै साहित्य बेचदा पावैगा अर कितै गोस्ठी करदा दीखैगा। माणस तै माणस की ढालां बात करैगा। ‘भगत सिंह से दोस्ती’, ‘प्रेमचंद से दोस्ती’ करदा हांडे जावै सै। और बी कई उदाहरण तो पा ज्यांगे हरियाणा पुलिस मैं। फेर पुलिस तै साफ-सुथरी छवि की बाट उस बख्त देखना जिब सारा समाज पाताल मैं जावण लागर्या हो, पुलिस गेल्यां ज्यादती नहीं सै के? एक बर पुलिस आल्यां के नेशनल स्तर के खेल होवैं थे। बंगाल, केरल, आंध्रप्रदेश, हरियाणा कई प्रदेशां के पुलिस के खिलाड़ी आ रे थे। रात नै कठ्ठे बैठ कै गप मारैं थें। एक बोल्या साड्डी पंजाब दी पुलिस सब नालों चंगी है। बंगाली बोले - नहीं हमारा अच्छा है। एक ने कहा ‘हाथ कंगन को आरसी क्या और पढ़े लिखे को फारसी क्या।’ ऐसा करते हैं एक शेर को जंगल में छोड़ देते हैं, जिस प्रदेश की पुलिस सबसे कम समय में पकड़ कर ले आयेगी वह नंबर वन होगी। आंध्र की टीम नै बैठ कै योजना बनाई अर दो घंटे मैं शेर हाजिर कर दिया। बंगाल की टीम बी ढाई घंटे मैं पकड़ ल्याई। हरियाणा की टीम गई। सांझ होगी उल्टी ए कोनी आई। फिकर होगी। आगले दिन गये जंगल मैं टोहवण तै देख्या अक एक रीछ बांध राख्या पेड़ कै अर लागरे गुड़गामा की पुलिस की ढालां। रैफरी ने कहा - यह क्या कर रहे हो भाई? शेर नहीं पाया? हरियाणा की पुलिस बोली - बस पांच मिन्ट और डट ज्याओ पांच जूत लाग्गे नहीं अर यू ईब हां भर ले सै अक हां मैं शेर सूं। आई किर्म समझ मैं अक ईब्बी कसर रैहगी? मिलकै सोच्चणा पड़ैगा। फेर सोच्चे कौण? म्हारे बेटा-बेटी सैं ना पुलिस मैं। अर जिब आपां बिजली की समस्या लेकै सड़कां पै उतरां सां तो ये बेटा-बेटी म्हारा क्यूंकर सत्कार करैं सैं? पुलिस बनाई तो जनता की हिफाजत खातर अर या करै सै के? देखियो आगै आगै के और देखना पड़ैगा।

दारू अर दहेज

दारू अर दहेज
जै कोए महिलावां धोरै उनकी दिक्कतां के बारे मैं बूझै वे मुसीबतां के अम्बार लादें सैं फेर इस अम्बार मैं ते सबतै वजनी दिक्कत वे दारू अर दहेज नै बतावैं सैं। एक ढाल सोचैं तो इसा लागै सै जणों ये दोनूं बीमारी लाइलाज सैं। दारू की लत कितनी बुरी हो सैं या दारूबाज नै औटनियां ए जानै सैं। लागज्या तो छुट्टण का नाम नहीं लेती। आजकल हरियाणा के गामां मैं दारू की मार तै घर तै कोए बच नहीं रह्या। हां, हो सकै सै घर मैं कोए माणस बचरया हो। सांपले तै पी कै चालैगा टुन होकै। अपणे गाम मैं पहोंच कै जिब हरिजनां के घर पहलम सी आवैंगे तो ठाड्डू बोलैगा - म्हारै साहमी कूण बोलैगा, देख ल्यांगे एक-एक नै। थोड़ी दूर चाल कै स्वर्ण जात के घर आज्यांगे तो आवाज नीची करकै बोलैगा - अपणे भाई सैं। ज्यान दे द्यांगे भाइयां खातर। अपने घरां पहोंच कै उसकी आवाज फेर ऊंची हो ज्यागी अर कहवैगा - ये सूके टीक्कड़ क्यूंकर खाऊं? साग क्यूं ना बनाया? साग भाई नै चटनी दीखैगा। जिब घरआली कहवै अक यू रह्या साग तो न्यों कैंहकै अक उल्टी बोलै सै मंड ज्यागा लात घूंसे मारण। म्हारे परिवारां मैं भी आपां छोरियां नै इसी शिक्षा देवां सां अक पति परमेश्वर हो सै। जिसा भी हो उसकी गेल्यां निभाणी चाहिये। ब्याह पाछै छोरी की ल्हास सुसराड़ की देहली पर तैं बाहर लिकड़नी चाहिये। घर की बात बाहर जावैगी तो महिला की बेइज्जती सै। इसी शिक्षा दे कै खंदावां सां आपां तो छोरी बी अपनी सुसराड़ मैं चुपचाप सहें जावै सै या मार पिटाई। गात पै लीले-लीले लील पड़रे होंगे कई जागां पिटाई करकै फेर कोए बूझै तो न्यों कैह देगी - पड़गी थी ठोकर लाग कै। कई बै बात बातां मैं न्यों बी कहवैंगी - करां तो के करां। राह तो कोए बी कोन्या दीखता। कित जावां? इस कित जावां का जवाब किसी धोरै सै तो मेरे धोरै भी लिख कै भेज दियो। किसेनै कह्या सै - आजकाल मकान तो बहोत बड्डे-बड्डे बणण लाग्गे फेर इनमैं रहण आल्यां के दिल बहोतै छोटे होगे। ये मकान सैं घर कोन्या। सरकार की बी बात समझ मैं कम आवैं सैं। एक कान्हीं तो कहवै अक दारू मतना पिया करो। या बहोत बुरी चीज सै। दूजै कान्ही रोज नये दारू के ठेके खोलती जावण लागरी। कोए इस पै एतराज करै तो कहवैगी अक विकास की खातर पीस्सा कित तै आवै? कोए न्यूं बूझनिया हो अक विनाश की चीजां तै पीस्सा कमा कै विकास किसा होगा? एक कान्हीं दारू के ठेके अर दुजे कान्हीं दारू छुटवावण के नशा मुक्ति केंद्र। दोनों सरकारी। सदकै जाऊं!
दूसरी बात दहेज की। दहेज तै मेरे हिसाब तै लड़की होवण सजा सै। यो धुर तै चाली आवै सै। या बात म्हारी परंपरावां अर धार्मिक संस्कारां तै बी भीतर ताहिं जुड़री सै। बहोत जणे कैहते पाज्यांगे अक इसका बी कोए इलाज नहीं या लाइलाज सै। आज म्हारे समाज की हालत देख कै लागै सै अक ये औरत ठीकै कहवै सैं, ‘‘दहेज की मांग के हमले कै आगै सारे हथियार फेल होकै ढेर होज्यां सैं।’’ सबनै बेरा सै अक दहेज लेना अर देना अपराध सै। सोने पै सुहागा यू सै अक हम सब अपराधी बणकै यू अपराध करते ए रहवां सां। इसमैं पूरा का पूरा समाज शामिल सै। यू एक इसा अपराध सै जिसमैं करणियां अर भुगतनियां दोनों बराबर के दर्जे के अपराधी माने जावैं सैं जबकि देवणिया की मजबूरी हो सै कई बै। फेर चारों कान्ही तै इसनै स्वीकृति प्रदान सै। जिब यो जुर्म करया जावै सै तो कोए एफआईआर नहीं लिखी जात्ती, कोए गिरफ्तार नहीं करया जात्ता। थाना पुलिस कचहरी की लिखा पढ़ी तो तब शुरू होवै सै जब इस शुरू के जुर्म हुये पाछै इसकै कारण कोए हिंसक घटना जुड़ै सै। गज़ब की बात तो या सै अक इस प्रथा नै धार्मिक संस्कार बतावण आले, माणण आले अर धार्मिक संस्कारां के ज्ञानी कोए नहीं बतात्ता अक इस दहेज का जिकरा कौन से शास्त्र मैं या किस वेद पुराण मैं सै? महिलावां नै अधिकार के काबिल ना होवण की मान्यतावां तै भरी मनुस्मृति मैं भी महिलावां के एक अधिकार का जिकर बतावैं सैं। अर वो सै स्त्री धन जिसपै स्त्री का इकलौता अधिकार सै। मनुस्मृति का बी यो कहना सुण्या सै अक ब्याह के बख्त कन्या नै उसके मायके अर ससुराल की तरफ तै जो कुछ भी मिलै सै वो उसका स्त्री धन सै जिसपै निखालस स्त्री का हक बताया। इसे स्त्री धन ताहिं दहेज भी कह्या जा सै फेर दहेज का जो आधुनिक रूप सै वो स्त्री धन तै बहोत दूर की बात सै। आधुनिक दहेज वर पक्ष की विवाह की खातर राखी गई बातां का नतीजा हो सै अर इस नाम तै जो कुछ दिया जावै सै उस पै स्त्री का कोए हक नहीं होत्ता आगल्यां का ए हक हो सै। इसा लागै सै अक मनुस्मृति के बख्तां में भी लड़कियां अर औरतां का स्तर परिवार अर समाज मैं लड़कों अर पुरुषों के बराबर नहीं था। चूंकि लड़की ताहिं उसे बख्तां ते ‘पराया धन’ समझया जाया करता इस करकै उस ताहिं पैतृक संपत्ति मैं भी हिस्सा नहीं दिया जाया करदा। आज के दौर मैं देखां तो देश के हर कोने, हर समुदाय अर जाति मैं यू दहेज महामारी की ढालां फैलता जावण लागरया सै। पहल्यां यू स्वर्ण जातियां मैं ए हुआ करदा। इसका कारण यू लागै सै अक यू जो आधुनिक बाजार का चलन बधण करकै दहेज का चलन भी बधग्या। आपां ने सोचना पड़ैगा अक इस दारू अर दहेज तै समाज का पैंडा क्यूकर छूटै? फेर आपां सोचांगे क्यूकर? आपां नै ताश खेलण तै कड़ै फुरसत सै। सोचांेगे तो राह बी काढांगे। गेर रै गेर पत्ता गेर! सोचलेंगे सोच्यण आले। झकोई इतनै तूं नहीं सोचैगा उतनै पार कोन्या पडै़।

सैर अमरीका की

सैर अमरीका की
     कई बार बात चालै तो हम बड़े ऊम्हा कै कहवांगे अक मेरा छोरा अमरीका जारया सै। छोरा भी अमरीका के बारे मैं खूब बढ़ा-चढ़ा के लिखैगा। वैटरनरी का डाक्टर होगा अर अमरीका मैं किसे किरयाणा की दुकान मैं सेलज मैन लागरया होगा फेर बी न्यों लिखैगा अक तीजां केसे कटरे सैं। कोए न्यूं नहीं लिखै अक उड़ै म्हारी गेल्यां दोयम दरजे का व्यवहार हो सै। म्हारले छोरे नै ये सारी बात लिख कै भेजी। अमरीका मैं दुनिया की जनता का 6 प्रतिशत रहवै सै। फेर अमरीका धोरै दुनिया की दौलत का 50 प्रतिशत सै। आई किमै समझ मैं अक नहीं आई। पिस्तौल की नोक पै तीसरी दुनिया नै लूट लूट कै कमाई सै अमरीका नै या दौलत। अर ईब कुणसा थम्ब लिया। ईब्बी जारी सै या लूट। पहलम इस लूट मैं ईस्ट इंडिया कंपनी शामिल थी ईब मोनसैंटो बरगी घणिए कंपनी शामिल होगी। तेल के सबतै फालतू भंडार साउदी अरबिया मैं सैं अर दूसरे नंबर के भंडार सैं तेल के इराक मैं। इन तेल के भंडारां पै कब्जा करण की खातर अमरीका नै सारे अंतर्राष्ट्रीय कायदे कानून ताक पै धरकै पढ़ण बिठा दिया। सद्दाम नै पहलम इराक के सीन पै अमरीका ले कै आया अर जिब बात सूत नहीं आई तो सद्दाम शैतान बना दिया। इराक तबाह कर दिया अपनी लूट बरकरार राखण खातर। दुनिया मैं एक साल मैं मिलट्री के बजट पै कितना खर्च होवै सै? बेरा सै के? कड़ै फुरसत सै आपस मैं लड़ण तै अर कै ताश खेलन तै जो इसी-इसी बातां का बेरा हो। दुनिया का मिलट्री बजट 900 बिलियन बताया एक साल का। अमरीका इस मिलट्री खर्च का 50 प्रतिशत खर्च करै सै। मतलब अमरीका आधे मैं अर बाकी दुनिया का मिलट्री खर्च बाकी के आधे मैं। मतलब अमरीका दुनिया का दादा पाक रया सै। बाकी दुनिया निरक्षरता, भूख, बेरोजगारी अर बीमारी की गिरफ्तर मैं सै। अर आपां भी इन चीजां नै किस्मत का खेल मानकै छाती पै मुक्का मारकै बैठे रहवां सां। यूएनओ के हिसाब तै अमरीका के इस बजट खर्चे का जै 10 प्रतिशत बीमारी, निरक्षरता, भूख अर बेरोजगारी दूर करण मैं ला दिया जावै तो दुनिया के नक्शे पर तै ये चारों महामारी खत्म हो सकैं सैं। दूसरे विश्व युद्ध तै लैके ईब ताहिं युद्धां मैं 86 मिलियन के लगभग माणस मारे जा चुके सैं अर ईब अमरीका के निशाने पै ईरान सै। अमरीका धोरै खुद तै 10,000 तै फालतू न्यूकलियर हथियार सैं फेर इराक पै अर ईरान पै हथियारां का बाहणा करकै हमला करण का खेल म्हारे सबकै साहमी सै।
     दूसरी बात अमरीका मैं सै अक उडै़ सौंदर्य प्रसाधनां के कारखाने बहोत सैं। उनके अपने देश मैं इनकी खपत की सीमा आगी। दूसरे देशां मैं ये बेच्चण की खातर ये ल्याये ‘सुंदरी प्रतियोगिता’ अर ‘फैशन शो’। जित देखो उड़े ए मिस गांव, मिस शहर, मिस तहसील, मिस जिला, मिस प्रदेश, मिस इंडिया, मिस एशिया अर मिस वर्ल्ड के कम्पीटीशन आ गे। अमरीका मैं इन सौंदर्य प्रसाधनां पै साल में 8 अरब डालर खर्च कर दिये जावैं सैं। पूरे यूरोप अर अमरीका मैं 12 अरब डालर साल का खर्च इत्तर पै होज्या सै। ईब पाउडर लिपस्टिक पै खर्च तो विकास के काम आवै नहीं। भारत देश मैं जो लोग एक कान्हीं जीन्स का विरोध करैं सैं उन्हें के जीन्स के बड्डे शोरूम बी सैं। जो लोग फैशन का विरोध करैं सैं उनके ए फैशन सैंटर सेल की खातर सैं। रूढ़िवाद अर अन्ध उपभोग्यतावाद दोनूं गले मिलकै चान्दी कूट्टण लागरे सैं। एक और बात सै अक यूरोप अर अमरीका मैं पालतू पशुआं के खानपान पै 17 अरब डालर साल के खर्च होज्या सैं। इसे ढाल पूरी दुनिया मैं नशीली दवाइयां पै 400 अरब डालर का खर्च होज्या सै। म्हारे बरगे देश के नौजवान सुल्फा पीकै टुन्न हुए रहवैं ताकि इननै अमरीका की इस लूट का बेरा नहीं लाग्गै। जै लाग्गै बी तो जात-पात गोत-नात के चक्करां मैं बांट कै राखो ताकि ये नौजवान लड़के-लड़की अमरीका के गुण गाये जावैं उसकैं खिलाफ नहीं बोलैं। अमरीका की लूट के बारे मैं इननै बेरा नहीं लाग ज्यावै। नशा, सैक्स, हिंसा का पैकेज कसूता तैयार कर राख्या सै अमरीका नै म्हारे नौजवानां की खातर। जो हरियाणा के अमरीका जाकै बसगे उननै बी ये चीज कोन्या दीखण देन्ता अमरीका। अपमान सहन करकै बी वे उड़ै पीस्से की कमाई कै लागरे सैं। लागे रहो। फेर इन बातां पै बी गौर फरमाइयो। जै झूठी होतै सम्पादक धोरै चिटठ्ी भेज कै मनै बताइयो अर जै ठीक लागती हो तै चिट्ठी गेर कै मेरा होंसला बधाइयो।
      म्हारी तीसरी दुनिया के देशां पैं 1300 अरब डालर का कर्ज बताया। भारत पै यो कर्ज का बोझ सै 400 हजार करोड़ रुपइये। एक खास बात और सै अर वा सै अक दुनिया के मेहनत कशां नै इतनी मेहनत करी सै अक यू संसार आज तै पहलम इतना धनी नहीं था। 1960-2000 के बीच संसार का शुद्ध उत्पाद आठ गुणा तै फालतू बध्या सै। 1950 मैं सबतैं धनी देशां की 20 प्रतिशत आबादी के धोरै दुनिया की सबतै गरीब आबादी तै 34 गुणा संसाधन थे। 2000-2001 में धनी 20 प्रतिशत आबादी के धोरै संसार के संसाधना का 83 प्रतिशत सै जबकि सबतै गरीब 20 प्रतिशत के धोरै 1.5 प्रतिशत संसाधन सैं। अमरीका हड़खाया होरया सै। यो अपनी जनता के सुख की खातर दुनिया की बाकी जनता के सुखां पै हमला बोलण लागरया सै। पूरी मानवता नै खतरा पैदा होन्ता जावण लागरया सै। यू एक देश पै एक या दूसरी पार्टी का मामला नहीं सै। साम्राज्यवाद नै जालिम शिकंजा कस दिया सै। यू एक-एक देश का सवाल नहीं पूरी दुनिया नै बचावण का सवाल सै। जिस राही पै दुनिया ईब जावण लागरी सै उस राही पै मानवता का विनाश लाजमी सै इस वैश्वीकरण की छत्रछाया मैं। फेर दुनिया की जनता समझण लागरी सै। मानवता अपनी नाड़ इस वैश्वीकरण की कुल्हाड़ी के तलै कोन्या धरै। मानवता का जिन्दा रहवण का जज्बा अर मनुष्य के विचार की ताकत संसार का विनास कोन्या होवण दे। फेर हरेक महिला पुरुष नै अपने स्तर पै इस संसार नै बचावण की खातर, अपने आप नै बचावण की खातर मिलजुल कै किमै ना किमै तो करना पड़ैगा। के करां? क्यूकर करां? कद करां? कित करां? ये सारे सवाल सैं जिन पै बैठकै विचार करने की जरूरत सै। फेर फुरसत किसनै सै इन बातां पै विचार करने की? फुरसत हो चाहे ना हो विचार तो करना ए पड़ैगा।
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पाणी पै लाठ्ठा बाजैगा

