सोमवार, 26 सितंबर 2016

आण्डी नेता

आण्डी नेता
म्हारे हरियाणा की बातै न्यारी सै। आर्थिक तौर पै सबतै आगे अर सामाजिक तौर पै ठन-ठन गोपाल। लिंग अनुपात की खराब हालत नै नाम रोशन कर दिया हरियाणा का। म्हारे नेतागण जिसकी कड़ पै एक बार हाथ फेर दें सैं उस माणस का दिमाग सातमे आसमान पै जा चढ़ै सै कै कतिए काम करना छोड़ ज्या सै, उसकी तर्क करण की ताकत बी खत्म होज्या सै, आच्छे भूंडे मैं फरक करण की शक्ति मारी जा सै, हां मैं हां मिलावण की आदत पड़ज्या सै, देखती आंख्यां माक्खी निगलण की खूब महारत हासिल हो ज्या सै, झोटे की ढालां गश खाणा बी आ ज्या सै। माणस नेता के सम्मोहन मैं घणी कसूती ढालां फंस कै खड़या हो ज्या सै ज्यूकर बस के गेयर बाक्स में गेयर फंस जाया करै। नेता की हर बात नै अपनी चाद्दर के पल्ले कै गांठ मार ले सै। उसकी रीढ़ की हाड्डी कड़ थेपड़ते की साथ बेरा ना कित रफ्फूचक्कर हो ज्या सै और कै पिंघल ज्या सै। ज्यूकर साम्मण के आन्धे नै हरया ए हरया दिख्या करै न्योंए उस माणस नै बी ओए दीखै सै जो उसका नेता उसनै दिखाना चाहवै सै। फेर कुछ बी करवा यो उसपै।
जिसका राज हो सै वे तो अपने कार्यकर्ता नै समझावैंगे अक जो अपणी चालदी मैं नहीं चलावै ओ माणस बी किमै माणस हो सै? सदियां तै यो दस्तूर चालदा आया सै। जिसकी चाली उसनै चलायी। महाराजा अशोक तै हिंदुस्तान का अशोक सम्राट माण्या जा सै फेर गद्दी पै बैट्ठण ताहिं तो उसनै बी अपने तीन चार भाइयां का कतल करवाया ए बताया सै। तो फेर आज के जमाने मैं इस राज-पाट नै डाट्टण की खातर अर कै हासिल करण की खातर बीस-तीस कतल कर दिये जावैं कै करवा दिये जावैं ता के हरजा सै? या तै म्हारी प्यारी पुरानी संस्कृति का सवाल सै। म्हारी आस्था नै ठेस पहोंच सकै सै जै हम बख्त-बख्त पै सौ दो सौ चार सौ माणसां नै धर्म पै कै जात पै लड़वा कै मरवा नहीं दयां।
म्हारे नेता हमनै उकसावण ताहिं हल्दी घाटी की लड़ाई मैं महाराजा राणाप्रताप की बहादरी की तो खूब चरचा करैंगे फेर न्यों कोन्या बतावैं अक उस लड़ाई मैं सबते बहादरी गेल्यां हकीम खां सूर अर उसके अफगान सैनिक लड़े थे। मथरा वृंदावन में मंदिरां खातर एक हजार बीघा जमीन का दान किसने करया था। बेरा सै? सम्राट अकबर नै। मतलब यू सै अक म्हारी साझी संस्कृति को म्हारी साझाी शहादत नै सीच्या सै न्यों कोन्या बतावैं। अर हम बी मोटी बुद्धि के माणस उनकी हां मैं हां मिलावण मैं कती वार नही लान्ते। शाबास रै म्हारे नेताओं तम सम्राट अशोक की साच्ची शुद्ध सन्तान सो।
बिना मैरिट नौकरी दिवावण का झांसा देकै राखणा, बिना मैरिट यूनिवर्सिटी मैं दाखला, बिना मैरिट मैडिकल मैं लैक्चरर अर प्रोफैसर लावणा, रातोंरात करोड़पति बणा देवण का सपना दिखा कै राखणा इस ढाल के सारे गुण सैं म्हारे नेतावां मैं। कायदे कानूनां कै ठोक्कर मारकै घटिया काम कराणियां ताहिं बचाणा, ये सारी चीज ऊपर तै लेकै तले ताहिं सै अर घट्टण की जागां बधती जावण लागरी सैं। इसे नेता आण्डी कै फक्कड़ कहे जावैं सैं। म्हारे मां तै बी कई तो न्यों कहवैंगे अक जे माणस