सोमवार, 26 सितंबर 2016

दूध सै, उड़ै पानी बी सै

दूध सै, उड़ै पानी बी सै                                                                               जिस महापुरुष नै अपने ग्रंथां के धरण की खातिर राजगृह जिसा विशाल भवन बनवाया था, उसे नै एक पुस्तक जला दी। क्यों? जिस बुद्धिमान के धोरै लगभग तीस हजार तै भी फालतू कीमत की निजी किताब हों, उसे ने एक दिन एक किताब जला दी, आखिर क्यों? जिस माणस का पुस्तक प्रेम अनेक विद्वानां की खातिर आश्चर्य की बात हो, उसे नै एक दिन एक किताब जला दी क्यों? उस पुस्तक का नाम के था? उसका नाम था - मनुस्मृति। याहे किताब क्यों जलाई? इस जिज्ञासा का समाधान ना करकै आपां अपने अपने पूर्वाग्रहां के हिसाब तै सोच्चण लागज्यां सां इसपै। मनुस्मृति पूरी पढ़कै देखनी चाहिये। इसकी अध्याय संख्या 12 ए सै फेर कई अध्याय इतने बड्डे सैं अक श्लोक संख्या ढाई हजार तै भी ऊपर चली गई।

  वह कौन-सा ग्रंथ सै जिसमें कोए बी बात काम की ना हो? मनुस्मृति बी उसका अपवाद कोन्या। किसे-किसे का कहना सै अक सम्मिश्रण तो हर वस्तु मैं होसै जड़ै दूध सै उड़ै पानी बी सै, फेर मनुस्मृति मैं भी जै कुछ सम्मिश्रण सै तो उसमैं के बात सै। इस पै इतनी आपत्ति क्यों? न्यों कहया जा सकै सै इसके उत्तर मैं अक जै कोए आदमी गलती तै कै जानबूझ कै दूध मैं ए सही, कितै कोए इसी चीज मिलादे जो पीवण आले की ज्यान लेले तो के उस ताहिं साधारण मिश्रण कहकै उसकी उपेक्षा करी जा सकै सै? इसमैं कुछ संदेह की बात नहीं अक चाहे किसे नै भी अर किनहे बख्तां में भी मनुस्मृति का संकलन करया तो उस बख्तां की सारी आच्छी-भुन्डी जानकारी का संग्रह मनुस्मृति मैं हुया लागै सै। आज भी ज्यूकर सामान्य ज्ञान अथवा जनरल नॉलेज की कुछ किताबें तैयार करी जावैं सैं उसी ए या कृति भी लाग्गै सै।
यों भी या कृति किन्हीं मनु महाराज की कृति नहीं लगती क्योंकि इसमें जागां-जागां इस बात की पुनरुक्ति मिलती है अक ऐसा मनु महाराज नै कहया सै। सोच्चण की बात सै फेर या क्यों जलाई गई? इस पुस्तक का रचने आला कोए बी हो, आज के मूल्यांकन की नजर तैं इस किताब मैं इसा कुछ भरया हुया सै अक इसकी मान्यतावां के प्रचलित रहन्ते इस देश में कई मसले खड़े हो ज्यां। कहवण आले कहदे सैं अक, मनुस्मृति अर उसकी आज्ञाएं तो कद की मरलीं। ईब गड्डे मुरदे पाड़न का के लाभ? फेर मनै तो जमा नहीं लागता अक मनुस्मृति मरली। आज भी जड़ै बी धर्मशास्त्र पढ़ाया जावै सै इसे घणखरे विश्वविद्यालयां मैं मनुस्मृति पाठ्य पुस्तक के रूप मैं पढ़ाई जावै सै। असल मैं आज के हिन्दू कोड का मूलाधार भी मनुस्मृति सै। सवाल असली यो सै अक याहे किताब क्यों जलाई? उसे कारण तै या पुस्तक जलाई, जिस कारण तै महात्मा गांधी नै अनगिनत विदेशी कपड़े जलवाये थे। फेर न्यों कहदें सैं एक मरे औड़ सांप कै पाछै क्यों पड़रे सो। उननै या बात कती नहीं दिखाई देन्ती अक इन कुछ ग्रंथां नै तो सुदीर्घकाल से समाज के एक हिस्से विशेष को ही डस राख्या सै। तो फेर के इनकी अन्तयेष्टि यथासंभव करया जाना जरूरी नहीं सै?
गजब की बात सै अक म्हारी सरकार इसी बातां का प्रचार करण आली किताबां नै निरोत्साहित करण की बजाय प्रोत्साहित करती दीखै सै। भारतीय सरकार नै 1969 मैं अछूतपन के बारे मैं सही-सही जानकारी हासिल करने के खातिर पेरुमल की अध्यक्षता मैं एक कमेटी बनाई थी जिसनै भारत के सारे राज्यां का दौरा करया अर जिन बातां का बेरा लाया वे म्हारी आंख खेलण ताहिं भतेरी सैं। अर मैं तो न्यों कहूं सूं अक हरियाणे की कई खूबियां का तो बेरा ए कोन्या ला पाये। हरियाणा के बारे मैं या कमेटी कहवै सै अक - सन् 1968 मैं बंशी-खुरद जिला करनाल की एक अछूत लड़की को जिस समय वह गोबर बटोर रही थी, एक जातीय अभिमानी नै बुरी तरह पीटा। सन् 1968 मै ही अंबाला जिले के फतेहपुर गांव के प्राइमरी स्कूल के एक अछूत टीचर नै पानी पीने के लिए रखे हुए बर्तन में से पानी पी लिया। यह देख मुख्य अध्यापक आग बबूला होग्या। उसनै वह घड़ा और पानी पीने का गिलास दोनों फोड़ दिये।

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