पाणी पै लाठ्ठा बाजैगा
पाणी पै गामां लाट्ठा बाजता देख्या था खेत क्यारां के पाणी के वारां पै। फेर ईब तो न्यों सुणण मैं आवै सै अक जो तीसरा महायुद्ध होवैगा तो ओ पाणी के मामले पै होवैगा। पाणी पै दुनिया का संकट तावला ए इसा रूप धारण कर लेगा जिसतै पाणी उसे तरियां खरीद्या अर बेच्या जावैगा जिस तरियां पाइप लाइन अर टैंकरां के जरिये तेल बेच्या जावै सै। सच्चाई या सै अक 1.3 अरब तै फालतू माणसां नै स्वच्छ पाणी उपलब्ध कोन्या। 2.4 अरब लोग साफ-सफाई के प्रबंध की सुविधा तै वंचित सैं। पाणी के संकट के कारण रोजाना लगभग 6000 लोग मरण लागरे सैं। इसतै फालतू आपातकाल का संकट और के हो सकै सै? आवण आले बख्तां मैं मानव समाज की मांग उसकी सप्लाई तै 30 प्रतिशत फालतू होगी। लगभग 40 देशां अर एक अरब लोगां के धोरै निकट भविष्य में पर्याप्त मात्रा मैं जल उपलब्ध नहीं होगा। सन् 2025 ताहिं इसे लोगां की संख्या बधकै 2.3 अरब ताहिं पहोंच जावैगी। आज छह अरब लोग इस दुर्लभ जल संसाधन की खातर एक-दूसरे तैं होड़ लावण लागरै सैं जबकि सन् 2050 ताहिं दस अरब लोग तिसाये होज्यांगे। इनमैं ज्याद महिलाएं अर कमजोर तबक्यां के लोग होवैंगे। भारत की शहरी आबादी का जो 38.38 प्रतिशत हिसा गरीबी की रेखा के नीचे रहवै सै उसनै आसानी तै पाणी उपलब्ध नहीं सै। जमीन्दोज पाणी मतलब धरती के तले का पानी जो सै उसका लगातार दोहन कर्या जाण लागर्या सै। खासकर आंध्रप्रदेश, गुजरात, हरियाणा, कर्नाटक, पंजाब, राजस्थान, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश मैं यो दोहन बधता जावण लागर्या सै। पाणी का एक जागां तै दूसरी जागां ढोवण का राष्ट्रीय खर्च आये साल 15 करोड़ महिला दिवस सै अर जै पीस्यां मैं कीमत आंकी जावै तो इसका प्रतिवर्ष नुकसान 10 अरब रुपये सै।
भारत मैं पाणी तै जीवित बीमारियां तै आये साल 9 करोड़ मानव दिवसां का नुकसान होन्ता बताया। 1985 में 750 गाम इसे थे जड़ै पाणी का कोए स्रोत नहीं था। 1996 मैं इसे गामां की संख्या बधकै 65000 होगी बताई। म्हारे देश मैं 80 प्रतिशत बच्चे पाणी जनित बीमारियां के शिकार होवैं सैं अर इन मां तै प्रति वर्ष लगभग 7 लाख बालक मरैं भी सैं मतलब 1944 बालक रोज मरैं सैं। 4.4 करोड़ लोग पाणी की खराब क्वालिटी करकै नुकसान ठावैं सैं? इस खराब पाणी में लोहा, फ्लोराइड, नाइट्रेट, आर्सेनिक, भारी धातु अर खारा पाणी शामिल सै। पाणी की कमी के चलते दिल्ली-हरियाणा सीमा पै रोहतक रोड इलाके मैं दंगा भड़क ग्या था जिसमैं तीन पुलिस कर्मियों सहित 15 लोग घायल हुए अर अनेक वाहन क्षतिग्रस्त होगे थे। पूर्वी दिल्ली के गोकुलपुरी इलाके मैं पाणी नै लेकै झगड़ा फैल ग्या जिसनै सांप्रदायिक रंग ले लिया। इस झगड़े मैं दो लोग घायल होगे थे। 18 प्रतिशत जल स्रोत प्रदूषित हो लिये। इस धरती पै पाणी की कुल मात्रा का 97 प्रतिशत हिस्सा महासागरों और समुद्रों में है। 2 15 प्रतिशत हिस्सा बर्फ के रूप में मौजूद सै तथा अन्य जीवधारियां अर लोगां की खातिर पाणी की जो मात्रा उपलब्ध बची सै वा सिर्फ 0.5 प्रतिशत सै। जल की इस अल्पमात्रा का वितरण भी सारी जागां समान ढंग तै नहीं होंता।
यू पाणी का संकट इतना भयानक और कितै कोन्या जितना भयानक यू भारत मैं सै। संयुक्त राष्ट्र के एक अध्ययन के हिसाब तै एशिया मैं प्रति व्यक्ति प्रतिवर्ष शुद्ध पाणी की उपलब्धता मात्र 3000 क्यूबिक मीटर सै। भारत मैं या मात्रा 2500 क्यूबिक मीटर सै। शंका जाहिर करी जावै सै अक 2005 तक भारत मैं पाणी का घोर संकट आखड्या होगा। अर यो होग्या। पाणी की किल्लत भारत में और बधी सै। हरियाणा मैं भी इस सबके चलते कई वातावरणीय समस्याएं साहमी आ खड़ी हुई। पहली बात तो याहे सै अक जितना पाणी हरियाणा की खेती न चाहिये उतना पाणी इसपै कोन्या। दूसरी बात याबी सै अक जितना पाणी सै उसका इस्तेमाल बी किस तरियां कर्या जावै सै। बहोत सी जागां पै धरती तै नीचे के पानी का स्तर बहोत नीचै जा लिया अर किसान की मुसीबत बी बधगी। हैंड पंप अर कुय्यां की जागां ट्यूबवैल के पाणी के कनैक्शन घरां मैं लिये जावण लागरे सैं। पाणी की समुचित निकासी की जागां बनी नहीं सै। गालां का कीचड़ बधग्या अर बीमारी बी बधगी। खाज बधग्या, दमा बधग्या, अर पेट की गैस की बीमारी बधगी। नहरों के पाणी का संकट बधग्या। रजबाहयां तै निकले खालां की खुदाई का रोला बधग्या। जोहड़ां का पानी ज्यादा प्रदूषित होग्या। कीटनाशक दवाइयां के इस्तेमाल नै पाणी मैं अर धरती मैं इनकी मात्रा बधा दी। इसतै बी बीमारी बधगी। बरसात के मौसम मैं पानी का कहर चारों कान्हीं देख्या जा सकै सै - चाहै शहर हो अर चाहे गाम हो। कुछ इलाक्यां में सूखे के हालात बने रहवैं सैं। इस पानी का भंडारण करना अर किफायती इस्तेमाल करना पानी की उपलब्धता बनाये राखण की खातिर जरूरी बात सै। हमनै सोचना पड़ैगा अक किस ढालां बहुमूल्य पाणी के प्राकृतिक स्रोतां का रखरखाव करां अर इननै प्रदूषित होवण तै बचावां ताकि मानवता का बड़ा हिस्सा स्वच्छ पाणी ताहिं पहोंच बना सकै। राजस्थान के किसानां का आंदोलन भी इसे ढाल पाणी की कमी करकै चाल रह्या सै। सोचो मेरे बीरा किमैतो।

भूत प्रेत कोन्या होन्ते

भूत प्रेत कोन्या होन्ते
मैं बस मैं बैठा था जीन्द जाने के लिए। यात्रियों में बहस हो रही थी कोए कह रहा था कि धरती पर सारी चीजें हैं जिसके लाग्गै ओए मान्नै सै भूत नै। मैं भी कभी नहीं मानता था लेकिन म्हारी भाभी मैं आ गया भूत। वो 8-10 आदमियों को फैंक रही थी जैसे हिन्दी फिल्म का हीरो गुन्डों को फैंकता है। दूसरा बोलया मैं भी नहीं मान्या करदा पर मेरे भाई के लड़के मैं आ गया, वो उर्दू मैं बोल रहा था। अब मैं मानता हूं कि धरती पै सब कुछ है। जो आदमी उनके साथ बहस कर रहा था वह अकेला पड़ गया और चुप हो गया। तभी जयप्रकाश जो बस में ही था, ने भी बहस में हिस्सा लिया। वह बोला - पीछे क्या हुआ उस पर तो बहस करना ठीक नहीं लेकिन अब किसी को कुछ हो रहा हो तो मैं ठीक भी करूंगा और यह भी साबित करूंगा कि इस घटना के पीछे भूत नहीं बल्कि कोई और कारण है। तभी वह एएसआई बोला - हमारे घर में तो अब भी रोज कुछ ना कुछ घटना घट रही है। परसों ही मेरा एक्सीडेंट हो गया। मरते-मरते बचा हूं। हमारे घर चलो और ठीक करके दिखाओ, फेर मानूंगा आपनै। और जो कुछ लेणा चाहो वह भी दूंगा।
जयप्रकाश ने उसका पता ले लिया और अपना पता दे दिया। मैंने भी जयप्रकाश का पता नोट किया और टेलीफोन नम्बर भी। जयप्रकाश ने एएसआई को कहा - जब जरूरत हो हमें बुला लेना। हम आ जायेंगे। एक हफ्ते के बाद मैंने जयप्रकाश से टेलीफोन पर पूछा तो उसने बताया। अगले ही दिन वो खुद ही लेवण आग्या अर बोल्या - आप ईबे चालो। आज रात म्हारे आंगन मैं खून, सरसों, लोहे की कील, हल्दी व पतासे पड़े मिले। मैं और सोहनदास ही थे दफ्तर मैं। सोहन दास नै भी कहया अक थाम इबै जाओ। जयप्रकाश उनके साथ चला गया। वहां जाकर उसने देखा व बताया - मैंने घर की सारी चीजें देखी। वह जो सामान आया था वहीं पड़ा था। जब मैं हाथ लगाकर देखने लगा तो उस एएसआई की पत्नी बिमला ने कहा - भगत हाथ ना लावै ना तो आप का भी कुछ हो जायेगा। भैंस का कटा थण व पूंछ भी देखो। उसके बाद सभी सदस्यों से बात की। उनके घर मैं एएसआई, पत्नी बिमला अर एक लड़का नीरज जो बारहवीं मैं साईंस का विद्यार्थी था। एक लड़की नीतू जो 8वीं कक्षा में पढ़ै थी। उसके बाद मैंने एक-एक से बात की। दोनों बच्चों ने कोई खास जानकारी नहीं दी। वे कुछ मजाक भी कर रहे थे और डर भी रहे थे। उसके बाद मनै बिमला को अन्दर बुलाया। बिमला ने बताया - ये घटनाएं तीन महीने से घट रही सैं। सबसे पहले हमारे घर मैं कभी कुछ तो कभी कुछ पड़ा मिलता। मैं घरवाले से बात करती तो वो मुझे धमका देते अर कहते कि यू तेरा बहम सै और कुछ नहीं। उसके बाद जो भैंसों के साथ हुआ फेर वे कहण लगे अक किसी पड़ौसी का काम सै, तुम देखती रहया करो। फेर मनै कई स्याणों को बुलाया। उन पर चोरी से ही 15 हजार रुपए खरच करे। फर्क कोनी पड़या।
मैंने पूछा - आपके पड़ौस में किसी के यहां स्याणा आता-जाता है। बिमला ने बताया कि मेरी जेठानी बुलाती भी है और जाया भी करै। मैंने कारण पूछा तो बताया कि इसका एक ही लड़का था वह एक एक्सीडैंट मैं मरग्या। उसके बाद यह चाहती है कि इसे लड़का हो जाये। शायद इसीलिए करती है। बाद मैं मनै एएसआई को बुलाया अर खून पड़ण आली घटना के बारे मैं पूछया अर जित वो सोया था वा जागां बी देखी। उसनै बताया अक दरवाजा बन्द था। करीब 11 बजे मेरी छाती पर मैंने कुछ गीला महसूस करया। मैंने खड़ा होकर लाइट जगाई तो देखा मेरी दरी पर काफी खून पड़ा था। उस दिन के बाद मैं घर में सोने से डरता अर मेरी पत्नी की तो नींद आणी बन्द होगी। मैं उनके साथ छत पर गया। भाई के घर की छत पर आसानी से जाया जा सकता था। फेर मनै जहां एएसआई की चारपाई थी उस जगह की छत को देखा। वहां कुछ नई मिट्टी पड़ी थी। उसको खोद कर देखा तो एक पोलीथीन का लिफाफा मिला जिसके भीतर कुछ खून ईब बी था लेकिन सूख्या औड़ था। एएसआई नै वो लिफाफा काढ़ लिया। उसके बाद एएसआई कै सारी कहानी समझ मैं आगी। बोल्या किसनै दाब्या होगा? मैंने कहा उसका तो मैं पता कर ल्यूंगा लेकिन थाम उसके साथ झगड़ा नहीं करोगे। फेर मैं उसके भाई के घरां गया। वहां उसकी भाभी श्यामो एकली थी।
उसनै मेरे को प्रणाम किया। चाय-पानी पूछा अर बोली - महाराज थाम इनका तो इलाज करे रहे सो म्हारे घर का भी कुछ देखो। मैंने चारों तरफ नजर घुमा कै सारी बातें बता दी जो मुझे पहले ही मालूम थीं। उसको लगा कि ये तो सब-कुछ जाणै सै। पहोंच्या औड़ स्याणा सै। फेर मनै कहया - आप अपने देवर नै क्यों परेशान कर रही सो? के इसतै लड़का हो ज्यागा? एक-दो बर तो उसनै इनकार करया फेर थोड़ी बार मैं उसनै सब हां कर ली और या भी मानगी अक आगे तै ईसा नहीं करूंगी। फेर इलाज तो म्हारा भी कर दयो जिसतै म्हारा घर बस्या रैहज्या। फेर मनै समझाया अक ऐसा करने तै अर कै इस तरियां स्याणे बुलाणे तै बच्चे पैदा नहीं होन्ते। वो ठग हों सैं, उनके चक्करां मैं हमनै पीस्सा अर बख्त बर्बाद नहीं करना चाहिये। श्यामो नै कहया - जो ईसा कुछ नहीं होन्दा तो तनै म्हारे घर की सारी बात क्यूकर बता दी? मैंने कहा - ऐसा कोई नहीं बता सकदा। मैंने यह सब जानकारी आपकी देवरानी से पता की थी, उसके बाद श्यामो को कुछ समझ मैं आई।