चालती मैं भी नहीं चलावैगा तो फेर नेता बणन की के जरूरत सै। ईब ईसे ढालां सोचणियां माणस आण्डी तै न्यारा के कह्या जा सकै सै? हमनै अपणी समझदाणी पै जोर देकै सोच्चण की तो आपां नै बी सूं खा राखी है। पहली बात तो या सै अक आपां अपणा किसनै समझां सां अर पराया किससै समझां सां। ऊत बलात्कारी, कातिल, सुलफाबाज, काला धन कमावाणिया तै हमनै प्यारा लागै सै इस करकै अक ओ म्हारी जात का सै, ओ म्हारा गोती भाई सै, ओ रिश्तेदारी मैं पड़ै सै। ईमानदार, आम जनता का भला चाहवणिया, साच नै साच अर झूठ नै झूठ कहवणिया, अपने असूलां पै चालणियां माणस हो तै आपां उसनै सूंघते बी कोन्या इस करकै अक ओ अपणी जात का कोन्या, ओ गोती भाई कोन्या। कोए बूझै तो कैहद्यां सां अक ऊत सै तो के सै, सै तो अपनी जात का जिस माणस की फितरत बलात्कारी की होगी ओ जात की छोरियां तै बी बदफेली करैगा अर दूसरी जात की छोरियां गेल्यां बी। ओ नहीं बक्शै किसे जात नै अर फेर बी हम उसनै अपना मानां अर उसपै केस नहीं चालण देवां।
जिस माणस का काम सुलफा बेचण का सै तो ओ योहे काम तै म्हारे बालकां नै भी सिखावैगा। बताओ इसे रिश्तेदार अर गोती भाई नै के कोए चाटै। येहे माणस सैं जो अपने बचण की खातर जात का साहरा लेवैं सैं। हम बी सैड़ देसी कहवांगे अक बात सही सै, अपणा माणस फेर बी किमै तो ख्याल राखैगा ए। हम एक बात कती भूल जावां सां अक इन संकीर्ण जगहावां पर ना पहोंचा कै म्हारी समझ का विकास रोक दिया जा सै। थोड़े घणे लोगां कै तो समझ आवण लागगी अक जात गोत के नाम पै बांट कै हमनै ये नेता म्हारा उल्लू बनावैं सैं। हम टांड पै बिठा राखे सां इन नेतावां नैं। वा टांड आली बात सुनी होगी थामनै - एक बै एक छोरी नै भूख लागरी करड़ी अर वा मां धोरे रोटी मांगै। गरीब घर था। रोटी थी कोन्या। मां नै बहोत समझाई। न्यून-न्यून की बात लाई फेर छोरी नै रोवणा बंद नहीं करया। बातां तै के भूख भाजै थी। मां नै दुखी होके छोरी की पिटाई कर दी। छोरी और जोर से रोवण लागगी। इतने मैं एक पड़ोसन आगी अर वा बोली - ए संतरा बेटी क्यूं रूआ राखी सै। संतरा रोवण नै होरी थी - या रोटी मांगै सै। पड़ोसन बोली - दे क्यूं ना देन्ती रोटी। संतरा - रोटी कोन्या। पड़ोसन सोच कै बोली - तो न्यूं कर इसनै टांड पै बिठा दे। संतरा बोली - टांड पै के रोटी धरी सैं। पड़ोसन बोली - बिठा तो सही। संतरा नै छोरी टांड पै बिठा दी। टांड पै बैठे पाछे रोएं तो गयी फेर रोटियां नै भूलगी। छोटी बोली - मां मनै बस टांड पर तै तले तार दे।
तो आई किमै समझ मैं अक नहीं। इन नेतावां नै अर धर्मगुरुआं नै आपां टांड पै बिठा राखे सां। हम अपनी असली बातां पै रोल्या ना करद्या इस खातर जात गोत, धर्म, आतंकवाद अर बेरा ना के के नाम पै हम टांड पै बिठा राखे सां। पहली बात तो याहे सै अक हमनै टांड पर तै तारणिया कोए नहीं सै, हमनै आपै उतरना पड़ैगा। इन नेतावां कै भरोसै बैठे रहे तो बैठे-बैठे रोवन्ता रैहणा पड़ैगा टांड पर तै तलै आकै हमनै इन नेतावां का खरणा ए बदलना पड़ैगा।

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