सोमवार, 26 सितंबर 2016

चाल हरियाणे की

चाल हरियाणे की
हरियाणा के गठन के बाद पाछले 40 बरसां मैं हरियाणा मैं अभूतपूर्व बदलाव आये सैं। पिछड़ी खेती, परम्परागत उद्योग धण्धयां की साथ सीमित व्यापार पै टिकी हरियाणा की अर्थ व्यवस्था पै इस बीच लाम्बी छलांग लाई सै। अर प्रदेश पै देश के नम्बर वन प्रदेश के रूप मैं उभरण की कोशिश करी सै। आज हरियाणा उतर भारत मैं हरित क्रान्ति, तेजी से विकसित होन्ते उद्योग धन्धों अर व्यावसायिक गतिविधियों के केन्द्र के रूप मैं अपनी पहचान बणा चुक्या सै। फेर इस बाजार व्यवस्था के चालते जो विकास हुया सै इसतै समाज मैं आर्थिक विभाजन भी तेज रफतार तैं बढ़या सै। आर्थिक, सामाजिक अर ज्ञान की खाई और चौड़ी होन्ती जावण लागरी सै। कृषि के बढ़ते मशीनीकरण के साथ परम्परागत जजमानी प्रथा बोझ बनती चाली गई। किसान अर कारीगर अर दूसरे परम्परागत पेश्यां मैं लगे लोगों कि रिश्ते बी बदलते गये । जजमानी प्रथा टूटती चाली गई। एक कान्हीं दिहाड़ीदार मजदूर ने जनम लिया तै दूसरे कान्हीं कारखान्यां/ फैक्ट्रीयां मैं बनने आले कृषि के औजारां की मांग बढ़ती गई। खेती की बढ़ती पैदावार नै एकबर तो छोटी जोत्यां के किसानों को भी लाभ देना शुरू कर दिया। इसका फल यू हुया अक समाज मैं संयुक्त परिवारां की जरूरत कम होवण लागगी। सहज सहज ये भी टूटण लाग्गे। इस खेती के विकास की साथ चौथरफा पैदावार बढ़ी। बड्डे किसानां का धनी वर्ग पैदा होण लाग्या। धनी किसान, अफसरशाही, ठेकेदार अर मध्यम वर्ग उभरते गये। नई नई उपभोग्ता वस्तुआं की मांग बढ़गी। बाजार व्यवस्था का विस्तार हुया। उद्योग, व्यवसाय, यातायात अर संचार मतलब सारे क्षेत्रां मैं विस्तार होन्ता चाल्या गया। सबतै फालतू मेहनत इसमैं वंचित तबक्यां, महिलावां अर छोटे किसानां की थी।
च्यार ढाल के किसान पैदा होगे - धनी किसान, मध्यम किसान, छोटा किसान, अर सीमान्त किसान। इनके हित न्यारे न्यारे होगे। फेर धनी किसान इननै जात के नाम पै कठ्ठै करकेै अपने हित साधण लागरया सै। बेरा ना कद समझ मैं आवैगी छोटे किसान कै या हेरा फेरी। अफसर शाही का ताना बाना बध्या अर मजबूत हुया। कर्मचारी क्लास थ्री तै लेके क्लास ताहिं भरती होए। ठेका प्रणाली के तहत ठेकेदार, कर्मचारी, मालिक, मजदूर, अर प्रवासी मजदूर उभरे। थोक विक्रेता तै लेकै रेहड़ी आले अर फेरी आले उभरे। बड़ी बड़ी ट्रांसपोर्ट कम्पनियां तै लेकै रिक्शा चालकां की लार उभरी अर उसतै बी लाम्बी बेरोजगारां की फौज। जिस अनुपात मैं आर्थिक विभाजन बढया उसे अनुपात मैं शिक्षा अर स्वास्थ्य मैं विषमताएं भी बढ़ण लाग्गी। सामाजिक विषमताएं पहलमैं उफनी हांडै थी। ईब और बी तीखी होगी। सरकारी स्कूलां मैं अर निजी स्कूलां मैं जनता का विभाजन बढ़ता चल्या गया। जिसकै धोरै जितना पीस्सा, उसके बालकां की खातर उसा ए स्कूल। अलग-अलग श्रेणियां के न्यारे-न्यारे स्कूल खुल्लण लाग्गे। सरकारी स्कूलां मैं बालक गरीब के बालक मतलब छोटे अर सीमान्त किसान के बालक अर दलितां के बालक जिनको बहुमत विकास की इस दौड़ मैं पाछै छोड़ दिया गया।