किस्सा लाडली

किस्सा लाडली
सत्ते, फत्ते, नफे, सविता, कविता, सरिता, ताई भरपाई सारे इकट्ठे हो जाते हैं शनिवार के दिन। इतनी देर में नमिता आती है और कहती है कि आज तो गाम में जन साक्षरता समिति वाले आये हैं। वे सांग दिखा रहे हैं आज वहां चलना चाहिये। नफे बोल्या - नमिता तूं बहू सै इस गाम की, तनै इसका इतिहास कोनी बेरा। नमिता बोली - क्यूं बेरा क्यूं नी। इस गाम मैं पाछले सौ साल मैं सांग नहीं हुआ कदे। यू आर्य समाज का गढ़ बताया जावै सै। फेर यू सांग न्यारा ए सांग सै। नफे बोल्या - किम्मै कहै नमिता। सांग तो सांगै हो सै। नमिता बोली - मनै अखबारां मैं पढ़ी थी बोहर गाम मैं हुआ अर और कई गामां मैं हो लिया। न्यों बी लिख राखी थी अक घणी ए औरत आवैं सै इस सांग नै देखण। नफे बोल्या - ये साक्षरता आले नाश करैंगे गामां के परिवारां का। सांग का अर लुगाई का के काम? आज काल के माहौल का बेरा कोणी के। नमिता बोली - मैं तो देखण जाऊंगी बाकी थारी मरजी। खैर वे इस बात पै सांग देखण गये अक आकै इसपै चर्चा करैंगे। उड़ै स्टेज पै जन साक्षरता समिति के कोओरडिनेटर नै बताया अक यू सांग रामफल जख्मी नै लिख्या सै। रामफल जख्मी अनपढ़ था। साक्षरता अभियान मैं पढ़या अर खाण्ड-कसार सांग की रचना करी जिसमैं अनपढ़ के जीवन संकट का मसला छाया था। ईब इसनै हरियाणा की सबतै गंभीर समस्या छांट कै महिला भू्रण हत्या कै ऊपर यू सांग रच्या सै। सांग कहो इसनै किस्सा कहो या हरियाणा की हरेक बहू की, हरेक छोरी की, हरेक घर-घर की कहानी सै। एक गाम मैं एक राममेहर नाम का किसान रहता था। उसकी पत्नी का नाम रजनी था। राममेहर के ब्याह को 5 साल होगे थे। इस बीच रजनी नै दो लड़कियों को जन्म दिया।
इसके बाद परिवार ने उस पर ताने कसने शुरू कर दिये। राममेहर की मां ने तो साफ-साफ कह दिया अक जै इस बार भी लड़की होगी तो म्हारा तो सत्यानाश हो ज्यागा। कुछ समय के बाद रजनी का अल्ट्रासाउंड करवाते हैं जिसमें पता चलता है कि रजनी के पेट में जो बच्चा पल रहा है वह लड़की है। रजनी के सुसरे नै तो सुणकै गश-सी आज्या सै। परिवार के सभी लोग कहते हैं कि एक छोरा तो होना ए चाहिये। परिवार रजनी का गर्भपात करवाने का मन बना लेता है। रजनी रोते-रोते मना करती है मगर उसके परिवारवाले कहते हैं कि यदि अबोरशन नहीं करवावोगी तो तेरे को घर से निकाल देंगे। रजनी मजबूर होकर अबोरशन के लिए तैयार हो जाती है। रजनी को चलते-चलते विचार आता है कि गर्भ में जो लड़की है वह क्या सोचती होगी? उसकी तरफ से रजनी सोचती है - मत मरवावै मेरी मां, मन्नै दुनिया देखण का चा। तूं सै मेरी मातारी, क्यूं जुलम करै हत्यारी, म्हारी कौन सी होई खता, मनै दुनियां देखण का चा। नफे सिंह पूरी रागनी सुनकर गंभीर हो जाता है। बेटी के विचार जानकर रजनी बतौर मां के क्या सोचती है - सौ सौ मन की झाल बोच रही सूं मन मैं। पूरी रागनी सुनकर नफे सिंह गायक को 50 रुपये देकर आता है। रजनी उस दिन से फैसला कर लेती है कि वह तीसरी लड़की को भी दुनिया में जरूर लायेगी चाहे उसे कितने दुःख झेलने पड़ैं।
राममेहर रजनी को खूब खरी खोटी सुनाता है। घर से निकालने की धमकी देता है। रजनी एक गीत के द्वारा उसे समझाने की कोशिश करती है। मगर राममेहर पंचायत बुला लेता है और रजनी को घर से बाहर निकाल दिया जाता है। रजनी घर से चल पड़ती है और क्या सोचती है - हुए जुल्म कती वा राजपती थी गर्भवती तंग होकै चाल पड़ी। यह रागनी सुनकर वहां बैठी कई औरतें रोनी लगती हैं। कविता भी आंसूं नहीं रोक पाती। रजनी को रास्ते में एक नशेड़ी मिलता है जो छेड़छाड़ करने की कोशिश करता है तो रजनी क्या कहती है - हटज्या छोरे पाछे नै ना तो पिटूंगी जी भरकै। सविता को बड़ा अच्छा लगता है रजनी का शराबी को धमकाना और वह 100 रुपये देकर आती है गायक को। चलते-चलते रजनी को एक बुजुर्ग महिला मिल जाती है और रजनी से इतनी रात में चलने का कारण पूछती है। रजनी एक रागनी के द्वारा अपनी व्यथा सुनाती है। वह बुढ़िया स्कूल में चपरासी का काम करती है। वह एक रागनी के द्वारा अपनी बात रखती है और रजनी को अपने साथ ले जाती है और स्कूल में अपनी जगह रखवा देती है। रजनी के गुम होने के मामले में राममेहर को दस साल के मुकदमे के बाद 7 साल की सजा हो जाती है। सज़ा के दौरान दोनों लड़कियां मर जाती हैं। रजनी तीसरी लड़की को जन्म देती है और लाडली नाम रखती है। लाडली दसवीं पास करके नर्स के कोर्स में दाखिला लेती है और अस्पताल में नर्स की नौकरी करने लगती है। राममेहर सज़ा काट कर आ जाता है मगर टीबी से पीड़ित हो जाता है। वह लाडली वाले अस्पताल में भर्ती होता है। बुजुर्ग महिला बीमार हो जाती है तो रजनी उसे लाडली के पास लाती है। और यहां संयोग से राममेहर और रजनी की मुलाकात होती है। आंसू आ जाते हैं उसकी आंखों में और क्या कहता है - हाथ जोड़ तेरे पांव पड़ज्यां मैं ठावण जोगा कोन्या। सब तरिया तै गिरर्या आंख मिलावण जोगा कोन्या। यह रागनी रजनी को भावुक बना देती है और जनता को भी। लाडली राममेहर के बारे पूछती है तो राममेहर पूछता है - रजनी यह अपनी बेटी है क्या? रजनी कहती है - अपनी नहीं सिर्फ मेरी बेटी सै। यह अपनी बेटी जब होती जब तुम इसे जन्म से पहले खत्म करने की नहीं सोचते। राममेहर इतना सुणकै रोने लग जाता है और अपनी गलती कबूलता है एवं रजनी से माफी मांगता है। तीनों बुजुर्ग महिला के साथ उसी कस्बे में अमन चैन से रहने लगते हैं। सांग खत्म हो जाता है। तीन-चार घंटे क्यूंकर बीतगे सत्ते हर नै बेरा ए कोन्या लाग्या। नमिता बोली - नफे आर्यसमाजी जी आई किमै समझ मैं अक नहीं? नफे सिंह बोल्या - चाला पाड़ दिया नमिता। मनै के बेरा था इसा सांग सै। फेर एक राय सै जै इन साक्षरता आल्यां ताहिं पहौंचा दे तै। नमिता बोली - बता के बात सै। नफे बोल्या - सांग लाडली की जागां किस्सा लाडली करलें तो म्हारे बरगे खामखा सांग के नाम पै सींग नहीं फंसावैंगे। नमिता बोली - ले साक्षरता आल्यां धोरै तो तेरी बात पहोंचै गई होगी। फेर तूं सांग का विरोध जरूर छोड़ दिये।
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म्हारी शिक्षा

म्हारी शिक्षा
वैश्वीकरण अर उदारीकरण के दौर मैं शिक्षा नव उपनिवेशवाद की चुनौतियां तै दो-दो हाथ करण लागरी सै। शिक्षा के व्यापारीकरण का अर साम्प्रदायीकरण का एजेंडा इतनी बारीकी तै आपस मैं गूंथ राख्या सै अक म्हारे थारे बरगे माणसां नै इसके तार जुड़े औड़ कोन्या दीखते। ‘सबकी खातर शिक्षा’ नै मौलिक अधिकार बणावण का सांग भरणियों नै बाजार की दूसरी चीजां की ढालां शिक्षा नै भी ‘माल’ अर अंग्रेजी मैं कहवां तो ‘कोमोडिटी’ बणावन की खातर गोड्डी घाल राखी सैं। इनका सरगना सै ‘विश्व बैंक’ जिसके मुंह तै लिकड़या औड़ एक शब्द की पात्थर की लकीर सै म्हारी खातर। इसे करकै शिक्षा नै गैट के अंतर्गत ल्यावण की चरचा जोरां पै सै। इंजीनियरिंग, चिकित्सा, बहुतकनीकी, प्रबन्धन, कंप्यूटर, सूचना प्रौद्योगिकी, चिकित्सा क्षेत्र के डिप्लोमा पाठ्यक्रम, अध्यापक प्रशिक्षण कालेज अर यूनिवर्सिटी के लेवल की उच्च शिक्षा के साथ-साथ विद्यालय शिक्षा क्षेत्र मैं भी धन्ना सेठों के लाभ की खातर ये क्षेत्र खोले जावण लागरे सैं। म्हारी केन्द्र की यूपीए सरकार ने बी अपणे न्यूनतम सांझा कार्यक्रम मैं शिक्षा पै सकल घरेलू उत्पाद का 6 प्रतिशत खर्च करण की बात का वादा करया था। फेर कहया करैं ना अक ‘कसमें वादे प्यार वफा, बातें हैं बातों का क्या।’ तो 6 की जागां 4 प्रतिशत खर्च बी बहोत मुश्किल तै करया सै अर यो तो जब सै जब शिक्षा की खातर 2 प्रतिशत का विशेष उपकर भी ला दिया।
एक बर की बात सै एक घर मैं सांझ नै बात चालदी अक ईबकै तो एक भैंस खरीदांगे। घरआली कैहन्दी - भूरी होगी। बालक कैहन्दे - रूढ़ी होगी। बालकां का बाबू कैहन्दा - 20 किलो दूध आली ल्यावांगे। दूसरा बालक बोल्या - हमतै काली झोटी ल्यावांगे। जड़ पूरा म्हिणा होग्या रोज सांझ नै भैंस ल्यावण का जिकरा होज्या अर बालक दूध पीवण की आस मैं सोज्यावैं। एक दिन छोरी बोली - बाबू भैंस तो ल्याणी सै कोन्या फेर खामखा की बात करकै क्यूं भकाया करो। बाबू नै बात करनी बंद करदीं। बालक फेर परेशान होगे। छोरी एक दिन बाबू नै बोली - बाबू भैंस तो कोन्या ल्यावै फेर भैंस ल्यावण की बात तो कर लिया कर। तो बात थी अक जिब देश आजाद हुया तो म्हारे देश के संविधान मैं आपां नै लिख्या था एक नीति निर्देशक सिद्धांत-45 मैं अक चौदह बरस के बालकां ताहिं जरूरी अर मुफ्त शिक्षा दी जावैगी सन 1960 ताहिं फेर 60 मैं कहया 70 ताहिं अर सत्तर मैं बोले 80 ताहिं अर 80 पाछै तो जिकरा ए बंद होग्या। यो तै सन् 1993 मैं हटकै केपी उन्नी कृष्णन के मामले मैं सर्वोच्च न्यायालय मतलब सुप्रीम कोर्ट नै 14 बरस ताहिं के बालकां की खातर पढ़ाई मौलिक अधिकार के रूप मैं बताई अर इस पाछै यू सारा मामला हटकै गर्माग्या। इस सारे सवाल नै जै ‘शिक्षा का अधिकार बिल-2005’ के चौखटे तै बाहर काढ़ कै देखां तो साफ होज्या सै अक किसे बी लोकतांत्रिक समाज व्यवस्था मैं टिकाऊ विकास सुनिश्चित करण की खातर सबकी भागीदारी जरूरी सै।
म्हारे देश की आज़ादी की लड़ाई जिब लड़ी जावण लागरी थी तो ‘सबकी खातर शिक्षा’ एक जरूरी मुद्दा बण लिया था। भगत सिंह से वीरा नै कुर्बानी दी अक आजाद भारत मैं ‘सबनै शिक्षा’ मिलै अर सबनै स्वास्थ्य सुविधा मिलैं। फेर देश की आजादी पाछै शिक्षा के जगत मैं जो सार्वजनिक ढांचा बना, उसनै खड़या करण की खातर अर मजबूती देवण की खातर लोगां नै जमीन अर धन दे कै अर श्रमदान करकै योगदान दिया। हरियाणा मैं बाजे भगत बरगे सांगियां नै भक्त फूल सिंह की गेल्यां मिलकै गुरुकुल खानपुर खातर खूब चन्दा कठ्ठा करया था। घणखरे स्कूलां की बिल्डिंग उन बख्तां मैं हमनै अपने खून-पसीने की कमाई तै बनाई थी। देश की बड़ी आबादी की पहली पीढ़ी नै इन शिक्षण संस्थावां मैं पढ़कै आईएएस, आईपीएस, वकील, डाक्टर, इंजीनियर, नेता आदि के रूप में अभिजात वर्ग मैं शामिल होवण का मौका मिल्या। रिटायर्ड फौजियां नै अर आर्य समाज नै हरियाणा मैं शिक्षा के प्रसार मैं महत्वपूर्ण योगदान दिया। गामां के स्कूलां मैं पढ़े औड़ बहोत लोग बड्डी-बड्डी नौकरियां पै पहोंचे। फेर या रफ्तार धीमी पड़ती गई। फेर खडौत आई अर विपरीत दिशा पकड़ा दी। अर ईब सुधारीकरण के नाम पै ‘शिक्षा का निजीकरण’ का नारा गूंजा दिया शेरां नै। फेर म्हारे ताश खेलण आले भाईयां नै बेराना बेरा सै अक नहीं सै अक ‘शिक्षा का निजीकरण’ आम आदमी के आगै बढ़ण के न्यूनतम अवसरां नै खतम करण की कसूती साजिश रच राखी सै।
‘राइट टू एजुकेशन बिल-2005’ का जो मसौदा 86वें संविधान संशोधन के आधार पै तैयार करया गया सै वो सरकार की संवैधानिक बाध्यता और शिक्षा नै ‘माल’ बनावण के विश्व बैंक के नुस्खे के बीच की दुविधा बहोत काम्मल ढालां दिखावै सै जै कोए इसनै देखना चाहन्ता होवै या देखी जा सकै सै। बिल मैं 6-14 साल की उम्र के बालकां नै शामिल करकै इसमै 0-6 उम्र के सात करोड़ बालकां के खाते ए बंद कर दिये दीखै सैं गरीब अमीर परिवारां के सारे बालकां की खातर समान अवसरां की समानता उपलब्ध करवावण के मामले मैं ‘कॉमन स्कूल प्रणाली’ लागू करण पै भी बिल चुप्पी खींचग्या। बालकां नै स्कूल ना भेज पावण के लिए माता-पिता नै दंडित करण के प्रावधान की जागां हरेक बस्ती/गांव मैं स्कूल खुलने चाहिये अर इनपै सामाजिक नियंत्रण भी होणा चाहिये। इन आईएएस अफसरां की एसीआर जिला परिषद् के चेयरमैन द्वारा लिखी जावै। शिक्षा पै हमला घणां भारी सै, मनै लागै कमजोर त्यारी सै। ताश खेलना छोड़ दवो ना तै दुर्गति म्हारी सै।

हरया भरया हरियाणा

हरया भरया हरियाणा
आज तै दस-बारा साल पहलम के हरियाणा की तसबीर कुछ और थी फेर आज की तसबीर बहोत घणी बदलगी। अर और बी तेजी तै बदलती जावण लागरी सै। ठीक सै समाज परिवर्तनशील बताया सै म्हारे बड़े बडेर्यां नै। बदल भी दो ढाल की बताई सै - एक पाछे नै जावण की अर दूसरी आगे नै जावण की। ईब न्यों क्यूकर तय होवै अक आपां आगे नै जावण लागरे सैं अक पाछे नै। एक बात याद आगी। एक बै भैंसवाल मैं गाम के लोगां नै राय बना ली अक या चौपाड़ ठीक जागां पै कोन्या इसनै दूसरी जागां पै लेजावांगे। गाम कट्ठा होकै लाग्या धकावण चौपाड़ नै एक रात नै। इसी हुई अक मींह बरसग्या अर जोर लावणिये माणसां के पैर फिसलण लागगे तो उननै समझी अक चौपाड़ सरकण लागरी सै। लागे रहे सारी रात धक्के मारण। तड़का होग्या तो देख्या अक चौपाड़ तो एक इंच बी ना सरक री थी। न्यों ए राजस्थान मैं जिब रूपकंवर ताहिं सती के नाम पै जिन्दा जलाया गया तो इसका विरोध करया गया पूरे हिन्दुस्तान मैं। फेर सती जिसी कुप्रथा नै अपनी बढ़िया परम्परा बता कै डेढ़ लाख लोग कट्ठे होकै न्यों बोले - हम तो जलावांगे औरतां नै। ईब जै यो आगै बढ़ना सै तो फेर के कह्या जा सकै सै ?
इन सालां मैं एक नई बला और आई सै अर वा सै वैश्वीकरण अर उदारीकरण की। या विकासकारी सै अक विनाशकारी सै, फेर इसनै अपने पत्ते खोलने शुरू कर दिये सैं। यों सब किमै इतनी रफ्तार तै होवण लागर्या सै अक इसनै ठीक-ठीक ढंग तै अर सही तरीके तै देख पाणा अर समझ पाणा बहोत मुश्किल होत्ता जावण लागर्या सै। इन नये उपनिवेशवादी बुलडोजर नै अपने करतब दिखाने शुरू कर दिये सैं। म्हारे ढेर सारे प्राकृतिक संसाधनां पै अर सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन पै कसूता हमला बोल राख्या सै अर इननै काबू में लेत्ता जावण लागर्या सै। अपने मनमाने ढंग तै इननै लूटण की कोशिश दिनों दिन बढ़ा दी सैं। अर हम ताश खेलण ला दिये अक हमनै इनके खेल का बेरा ना लागज्या। पहलम तै केन्द्र सरकारै इनके इशायरयां पै नाचया करदी फेर ईब तै ये राज्यां की सरकार भी सधे-सधाये तरीके तै विश्व बैंक अर बहुराष्ट्रीय निजी निगमां की धुनां पै नाच्चण लागली।
म्हारा हरियाणा कृषि प्रधान देश रहया सै। इस क्षेत्र मैं राज्य के समर्थन अर सुरक्षा के माहौल मैं आड़े के किसान नै अर खेत मैं काम करण आले मजदूर नै अपने खून-पसीने की मेहनत तै हरित क्रान्ति के दौर में खेती की पैदावार को एक हद ताहीं बढ़ाया। इस हरित क्रान्ति करकै हरियाणा के एक तबके मैं सम्पन्नता आई पर ज्यादा बड़ा हिस्सा इसके फल प्राप्त नहीं कर सक्या। ईब यो समर्थन अर सुरक्षा का तान-बाना टूट लिया अर हरियाणा मैं कृषि का ढांचा बैसकण लागरया सै, असल मैं तो बैसकै लिया। अर इसनै बैसकण तै बचावण के नाम पै जो नई कृषि नीति परोसी जावण लागरी सै उसके पूरी तरियां लागू होयां पाछै आवण आले बख्तां मैं ग्रामीण आमदनी, रोजगार, मजदूरी अर खाद्य सुरक्षा की हालत बहोत भयानक रूप धारण करण आली सै। दूजै कान्हीं जै गौर करके देखां तै सेवा क्षेत्र मैं छंटनी अर असुरक्षा का आम माहौल बनता जावण लागरया सै। कई हजार कर्मचारियों के सिर पै छंटनी की तलवार चाल ली अर बाकी कई हजारां के सिर पै लटकण लागरी सै। सैंक्ड़यां फैक्टरी बंद होली, सैंक्ड़या कारखाने पलायन करकै दूसरे प्रदेशां मैं चाले गये अर छोटे-छोटे कारोबार चौपट होवण लागरे सैं। संगठित क्षेत्र सिकुड़ता जावण लागरया सै अर असंगठित क्षेत्र का तेजी तै विस्तार होता जावण लागरया सै। शिक्षा के अर स्वास्थ्य के क्षेत्र मैं बाज़ार व्यवस्था का लाचली अर दूषणकारी खेल सबकै साहमी ईब आणा शुरू हो लिया। जो ढांचे समाज नै अपने हाथां तैं खड़े करे थे उनको ध्वस्त करण की कै बेच्चण की मुहिम तेज होती जावण लागरी सै।
हरियाणा के जीवन के आगामी मानचित्र मैं गरीब अर कमजोर तबकों, दलितों, युवाओं और खासकर महिलाओं का अशक्तीकरण, इन तबकों का और बी हासिये पै फेंक्या जाना साफ तौर पर उभर कै साहमी आवण आला सै। इन तबकों का अपनी जमीन से उखड़ने व दरिद्रीकरण का भगदड़ भर्या दौर शुरू हो लिया अर आवण आले बख्त मैं और तेज होवण आला सै। हरियाणा मैं इस बख्त शिक्षित, अशिक्षित अर अर्द्धशिक्षित युवा लड़के व लड़कियां मारे-मारे घूमते फिरैं सैं।
पाछले सालां मैं हुये बदलावों के साथ-साथ आई छद्म सम्पन्नता, सुख भ्रान्ति अर नए-नए सम्पन्न तबकों की सांस्कृतिक दरिद्रता को दूर करने के लिए पिछड़ी सोच अपनी जगह बनाती जावण लागरी सैं। धींगामुश्ती, कुनबापरस्ती, जात-गोतवाद, गरीबों की बेदखली, शामलात जमीनों पर कब्जे, स्त्रियों के साथ छेड़छाड़, बलात्कार अर हत्या, बेहयाई अर मौकापरस्ती, साम्प्रदायिक अर जातिवादी हिंसा, स्वयंभू पंचायतां के महिला विरोधी तालिबानी फतवे आदि आड़े के इन तबक्यां के राजनीतिक, सामाजिक अर सांस्कृतिक जीवन का हिस्सा बन लिये सैं। इसे करकै इन तबक्यां के फतवे चालैं सैं। इन तबक्यां की या वर्चस्ववादी संस्कृति हरियाणा के सामाजिक पिछड़ेपन पै टिकरी सै। आई किमै समझ मैं अक गई सिर पर कै? छोड़दे ये ताश खेलने अर सोच किमैं। बीस-बीस लाख के किल्ले बिकैंगे तेरे अर तों चा मैं आकै बेचैगा। फेर एकबै दिल्ली के तले के गाम आल्यां की जो आज तैं तीस साल पहलम धरती बिकी थी उनका बेरा पाड़ले के हाल होया सै उनका।
जिस राह पै दुनिया ईब जावण लागरी सै इस तरह पै मानवता का विनाश निश्चित सै। या वैश्वीकरण की प्रक्रिया भी नष्ट हो ज्याणी। फेर दुनिया समझण लागली इन सारी बातां नै। मानवता आपनी नाड़ इस वैश्वीकरण की कुल्हाड़ी कै तलै कोन्या धरै। मानवता का जिन्दा रहवण का जज्बा अर माणस के विचार की ताकत इसा होना असंभव कर देगी। हरेक माणस नै अपने स्तर पै मानवता बचावण की खातर अर गैल अपने आप नै बचावण की खातर मिल-जुल कै किमै ना किमै करना पड़ैगा जिबै हरया भरया हरियाणा बच सकै सै।

