शुक्रवार, 6 जनवरी 2017

                         छक्का 
संविधान भारत देश का इसपै काले बादल मंडराए 
संसद म्हारी पढ़न बिठा दी अध्यादेश रोजाना ही ल्याए 
देश की बहुविविधता को तोड़ण के घणे प्रयास करे रै 
हिन्दू मुस्लिम के झगडे करा लोग घने बदहवास करे रै 
बिना बात की बातों पर संघियों नै दंगे खूब करवाए 
किसानी विरोधी कानूनों के बी जे पी नै अम्बार लगाए 



गुरुवार, 5 जनवरी 2017

फायर पै फायर


टीवी मैं देख्या अक सिवसेना के चेले चपट्यां ने बम्बई के दो सिनेमा घरां मैं चलती फिल्म ‘फायर’ के विरोध मैं सिनेमा हाल तोड़ फोड़ दिये अर फायर के हवालै कर दिये। उनकी कार्यकर्ता न्यों बोली अक तोड़ फोड़ हमनै कोण्या करी, या तोड़ फोड़ तै फिल्म देखणियां नै फिल्म ना देखण देवण के बदले मैं करी सै। आगलै ए दिन दिल्ली मैं सांग रच दिया इनके चेले चेलियां नै अर टीवी पै दिखाया अक ये सारे के सारे सूड़यां मंडरे थे सीसे तोड़ण कै अर फिल्म देखणियां तै बाटै देखते रैहगे अक कद म्हारी बी बारी आवै अर हम सीसे तोड़ां। इस फिल्म के सही कै गल्त होण पै बहस हो सकै सै। हो सकै सै इसमैं चुने गए मसले के बारे मैं हम सहमत ना होवां। पर इसे नाज्जुक मुद्दे नै लेकै लोगों की भावनावां गेल्यां यो पाखण्ड आच्छी बात कोणया। जिब सिव सेना आल्यां नै अर उनके नेड़े धोरै आल्यां नै बम्बी मैं माइकल जैक्शन का प्रोग्राम करवाया जिब कित जारी थी या संस्कृति? जिब इनकी पुत्रवधु घटिया नाच गान्यां अर ऊघाड़ेपन आली फिल्म बणावै जिब इनकी या संस्कृति कित बूम्बले खावण चाली जाया करै? जिब रूप कंवर ताहिं जबरी चिता मैं बिठा दिया जा जिब या संस्कृति ‘सती’ की हिम्मत मैं दिल धौली काटकड़ तार कै धरदे तै सही माणस इस संस्कृति के बारे मैं के सोचैगा? दहेज नै अर दहेज हत्यावां नै ये ‘फायर’ पै फायर करणिया ठीक बतावै तो के समझया जा? ये दुनिया भर की मस्त राम की पौण्डी अर कोक शास्त्र सारे हिन्दुस्तान के बस अड्यां पै अटे पड़े रहवैं इसपै कद सी ध्यान ज्यागा?
दूसरी बात हिन्दू संस्कृति की सै तै या हिन्दुस्तान की इकलौती संस्कृति कोण्या। हिन्दुस्तान की संस्कृति तै 2500 हजार साल पुरानी संस्कृति सै। जिस संस्कृति का ये सिव सेना आले अर इनके भाई भतीज टोकरा ठायें हांडैं सैं उसका अर म्हारी प्राचीन संस्कृति का कोए ढब नहीं दिखता। म्हारी पुरानी देस की सांस्कृतिक विरासत मैं वेद बी सैं, उसतै पहलम की संस्कृति बी सै, इसमैं बुद्ध बी सै, इसमैं गुरू नानक बी सै, इसमैं कबीर सै, रैदास सै, रहमान सै, इसमैं जैनी बी सै, इसमैं नास्तिक बी सैं अर आस्तिक बी सैं। इस संस्कृति का इतिहास गवाह सै अक इसमैं जिसनै बी हिटलरी अन्दाज अपणाया उसनै मुंह की खाणी पड़ी।
ईब सवाल यो सै अक जै सिव सेना की भीड़ी समझदानी के नजरिये तै बी देखां अर सही नजरिये तै बी देखां तै बम्बी मैं बाकी जितनी फिल्म बणैं सै तै वे के सारी की सारी इस ‘सो काल्ड’ संस्कृति मैं फिट बैठें सैं? अर फायर फिल्म नै रोकण का यो दहसत भरया, गुण्डई अन्दाज तै हिन्दुस्तान मैं पंजाब के उग्रवादियां की कंपकंपी चढ़ावण आली याद ताजा करवादे सै। उननै भी इस संस्कृति की इसी तिसी करण मैं कसर नहीं घाली। एक कान्हीं तै पश्चिमी संस्कृति नै गाल दे कै फरमान जारी कर दिया अक कोए बी छोरी स्कूलां तैं पीली चुन्नी तै न्यारी कोए चुन्नी नहीं औढैगी। एक स्कूल की हैडमास्टरनी नै इसका विरोध करया तै उसकै गोली मारदी अर दूसरे कान्ही बेरा ना कितनी छोयिां की इज्जत खराब करी थी उसनै। ये ‘फायर’ पै फायर करणिया बी जिब ब्यूटी कम्पीटीसन करवावैं अर माइकल जैक्शन हर नै न्यौतैं तै दूसरी बोली बोलैं अर ईब दूसरी बोलैं सैं।
