सोमवार, 26 सितंबर 2016

प्यार हो तै इसा हो

प्यार हो तै इसा हो
हरियाणा नै लागै सै प्यार तै बहोत घणी नफरत सै। ज्याहें तैं प्यार करने वालों को फांसी के फंदे पै चढ़ान्ते हरियाणा आले वार कोन्या लान्ते। इतिहास मैं कुछ इसे प्रेमी हुए हैं जिनकी मिशालें आज भी दी जाती हैं। उन्हीं में से एक जोड़ी थी सोहनी महिवाल की। पंजाब में चिनाब नदी के कांठे पर तुला कुम्हार के घर लड़की का जन्म हुया। माता-पिता नै उसका नाम सोहनी रख्या जिसका मतलब ए खूबसूरत होसै। जैसे-जैसे वह बड़ी होती गई, उसकी खूबसूरती के चरचे दूर-दूर तक फैलते गये।
एक दिन इज्जतबेग नाम का एक सौदागर बर्तन खरीदण बुखारा से चलके पंजाब आया। उसनै तुला के बर्तनों की तारीफ सुनी थी। इसलिए वह उसके घर पहुंचा। तुला ने सोहनी से उसे बर्तन दिखाने के लिए कहा। बड़े अदब के साथ सोहनी ने बर्तन दिखाये। इज्जतबेग बर्तन क्या देखता, वह तो सोहनी को देखकर ही होश खो बैठा। एकटक उसे ही देखैं गया। सोहनी बोली - ‘बर्तनों को देखो सौदागर। इनमें से जो पसंद हों एक तरफ रखता जा।’ ‘हां-हां! थाम बर्तन दिखाओ।’ इज्जतबेग हड़बड़ा के बोल्या। फिर सोहनी उसे बर्तन दिखाती गई अर वो उन्हें एक तरफ रखता गया। जब वह तुला के घर से निकला तो उसके पास बर्तनों की भारी गठरी थी। इज्जतबेग सोहनी का दिवाना होग्या। उसनै शहर में एक दुकान लेली। अपने मुल्क उल्टा जावण का इरादा छोड़ दिया। वह रोजाना महंगे दामां पै सोहनी से बर्तन लेकै आन्ता और सस्ते दामों पै उननै बेच देन्ता। एक बख्त इसा आया के उसके सारे पीस्से खत्म होगे। अब सोहनी से मिलने का कोए बहाना नहीं बच्या। वह तुला के पास पहोंच्या और बोल्या - ‘मेरी जमापूंजी खतम होली। इस परदेश मैं मेरा कोए नहीं। मनैं अपने घर मैं नौकर राख ले। ‘तुला ने इज्जतबेग को भैंस चराने और उनकी देखभाल करने का काम सौंप दिया। उसे दिन तै लोग उसनै महिया मतलब भैंसों की देखभाल करने आला महिवाल कहकै पुकारण लाग्गे।
महिवाल को सोहनी के पास रहने का मौका मिलग्या। ज्यादा से ज्यादा वक्त दोनों साथ बितावण लाग्गे। कद उनकी दोस्ती प्यार मैं बदलगी उननै बेरा ऐ कोनी पाट्या। ईब वे एक-दूसरे के बिना एक पल भी नहीं रह पाते थे। लोग सोहनी महिवाल के प्यार की बात करने लगे। ये बात तुला के कानों तक भी पहुंची। उसने महिवाल को घर से बाहर निकाल दिया। प्यार के किस्से को खतम करने के लिए सोहनी की जबरदस्ती शादी करदी। महिवाल ने चिनाब नदी के पार एक झोंपड़ी बना ली। वह रात दिन सोहनी की याद में डूबा रहता। दूसरी तरफ सोहनी भी उसकी याद में आंसू बहाती रहती। जब और रहा नहीं गया तब एक दिन भिखारी बनकर महिवाल सोहनी की ससुराल आया। सोहनी ने उसकी आवाज पहचान ली। वह भागती हुई दरवाजे पर गई और उसे घर में खींचकर उसके गले लग गई। वायदा किया कि रात को उससे मिलने झोंपड़ी में आयेगी।
सोहनी रात में छिपती-छिपाती चिनाब के किनारे पहुंची। नदी पार करने के लिए उसने झाड़ी में पहले ही एक पक्का घड़ा छिपा दिया था। कारण यह था कि उसे तैरना नहीं आता था। वह उलटे घड़े के सहारे तैर कर नदी पार महिवाल के पास पहुंच गई। हर रात सोहनी इसी तरह नदी पार करती। दोनों प्रेमी एक-दूसरे का साथ पाकर दुनिया को भूल जाते। एक दिन उसकी ननद ने उसे जाते देख लिया। उसे बर्दाश्त नहीं हुआ। उसने उसकी झाड़ी से पका घड़ा निकाल कर उसकी जगह कच्चा घड़ा रख दिया। रात नै कच्चा घड़ा देख कै सोहनी चौंकगी। पक्का घड़ा ल्यावण का बख्त नहीं था उसके पास। महिवाल से मिले बिना वह रह नहीं सकती थी। वह कच्चे घड़े पर नदी पार करने का खतरा जानती थी। फिर बी उसने नदी पार करने का फैसला किया। नदी में उतरने के कुछ देर पाछै घड़े की मिट्टी पानी में घुल्लण लाग्गी। घड़े के साथ ही सोहनी नदी में डूबने लगी। उसने महिवाल को आवाज लगाई।
चिनाब किनारे महिवाल उसका इन्तजार कर रहा था। सोहनी की आवाज सुनते ही वह उसे बचाने के लिए नदी में कुद पड़ा। पर देर हो चुकी थी। सोहनी लहरों में समा चुकी थी। सोहनी के बिना उसका जीवन बेकार था। महिवाल तैरते हुए वहां पहुंचा जहां उसने सोहनी को डूबते देख्या था। सोहनी का शरीर उसकी बांहों में आ गया। उसने सोहनी को कसकर पकड़ लिया और नदी की गहराई मैं समाता चाल्या गया। आज बी घणे ऐ सोनी महिवाल सैं जो ज्यान की बाजी लाकै बी अपने प्यार नै अमर करण लागरे सैं। फेर हमनै तो ये म्हारी संस्कृति के दुश्मन दीखैं सैं। भला क्यों?
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