आण्डी नेता

आण्डी नेता
म्हारे हरियाणा की बातै न्यारी सै। आर्थिक तौर पै सबतै आगे अर सामाजिक तौर पै ठन-ठन गोपाल। लिंग अनुपात की खराब हालत नै नाम रोशन कर दिया हरियाणा का। म्हारे नेतागण जिसकी कड़ पै एक बार हाथ फेर दें सैं उस माणस का दिमाग सातमे आसमान पै जा चढ़ै सै कै कतिए काम करना छोड़ ज्या सै, उसकी तर्क करण की ताकत बी खत्म होज्या सै, आच्छे भूंडे मैं फरक करण की शक्ति मारी जा सै, हां मैं हां मिलावण की आदत पड़ज्या सै, देखती आंख्यां माक्खी निगलण की खूब महारत हासिल हो ज्या सै, झोटे की ढालां गश खाणा बी आ ज्या सै। माणस नेता के सम्मोहन मैं घणी कसूती ढालां फंस कै खड़या हो ज्या सै ज्यूकर बस के गेयर बाक्स में गेयर फंस जाया करै। नेता की हर बात नै अपनी चाद्दर के पल्ले कै गांठ मार ले सै। उसकी रीढ़ की हाड्डी कड़ थेपड़ते की साथ बेरा ना कित रफ्फूचक्कर हो ज्या सै और कै पिंघल ज्या सै। ज्यूकर साम्मण के आन्धे नै हरया ए हरया दिख्या करै न्योंए उस माणस नै बी ओए दीखै सै जो उसका नेता उसनै दिखाना चाहवै सै। फेर कुछ बी करवा यो उसपै।
जिसका राज हो सै वे तो अपने कार्यकर्ता नै समझावैंगे अक जो अपणी चालदी मैं नहीं चलावै ओ माणस बी किमै माणस हो सै? सदियां तै यो दस्तूर चालदा आया सै। जिसकी चाली उसनै चलायी। महाराजा अशोक तै हिंदुस्तान का अशोक सम्राट माण्या जा सै फेर गद्दी पै बैट्ठण ताहिं तो उसनै बी अपने तीन चार भाइयां का कतल करवाया ए बताया सै। तो फेर आज के जमाने मैं इस राज-पाट नै डाट्टण की खातर अर कै हासिल करण की खातर बीस-तीस कतल कर दिये जावैं कै करवा दिये जावैं ता के हरजा सै? या तै म्हारी प्यारी पुरानी संस्कृति का सवाल सै। म्हारी आस्था नै ठेस पहोंच सकै सै जै हम बख्त-बख्त पै सौ दो सौ चार सौ माणसां नै धर्म पै कै जात पै लड़वा कै मरवा नहीं दयां।
म्हारे नेता हमनै उकसावण ताहिं हल्दी घाटी की लड़ाई मैं महाराजा राणाप्रताप की बहादरी की तो खूब चरचा करैंगे फेर न्यों कोन्या बतावैं अक उस लड़ाई मैं सबते बहादरी गेल्यां हकीम खां सूर अर उसके अफगान सैनिक लड़े थे। मथरा वृंदावन में मंदिरां खातर एक हजार बीघा जमीन का दान किसने करया था। बेरा सै? सम्राट अकबर नै। मतलब यू सै अक म्हारी साझी संस्कृति को म्हारी साझाी शहादत नै सीच्या सै न्यों कोन्या बतावैं। अर हम बी मोटी बुद्धि के माणस उनकी हां मैं हां मिलावण मैं कती वार नही लान्ते। शाबास रै म्हारे नेताओं तम सम्राट अशोक की साच्ची शुद्ध सन्तान सो।
बिना मैरिट नौकरी दिवावण का झांसा देकै राखणा, बिना मैरिट यूनिवर्सिटी मैं दाखला, बिना मैरिट मैडिकल मैं लैक्चरर अर प्रोफैसर लावणा, रातोंरात करोड़पति बणा देवण का सपना दिखा कै राखणा इस ढाल के सारे गुण सैं म्हारे नेतावां मैं। कायदे कानूनां कै ठोक्कर मारकै घटिया काम कराणियां ताहिं बचाणा, ये सारी चीज ऊपर तै लेकै तले ताहिं सै अर घट्टण की जागां बधती जावण लागरी सैं। इसे नेता आण्डी कै फक्कड़ कहे जावैं सैं। म्हारे मां तै बी कई तो न्यों कहवैंगे अक जे माणस चालती मैं भी नहीं चलावैगा तो फेर नेता बणन की के जरूरत सै। ईब ईसे ढालां सोचणियां माणस आण्डी तै न्यारा के कह्या जा सकै सै? हमनै अपणी समझदाणी पै जोर देकै सोच्चण की तो आपां नै बी सूं खा राखी है। पहली बात तो या सै अक आपां अपणा किसनै समझां सां अर पराया किससै समझां सां। ऊत बलात्कारी, कातिल, सुलफाबाज, काला धन कमावाणिया तै हमनै प्यारा लागै सै इस करकै अक ओ म्हारी जात का सै, ओ म्हारा गोती भाई सै, ओ रिश्तेदारी मैं पड़ै सै। ईमानदार, आम जनता का भला चाहवणिया, साच नै साच अर झूठ नै झूठ कहवणिया, अपने असूलां पै चालणियां माणस हो तै आपां उसनै सूंघते बी कोन्या इस करकै अक ओ अपणी जात का कोन्या, ओ गोती भाई कोन्या। कोए बूझै तो कैहद्यां सां अक ऊत सै तो के सै, सै तो अपनी जात का जिस माणस की फितरत बलात्कारी की होगी ओ जात की छोरियां तै बी बदफेली करैगा अर दूसरी जात की छोरियां गेल्यां बी। ओ नहीं बक्शै किसे जात नै अर फेर बी हम उसनै अपना मानां अर उसपै केस नहीं चालण देवां।
जिस माणस का काम सुलफा बेचण का सै तो ओ योहे काम तै म्हारे बालकां नै भी सिखावैगा। बताओ इसे रिश्तेदार अर गोती भाई नै के कोए चाटै। येहे माणस सैं जो अपने बचण की खातर जात का साहरा लेवैं सैं। हम बी सैड़ देसी कहवांगे अक बात सही सै, अपणा माणस फेर बी किमै तो ख्याल राखैगा ए। हम एक बात कती भूल जावां सां अक इन संकीर्ण जगहावां पर ना पहोंचा कै म्हारी समझ का विकास रोक दिया जा सै। थोड़े घणे लोगां कै तो समझ आवण लागगी अक जात गोत के नाम पै बांट कै हमनै ये नेता म्हारा उल्लू बनावैं सैं। हम टांड पै बिठा राखे सां इन नेतावां नैं। वा टांड आली बात सुनी होगी थामनै - एक बै एक छोरी नै भूख लागरी करड़ी अर वा मां धोरे रोटी मांगै। गरीब घर था। रोटी थी कोन्या। मां नै बहोत समझाई। न्यून-न्यून की बात लाई फेर छोरी नै रोवणा बंद नहीं करया। बातां तै के भूख भाजै थी। मां नै दुखी होके छोरी की पिटाई कर दी। छोरी और जोर से रोवण लागगी। इतने मैं एक पड़ोसन आगी अर वा बोली - ए संतरा बेटी क्यूं रूआ राखी सै। संतरा रोवण नै होरी थी - या रोटी मांगै सै। पड़ोसन बोली - दे क्यूं ना देन्ती रोटी। संतरा - रोटी कोन्या। पड़ोसन सोच कै बोली - तो न्यूं कर इसनै टांड पै बिठा दे। संतरा बोली - टांड पै के रोटी धरी सैं। पड़ोसन बोली - बिठा तो सही। संतरा नै छोरी टांड पै बिठा दी। टांड पै बैठे पाछे रोएं तो गयी फेर रोटियां नै भूलगी। छोटी बोली - मां मनै बस टांड पर तै तले तार दे।
तो आई किमै समझ मैं अक नहीं। इन नेतावां नै अर धर्मगुरुआं नै आपां टांड पै बिठा राखे सां। हम अपनी असली बातां पै रोल्या ना करद्या इस खातर जात गोत, धर्म, आतंकवाद अर बेरा ना के के नाम पै हम टांड पै बिठा राखे सां। पहली बात तो याहे सै अक हमनै टांड पर तै तारणिया कोए नहीं सै, हमनै आपै उतरना पड़ैगा। इन नेतावां कै भरोसै बैठे रहे तो बैठे-बैठे रोवन्ता रैहणा पड़ैगा टांड पर तै तलै आकै हमनै इन नेतावां का खरणा ए बदलना पड़ैगा।

किसी हो भारत की सरकार ?

किसी हो भारत की सरकार ?
सते, फते, सविता, कविता अर नफे सते हर के घरां बैठे थे। बात चाल पड़ी केंद्र की सरकार पै। सते बोल्या - पहलड़ी सरकार तै दुःखी होकै उसके धक्का मारकै तो इस सरकार नै ल्याये थे फेर इसकी बी चाल अर रंग-ढंग उसे बरगे लाग्गे मनै तो। फते बोल्या - कुछ तो फरक सै उसमैं अर इसमैं। इतनी वार मैं सते की बहु सरिता अर नफे की भाभी कमला बी उड़ै ए आगी। नफे अर उसकी घरवाली खजानी यूपी में तीन-चार दिन लाकै आये थे खजानी के पीहर में। कमला बोली - लैक्सनां का चर्चा जोरां पै सै उड़ै तो। सते बोल्या - यूपी के लोग किसी सरकार चाहवैं सैं? कमला बोली - यूपी आल्यां का तो मनै बेरा कोन्या अक वे किसी सरकार चाहवैं सैं फेर सविता अर गाम की कई लुगाई एक दिन बैठ कै जरूर बतलाई थी अक म्हारे देश की सरकार किसी होनी चाहिए? नफे बोल्या - तो आज थाम अपनी भड़ास काढ़ल्यो आच्छी ढालां। फते बोल्या - के गलत बात सै इसमैं? हमनै तो ताश खेलण तै फुरसत कोन्या ईसी बातां पै विचार करण की। हां, बोलो थाम नै किसी सरकार बनानी चाही। सविता बोली - हमतै ईसी सरकार चाहवां सै जो अमरीका के आगै गोड्डे ना टेकै। दूसरे देशां मैं बिना बात सेना भेजण की अमरीका हिम्मत ना करै। आजाद अर गुट निरपेक्ष विदेशी नीति अपनावै। नफे बोल्या - थाम इतनी दूर की क्यूकर बतलाई? जरूर इन ज्ञान-विज्ञान आल्यां की झपेट में आरी दिखो सो? कमला बोली - ओ अपना सतत शिक्षा का केंद्र नहीं खोल राख्या सै इन ज्ञान-विज्ञान आल्यां, नै, उसमैं चर्चा होरी थी। हां, तो और के बतलाई थी ईब तो पूरी बात बताओ।
सविता नै फेर बोलना शुरू करया - पूरे देश के हितां की रुखाली हो, चाहे कोए गरीब हो चाहे अमीर हो। धर्म के नाम पै, अर जात्यां के नाम पै कट्टरवादी उन्माद फैलाकै लोगां नै ना जलवावै। दुलिना अर गोहाना बरगे कांड ना होवण दे। गऊ के नाम पै लोगां नै ना भिड़वावै। सहशिक्षा का विरोध ना करै। कविता बोली - इसका मतलब ये सारे उल्टे काम म्हारी सरकारें करवावैं सैं अक म्हारा बी कोए दोष सै? सते बोल्या - इन बातां पै चर्चा फेर किसे दिन करल्यांगे, आज तो सरकार पै ए गैहटा उतरण दे। सविता नै आगै बताया - गरीबी का पक्का इलाज करण की गारंटी करैं। भूख तैं मरण आल्यां का खूब हांगा लाकै राह टोहवै। बेरोजगार छोरे-छोरियां ताहिं बेरोजगारी भत्ता देवैं। कविता हटकै फेर बोली - ईसी सरकार कड़ै सै मनै बताओ तो सही? सते बोल्या - बीच मैं टोक के गड़बड़ मत ना करो। कहे पाछै कह लियो अपनी बात। हां सविता तों अपना मीटर चालू राख। सविता बोली - जो भ्रष्टाचार नै जड़ तै पाड़ कै बगादे। नफे बीच मैं फेर बोल पड़या - ज्यूकर म्हारले सीएम नैं कर दिया करप्सन का खात्मा। सविता बोली - ना, असल में करप्सन का खात्मा करण आली सरकार। देश के कानून विदेशियां के हक मैं ना बदलैं अर देश की आम जनता के हकां की रुखाली करै। सार्वजनिक क्षेत्र के नवरतन कारखान्यां ने ना बेचै। काला बाजारियां नै जेल मैं ठोक दे। खेती में सरकारी निवेश ताहिं बढ़ावा देवै। नफे बोल्या - कसूता घोटा मार कै आरी सै सविता तंू तो। सते बोल्या - घोटा मारकै तनै पास करी थी दसमी जमात। सविता इन सारी बातां नै समझै सै जिबै तो तरतीब वार सारी बात करण लागरी सै। रट्टा मारकै ईसी बात कोन्या हो सकदी। सविता बोली - और चर्चा करूं अक छिक लियै? सते बोल्या - आज इस बारे में तों जो बताना चाहवै सै वे सारी बात बतादे। सविता बोली - ईसी सरकार जो सूखा राहत का बख्त तै इन्तजाम करै अर गाम के बेजमीन्यां के रोजगार का इन्तजाम करै। फसल की ठीक कीमत तय करै अर दूसरे देशां ते नाज ना मंगवावै। डब्ल्यूटीओ की दाब मैं ना आवै। खेत मजदूरां के खातर संसद में कानून पास करै। सबके स्वास्थ्य की गारंटी करै। बारहवीं ताहिं की शिक्षा सबनै मुफ्त देवै। संसद मैं अर विधानसभा मैं महिलावां खातर एक तिहाई रिजर्व करवावै। हड़ताल का अधिकार बरकरार राखै। बिजली का निजीकरण रोकै। नदी का कटाव रोकण की खातर पूरा ध्यान देवै अर दूरगामी योजना बनावै। फते बोल्या - ईसी सरकार के न्योंए थोड़े बणज्यागी? इसकी खातर तो कसूते पापड़ बेलने पड़ेंगे। सविता बोली - हम तो तैयार सैं पापड़ बेलण नै थाम अपनी बात बताओ? नफे कै गले नहीं उतरी ये सारी बात अक इसी बी सरकार हो सकै सै? उसकी पार्टी का ब्योंत नहीं था इन बातां मा तै दो बी पूरी करण का। बात नै घुमा कै बोल्या - कड़ै सै ईसा राज? सविता सहज दे-सी बोली - जिब देखण का मन बणावैगा तो ईसा राज कड़ै सै इस बात का बी बेरा तो लाए लेगा। सते बोल्या - जै ईसी सरकार कितै ना बी हो तो के होग्या? सोच्चण मैं अर विचार करण मैं के हरजा सै? देश आजाद करावण की बात तो पहलम विचार में आई होगी उसतैं पाछे अमल शुरू हुया होगा। सविता बोली - आज नहीं तो काल इन बातां पै गौर तो करना ए पड़ैगा। ये जो सोच्चण के नाम पै ताले ला राखे सैं ये खोलने बहोत जरूरी सैं। नफे बोल्या - के धिंगतानै खुलवावैगी? सविता बोली - पहलम तै मिलकै सोच-विचार करांगे, अर फेर सबनै साथ लेके चालांगे। कोए एतराज? नफे बोल्या - फेर किसा एतराज।