जनता ईब स्याणी होरी सै अर वा ईसी चालां नै खूब समझण लागली सै। इसे पाखण्ड बहोत देख लिये जनता नै। जनता का सवाल सै अब जिब बम्बी की आधी आबादी फुटपाथां मैं सोवै सै तै इस संस्कृति नै मासा भर भी सरम क्यों नहीं आन्ती? ये रोज धड़ाधड़ कत्ल होण लागरे बम्बी मैं तै या संस्कृति चुप क्यों रहवै सै? जिब बम्बी मैं मुसलमानां पै दंगई हमले करैं अर उननै मौत कै घाट तारदें तै या संस्कृति माणस मारण के फतवे क्यों देवै सै? हां अर इनके हितैसी जैन साहब बताये उननै एक चैनल चलाया था जिसपै घणी अस्लील फिल्म रात नै दिखाई जाया करती तै ये संस्कृति के ठेकेदार न्यों कहया करते अक वे ऊघाड़ी फिल्म तै जिब दिखाई जावैं सै जिब लोग बाग सोले सैं। बहोत हो लिया इस तरां का खिलवाड़ भारत की संस्कृति गेल्यां। म्हारा अपसंस्कृति तै क्यूकर छुटकारा हो? क्यूकर के चाल्या जा उस राह पै? ये लाम्बे मसले सैं। इनपै खूब बहस होनी चाहिये पर एक बात लाजमी सै अक जिब ताहिं देस में ‘ब्लैक मनी’ का बोल बोला सै जिब ताहिं ‘काली संस्कृति’ ‘अपसंस्कृति’ इसनै किमै कहल्यो या रहवैगी। धौली संस्कृति मतलब (‘व्हाइट मनी’) नै ‘काली संस्कृति’ का गुलाम बणकै उसका तलहड्डू बणकै रैहणा पड़ैगा। ‘ब्लैक मनी’ की भ्यां क्यूकर बोलै इसपै फेर कदे सही।



कुत्ता अर माणस


मेरे याड़ी की कार जिब कोठी मैं बड़ली तै उतरती हाणां मनै बूझै लिया, ‘‘कुत्ता तै नहीं पालरे सैं?’’
मेरा याड़ी बोल्या, ‘‘के बात सै? इतना डर क्यों लागै सै कुत्ते तैं?’’ मनैं अपणी बात ऊपर राखण ताहिं जवाब दिया, ‘‘आदमी की शक्ल मैं कुत्ते तै डर कोण्या लागता मनै। उसतै तै मनै निबटना आवै सै। पर साच माच के नसली कुत्ते तै बहोत डर लागै सै।’’
असल मैं कुत्त्यां आले घर मनै आच्छे कोण्या लागदे। कुत्ते आले घरां मैं सबतै पहलम कुत्ता स्वागत करैगा भों भों करकै। तुड़ाइया कर देगा छाती पै चढ़ण खातर। घरक्यां तै ‘राम रमी’ तै हुई ना होन्ती फेर कुत्ता गाली देवण लागज्या सै।’’ आया स्साला बटेऊ। सिफारिस करवानी होगी कै रिश्वत देणी होगी। भाजज्या आड़े तै।’’ इसा लागैगा जणों भों भों करकै ओ नसली कुत्ता म्हारे भीतर की बात जाण कै हमनै नसीहत करण लागरया हो। मनै तो कुत्ते के काटण का सिंह के टपके तै भी फालतू डर लागै सै। असल मैं डर सै उन चौदा टीक्यां का जो डाक्टर पेट मैं घुसेड़ै सै। वरना तै कुत्ते के काटण तै कोण डरै सै चाहे दो बर बुड़का भर ले कुत्ता तै। आजकाल पेट की जागां बांह मैं लागण आले टीके आगे। पर पेट आले टीके तै मुफ्त लाग्या करते। पर ये बांह आले टीके तै तीन सौ रुपइयां का एक लागै सै अर सात लुआणे पड़ैं सैं। यो टीका तै पूरे कुण्बे पै मार करै सै।
फेर एक बात देखण मैं आवै सै अक कुछ माणस तै कुत्ते तै भी जहरीले हों सैं। एक माणस कै कुत्ते नै दांत गड़ा दिये। दूसरा बोल्या, ‘‘बस मिर्च बान्ध द्यो इसकै। बाकी कुछ ना होवै। उस कुत्ते की सम्भाल करो, इसका कुछ नहीं बिगड़ैगा। टीके लुआणे सैं तै उस कुत्ते कै लुआओ। कई बै कइयां के घरां के दरवाज्यां पै लिख्या पावैगा अक कुत्यां तै सावधान। ईब बेरा ना उन घरां मैं माणस रहैं सैं अक निरे कुत्ते ए रहवैं सैं? यो सवाल खामैखा का सवाल कोण्या। कोए कोए माणस तै कुत्ते तै बी गुजरया हो सै। किसे विचारक नै लिख्या सै अक जै थाम किसे कुत्ते नै रोटी खवा द्यो तै ओ थामनै कोनी काटै। माणस मैं अर कुत्ते मैं योहे असली फर्क सै। माणस सब किमै खाकै बी कितने बुड़के भरदे इसका कोए भरोसा नहीं।