इसका यो मतलब नहीं सै अक इननै अपनी मेहनत का योगदान इस नये हरियाणा के बणावण में कम करया। खूब करया, खूब खून पस्सीना बहाया इन तबक्यां नै। फेर फल कोन्या पहोंचे तबके ताहिं। बीच मैं ए गुलफ लिये ताकतवर नै। हां कुछ लोगां नै आरक्षण का साहरा जरूर मिल्या। फेर इनमैं भी एक अभिजात तबका पैदा हुया पर घणखरे तो पिछड़े ए रहे। याहे हालत स्वास्थ्य के क्षेत्र मैं भी बनी। स्वास्थ्य का ढांचा तो सन् 90-95 ताहिं तेज रफतार तै खड़या करा पर फेर खड़ौत आगी। पूरी जरूरतां के हिसाब तै कोन्या खड़या हो पाया। जो खड़ा भी हुया उसमैं डाक्टरां अर बाकी स्टाफ की कमी बनी रही। नतीजतन इस क्षेत्र मैं भी निजी संस्थावां पर निर्भरता बढ़ती गई अर जिनकी संख्या बढ़ती ए जान लागरी सै। देहात की एकरसता बी टूटी सै। एक कान्हीं आधुनिक सुख सुविधा तै लैस कंकरीट के मकान, बगड़ मैं टैक्टर अर कार खड़े, तो दूजे कान्हीं क्यूकरै पक्की ईंटां का जुगाड़ बिठाकै कच्ची पक्की छतां के मकान। इस बीच मैं शहरां का भी खूब विस्तार हुया सै।
नई नई कालोनियां बणगी। मतलब एक कान्ही तो अधखबड़ा सा, बेतरतीब सा बस्या पुराना शहर/कस्बा तो दूजे कान्हीं खुली सड़क अर नागरिक सुविधावां आला नया शहर। बीच बीच मैं काम धन्ध्यां की तलाश मैं गाम तै आकै शहर मैं बसे लोगां की अनाधिकृत बस्तियां जड़ै नागरिक सुविधावां का जबरदस्त अभाव सै। मतलब साफ सै अक शहरां मैं भी विभाजन और तेज हुया सै। फेर यू घणखरे हरियाणा आल्यां नै कै तो दीखता कोन्या कै वे देखना नहीं चाहन्ते।
चढ़ता हरियाणा, चमकता हरियाणा, फील गुड हरियाणा, नम्बर वन हरियाणा, चक दे हरियाणा अर दूजे कान्ही का हरियाणा म्हारी कलम पै चढ़ण मैं भी दिक्कत आवै सै। हमनै हरियाणा का चित्रण सही सही करण ताहिं शब्द टोहे नहीं पान्ते। सफरिंग हरियाणा, मेहनत करकै बी भूखा मरता हरियाणा, लिंग अनुपात मैं रसातल मैं जान्ता हरियाणा, खाप पंचायतां के फतव्यां पै फांसी पै झूलता हरियाणा, अन्धविश्वासी हरियाणा, स्टोव फटने तै जलकै मरता हरियाणा, बेरोजगारी के रिकाट तोड़ता हरियाणा, दुलिना अर हरसौला काण्ड करता हरियाणा, सेज की भेंट चढ़ता हरियाणा, इसका जिकरा एक नवम्बर आले दिन टोहया बी कोन्या पाया। सारे अखबार साइनिंग हरियाणा तै साइन करते पाये थे। चलो साच्ची कहनिया अर पूरी बात कहनिया बी बसै सैं इबै हरियाणा मैं। आई किमै समझ मैं ?

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