दीवाली क्यूकर मनावां

दीवाली क्यूकर मनावां
सते, फते, नफे, कविता, सविता अर भरपाई शनिवार नै फेर कट्ठे होगे। इतनी देर मैं सुमन बी आगी। सते बोल्या - सुमन के बात किमै कमनू सी दिखै सै? सुमन बोली - ना इसी तो कोए बात ना। सते बोल्या - सुमन ले तों ना बताना चाहन्दी तो कोए बात ना फेर बात तो किमै ना किमै सै। सुमन बोली - वा मेरी चाची नहीं सै मैडीकल मैं। काल उसकै धोरै गयी थी उसनै दीवाली का न्योता देवण अक पहलम की ढालां सारे मिलकै दीवाली मनावांगे। फेर मेरी चाची तो रोवण लाग्गी मेरी बात सुणकै। एकबै तो मेरै समझ मैं नहीं आया अक वा रोई क्यों? फेर मनै होसला-सा करकै बूझ लिया अक चाची तूं क्यूं रोई? मनै बता। बताए तै दुःख आधा होन्ता बताया। चाची बोली - तेरा भाई राजकुमार तो अमरीका बैठ्या सै, तनै बेरा ए सै। तेरी भाण बंगलौर मैं सै अर उसनै बंगलौर बहोत भा ग्या। तेरा चाचा ओमान देश मैं सै। अर मैं एकली रोहतक मैं सूं। होली पै तीन साल मैं एकबै कट्ठे होए थे सारे, बता ईब दीवाली नै हटकै कट्ठे क्यूकर होवां? ईब क्यूकर गाम मैं आकै दीवाली मनावां? मैं बोली - देख चाची या तो आच्छी बात सै थाम चारों कमावण लागरे। घर नै धन दौलत तै भरण लागरे। दीवाली नै भी तो आपां लक्ष्मी की पूजा इसे खातर करया करां सां ना अक घर मैं लक्ष्मी मतलब धन का वास हो। तो थारी तो दीवाली रौजै ए मनै सै चाची। ईसे दीवाली आले दिन मोबाइल पै और पांच-पांच मिनट फालतू बात कर लियो और तै मैं के बताऊं चाची। चाची बोली सुन बेटी पीस्से का रौल्ला कोन्या। पीस्यां की तो गलेट सी लागैं सैं। फेर इतना पीस्सा बी किस काम का अक माणस दो दिन आपस मैं बैठकै दुख-सुख की ना बतला पावै। खुदा ना खास्ता मेरै किमै होज्या तो मेरी संभाल कूण करैगा? इसे पीस्से नै के चाट्टैं? बेटी या बात तो सही सै अक पीस्सा बी होना चाहिए फेर निरा पीस्सा बी किस काम का? सते बोल्या - जिन धोरे पीस्सा सै वे तो उकी पूजा करकै मना लेंगे दीवाली फेर जिन धोरै फूट्टी कोड्डी बी कोन्या वे किसकी धौंक मारैं? दीवाली का मतलब सै अच्छाई की बुराई पै जीत। नफे बोल्या - भाई फेर तो दीवाली नहीं दिवाला मनाना चाहिए। कविता नै बूझ लिया - क्यूं दिवाला क्यूं? नफे बोल्या - बुराई की अच्छाई पै जीत चारों कान्हीं होण लागरी सै आज।
झूठे का साच पै बोलबाला सै अक नहीं? गाम मैं शरीफ नै कूण बसण देसै आज के दिन? छोरियां का जीना मुश्किल कर राख्या सै। सविता बोली - म्हारा तो दीवाली मनावण नै कती जी कोन्या करदा। कविता बोली - जै म्हारे बरगे बी न्यों हार मानकै बैठज्यांगे तो सच्चाई की खातर अर अच्छाई की खातर कौन आवाज बुलंद करैगा? हमनै दीवाली का दिन अपनै ऐशोआराम बधावण की खातर पीस्से की पूजा करण के दिन के रूप मैं देखण की जागां बुराई के खिलाफ सच्चाई की जीत की खातर अपना संकल्प पुख्ता करण के दिन के रूप में देखना चाहिए।
सरिता बोली - थामतै बात की बाल की खाल तारण लागज्याओ सो। दीवाली तो खील पताश्यां का त्यौहार सै। दीवे बालो, मोमबत्ती बालो, चीन आली बिजली की लड़ चासो, पटाखे भटकाओ, खीर बनाओ, लक्ष्मी पूजा करो अर तान कै सो ज्याओ। थाम भगत सिंह क्यों बनना चाहो सो? सै के थारा भगत सिंह बनने का ब्यौंत? सविता नै सरिता की बात का जवाब दिया - बात तो सही सै सरिता तेरी फेर यू सब करण खातर घर मैं थोड़ा-घणा माहौल तो होना ए चाहिए ना। इस एक साल मैं गाम मैं आठ जण्यां नै तो खेती की मार खाकै फांसी खा ली। चार छोरी अर तीन छोर्या नै सल्फास की गोली खाकै ज्यान दे दी। तीन जने कैंसर का शिकार होकै तड़प-तड़प कै मरगे। दो जने इस डेंगू ने लील लिये। स्कूल मैं च्यार छोरियां गेल्यां के बणी थामनै बेरा सै। घर-घर मैं दारू नै तहलका मचा राख्या सै। बता इसे माहौल मैं दीवे बाल कै जै चान्दना करण की कोशिश बी करांगे तो भीतरले मैं चान्दना क्यूकर होवैगा? सते बोल्या - फेर दीवाली नहीं मनावां ईबकै? फते बोल्या - हालात तो इसे ए सैं फेर आपां तो गाम की साथ सां, ज्यूकर फैसला होगा वो सिर माथै। सते बोल्या - न्यों जी तोड़े कोन्या काम चालै भाइ। न्यौं तो बुराई और सिर पै चढ़कै बोलैगी। हमनै दीवाली का दिन इस बात की खातर मनाना चाहिए अक आपां अच्छाई अर बुराई की लड़ाई मैं अच्छाई का साथ निभावण का प्रण करां, आपां छांट कै महिला भ्रूण हत्या कै खिलाफ आवाज ठावण का प्रण करां, नशे, हिंसा, सैक्स के पैकेज का विरोध करां, समाज मैं व्याप्त गैर वैज्ञानिक रुझान, रूढ़िवाद अर पाखंड का मुकाबला करां, दहेज अर बाल विवाह के खिलाफ आवाज बुलंद करां, विज्ञान के जन विरोधी इस्तेमाल का विरोध करां, लड़कियां की खरीद-फरोख्त का विरोध करां। गाम मैं बढ़िया शिक्षा, बढ़िया स्वास्थ्य की बात करां। पंचायत की रचनात्मक सक्रियता की खातर काम करां। सविता बोली - सते की बात सुनकै तो किमै भीतरलैं मैं चान्दना-सा हुया। ये सारे प्रण करते हुए एक-एक दीवा कै मोमबत्ती आपां नै चासनी चाहिए।
अच्छाई की बुराई पै जीत की खातर कुछ ना कुछ तो आपां नै करना चाहिए ना? हम पांच जनियां नै दीवाली के दिन कट्ठी होकै यो घूंघट तार बगाना चाहिए फेर तो दीवाली का कोए मतलब होगा म्हारी खातर। कविता, सरिता, सविता, सुमन अर भरपाई मिलकै बोली - दीवाली नै तार बगावांगे इस घूंघट की बुराई नै। नफे बोल्या - कितना बढ़िया हो जै 10-20 गामां मैं बहादुर महिला यो काम कर दें इस दीवाली नै।
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प्यार हो तै इसा हो

प्यार हो तै इसा हो
हरियाणा नै लागै सै प्यार तै बहोत घणी नफरत सै। ज्याहें तैं प्यार करने वालों को फांसी के फंदे पै चढ़ान्ते हरियाणा आले वार कोन्या लान्ते। इतिहास मैं कुछ इसे प्रेमी हुए हैं जिनकी मिशालें आज भी दी जाती हैं। उन्हीं में से एक जोड़ी थी सोहनी महिवाल की। पंजाब में चिनाब नदी के कांठे पर तुला कुम्हार के घर लड़की का जन्म हुया। माता-पिता नै उसका नाम सोहनी रख्या जिसका मतलब ए खूबसूरत होसै। जैसे-जैसे वह बड़ी होती गई, उसकी खूबसूरती के चरचे दूर-दूर तक फैलते गये।
एक दिन इज्जतबेग नाम का एक सौदागर बर्तन खरीदण बुखारा से चलके पंजाब आया। उसनै तुला के बर्तनों की तारीफ सुनी थी। इसलिए वह उसके घर पहुंचा। तुला ने सोहनी से उसे बर्तन दिखाने के लिए कहा। बड़े अदब के साथ सोहनी ने बर्तन दिखाये। इज्जतबेग बर्तन क्या देखता, वह तो सोहनी को देखकर ही होश खो बैठा। एकटक उसे ही देखैं गया। सोहनी बोली - ‘बर्तनों को देखो सौदागर। इनमें से जो पसंद हों एक तरफ रखता जा।’ ‘हां-हां! थाम बर्तन दिखाओ।’ इज्जतबेग हड़बड़ा के बोल्या। फिर सोहनी उसे बर्तन दिखाती गई अर वो उन्हें एक तरफ रखता गया। जब वह तुला के घर से निकला तो उसके पास बर्तनों की भारी गठरी थी। इज्जतबेग सोहनी का दिवाना होग्या। उसनै शहर में एक दुकान लेली। अपने मुल्क उल्टा जावण का इरादा छोड़ दिया। वह रोजाना महंगे दामां पै सोहनी से बर्तन लेकै आन्ता और सस्ते दामों पै उननै बेच देन्ता। एक बख्त इसा आया के उसके सारे पीस्से खत्म होगे। अब सोहनी से मिलने का कोए बहाना नहीं बच्या। वह तुला के पास पहोंच्या और बोल्या - ‘मेरी जमापूंजी खतम होली। इस परदेश मैं मेरा कोए नहीं। मनैं अपने घर मैं नौकर राख ले। ‘तुला ने इज्जतबेग को भैंस चराने और उनकी देखभाल करने का काम सौंप दिया। उसे दिन तै लोग उसनै महिया मतलब भैंसों की देखभाल करने आला महिवाल कहकै पुकारण लाग्गे।
महिवाल को सोहनी के पास रहने का मौका मिलग्या। ज्यादा से ज्यादा वक्त दोनों साथ बितावण लाग्गे। कद उनकी दोस्ती प्यार मैं बदलगी उननै बेरा ऐ कोनी पाट्या। ईब वे एक-दूसरे के बिना एक पल भी नहीं रह पाते थे। लोग सोहनी महिवाल के प्यार की बात करने लगे। ये बात तुला के कानों तक भी पहुंची। उसने महिवाल को घर से बाहर निकाल दिया। प्यार के किस्से को खतम करने के लिए सोहनी की जबरदस्ती शादी करदी। महिवाल ने चिनाब नदी के पार एक झोंपड़ी बना ली। वह रात दिन सोहनी की याद में डूबा रहता। दूसरी तरफ सोहनी भी उसकी याद में आंसू बहाती रहती। जब और रहा नहीं गया तब एक दिन भिखारी बनकर महिवाल सोहनी की ससुराल आया। सोहनी ने उसकी आवाज पहचान ली। वह भागती हुई दरवाजे पर गई और उसे घर में खींचकर उसके गले लग गई। वायदा किया कि रात को उससे मिलने झोंपड़ी में आयेगी।
सोहनी रात में छिपती-छिपाती चिनाब के किनारे पहुंची। नदी पार करने के लिए उसने झाड़ी में पहले ही एक पक्का घड़ा छिपा दिया था। कारण यह था कि उसे तैरना नहीं आता था। वह उलटे घड़े के सहारे तैर कर नदी पार महिवाल के पास पहुंच गई। हर रात सोहनी इसी तरह नदी पार करती। दोनों प्रेमी एक-दूसरे का साथ पाकर दुनिया को भूल जाते। एक दिन उसकी ननद ने उसे जाते देख लिया। उसे बर्दाश्त नहीं हुआ। उसने उसकी झाड़ी से पका घड़ा निकाल कर उसकी जगह कच्चा घड़ा रख दिया। रात नै कच्चा घड़ा देख कै सोहनी चौंकगी। पक्का घड़ा ल्यावण का बख्त नहीं था उसके पास। महिवाल से मिले बिना वह रह नहीं सकती थी। वह कच्चे घड़े पर नदी पार करने का खतरा जानती थी। फिर बी उसने नदी पार करने का फैसला किया। नदी में उतरने के कुछ देर पाछै घड़े की मिट्टी पानी में घुल्लण लाग्गी। घड़े के साथ ही सोहनी नदी में डूबने लगी। उसने महिवाल को आवाज लगाई।
चिनाब किनारे महिवाल उसका इन्तजार कर रहा था। सोहनी की आवाज सुनते ही वह उसे बचाने के लिए नदी में कुद पड़ा। पर देर हो चुकी थी। सोहनी लहरों में समा चुकी थी। सोहनी के बिना उसका जीवन बेकार था। महिवाल तैरते हुए वहां पहुंचा जहां उसने सोहनी को डूबते देख्या था। सोहनी का शरीर उसकी बांहों में आ गया। उसने सोहनी को कसकर पकड़ लिया और नदी की गहराई मैं समाता चाल्या गया। आज बी घणे ऐ सोनी महिवाल सैं जो ज्यान की बाजी लाकै बी अपने प्यार नै अमर करण लागरे सैं। फेर हमनै तो ये म्हारी संस्कृति के दुश्मन दीखैं सैं। भला क्यों?
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औकात पीस्से की