म्हारे पड़ौस मैं एक साहब सैं उनका सै झबरू कुत्ता। ऊंची कद काठी, काला भूरा रंग, कान खड़े, लाम्बी पूंज। उस ताहिं तीन किलो दूध रोज का प्याया जा सै। म्हारे घरां हम पांच माणस सां ढाई किलो दूध हांग्या पुगै सै। 50-60 करोड़ माणस तै म्हारे देस मैं इसे बी होंगे जिनका ब्यौंत एक किलो रोज का दूध लेवण का भी कोण्या। उस अलसैसन कुत्ते ताहिं हफ्ते मैं तीन किलो मीट ख्वाया जा सै। म्हारे घर मैं तै आज ताहिं मीट बण्या ए नहीं सै बस कितै पार्टियां मैं दां लाग ज्या तै मुर्गे की एकाध टांग थ्याज्या सै। कम तै कम 70-80 करोड़ माणस तै इसे होंगे जिननै मुर्गी खाकै देखण का मौका ए ना मिल्या हो।
एक बै यो अलसैसन बीमार होग्या तै सारे कुण्बे के पासने पाटरे कदे इस डाक्टर नै बुला अर कदे उस डाक्टर नै बुला। कुत्ते के खाज की बीमारी होगी थी। बड़ी मुश्किल तै काबू मैं आई। दसियां हजार का बिल बैठ ग्या। डांगरां आला डाक्टर बी आण्डी ए था कोए। कुत्ते कै खाज किसके तै लागी इसकी खोज करण लागग्या शेर। पन्दरा दिन गाल दिये खोज करण मैं। फेर आखिर मैं बेरा लाग्या अक घर के मालिक कै खाज होरी थी उसके तै कुत्ते कै बी लागगी। कई डाक्टरां का बड़ा बढ़िया काम चालरया सै इन पालतू कुत्त्यां के कारण। कई लोगां नै तै कई नसली कुत्तिया पाल राखी सैं। उनतै बढ़िया नसल के पिल्ले बणावैं सैं अर पांच तै लेकै दस हजार ताहिं बेचैं सैं एक पिल्ला। मांग आल्यां की लाइनै टूट कै नहीं देन्ती। या न्यारी बात सै अक जो माणस इन कुत्त्यां की दिन रात सेवा करै सै उस ताहिं बारह सौ रुपइये म्हिने के भी कोण्या मिलते। साल मैं मालिक की कमाई यो करवादे एक लाख तै ऊपर अर इसनै साल के दस हजार (एक कुत्ता) भी नहीं मिलते।
आज के जमाने मैं यो कुत्ते पालण का शौक़ सबके बसका कोण्या। किसके बसका सै या दुनिया आच्छी ढाल जाणै सै। एक कुत्ते पालण का शौक सै अर एक कुत्ता पालण की मजबूरी सै। इन दोनूं बातां मैं जमीन आसमान का अन्तर हो सै। जिस दिन इस अन्तर की असलीयत का जनता नै बेरा लाग ज्यागा उस दिन चाला ए पाटैगा।


कम्पीटीशन बेशर्मी का


कम्पीटीशन तै बड़े-बड़े देखे अर सुणे पर इस बबाल का नाम कदे नहीं सुण्या था। रागनी कम्पीटीशन, ब्यूटी कम्पीटीशन, पी.एम.टी. कम्पीटीशन तै खूब मशहूर हुए अर इन कम्पीटीशनां की देखा-देखी म्हारे देश के नेतावां नै बेशर्मी का कम्पीटीशन बी शुरू कर दिया दिल्ली मैं। टीवी पै इसका सीधा प्रसारण होवै सै अर जनता बिचारी नै चुपचाप हो कै देखणा पड़रया सै। रागनी कम्पीटीशन मैं तै कोए रागनी आच्छी ना लागै तै हू हू करकै गावणियां नै जनता बिठा बी दे, पर इन फूफ्या का के करै? बेशर्मी के ट्रेलर तै पहलड़े नेता बी दिखा दिया करते कदे कदे पर वे शर्मा बी तावले से जाया करते। फेर इस एक साल मैं ईब आली सरकार नै तै सारी ए शर्मोहया खूंटी पै इतनी ऊंची टांग दी अक कोए तारना चाहवै तो भी नहीं तार सकदा। इसनै घणे कसूते अवतार दिये सैं। तखत की गेल्यां इन अवतारां के नाम बी बदल ज्यां सैं। किसे बख्तां मैं मतलब त्रेता, द्वापर कै सतयुग मैं जिन ताहिं अवतार कह्या जाया करता उनै ताहिं इस कलयुग मैं नेता कै मंत्री कह्या जा सै।
पहली हद तै इसे मैं होली अक अटल जी की हर बखत हिलती रहवण आली सरकार ताहिं बड़ी बेशर्मी तै स्थाई सरकार कह्या जान्ता रहया पूरे साल अर इब मूंधे मूंह पड़े पाछै बी काटकड़ तार कै गेर दिया इस स्थायित्व पै। ईब ताहिं के सबतै निकम्मे प्रधानमंत्री ताहिं सबतै काम्मल प्रधानमंत्री बतावण की बेशर्मी अर देश का भट्ठा बिठावण आली सरकार ताहिं देश नै मजबूत करण आली सरकार का तमगा देवण की बेशर्मी। या सरकार पाछे सी कितनी बेशर्मी तै प्याज नै चाब गी थी अर एक बी आंसू नहीं आया था। उस पाछै कितनी बेशर्मी तै पेटैंट बिल पास कराया अर उसतै भी घणी बेशर्मी गेल्यां प्रसार भारती का भट्ठा बठा दिया। जितनी बेशर्मी तै बिहार सरकार गिराई उसतै घणी बेशर्मी तै वाह बहाल करदी। सुन्दर सिंह भंडारी हटाया जागा का बयान दाग दिया अर फेर बोले अक कोनी हटाया जावै अर आखिर मैं उसका तबादला कर दिया। वाह रै आडवाणी साहब थारा बेशर्मी मैं कोए मुकाबला कोण्या। इस बेशर्मी के कम्पीटीशन मैं जार्ज साहब एक दो राउण्ड मैं ढीले रैहगे तै उननै भी कमर कस ली अर सबतै आगै रहवण की खातर एडमिरल विष्णु भागवत कै जा खस्या अर ओ बर्खास्त कर दिया। सिलसिला जारी सै। सरकार पड़े पाछै बी जारी सै अर विपक्ष की जै सरकार बनगी तो भी जारी रहवैगा। जै या सरकार हटकै आज्या तै इसका नाम बेशर्म जयते होणा चाहिए। इसका नारा जय जवान, जय किसान जय विज्ञान जीसे थोथे नारे की जगां कोए ठोस नारा जय बेईमान, होणा चाहिए।
ईसा लागै सै अक जै या सरकार हटकै आगी तै सारे कै बेशर्मी के कम्पीटीशन शुरू करवा देगी अर इन बेशर्मां ताहिं पदमश्री अर पद्मभूषण के खिताब दिया करैगी। फेर तै पाले, सतबीर, बाली, रणबीर, राजेंद्र खरकिया, सरिता चौधरी ये सबै भूखे मर्या करैंगे।

या के बणी


दिल्ली मैं इन दिनां मैं खूब उठा-पटक होई सै। भाजपा नै सारे नियम, कायदे कानून, सिद्धान्त ताक पै धर दिये अपणी कुर्सी बचावण की खात्तर। तलै ए तलै कई पार्टियां मैं पाड़ ला लिया। पाड़ लावण के तरीके भी सारे ए इस्तेमाल कर के गेर दिये। साम दाम दण्ड भेद सब क्यांएका सहारा लिया ज्याहे तैं तै वोट पड़ण तै पहलम् ताहिं भाजपा न्यों दंगालै थी अक वोटां का गणित उसके हक मैं सै अर घणखरे लोगां कै या बात जंचै भी थी अक एम पी खरीद खराद कै भाजपा अपणी गिणती पूरी कर लेगी।
म्हारले नेता जी भी बहोतै स्याणे बणकै दिखावैं थे इबकै फेर भाजपा नै बता दिया अक तम डाल डाल सो तै हम पात-पात सां। पहलम तै म्हारे नेता जी नै भाजपा तै समर्थन उल्टा लेवण का सांग करया अक क्यूकरै ममता कै जयललिता की ढालां उसके भी भा बध ज्यां। कई बै घर मैं कोए माणस रूस ज्या अर रोटी ना खावै अर घरके उस नै मनावैं नहीं तै दो बखत पास करने मुश्किल हो जाया करैं इसे माणस नै। वाहे बणगी म्हारे नेता जी गेल्यां अर हार फिर कै अखबारां मैं खबर दी अक समर्थन उल्टा ले लिया फेर जै कोए करड़ा बखत आया तै वोट हम भाजपा ताहिं ए देवांगे। नेता जी तै कोए बूझै अक जै न्योंए करनी थी तै समर्थन उल्टा क्यों लिया था? खैर आड़े ताहिं बी देखी गई। हरियाणे की जनता और थोड़ी फालतू उदास होगी। फेर यो विश्वास मत थोंप दिया जयललिता नै भाजपा पै तै म्हारे नेता जी का सारा कुण्बा कुकाया अक ईब बेरा पड़वा द्यांगे भाजपा नै अक तीन च्यार एम पी आली पार्टियां की कितनी औकात सै। टी.वी. मैं अखबारां मैं, दिल्ली मैं, चंडीगढ़ मैं सारे कै काटकड़ तार दिया अक हम भाजपा के विश्वास मत के विरोध मैं मतदान करांगे। टी.वी. आल्यां नै दो दो तीन-तीन बै बूझया अक यो आखिरी फैसला सै थारा? म्हारा नेता बोल्या अक यो पक्का फैंसला सै म्हारा। हरियाणे की जनता कै थोड़ा सांस में सांस आया अक नेता नै म्हारी लाज का थोड़ा घणा ख्याल तै ले आखिर मैं करे लिया। आज के जमाने मैं कूण लिहाज शर्म जिसी चीजां का ख्याल राखै सै ऊंतै पर म्हारे नेता जी की मेहरबानी अक उसनै म्हारी लिहाज शर्म राखण की सोची।