औकात पीस्से की
जिसा जनमदिन उनका हुया सबका होवै उसा। जलण आले जल्या करैं। जिनके धौरै सै वे क्यों ना धूम धाम तै मनावैं बर्थडे। हम तो कहवांगे अक हरेक अपनी घरआली नै उतना ए प्यार करै जितना उननै करया। घरआली का जनमदिन आया तो सीधी दो सौ करोड़ की एयरबस दे दी गिफट मैं। बीबी नै कसूती भागी या गिफट। इस मौके पै उननै वो गीत गाया ‘हर खुशी हो वहां, तू जहां भी रहे’। भीतर तै यार दोस्त कसूत जल भुनगे पर बाहर तै खुश दिखाई दिये। एक ने तो कसम खाली अक अपनी बीवी नै इसतै आगे की चीज द्यूंगा। बीवी की फरमायस बी आगी अक मनै जम्बो खरीद कै दियो मेरे जनम दिन पै। या ईर्ष्या बी हैसियत के मुताबिक होवै सै आजकाल। जिसके धोरै दुनिया की सबतै ज्यादा दौलत हो वो अपनी बीवी नै तोहफे मैं क्यों देवैगा पांच रुपये का लाटरी का टिकट कै सागर विल्ला मैं लंच। ये सब चीज तो आज काल के गामौली मौलड़ करना सीख लिये।
देश के सबतै बड्डे अमीर की तो पुरानी पैंट बी हजारां मैं बिक ज्यागी। हैसियत मतलब औकात का मामला सै भाई। आई किमै समझ मै? हरियाणा मैं या औकात आजकाल ब्याह शादियां मैं देखण मैं आवै सै। जो बड्डे लोग होंसैं वे बड्डी बात करया करैं। म्हारे बरगे छौटी औकात के लोग उनकी नकल बी करैंगे अर उनकी नुक्ताचीनी बी करैंगे। या नुक्ताचीनी बी एक परफोरमैंस सी बनकै रहगी। असल मैं या नुक्ताचीनी भी म्हारी निष्क्रियता मैं भरी निराशा तै न्यारी कुछ नहीं। जै ईर्ष्या करनी सै तो ढंग तै करो। वा आलोचना बी बनै। इस बुराई नै पलटन खातर कुछ हाथ पैर बी मारे जां। फेर न्यों कहवैंगे म्हारी के औकात, म्हारी कौन सुनैगा। अर जै कदे औकात हो बी ज्या तो सैड़ देसी औकात दिखावण पै आ ज्यांगे। अर न्यों कहवैंगे अक हमनै नेगेटिव की जागां पोजिटिव सोच बणावण की जरूरत सै। हर आदमी एक जहाज तो देवैगा। जितनी घरआली उतने जहाज हो ज्यांगे। किसे किसे धोरै तो च्यार-पांच बी हो ज्यांगे। फेर आगले जनम दिन पै बेरा ना के दे देवै। इस ढालां सब कपलां धोरै जहाज होंगे तो गजब का नजारा होगा। आसमान मै जहाजै ए जहाज टहल्या करैंगे। फेर कारां नै तो महारे थारे बरगे टटपूंजिये चलाया करैंगे। उनकी घरआली दफतर जावैगी तो उसमैं उड़कै जावैगी अर उड़ेए तै सीधे उड़कै घरां पहोंच ज्यागी। गुंड्डे कोन्या छेड़ पावैं न्यों उसनै। या छेड़छाड़ बी कसूती बीमारी सै समाज मैं इसतै बी निजात मिल ज्यागी औकात के हिसाब तै।
इस बाजारवाद के दौर मैं असल मैं या एक और ‘लूटबाजी’ आगी म्हारे भारत देश ‘महान’ मैं, इस ‘साइनिंग इंडिया’ मैं। या लूट बाजी असल मैं ‘गिफट बाजी’ का मुखौटा पहर के आई सै, ओ ताश खेलनिया मेरे भाई मेरी बात समझ मैं आई? नहीं! तो ताश बन्द कर अर दिमाग लाकै सोच। सोच्चण की तनै कस्सम खा राखी सै। तो सुन! ये जो इतनी हैसियत आली गिफट दी जावैं सैं इनपै इन्कम टैक्स की छूट सै। ये सारी गिफट फरी सैं। थाम चाहो तो ताजमहल खरीद कै दे द्यो। एक खास बात और सै अक या गिफट प्रतीक मात्र नहीं होन्ती। या भाव, मोल भाव, औकात अर ब्रांड की भाषा बण ज्यावै सै। आज कै तो औकात रहगी अर कै वा चीज जिस करकै औकात बणै सै। बाकी बीच की सारी की सारी चीज साफ चाहे वो प्रेम भाव हो, भाव हो, लगाव हो जो भी हो। कुछ दिन पाछै जब गिफट नहीं मिलती तो प्रेमी कहवै सै तेरा ब्यौंत देख लिया अर तेरी औकात देख ली। आई किमै समझ मैं? हाम ताश खेल्लण आले रोब्बट बणा दिये। जिब भावनाएं पीस्से मैं बदलैं सैं तो पीस्सा भावना नै तय करै सै। अर पीस्से का हिसाब हो सै मोल तोल हो सै। याहे सै पीस्से की औकात। एक कान्ही तो 500 रुपये की दवाई के अभाव मैं बालक मां की आंख्यां के साहमी दम तोड़ दे सै। दूजे कान्हीं एक रईश दो सौ ब्यालिश करोड़ की गिफट देदे सै। एक कान्ही तो ब्याह करण की खातर पीस्से ना होवण करकै एम ए पास छोरी घरां बेठी सै अर दूजे कान्ही हनीमून बी आसमान में मनैं सैं। एक तरफ किसान विदर्भ मैं, हरियाणा मैं अर पंजाब मैं करज के बोझ तलै फांसी खा कै आत्महत्या करैं सैं अर दूसरे कान्ही 1600 रुपये प्रति क्वींटल का नाज आयात करया ज्यावै सै। या सै पीस्से की औकात! आई किमै समझ मैं? मानवता की औकात आला समाज जिब ताहिं नहीं बनावांगे तो न्योंए धक्के खावांगे। उनके बालकां की खातिर एयरकंडीशंड कोठी, एयरकंडीशंड कार, एयरकंडीशंड बाजार, एयरकंडीशंड स्कूल अर एयरकंडीशंड अस्पताल अर म्हारे बालकां की खातर तो बस दीमक लागी कड़ियां का मकान, खसता हाल सरकारी स्कूल, बिना डाक्टरां अर दवाइयां आले सरकारी अस्पताल, बिना पीस्यां किस्से बाजार? इस पीस्से नै बड़े बड़यां की म्यां बुलवा दी। बहोत से ईमानदार लोगां नै बी हार मान ली। फेर बड़ा हिस्सा सै जनता का जो इस पीस्से की औकात नै सबक सिखाना चाहवै सै। या लड़ाई जारी सै। पीस्से नै अपनी असली औकात का एक दिन जरूर बेरा लागैगा जिब संसार का आम आदमी जागैगा।

संकट परिवार का

संकट परिवार का
आजकाल परिवारां का संकट खुल करकै साहमी आवण लागरया सै। एक्सटैंडिड एकल परिवार तै हम एकल परिवार की तरफ बढ़े थे फेर इसकी खातर जरूरी सपोर्टिव स्टरक्चर के विकसित ना होने तै परिवार मैं स्वस्थ जनतांत्रिक मूल्यों के विकास के अभाव मैं एकल परिवार मैं तनाव और टूटन का माहौल बढ़या सै। देखल्यो भीतर झांक कै ईब्बी बख्त सै। इसके कारण पूरी परिवार संस्था पर सवालिया निशान लाग लिया सै। आज इसके विकल्प के तौर पै या तो हम अपने संयुक्त परिवार की तरफ देखां सां कै फेर विदेशां मैं अमेरिकी कै कैनेडियनां की नकल करण नै उतावले नजर आवा सां। दोनों जागी पै आज के संकटग्रस्त एकल परिवार या परिवार संस्था का विकल्प नजर नहीं आन्ता। तो फेर असली विकल्प या तीसरा विकल्प के हो? एक मत यो भी सै अक या वर्तमान विवाह संस्था भी अलोकतांत्रिक सै, इसका विखंडन तो ज़रूरी सै।
इसी विमर्श के चालते आजकल या बात भी सामने आरी सै अक बख्त की साथ-साथ परिवार का स्वरूप बदलता रहया सै। आज का जमाना जनतंत्र का जमाना सै तो समाज और परिवार मैं जनतांत्रिक मूल्यों का समावेश बख्त का तकाजा सै। इस प्रक्रिया मैं आये या अड़ाये गये व्यवधान ही हमारे एकल परिवारों के तनावग्रस्त होने के कारक दीखें सैं। इस विमर्श के चालते आजकल परिवार के जनतंत्रीकरण पै काफी जोर दिया जा रया सै। आड़ै भी एक खास बात ध्यान देवण आली सै अर वा या सै अक यो जनतंत्रीकरण भी अमरीकी फ्रेमवर्क मैं ए देखा जारया सै। या यूं भी कहया जा सकै सै अक पूंजीवादी जनतंत्र के चौखटे मैं धरकै ही परिवार के जनतंत्र को सोचा-समझा जारया सै। समाजवादी जनतंत्र की भी बात चलती रही सै। तर्क सै अक समाज के जनतंत्र और परिवार के जनतंत्र नै न्यारा-न्यारा करकै देखना मुश्किल सै।
इस समाज में जनतंत्र, समता, स्वतंत्रता अर बंधुत्व की बातें तो की जावैं सैं लेकिन असल मैं ये सब चीजें वंचित तबकों तक नहीं पहुंच पायी क्योंकि डेमोक्रेसी भी एक प्रकार की वर्गीय तानाशाही सै। परिवार के स्तर पै या तानाशाही संयुक्त परिवार में भी होवै सै अर एकल परिवार में भी। साथ-की-साथ परिवार मैं पितृसत्ता पूरी ढाल जड़ जमाए बैठी सै। इस ढाल जिब हम परिवार के जनतंत्रीकरण की बात करां सां तो कई ढाल के सवालां का उठना स्वाभाविक सै। एक सवाल तो योहे सै अक इस परिवार की पितृसत्ता नै अर तानाशाही नै चुनौती देना परिवार के जनतंत्रीकरण का हिस्सा माना सां अक नहीं।
घणे लोग इस ढांचे नै चुनौती दिये बिना इस ढांचे के भीतरै जनतंत्र की बात करना अर वर्तमान परिवार नै अधिक व्यवस्थित ढंग तै चलावण की मशक्कत करना चाहवै सैं। इसकी साथ-साथ एक और मूलभूत धारणा परिवारां नै लेकै म्हारे दिमागां मैं बैठी होई सै अक परिवार स्त्री-पुरुष के जैविक संबंधों के आधार पै बनी एक प्राकृतिक संरचना सै जो शाश्वत सै अर समाज के विकास या प्रगति के नियमां तै निरपेक्ष सै। इसलिए परिवार के ढांचे मैं परिवर्तन की बात करना एक बेवकूफी सै। फेर ऐतिहासिक संदर्भों के अनुभव पै आधारित एक मान्यता दूसरी भी सै अक सामाजिक परिवर्तनां की साथ-साथ परिवार का ढांचा भी बदलता रहया सै। एक तीसरी जगह या भी सै अक स्त्री-पुरुष के जैविक संबंधां तै जो पितृसत्ता पैदा होवै है वा सामाजिक रूपांतरण के बावजूद यानी उत्पादन की पद्धति बदल जावण के बावजूद कायम रहवै सै। इसका मतलब यो हुया अक समाज का रूप बदल कै चाहे कुछ हो ज्या पर परिवार का रूप कुछ ऊपरी परिवर्तनों के बावजूद लगभग अपने मूल रूप मैं अपरिवर्तित रहवै है। क्या ये सभी प्रस्थापनाएं ठीक सैं? यदि ये ठीक नहीं सैं तो फेर ये म्हारे समाज मैं प्रस्थापित क्यूंकर हो पाई? इनतै कैसे निजात पाई जा सकै सै अर मानवीय संबंधां नै और फालतू मानवीय क्यूंकर बनाया जा सकै सै। इन सब सवालों तै रूबरू हुए बिना कोई बना-बनाया तीसरा रास्ता नहीं सोच्चा जा सकता।
ज्यों-ज्यों परिवारों का संकट बढ़ रहया सै त्यों-त्यों पुनरुत्थानवादी ताकतें, जिनमैं इब आर्य समाज का भी एक हिस्सा शामिल होग्या लागै सै अर ये स्वयंभू पंचायतें भी इस संकट के बख्त परिवार के जनतंत्रीकरण पै बातचीत करण की बजाय किसे अमूर्त प्राचीन भारतीय आदर्श परिवार की कल्पना करते हुए कति जनतंत्र के विरोध मैं जा खड़े हुए। टीवी चैनल पै इस ढाल की बात बहोत सुनण नै मिलै सै अर सतसंगां मैं भी इसी ढाल का पुनरुत्थानवादी विवेचन प्रस्तुत करया जा सै। परिवारां के भीतर और बाहर आज के समाज मैं स्त्रियों के बढ़ते हुए शोषण अर दमन के बीच एक तरफ स्त्रियों का घरेलूकरण किया जा रह्या सै तो दूसरी तरफ उनको असंगठित क्षेत्र में बड़े पैमाने पै धकेला जा रह्या सै, इस ढाल उनका सर्वहारीकरण हो रह्या सै। इन सबके चाल्ते परिवार मैं असली जनतंत्र की प्रक्रिया के रहैगी इस पै इब्बे ज्यादा विचार-विमर्श की जरूरत सै। स्त्री-पुरुष के संबंधां पै बातचीत किये बिना अर दहेज प्रथा, बाल विवाह, खर्चीली शादियों, यौन उत्पीड़न आदि पर विमर्श किये बिना परिवार मैं जनतंत्र की बात सोचना मुमकिन नहीं सै। परिवार के जनतंत्रीकरण का मसला केवल महिलाओं या युवाओं के अधिकारों का मसला नहीं सै इसका जनतंत्रीकरण इसके व्यक्तिवादी आत्मकेंद्रित चरित्र नै छोड़कै एक समाजोन्मुखी चरित्र बनाने तै जुड़ रया सै। परिवार केवल व्यक्तिगत स्वार्थों की सिद्धि और अन्य उपभोक्तावादी स्वार्थों को पूरा करने के लिए नहीं बल्कि बेहतर मानवीय मूल्यों के विकास अर सामाजिक योगदान की खातर होना चाहिए। इसमें कोई शक नहीं अक पुरुषों को स्त्रियों का समर्थन और सहयोग करने आला साथी होना चाहिए। यह गुण किस प्रकार हासिल किया जा सकै सै वो गंभीर मामला सै। खापां आल्यां कै तो समझ मैं आणा और बी मुश्किल सै।

चाल हरियाणे की

चाल हरियाणे की
हरियाणा के गठन के बाद पाछले 40 बरसां मैं हरियाणा मैं अभूतपूर्व बदलाव आये सैं। पिछड़ी खेती, परम्परागत उद्योग धण्धयां की साथ सीमित व्यापार पै टिकी हरियाणा की अर्थ व्यवस्था पै इस बीच लाम्बी छलांग लाई सै। अर प्रदेश पै देश के नम्बर वन प्रदेश के रूप मैं उभरण की कोशिश करी सै। आज हरियाणा उतर भारत मैं हरित क्रान्ति, तेजी से विकसित होन्ते उद्योग धन्धों अर व्यावसायिक गतिविधियों के केन्द्र के रूप मैं अपनी पहचान बणा चुक्या सै। फेर इस बाजार व्यवस्था के चालते जो विकास हुया सै इसतै समाज मैं आर्थिक विभाजन भी तेज रफतार तैं बढ़या सै। आर्थिक, सामाजिक अर ज्ञान की खाई और चौड़ी होन्ती जावण लागरी सै। कृषि के बढ़ते मशीनीकरण के साथ परम्परागत जजमानी प्रथा बोझ बनती चाली गई। किसान अर कारीगर अर दूसरे परम्परागत पेश्यां मैं लगे लोगों कि रिश्ते बी बदलते गये । जजमानी प्रथा टूटती चाली गई। एक कान्हीं दिहाड़ीदार मजदूर ने जनम लिया तै दूसरे कान्हीं कारखान्यां/ फैक्ट्रीयां मैं बनने आले कृषि के औजारां की मांग बढ़ती गई। खेती की बढ़ती पैदावार नै एकबर तो छोटी जोत्यां के किसानों को भी लाभ देना शुरू कर दिया। इसका फल यू हुया अक समाज मैं संयुक्त परिवारां की जरूरत कम होवण लागगी। सहज सहज ये भी टूटण लाग्गे। इस खेती के विकास की साथ चौथरफा पैदावार बढ़ी। बड्डे किसानां का धनी वर्ग पैदा होण लाग्या। धनी किसान, अफसरशाही, ठेकेदार अर मध्यम वर्ग उभरते गये। नई नई उपभोग्ता वस्तुआं की मांग बढ़गी। बाजार व्यवस्था का विस्तार हुया। उद्योग, व्यवसाय, यातायात अर संचार मतलब सारे क्षेत्रां मैं विस्तार होन्ता चाल्या गया। सबतै फालतू मेहनत इसमैं वंचित तबक्यां, महिलावां अर छोटे किसानां की थी।
च्यार ढाल के किसान पैदा होगे - धनी किसान, मध्यम किसान, छोटा किसान, अर सीमान्त किसान। इनके हित न्यारे न्यारे होगे। फेर धनी किसान इननै जात के नाम पै कठ्ठै करकेै अपने हित साधण लागरया सै। बेरा ना कद समझ मैं आवैगी छोटे किसान कै या हेरा फेरी। अफसर शाही का ताना बाना बध्या अर मजबूत हुया। कर्मचारी क्लास थ्री तै लेके क्लास ताहिं भरती होए। ठेका प्रणाली के तहत ठेकेदार, कर्मचारी, मालिक, मजदूर, अर प्रवासी मजदूर उभरे। थोक विक्रेता तै लेकै रेहड़ी आले अर फेरी आले उभरे। बड़ी बड़ी ट्रांसपोर्ट कम्पनियां तै लेकै रिक्शा चालकां की लार उभरी अर उसतै बी लाम्बी बेरोजगारां की फौज। जिस अनुपात मैं आर्थिक विभाजन बढया उसे अनुपात मैं शिक्षा अर स्वास्थ्य मैं विषमताएं भी बढ़ण लाग्गी। सामाजिक विषमताएं पहलमैं उफनी हांडै थी। ईब और बी तीखी होगी। सरकारी स्कूलां मैं अर निजी स्कूलां मैं जनता का विभाजन बढ़ता चल्या गया। जिसकै धोरै जितना पीस्सा, उसके बालकां की खातर उसा ए स्कूल। अलग-अलग श्रेणियां के न्यारे-न्यारे स्कूल खुल्लण लाग्गे। सरकारी स्कूलां मैं बालक गरीब के बालक मतलब छोटे अर सीमान्त किसान के बालक अर दलितां के बालक जिनको बहुमत विकास की इस दौड़ मैं पाछै छोड़ दिया गया।
इसका यो मतलब नहीं सै अक इननै अपनी मेहनत का योगदान इस नये हरियाणा के बणावण में कम करया। खूब करया, खूब खून पस्सीना बहाया इन तबक्यां नै। फेर फल कोन्या पहोंचे तबके ताहिं। बीच मैं ए गुलफ लिये ताकतवर नै। हां कुछ लोगां नै आरक्षण का साहरा जरूर मिल्या। फेर इनमैं भी एक अभिजात तबका पैदा हुया पर घणखरे तो पिछड़े ए रहे। याहे हालत स्वास्थ्य के क्षेत्र मैं भी बनी। स्वास्थ्य का ढांचा तो सन् 90-95 ताहिं तेज रफतार तै खड़या करा पर फेर खड़ौत आगी। पूरी जरूरतां के हिसाब तै कोन्या खड़या हो पाया। जो खड़ा भी हुया उसमैं डाक्टरां अर बाकी स्टाफ की कमी बनी रही। नतीजतन इस क्षेत्र मैं भी निजी संस्थावां पर निर्भरता बढ़ती गई अर जिनकी संख्या बढ़ती ए जान लागरी सै। देहात की एकरसता बी टूटी सै। एक कान्हीं आधुनिक सुख सुविधा तै लैस कंकरीट के मकान, बगड़ मैं टैक्टर अर कार खड़े, तो दूजे कान्हीं क्यूकरै पक्की ईंटां का जुगाड़ बिठाकै कच्ची पक्की छतां के मकान। इस बीच मैं शहरां का भी खूब विस्तार हुया सै।
नई नई कालोनियां बणगी। मतलब एक कान्ही तो अधखबड़ा सा, बेतरतीब सा बस्या पुराना शहर/कस्बा तो दूजे कान्हीं खुली सड़क अर नागरिक सुविधावां आला नया शहर। बीच बीच मैं काम धन्ध्यां की तलाश मैं गाम तै आकै शहर मैं बसे लोगां की अनाधिकृत बस्तियां जड़ै नागरिक सुविधावां का जबरदस्त अभाव सै। मतलब साफ सै अक शहरां मैं भी विभाजन और तेज हुया सै। फेर यू घणखरे हरियाणा आल्यां नै कै तो दीखता कोन्या कै वे देखना नहीं चाहन्ते।
चढ़ता हरियाणा, चमकता हरियाणा, फील गुड हरियाणा, नम्बर वन हरियाणा, चक दे हरियाणा अर दूजे कान्ही का हरियाणा म्हारी कलम पै चढ़ण मैं भी दिक्कत आवै सै। हमनै हरियाणा का चित्रण सही सही करण ताहिं शब्द टोहे नहीं पान्ते। सफरिंग हरियाणा, मेहनत करकै बी भूखा मरता हरियाणा, लिंग अनुपात मैं रसातल मैं जान्ता हरियाणा, खाप पंचायतां के फतव्यां पै फांसी पै झूलता हरियाणा, अन्धविश्वासी हरियाणा, स्टोव फटने तै जलकै मरता हरियाणा, बेरोजगारी के रिकाट तोड़ता हरियाणा, दुलिना अर हरसौला काण्ड करता हरियाणा, सेज की भेंट चढ़ता हरियाणा, इसका जिकरा एक नवम्बर आले दिन टोहया बी कोन्या पाया। सारे अखबार साइनिंग हरियाणा तै साइन करते पाये थे। चलो साच्ची कहनिया अर पूरी बात कहनिया बी बसै सैं इबै हरियाणा मैं। आई किमै समझ मैं ?