फेर खुराना जी पहोंचे म्हारे नेता जी धोरै। बेरा ना कूणसी दुखती रग का बेरा सै खुराना साहब नै अक म्हारे नेता तै बातचीत करण की जिम्मेवारी उसे ताहिं दी भाजपा नै। फेर किमै ढीले से पड़ते दीखे म्हारे नेता जी। आगले दिन फेर किमै करड़े से होगे। लोगां नै फेर राहत की सांस ली।
चाणचक दे सी प्रकाश सिंह बादल अर उसके छोरे कै बीच मैं बैठकै म्हारे नेता जी ने फेर पास्सा पलट लिया अक हम भाजपा के प्रस्ताव के हक मैं वोट गेरांगे। किसान नेता प्रधानमंत्री बणावण की सोचां थे ओ बणता कोण्या दिखाई दिया ज्यां करकै भाजपा का समर्थन करांगे। कोए बूझणिया हो अक वाजपेई नै किसानां की घणी झोली भरदी जो म्हारे नेता जी उसकी मदद मैं तिसाये होगे? बखत की करनी अक भाजपा फेर बी मूंधे मुंह पड़ी जाकै। सबतै पहलम म्हारे ताऊ जी के बख्ता मैं एक दो एम एल ऐ करकै यो आया राम गया राम का सेहरा म्हारे हरियाणा के सिर पै बंध्धा था। फेर भजनलाल जी तैं पूरी ए पाल्टी नै लेकै कांग्रेस मैं कूद गे थे। इन सारे सौद्यां मैं एक खास बात थी अक सौदेबाज नेता मगर बलि के बकरे थे उनके पाछै लागे औड़ एम.एल.ए.। पर इबकी बरियां एक औरै नजारा साहमी आया सै अर ओ सै अक नेता नै छोडकै उसके एम.पी. भाजगे। क्यूं भाजगे? कितने मैं भाजगे? किसके कहे तैं भाजगे? के सोच कै भाजगे? इन पै न्यारी-न्यारी अटकल लाई जावण लागरी सैं। फेर एक बात तै साफ होगी अक वे भाजगे थे अर म्हारे नेता जी नै तै बस अपनी लाज बचावण खातर समर्थन का दिखवाया ए कर्या, समर्थन तै भीतरै-भीतर हो लिया था। ईब हटकै फेर यूनाइटिड फ्रंट की बात कही सै। फेर कोए यकीन ना करै। हरियाणा की जनता मायूस बहोत होई सै। जो माणस म्हारे नेता के म्हां कै म्हारे ताऊ नै देख्या करते उनमैं तै और बी निराशा आई सै। इस निराशा के कारण जनता और कोए नेता टोहण की सोचै सै फेर कोए ठह्या सा नेता ए ना दीखता हरियाणे की जनता नै। या जनता करै तो के करै?
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नया साल किसा हो


इस बात मैं कोए शक की गुंजाइश कोन्या अक बीसवीं सदी मैं विज्ञान नै ताबड़तोड़ तरक्की करली। फेर आज महत्वपूर्ण सवाल यौ सै अक इस दुनिया के दुख-दर्द कम करण मैं कितना काम आया विज्ञान? उल्टा यू दुख-दर्द बधा तो नहीं दिया इस विज्ञान नै? आज दुनिया के 100 करोड़ के लगभग लोग (महिला-पुरुष) बुनियादी जरूरतों ज्यूकर रोटी, कपड़ा अर मकान तै महरूम सैं। आए साल दुनिया के लगभग 80 लाख बालकां की मौत, भूख, कुपोषण, पीने के साफ पानी की कमी, उचित आवास की कमी बख्त पै मामूली चिकित्सा सेवा ना मिलने के कारण होज्या सै। जो ये परिवार इतने गरीब न होन्ते अर उनकी बुनियादी जरूरतें पूर हो जान्ती तो इन मौतां पर काबू पाया जा सकै था। आई किमै समझ मैं अक ‘किस्मत म्हारी’ कैहकै पार बोलोगे।
आए साल मैं लगभग 4 लाख महिलावां की मृत्यु बालक होवण के बख्त होज्या सै। कारण सै अक ठीक खाणा नहीं, खून की कमी होज्या अर जच्चा-बच्चा को वांछित स्वास्थ्य सुविधा नहीं मिलती। फेर के कर्या जा? इसपै ढंग तै सोच्या जा आण आले नये साल मैं अक बेहतर दुनिया क्यूकर बनाई जा। या बेहतर दुनिया क्यूकर बनाई जा सकै सै? दुनिया मैं सारे महिला-पुरुषां की जरूरतां नै पूरा करण की खातर प्रतिवर्ष 40 अरब डालर और चाहिए। फेर किततैं आवै इतना पीस्सा? सोच्ची सै कदे अक ताश खेलण तै फुरसत कोन्या अर कै इन छुटभैये सफेदपोशां के बस्ते ठावण के बोझ तलै सांस चढ़े रहवैं सैं? बेरा सै केवल यूरोप मैं शराब पर एक साल मैं 105 अरब डालर खर्च होज्यां सैं। म्हारे देश के आंकड़े तो कोन्या फेर हरियाणा मैं दारू तै घर तो कोए बच नहीं रह्या फेर कोए माणस बचर्या हो तै बैरा ना? तो फेर के कर्या जा? पहलम तो पूरी समस्या आच्छे ढाल जान ली जावै अर फेर सोच्या जावै अक हम के चाहवां सां अर के करना चाहिए हमनै? हम नहीं चाहते किसे की आजीविका खोसना।
एक इन्सान का दूसरे इन्सान को लूटणा गल्त सै। दौलत की खातर दरिद्र का कूटणा गल्त सै। लूटमान अत्याचार हम कोन्या चाहते। हां, हम जरूर चाहवां सां मजदूर का मुस्कराना, किसानां का अपनी फसल देख कै खिलजाणा, हर झोंपड़ी, हर गांव मैं बालकां का खिलखिलाणा, इस नाबराबरी का दुनिया तै खात्मा जरूर करना चाहवां सां। हम कोन्या चाहते नये साल मैं ये जातिभेद अर रंगभेद। कोन्या चाहिये बेटियों के जन्म पै प्रकट होन्ता दुख-खेद, इस तरियां के भेद भाव जो करदें समाज मैं छेद, इन्सानियत का इसा अपमान कोन्या चाहिये। हां, आज हमनै चाहिये उनकी समानता जो तलछट मैं पड़े सैं, बेटी नै मौका मिलै अर वा तय कर सकै हर रास्ता, शूद्र भी शिखर छू सकै उसनै मिलै या मान्यता, काले रंग नै कृष्ण आला सम्मान मिलै या हम चाहवां सां। हम नहीं चाहते पड़ौसियों तैं रूठणा, एक ही परिवार मैं दीवारों का खींचणा, मजहबों के नाम पर किसी के घरों को रोंदणा, किसी के दिल नै तोड़णा हम कोन्या चाहन्दे।
हां, हम जरूर चाहवां सां टूटे दिलां नै जोड़णा, बहम अर बैर की हर दीवार नै तोड़णा, भटके औड़ हर कारवां नै प्यार की गली मैं मोड़णा, भजनां मैं कव्वाली की मिठास घोलणा चाहवां सां। हम नहीं चाहन्दे अक घरां पै गिरै कोए कहर, देखो हवा पानी मैं फैल रहे कितने जहर, बीमारियों, आपदाओं की या बढ़ती लहर, आबो हवा का यो प्रदूषण कोन्या चाहिये। हां हम जरूर चाहवां सां कोयलां का कूकणा, मृग शावक का विचरना वन बालिका तै खेलणा, चरवाहों की बांसुरी पै टहनियां का झूमणा, मुक्त नदी की खेल ठिठोली देखणा हम चाहवां सां। हम नहीं चाहन्दे मूक प्राणियों पै अत्याचार, विलासिता इसी करे जो पशुओं मैं हाहाकार, वो कैसा विकास जहां इन्सानों से हो मारामार, ताकत का दुरुपयोग हमनै कोनी चाहिये। हम नहीं चाहन्दे कि युद्ध तै हो ईब विनाश, अणु बम की गर्जना जो पुकारै बस नाश-नाश, धरती पै सन्नाटा हो अर रोवै आकास, ना ना इसी तबाही नहीं चाहन्दे। एक छोटा सा चमन हो, हर इंसान को अमन हो, बहै जड़ै सच्चाई का पवन हो, इसी दुनिया हम चाहवां। नया साल मुबारक।

सांच्ची बात कटारी लाग्गै


हिन्दुओं के इतिहास मैं राम का बहोत ऊचा स्थान रहया सै। आजकाल भी राम राज्य का खूबै जिकरा रहवै सै। वो राम राज्य कीसा होगा जिसमैं एक शूद्र शम्बूक का बस योहे अपराध था अक ओ धर्म कमावण की खात्तर तपस्या करण लागरया था अर इस कारण राम जीसे अवतार राजा नै उसकी नाड़ काट ली। ओ राम राज्य कीसा रहया होगा जिसमैं किसे आदमी के कहे तै राम नै गर्भवती सीता ताहिं जंगल मैं छोड़ दिया? राम राज्य मैं दास दासियां का कति तोड़ा नहीं था। ठारवीं और उन्नीसवीं शताब्दी ताहिं दुनिया मैं दास प्रथा कितनी क्रूरता के साथ प्रचलित रही सै इसका हमनै