सांप के कान नहीं होन्ते

सांप के कान नहीं होन्ते
सते फते नफे सरिता कविता सरिता अर भरपाई फेर कठ्ठे होगे शनिवार नै। सविता बोली - आज तो गाम मैं टिटाना गाम की बीन बजाने वालों की टीम आरी थी। बहुत गजब की बीन बजावै सैं। कई तो बहोतै पुरानी धुन सुनाई उननै। सते बोल्या - टहलगी होगी तूं तो बीन के लहरे पै। सरिता बोली - इतने मैं कड़ै साधी। हम तो नाच्ची भी खूब बीन के लहरे पै। फते बोल्या - फेर तो हम दो चीजां तै महरूम रहगे। एक तो बीन का लहरा अर दूसरा थारा नाच। म्हारे ताहिं ना बताई थामनै। कविता बोली - हमनै बालक भेजे थे फेर थाम खरखौदे जारे थे किसे काम तै। सरिता बोली - उड़ै तो फेर कई सांप बी कठ्ठे होगे होंगे बीन का लहरा सुणकै नै। सते बोल्या - सांप कै कान कोन्या होन्ते। सांप सुण कोन्या सकदा। भरपाई बोली - सते सरिता नै के समझावै सै। मेरी गेल्यां बात कर। मैं 60 साल की बुढ़ी हो ली अर कम तै कम 30-40 बार मनै बीन पै सांप नाचते देखे। तो फेर वे क्यूकर नाच्यैं सैं? सते बोल्या - ताई भरपाई तेरी बात सोलां आन्ने साच्ची सै। तनै सांप बीन के लहरे पै नाचते जरूर देखे होंगे। फेर इतनी ए साच्ची या बात सै अक सांप के कान नहीं होन्ते। धरती द्वारा आवण आली पैरां की खटपट सांप नै उसकी चमड़ी द्वारा सुनाई देज्या सै। मदारी की बीन की हरकतां पै सांप अपनी नजर टिका लेवै सै। इस तरियां जब मदारी अपनी बीन नै घुमावै सै तो सांप भी उसी दिशा मैं अपना सिर हिलावण लागज्या सै। लोग न्यों समझैं सैं अक बीन की आवाज नै सांप को नाच्चण नै विवश करया सै। फेर या बात साच्ची कोन्या। भरपाई एक बै फेर बोली - देख सते तेरी बात सुणकै मेरा दिमाग तो तेरी बातां का जवाब नहीं दे सकता फेर मेरा दिल इबै बी न्यों ए कहवै सै अक सांप बीन का लहरा सुनकै ए उसपै नाच्चै सै। सते बोल्या - ताई तेरा कसूर कोन्या। म्हारे हरियाणा मैं दिमाग अर दिल नै न्यारे न्यारे करकै सोच्चण आले माणसां का टोट्टा कोन्या। पढ़े-लिखे माणस बी दिमाग की बात ना मानकै दिल की बात मानैं सैं। सरिता बोली - सांप अपने तै मोटे चूहे ने क्यूंकर निगल ज्यावै सै? सारे एक-दूसरे के मुंह कान्ही देखैं। आखिर मैं सते बोल्या - घणा तो मनै बेरा ना फेर बात या सै अक सांप का मुंह तो छोटा हो सै। फेर उसका जबड़ा पीछे काफी लाम्बा हो सै अर साथ मैं लचकदार बी हो सै अर इसे करकै इसकी फैलण की क्षमता बहोत हो सै। इसे तरियां सांप का बाकी शरीर बी भीतर तै रबड़ की ढालां फैल सकता है। इसे करकै सांप अपने तै मोटे चूहे ने निगल जावै सै।
भरपाई बोली - सांप की केंचुली तो मनै बी देखी सै फेर सांप केंचुली क्यों तारै सै अर क्यूकर तारै सै इसका बेरा कोन्या अर कदे पहलम सोच्ची बी कोन्या इसी बात। फेर सारे चुप। किसे नै बी कोन्या बेरा था। सविता की ड्यूटी लागगी अक आगली बरियां वा बेरा पाड़कै ल्यावैगी अक सांप केंचुली क्यूकर अर क्यों तारै सै। बिनती सै मेरी हरियाणा के जिल्यां की साक्षरता समितियां तै अक वे इन अंधविश्वासां के खिलाफ सतत शिक्षा के केन्द्रां में चर्चा करवावैं अर विज्ञान सम्मत रूझान नै बढ़ावा देवण मैं मदद करैं। इस सवाल पै चर्चा होनी चाहिये अक यज्ञ करे तैं बरसात नहीं होन्ती। एक बात और सै म्हारे समाज मैं अक हवन करे तै शुद्धि हो सै वातावरण मैं। विज्ञान की समझदारी या सै अक जिब बी कोए चीज जलैगी तो कार्बनडायक्साइड पैदा होवैगी आक्सीजन नहीं। तो वातावरण की शुद्धि क्यूकर होगी? बस शुद्धि होवै सै या विश्वास की बात सै। म्हारे ग्रन्थों में लिख राख्या सै। इसे तरियां यो अंधविश्वास अक पीपल का पेड़ रात नै आक्सीजन पैदा कर सकै सै इसका विज्ञान ने ईब ताहिं तो बेरा कोन्या। फेर दो-दो घंटे बहस करेंगे अक ना पीपल रात नै आक्सीजन छोड्डै सै। विज्ञान की ईब ताहिं की खोज कहवै सै अक सूर्य की रोशनी मैं पौध्यां मैं अर पेड्डां के हरे पत्यां मैं मौजूद क्लोरोफिल मैं रसायनिक प्रक्रिया होवै सै जियां तै आक्सीजन पैदा होवै सै। रात नै कोए पेड़ क्यूकर आक्सीजन छोड्डै सै। बूझां अक क्यूकर? तो कहवैंगे न्यों तो बेरा ना फेर छोड्डै सै जरूर। किस किताब मैं लिख राखी सै? बेरा ना। कै न्यों कहवैंगे म्हारे पुराने ग्रंथां मैं जिकरा सै इन बातां का। अर म्हारा विश्वास बी सै अक पीपल ज्याहें तै तो देवता मान्या ज्यावै सै।
हां तो बात थी सांप की। तो सविता बोली - मैं कित तै बेरा पाड़ कै ल्याऊंगी? सते बोल्या जै बेरा लावण का मन बणावैगी तो बेरा किते ना किते तै लागे ज्यावैगा। नफे बोल्या - एक न्यूं बी कहवै था अक सांप उड़ बी सकै सैं। मेरै जंची कोन्या बात अक बिना पंखां के सांप क्यूकर उड़ सकै सै। सते बोल्या - सांप उड़ तो कोन्या सकदे फेर सांपां की कुछ प्रजातियां इसी सैं जो वृक्षों से उतरते बख्त गलाईडरां की ढालां सहज-सहल तले ने आवैं सैं। इस ढाल वे ऊंची टहनियां पर तै नीची टहनियां पै आ ज्यावैं सैं। गलाइड करने के लिए सांप अपनी पूंछ की सहायता लेवै सैं। भरपाई बोली - सारे जहरी नहीं होन्ते बताये। सते बोल्या - हां कुछेक सांप जहरी होवैं सैं बाकी नहीं। सविता बोली - ताई या बात तो हमनै देखनी सै अक म्हारी परम्परावां मैं म्हारे ग्रन्थां मैं कोणसी बात सही सै अर कौनसी गलत सै। महात्मा बुद्ध भी कैहगे अक किसे बात नै इस करकै मत मानो अक वा म्हारे ग्रन्थां मैं लिखी सै अक वा म्हारे गुरुआं ने बताई सै बल्कि इस करके मानो अक वा विवेकसम्मत सै अर संसार के ज्यादातर लोगां के हक मैं सै। म्हारी परम्परा मैं तो सती प्रथा भी जरूरी अर गौरव करण आली बात बता राखी सै तो के हम सती प्रथा की हिमायत करण लागज्यां। पहलम परम्परा थी अक बालक होवण पै ओरनाल जंग लागे ओड़ दान्त तै काट्या करते अर बालक टैटनस होकै मर ज्याया करदे। तो ईब बी निभावां कै या परम्परा?

पूंजी के सै अर किसकी सै

पूंजी के सै अर किसकी सै
खेती में, कारखाने में काम करते हैं हम। उनसे भांत-भांत की चीजें पैदा करने में खून-पसीना एक करते हैं हम। लेकिन मुनाफाखोर पैसे वाला उन चीजों का मालिक बन जावै सै। वह उन चीजां नै बाजार में भेजै सै। उड़ै बाजारां मैं बेच कै मुनाफा कमावै सै। जो चीज बाजार में बिकने की खातर भेजी जावै सै उननै माल (कमॉडिटी) कह्या जावै सै। मालिक माल बेच कै पीसा मतलब मुनाफा पैदा करता है। माल को बनाकै तैयार करण की खातर मालिक ने कच्चा माल खरीदना पड़ता है ज्यूंकर कपड़ा बनाने की खातर कपास या रूई। अर जिन लोगों को जुटा करकै वह कपास बनवाता है उन ताहिं भी मजदूरी देनी पड़ती है। जिन मशीनों या औजार का इस्तेमाल करकै माल तैयार किया जावै सै वो भी कुछ घिसते हैं, कुछ और खरच भी होन्ता होगा। कच्चा माल मजदूरी अर मशीन की घिसन पर दूसरे खरचे निकाले पाछै माल बेचने से जो पैसा मिलता है वह उसका मुनाफा होता है।
ज्यूंकर एक जोड़ी धोती की तैयार करने मैं एक रुपया कपास, दो रुपये मजदूरी तथा 50 पीस्से मशीन की घिसाई अर दूसरे खरचों में लग जाते हैं। इस ढाला धोती के एक जोड़े पर 3 रुपये 50 पीस्से कुल खरच बैठ्या। अर बाजार मैं धोती का वोह जोड़ा 10 रुपये मैं बिक्या तो मुनाफा कितणा हुआ? आया हिसाब किमै समझ मैं, अक नहीं? कितना हुया मुनाफा भला? छह रुपये पचास पीस्से। पूंजी वा हो सै अक मुनाफा कमावण की खातर कुछ पीस्सा लाया जावै सै अर उत्पादन के साधनां का इस्तेमाल कर्या जावै सै। मजदूरों की मेहनत लगती है तब माल तैयार होता है। इसे माल तैं मुनाफा कमाया जावै सै। एक जोड़ी धोती आली मिशाल नै एक बार फेर देखां तो यदि मुनाफे की छह रुपये 50 पीस्से की रकम को फिर रोजगार में लगा दिया जाता है तो यो पूंजी बन जायेगा। या पंूजी भी दो ढाल की हो सै। एक इसी हो सै जिससे उत्पादन के साधन - जगह, ज़मीन, कल-कारखाने, औजार आदि खरीदे जावैं सैं। इसनै स्थिर पूंजी कहवैं सैं। दूसरी पूंजी वा होसै जिसे लगाकै मजदूर की मेहनत खरीदी जावै सै अर्थात् मजदूरी के रूप में दी जावै सै। इसी पूंजी अस्थिर कही जावै सै। इस पूंजी की आड़ मैं मुनाफाखोर मजदूरां नै लूटते रहवैं सैं। या के आच्छी बात सै? आच्छी हो चाहे भूंडी मुनाफा बचैगा तो उद्योग बधैगा अर उद्योग बधैगा तो विकास होवैगा।
यो तो किस्मत का खेल सै। म्हारी किस्मत मैं पूंजी लाना सै तो मुनाफा कमावण का अधिकार भी म्हारा सै। इस मुनाफे पै अधिकार पूंजी के मालिक का होगा। फेर असल बात तो या सै अक पूंजी तो मेहनत तै पैदा हुई अर मालिक नै कदे मेहनत नहीं करी तो इस मुनाफे आली पूंजी पर हक तो मेहनत करने आले का सै। पर न्यों कह्या जावै सै अक या पूंजी हमें भगवान नै दी सै उपयोग करने की खातर। हम कहते हैं कि या पूंजी थामनै अर थारे पुरखों नै मेहनत करने वालों के द्वारा पैदा करी औड़ मुनाफा लूट-लूट कै इकट्ठा करी सै। इस मुनाफे इस लूट की पूंजी का हकदार मालिक कदे नहीं हो सकता। यह बात मेहनतकश कै समझ आज्यागी उस दिन समाज का रंग रूप बदल ज्यागा। टिकाऊ विकास अर समतावादी समाज का आधार फेर तैयार होवैगा। किसान भारत का फांसी खावण नै मजबूर नहीं होवैगा।
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म्हारी शिक्षा - सोचां किमै

म्हारी शिक्षा - सोचां किमै
सत्ते फत्ते नफे कविता सविता सरिता अर ताई भरपाई शनिवार नै फेर कट्ठे होगे। सत्ते बोल्या - बहोत बढ़िया करया सरपंच नै। स्कूल कै ताला जड़ दिया। फत्ते बोल्या - क्यूं जड़ दिया? कविता बोली - रिजल्ट दसमी का पांच परसैंट आया सै। नफे बोल्या - और के, ये मास्टरनी आज्यां सैं रोहतक तै अर स्वैटर बुनें जावैं सैं। बालकां नै पढ़ावण की कड़ै फुरसत सै। सरिता बोली - फलाने गाम मैं तो एक बी मास्टरनी कोन्या स्कूल मैं फेर रिजल्ट तो उड़े का बी तीन परसैंट सै। उड़ै बी ताला लागना चाहिये। उड़ै कम रिजल्ट क्यूं रैहग्या? नफे बोल्या - उस गाम के स्कूल का तै इन शहरियां नै सत्यानाश कर दिया। न्यों कहवैं सैं जै ये गामां के बालक पढ़ा दिये तो म्हारे बालकां नै नौकरी कोन्या थ्यावै। ज्यां करके पढ़ात्ते ए कोन्या गाम आल्यां नै। कविता बोली - नफे बात किमै जंची नहीं। फलाने गाम मैं तो एक बी शहरी मास्टर कोन्या फेर रिजल्ट उड़े का बी छह परसैंट सै। सारे गामां आले रलदू मास्टर सैं उस स्कूल मैं तो। नफे सिंह कड़ै हार मानण आला था, बोल्या - उस गाम मैं मेरे मामा सैं। मामा का छोरा बतावै था अक उड़ै जाट अर बाह्मणां के बीच मैं लाठा बाज रहया सैं। जाट कहवैं ये बाह्मण ना पढ़ात्ते अर हैडमास्टर बी बाह्मण सै अर बाह्मण कहवैं सैं अक ये जाट मास्टर कोन्या पढ़ात्ते। दो जाट मास्टर सैं ऊधम तार राख्या सै स्कूल मैं। दारू पीवैं स्कूल मैं बैठ कै अर दूसरी कुबध करैं वे न्यारी। सत्ते बोल्या - इसे करकै मनैं तो अपने बालक गाम के स्कूल मैं तै काढ़ के परले गाम आले माडल स्कूल मैं भेजने शुरू कर दिये। ताई भरपाई बोली - तनै तो काढ़ कै माडल स्कूल मैं भेज दिये। तेरा तो चौखा ब्यौंत सै। फेर म्हारे बरगे के करैं दो किल्यां आले। सविता बोली - थारै तो ताई दो किल्ले सैं बी जिनकै धरती सै ए कोन्या अर कोए नौकरी ना वे कड़ै खंदावैं अपने बालकां नैं? सरकारी स्कूलां मैं तो ये म्हारे बरगे दलितां के बालक सैं कै गरीब जाट बाह्मणां के। इसे करकै किसे नै चिंता कोन्या स्कूलां मैं पढ़ाई की। प्राइवेट स्कूल हर गाम गेल्यां दो-दो, तीन-तीन होगे। उननै अपनी फीस तै मतलब सै अर कै बालकां की ड्रैस तै मतलब सै। इम्तिहान मैं बालकां नै नकल मरवाकै रिजल्ट बढ़िया कढ़वा लें सैं अपने स्कूल का। ताई भरपाई बोली - हम इनकै ताले लाकै के करना चाहवां सां? कमलू मास्टर जी बतावै या अक जितने छंटे औड़ मास्टर सैं अर, ये लैब आले सैं कै और क्लर्क सैं उनके तार तो ऊपर ताहिं फिट होरे सैं अर जो पढ़ावणिया मास्टर सै उनकी कोए सुणता कोन्या कै वे चुप रहवैं सैं। इस मारे मामले नै समझण खातर और पैनी नजर चाहिये अक म्हारे स्कूलां का इतना बुरा हाल क्यूं होग्या? सविता बोली - ये तो बीमारी के लक्षण सैं असल बीमारी की जड़ तो किते और सै। नफे बोल्या - दूसरयां नै दोष देवण तै पहलम हमनै अपणे गिरेबान मैं भी झांक कै देख लेना चाहिये। ये छोर-छोरियां के स्कूल न्यारे होने चाहिये। म्हारे कुछ भाई तो बहोत पहलम तै न्यों कहत्ते आये सैं। कविता बोली - नफे इन भाइयां नै महिला की शिक्षा का प्रचार तो खूब करया फेर सह-शिक्षा का विरोध करकै हरियाणा का नुकसान बी बहोत करया। नफे सिंह तो फूट पड़या - कविता या बात सही सै उनकी इस सह-शिक्षा नै बिगाड़ फालतू करया सै। स्कूलां मैं बलात्कार? कविता बी अड़गी अर बोली - सह-शिक्षा का विरोध गलत सै। औरत तो आज घरां मैं भी सुरक्षित कोन्या। घरां मैं भी उनके सगे संबंधियां धोरै बलात्कार की शिकार होवै सै औरत। न्यों तो औरत कित जा? एक सर्वे मैं तो था अक 52 प्रतिशत बलात्कार जानकार अर रिश्तेदारां द्वारा करे जावैं सैं। बीर-मरद नै नयारे-नयारे करकै किसी दुनिया बनाना चाहवां सां आपां? ये बिगाड़ के कारण टोहने पड़ैंगे अर औरत ताहिं बराबरी का दरजा देना ए पड़ैगा। एक नया समाज जड़ै बीर-मरद कान्धे तै कान्धा मिला कै समाज का विकास करैं, बनाना जरूरी सै अर वो बेहतर शिक्षा अर सह-शिक्षा बिना संभव कोन्या। नफे सिंह बोल्या -कविता, माड़ी सी डट। पूरा भाषण दे दिया तनै तो। फेर या बी ठीक नहीं वा बी ठीक नहीं, ठीक के सै न्यों तो बताओ। कविता बोली - इतनी जल्दी क्यू कररया सै।
पहलम गलत के-के सै इसनै तो आच्छी ढाल समझ ल्यां ठीक के बारे मैं जिबै तो पड़ताल करी जा सकै सै। फत्ते बोल्या - तो के करां इन स्कूलां का सुधार क्यूंकर हो? कविता बोली - सारे गाम मां तै अर हर कौम मां तै बढ़िया माणस अर औरत छांट कै एक निगरानी कमेटी बनावां ग्यारा मैम्बरां की जिसमैं पांच महिला जरूर हों। गलत-सही के आधार पै जातपात, लिंग भेद अर अमीर-गरीब के भेद तै ऊपर उठकै या कमेटी स्कूल के बारे मैं किमै सोंचै तो किमै बात बण सकै सै। न्योंए एक-दूसरे पै दोष मढ़कै हम बीमारी की सही रग कोन्या पकड़ पात्ते।
ताई भरपाई बोली - हां, वे ज्ञान-विज्ञान आले बी एक दिन कैहरे थे अक शिक्षा जगत नै भी मुनाफे की नजर तै देखण की ललक नै आज म्हारे देश मैं गैट के रास्ते प्रशस्त कर दिये सैं। इब योहे तय करैगा अक नागरिकां नै कैसी अर कितनी कीमत चुकाकै शिक्षित किया जावै।