पूरा ग्यान सै। उन बख्तां मैं (राम राज मैं) स्वेच्छा पूर्वक अपने आप नै अर अपनी संतान नै सिर्फ बेच्या ए नहीं जाया करता। बल्कि समुद्र अर बड्डी नदियां के कांठ्यां पै बसे गामां मैं तो आदमियां नै पकड़ कै ले जावण की खात्तर बाकायदा हमले हुया करदे। डाकू गाम पै छापा मारया करते अर धन-माल की साथ-साथ उड़े के काम करण जोगे आदमियां नै पाकड़ के ले जाया करते। हर साल इस तरियां के गुलाम पोर्त्तुगीज पकड़ कै बर्मा के अराकन देश मैं बेच्या करते। राम राज्य मैं जै इस ढाल की लूट अर डाकेबाजी नहीं बी होगी तो भी दास प्रथा तो जरूरै थी। मिथिला मैं ईब बी कितने ए घरां मैं वे कागज सैं जिनमैं बहिया (दास) की खरीद-फरोख्त दर्ज सै। दरभंगा जिले के तरौनी गांम मैं दिगंबर झा के परदादा नै कुल्ली मंडर के दादा को किसे दूसरे मालिक तैं खरीदया था अर दिगंबर झा के दादा नै पचास रुपइये के फायदे के साथ ओ आगै बेच दिया। इैबै तीन पीढ़ी पहलम अंग्रेजी राज तक मैं या प्रथा मौजूद थी। साच्ये धार्मिक हिंदू हों चाहे मुसलमान, दोनूं जब अपनी मनुस्मृतियों और हदीसों मैं दासां के ऊपर मालिकां के हक के बारे पढ़ैं सैं तो उनके मुंह मैं पाणी आये बिना नहीं रैहन्ता।
आवां राम राज्य की दास प्रथा की एक झांकी देखां। एक साधारण सा बाजार सै जिसमैं निखालस दास-दासियां की बिक्री होवै सै। लाखां पेडां का बाग सै। खाण-पीण की दुकान सजरी सैं। भेड़-बकरियों अर शिकार करे जानवरां तै न्यारा उच्च वर्ग के माणसां के भोजन की खात्तर मांस बेच्चा जावण लागरया सै। जागां-जागां पै सफेद दाढ़ी आले ऋषि अर दूसरे ब्राह्मण, क्षत्रिय अर वैश्य अपणे पड़ाव घालें पड़े सैं। कोए नया दास कै दासी खरीदण आया सै। किसे के दिन बिगड़ गे ज्यां करकै ओ अपणे दास-दासी बेच कै कुछ पीस्से का जुगाड़ करण आरया सै। कुछ पुराने दास बेच कै नये दास लेवण आरे सैं। म्हिने पहलम दास-दासियां की सेवा शुरू होज्या सै अक बढ़िया दामां मैं बिक ज्यावैं। उनके सफेद बाल काले रंग दिये। बढ़िया लत्ते कपड़े पहरा के बिठावैं सैं। कितै-कितै सौ-सौ दास सैं कितै एकाध दास आले मालिक सैं। खरीदण आले कहवैं सैं, ईबकै तो बाजार बहुत म्हंगा गया। पाछले साल अठारा बरस की हट्टी-कट्टी सुंदर दासी दस रुपइए मैं मिल जाया करती, ईबकै तो तीस मैं बी हाथ कोन्या धरण देन्ते। दान्त ताहिं देख्या करदे। कोए चालीस बरस की नै बीस बरस की बतावै। कोए कहवै म्हंगी कित सै। महाराज रामचंद्र के यज्ञ मैं दक्षिणा मैं हरेक ऋषि ताहिं एक-एक तरुण दासी दी जावैं सैं। कितनी दासियां के बालक उनतै कोसां दूर चाले जावैं सैं, कितनी दासियां के प्रेमी उनतै बिछड़ ज्यावैं सैं इसकी उड़ै किसनै चिंता नहीं थी। यो सै राम राज्य मैं आदमी के एक भाग का जीवन। अर यो सै राम राज्य मैं मरद-औरत का मोल। इसे पर हमनै नाज सै। ईब ताहिं तो हमनै आदमी की ढालां रैहना भी नहीं सीख लिया सै। पास पड़ौस मैं सफाई की अवहेलना मैं तो हम जानवरां तै भी गये बीते सां। म्हारे गामां जीसे गंदे गाम दुनिया के किसे देश मैं दीवा लेकै बी टोहे कोन्या पावैं। या म्हारे गांम की ए खूबी सै अक एक आन्धा माणस बी एक मील पहलमै म्हारे गाम नै पिछाण लेवै सै क्योंकि उसकी नाक बदबू नै पिछाण ले सै। तो म्हारा इतिहास कई ढाल की यादां तै भरया पड़या सै। हमनै देखना पड़ैगा अक कौन सी आज के हिसाब मैं ठीक बात सै अर कौन सी गलत सै। अन्धभगत हो कै अपने पुराने इतिहास की झोल्ली भरकै काम कोन्या चालै। आई किमैं समझ मैं?