म्हारी खेती वैश्वीकरण की गिरफ्त मैं

म्हारी खेती वैश्वीकरण की गिरफ्त मैं
अखबारां मैं खबर छपी अक छाछरोली मैं 1000 एकड़ तै फालतू धरती मैं जरोटा की खेती करण की खातर उन गामां की पंचायतां तै बदेशी कंपनियां नै सीधा एमओयू साइन करया सै। वाह रै म्हारे देशभक्त देशवासियों! पहलम तै हरियाणा मैं मुश्किल तै धरती नीलाम होवण तै बचाई थी किसान की। ईबकै बेरा ना के हो? बदेशी कंपनियां कै गहणै धरण लागगे धरती नै लोग बिना आगा-पाछा देखे। अर यू म्हारे देश का नहीं घणखरे देशां का यू हाल सै। खेती करना लगातार महंगा होत्ता आवै सै। खेती मैं काम आवण आली चीजां के ज्यूंकर पानी, खाद, बीज अर बिजली के दाम लगातार बधते जावण लागरे सैं। अर इन सब पर तै किसान की पकड़ खत्म होत्ती जावण लागरी सै। घणखरे देशां मैं खेती तै पैदा होवण आले उत्पादां की कीमतां मैं बढ़ोतरी की रफ्तार बहोत धीमी सै। इसतै खेती लगातार घाटे का धंधा बनती जावण लागरी सै। पूरी दुनिया का किसान इस घाटे करकै कर्जे के चक्रव्यूह मैं फंसता जावण लागरया सै। (म्हारी सरकार नै भी भारत के किसान ताहिं करजे देवण खातर बजट बढ़ाया सै)। बैंक, वित्तीय संस्थाएं, स्थानीय साहूकार अर अंतर्राष्ट्रीय साहूकारां नै (विश्व बैंक बरगे) कर्जे का इसा सिलसिला शुरू करया सै जिसके चक्रव्यूह मैं किसान फंस लिया पूरी तरियां।
किसानां मैं बढ़ती आत्म हत्यावां की प्रवृति इसी नजर तै देखे जावण की जरूरत सै। पूरी दुनिया मैं छोटा किसान लगातार अपनी जमीन तै बेदखल होवण लागरया सै। या बेदखली दो तरियां होवण लागरी सै। एक तै किसान छोटी जोत नै अलाभकारी मान कै खुद बेच्चण लागरया सै अर दूसरे कान्हीं विकास के नाम पै इन देशां की सरकार उनकी धरती नै अवाप्त (एक्वायर) करकै उननै जमीन तै बेदखल करण लागरी सै। पूरी दुनिया का किसान इस बख्त आंदोलनरत सै। किते पानी के सवाल पै, कितै बिजली के सवाल पै, कितै फसलां के बाजिब दामां पै, कितै सरकार की किसान विरोधी नीतियां के नाम पै। सोच्चण की बात सै अक दुनिया भर मैं खेती अर किसानां की गेल्यां इसा क्यों होवण लागरया सै। आखिर इन सारे देशां मैं अर खास करकै तीसरी दुनिया के देशां मैं इसा के घटण लागरया था सै अक जिसतै किसानां के साहमी जीवन का संकट पैदा होग्या। इस बात की गहराई मैं जाकै समझण खातर हमनै विश्व व्यापार संगठन, विश्व बैंक अर इसीए और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थावां के क्रियाकलापों की जानकारी लेना बहोत जरूरी सै। इन संस्थावां की नीतियां के कारण ईब पूरी दुनिया के गरीबां अर किसानां के साहमी जीवन का संकट आण खड़या हुया। किमै सुणैगा डब्ल्यूटीओ के बारे मैं अक ताश खेलें जावैगा।
यूं तेरा अर म्हारा अहदीपना बी इसकै खूब सूत आरया सै। विश्व व्यापार संगठन द्वारा बनाये गये कानून सबतै ऊपरले कानून सैं आज दुनिया मैं चाहे ये पूरी दुनिया के देशां के हितां के खिलाफ क्यूं ना हों। इसके मैम्बर देशां की संसद बी विश्व व्यापार संगठन कै साहमी बौनी होगी। इन मैम्बर देशां धौरे दो राह सैं इब - कै तो विश्व व्यापार संगठन के कानूनां नै मानकै अपने देश की जनता के जीवन का संकट बधात्ते रहवां। दूसरा राह सै अक इस विश्व व्यापार संगठन तै बाहर कूद जावां। इस करकै बाहर आये देश नै हो सके सै कुछ आर्थिक प्रतिबंध झेलने पड़ैं फेर सहज-सहज देश सही राह पै आज्यागा अर जवान पीढ़ी तबाह होवण तै बच ज्यागी। म्हारे भारत नै कूद मारदा देख कै हो सकै सै दुनिया के और गरीब देश बी कूद कै बाहर आ ज्यावैं इस डब्ल्यू टी ओ तै। ना तै भाई विश्व व्यापार संगठन का दायरा बढ़ता जावण लागरया सै अर ईब बौद्धिक सम्पदा, शिक्षा, स्वास्थ्य, बीमा, बैंक, पानी आदि घणखरी चीजां का ब्यौपार हो सकैगा जो ईब ताहिं नहीं हुआ करदा। जै किसे देश की सरकार कै उस देश का कानून इस ढाल के चीजां के ब्यौपार पै रोक लावैं सै तो उस देश नै अपना कानून बदलना पड़ैगा। अर सोने पै सुहागा यो अक जिब कदे अंतर्राष्ट्रीय ब्यौपार अर देशी कानूनां मैं कोए कानूनी झगड़ा होगा तो उसका निराकरण विश्व ब्यौपार संगठन का विवाद निपटारा आयोग करैगा जो किसे बी देश के उच्चतम न्यायालय तै ऊंचा होगा। आई किमै समझ मैं?
म्हारे सत्यानाश की जड़ यू डब्ल्यूटीओ सै। कई इसके हिमायती बी पावैंगे म्हारे बीच मैं। वे क्यूं सैं इसके हिमायती इसपै बी गहराई तै सोच्चण की जरूरत सै। अमरीका की सरकार कै बाकी विकसित देशां की सरकार बदेशी कंपनियां के हित साधण मैं लागरी सैं। डब्ल्यूटीओ की बैठकां मैं ये सरकार इन कंपनियां ने फालतू तै फालतू मुनाफा दिवावण आले कानून पास करवावैं सैं। जै विश्व व्यापार संगठन के बणे पाछै के दस सालां का लेखा-जोखा जोड़ कै देख्या जावै तो या बात साबित करी जा सकै सै अक विश्व व्यापार संगठन नै जमा बड्डी-बड्डी बहुराष्ट्रीय कंपनियां ताहिं फालतू तै फालतू मुनाफा दिवावण की दिशा मैं ए कदम बढ़ाये सैं।
कुछ लोगां का यू भी ख्याल सै अक इसकै भीतर रैहकै किसानां के हक की लड़ाई लड़नी चाहिए भारत नै। सौ का तोड़ यो सै अक इस डब्ल्यूटीओ की किसान विरोधी अर गरीब विरोधी नीतियां कै खिलाफ कठ्ठे होकै भीतर बी लड़ना पड़ैगा अर बाहर बी लड़ना पड़ैगा। अरै फांसी खा कै मरण तै तो आच्छा सै इस डब्ल्यूटीओ कै दूण मारकै मरां आपां। आण आली पीढ़ी का बचाव इस तरियां हो सकै सै। ना तो हमनै तो मरना ए मरना सै अर या जवान पीढ़ी बी हमनै गाल बकैगी अर म्हारे की ढाल फांसी खाकै कै सल्फास की गोली खाकै आत्महत्या बड़े पैमाने पै करैगी। करो मिलकै किमै जुगाड़ म्हारी खेती नै वैश्वीकरण की गिरफ्त मैं तै काढण का। जै आपां सारे मिलकै सोचां तो किमै ना किमै राह गोन्डा काढ़ सकां सां आपां। निराश हो कै हाथ पै हाथ धरकै बैठण की बात नहीं सै। कहया सै ना अक ‘जहां चाह उड़ै राह’।

आरक्षण तै नफरत क्यों ?

आरक्षण तै नफरत क्यों ?
उच्च शिक्षण संस्थावां मैं पिछड़यां की खातर केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री अर्जुन सिंह की आरक्षण की घोषणा नै देश भर मैं तूफान सा ल्या दिया। यो तूफान समझ मैं आवण की बात तो सै फेर इसके करकै सामाजिक वैमनस्य अर विभेद की जो परतें खुली सैं उनतैं भविष्य की एक डरावनी अर भयानक तसवीर तो साहमी दिखाई दी सै। सवर्णां की ये अभिव्यक्तियां भारत के समाज के संघटन के प्रति घणी चिंता पैदा करण आली सैं। मेरे हिसाब तैं ये आण आले दिनां मैं के होगा भारत मैं उसका ट्रेलर तो जरूर सैं। या भी बात साफ होगी अक एक विभेदपरक सामाजिक संरचना मैं वंचितों नै आगे ल्यावण की कोए भी कार्यवाही निरापद नहीं हो सकती। जिननै ईब ताहिं इस समाज पै अपणा कब्जा जमा कै राख्या सै उनके पेट मैं दरद तो जरूर होवैगा। वर्ण व्यवस्था पै जिस हिन्दू समाज की नींव हो तो म्हारे बरगे तथाकथित ऊंची जाति के लोग इस आरक्षण नै क्यूंकर गले तै नीचै तार सकैं सैं? मेरे हिसाब तै हम इन्हीं दलितां की वंचितां की मेहनत की कीचड़ मैं उगे औड़ कमल के फूल सां। देश की आबादी की 18 प्रतिशत ऊंची जातियां का आज भी 85 प्रतिशत सरकारी सेवावां पै कब्जा सै अर वे देश की 90 प्रतिशत संपत्ति की स्वामी सैं।
शहीदे आजम भगत सिंह नै तो फांसी तै पहलम जेल की मेहतरानी के हाथ की रोटी खावण की इच्छा जाहिर करी थी। उसका कहना था अक मेरी मां नै तो बचपन मैं मेरी गंदगी साफ करी थी परन्तु या तो मेरे बड़े होवण पै भी मेरी गंदगी साफ करती रही सै इस करकै इसका दरजा मेरी मां तै भी ऊंचा सै। काश! हम भगत सिंह तै कुछ सीख ले पान्ते। इसे करकै निश्चित रूप तै इस प्रक्रिया मैं सामाजिक अन्तः संघर्ष और द्वंद्व तो उभरैंगे। फेर बौद्धिक अर आधुनिक कहे जावण आले सवर्ण तबके की तरफ तै जिसी प्रतिक्रियाएं आवण लागरी सैं उनतै इसा लागै सै अक यथास्थिति नै ताड़ण की माड़ी सी कोशिश भी बहोत घणी बिचलनकारी सै। इस प्रसंग नै वीपी सिंह द्वारा मंडल कमीशन नै लागू करण के दस साल पहलम के उस बख्त की बहस फेर ताजा कर दी। इसे करकै इसके विरोधी इसनै मंडल-दो का भी नाम देवैं सैं। कई नए सवाल बी खड़े करे सैं। इन बहसां मैं प्रतिभा, योग्यता अर स्तर नै लेकै उठे कुछ बेमानी सवाल सैं जिनके पाछै कोए वैज्ञानिक तर्क नहीं सैं। खास बात या सै अक ये सवाल और घणे जोर शोर तै ठाये जावण लागरे सैं। कोए बूझै रामायण किसने लिखी? महाभारत किसनै लिखी? कबीर कौण था, रैदास कौन था ?
एक शिकायत या बी करी जा सै अक सरकार नै प्रारंभिक शिक्षा का स्तर क्यूं नहीं सुधार्या? कितना बढ़िया होन्ता जै या शिकायत पूरे दमखंम की साथ दस-बीस साल पहलम ठाई जान्ती। न्यौ बी कहवैंगे अक ईब छुआछूत कड़ै सै? तो पूनम अर उसका पति इन खाप पंचातियां तै क्यों ल्हुकते हांडैं सैं? दस एमबीबीएस करैं औड़ सवर्ण डाक्टरनी 10 दलित डाक्टरां तै ब्याह तो करकै दिखावैं जै छुआछूत खत्म होगी सै तो। फेर न्यों कहवैं सैं अक आरक्षण आले घटिया डाक्टर बणैंगे। कोए बूझणिया हो इम्तिहान तो सार्यां खातर एकसा हो सै। इम्तिहान के नंबरां मैं आरक्षण कोन्या। तो जै घटिया डाक्टर कोए बनै सै तो वो तै इम्तिहान लेवणियां का कसूर हुया। बाकी इसमैं कोए शक नहीं अक सामाजिक न्याय का मामला गंभीर सै। बाबू जगजीवन राम नै एक मूर्ति का उद्घाटन कर्या था तो बाद मैं वा गंगा जल तै धोकै पवित्र करी गई थी। क्रीमी लेयर की बी बात खूबै आई सै। दलित के आरक्षण तै जो दो च्यार परसैंट लोग आये सैं वे भी जाते रहवैंगे। पिछड़ा वर्ग मैं या क्रीमी लेयर की बात थोड़ी बहोत सोची जा सकै सै। सवर्णां मैं कमजोर तबक्यां खातर बी आरक्षण की बात सोची जानी चाहिए। प्राइवेट कालेजां मैं अर प्राइवेट सेक्टर मैं बी आरक्षण की बात सोचनी चाहिये। पब्लिक सेक्टर मैं नौकरी बचीए कोन्या। एक बै एक डाक्टर अर एक इंजीनियर एक बस मैं सफर कैरैं थे। एक सीट पै बैठे थे। डाक्टर बोल्या यू शीशा बंद करदे मेरै जुखाम होर्या सै। इंजीनियर बोल्या - मैं तो खुल्या राखूंगा। मनै गर्मी लागै सै। दोनूं झगड़ पड़े। कंडक्टर आया अर बूझ्या के बात क्यूं झगड़ो सो? डाक्टर बोल्या - शीशे पै रोल्ला सै। यू कहवै सै खुल्या राख मैं कहूं सूं बंद करदे। तो कंडक्टर बोल्या - पहलम न्यों तो देखल्यो शीशा सै बी अक नहीं। शीशा कोन्या इस खिड़की मैं।
सौं का जोड़ यो सै अक केरल नै विधानसभा मैं एक बिल पास कर्या सै इस आरक्षण नै ले कै उस पै गौर कर्या जाना चाहिए। बख्त की नजाकत समझणा बहोत जरूरी सै।