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लड़ाई ही लड़ाई



थामनै कई ढाल की लड़ाईयां के बारे में पढ्या होगा, सुण्या होगा अर देख्या होगा। घर मैं लड़ाई किसे ना किसे बात पै आपां रोजै करां सां। कितै मां बेटे की तकरार, किते भाई भाईयां मैं मारममार, कितै मुसलमानां पै होन्ते वार, कितै देवर भाभी मैं पड़ै सै दरार। बस बुझो मतना। फेर हिन्दुस्तान मैं एक न्यारे नमूने की लड़ाई शुरू होती दीखै सै। या किसी लड़ाई सै बेरा ना? संसद तै बाहर तै कांग्रेस अर भाजपा एक दूसरे के खून की प्यासी दीखै सै, एक दूसरे की खाट खड़ी करण मैं कसर नहीं छोड़ती फेर संसद मैं दोनूआं की एकै भाषा, एकै राग लागै सै। एक पाछै एक आवण आले विधेयकां - बीमा विधेयक, महिला आरक्षण विधेयक, पेटैंट विधेयक पै तै इन दोनू पार्टियां की गजलोट हुई दीखै सै। पर बीमा आले विधेयक पै भाजपा अर आर.एस.एस. मैं लड़ाई छिड़गी। बेरा ना या दिखावटी सै अक या असली सै? दूसरे कान्हीं अकाली दल मैं बादल अर टोहरा नै हथियार पिना लिये। छूट छुटावण करवाणिये अपने नम्बर बणावते हांडैं सैं। इनका यो बी नकली सौदा सै अक असली सै बेरा ना? एक और चाला देख्या लोगां नै तै बाट थी अक जयललिता वाजपेयी का धुम्मा ठावैगी फेर उसनै तै आपणा ए मोर्चा तोड़ कै धर दिया। ईब डण्ड बैठक काढ़ण लागरी सै बेरा ना किसनै तोड़ैगी अर किसनै बणावैगी? मुलायम सिंह यादव नै कांग्रेस कै खिलाफ तलवार खींच ली अर कांग्रेस नै राबड़ी देवी पै तीर कमाण कर राख्या सै तीर बेरा ना कद कमान मां तै छूटज्या। बीजू जनता दल वाले आपस मैं ए कब्ड्डी घालरे सैं। बेरा ना चाण चक दे सी यो के होग्या? ये नये-नये पाले खींचगे। किसके पाले मैं कौण जा खड़या होगा कुछ नहीं कह्या जा सकदा। गिरगिट की ढालां रंग बदलते वारै कोण्या लान्ते। पहलम आली सारी कतार बन्दियां बदलती दीखै सैं।
इलैक्शनां की जंग कांग्रेस अर भाजपा बिचालै लड़ी गई। कांग्रेस नै राजस्थान, मध्यप्रदेश अर दिल्ली मैं फेर पैर जमा लिये। कैहवणिया तो न्यों बी कहवैं सैं अक या लड़ाई गंठे अर बम्ब के बीच लड़ी गई। पर असल मैं या लड़ाई महंगाई अर जनता के बिचालै लड़ी गई। भाजपा तै महंगाई के रथ पै असवारी होरी थी अर कांग्रेस नै जनता अपणे कान्ध्या पै ठारी थी। तुलसीदास नै भी कह्या सै अक रावण रथी था ज्यां करकै ओ रथ पै सवार था अर रघुवीरा विरथ थे। ऊंह धोरै किसे रथ थे। रघुवीरा तै बांदरां के अर भालुआं के दम पै लड़या था। पर उस लड़ाई मैं तै रथी हारया था अर विरथी जीतया था। म्हारे प्राचीन संस्कृति के वाहक तै बिना रथ के कोए बी लड़ाई कोन्या लड़ते। बेशक वे रघुवीरा के भक्त सै फेर लैक्शन की पाछली लड़ाई तै उननै रथ यात्रा की बदोलतै जीती थी। जै आडवाणी जी रथ पै सवार नहीं होन्ते तो दो सांसद आला यो सीमित सुखी परिवार इतना बड्डा कुणबा क्यूकर बणता? ईब या न्यारी बात सै अक इसतै म्हारी पुराणी संस्कृति गैल्यां खिलवाड़ हुया अक नहीं हुया? इबकै भी आडवाणी जी महंगाई के रथ पै सवार हो लिए। रथ तो रथै हो सै या बात न्यारी सै अक यो पहलड़े रथ बरगा टोयटा आला रथ नहीं था जिसकी तामझाम तै सौ कोस तै बी दीखै थी। पर इबके रथ मैं महंगाई भव्य थी। जिसी आडवाणी जी के रथ नै हा हा मचाई थी कुछ उसे ए ढाल की हालत इस महंगाई नै बणादी। फेर उस हा हाकार नै तो आडवाणी जी पै वोटां की बरसात करदी थी अर इस बर की नै चुनावी हार का तमगा दे दिया।
इस चुनावी लड़ाई पाछै इसा लागण लाग्या था अक ईब साचली लड़ाई शुरू होवैगी। महाभारत का युद्ध जणो तै हटकै नै लड़या जागा। पाले बंदी बदलैगी। नये मोर्चे बनैंगे। सरकारी मोर्चा टूटैगा अर नया मोर्चा सरकार बणावैगा। फेर सरकारी मोर्चा तै न्यों का न्यों सै हां बिचारी जयललिता का मोर्चा जरूर टूटग्या। लोग बाट देखैं थे अक वाजपेई जी आज गया कै काल गया। जयललिता जी तै न्यारा भला और कोण तोड़ सकै सै सरकारी मोर्चे नै? जार्ज साहब तै-समता बेशक टूटो पर भाजपा की सरकार बच ज्याओ - इस अभियान पै जोर तै मंडरे सैं। काम जार्ज ताहिं देश की रक्षा का सौंप राख्या फेर आण्डी रक्षा वाजपेई की सरकार की करण लागरया सै। समता पार्टी मैं कई जणे मंत्री बणन के नाम पै सिंगरे हांडैं सैं फेर नम्बर कोन्या आ लिया सै भाइयां का। वे बड़े दुखी सैं अक जार्ज अर नीतिश कुमार तै मंत्री होगे अर हम सूके के सूके राख राखे सां।
उननै दुख इस बात का भी सै अक वाजपेई जी आपणे तै तीन मंत्री बणा लिये अर बाकी सबनै भूलगे। बड़ा चाला कर दिया। साहब सिंह जी वर्मा नै भूलगे उस तांहि तै उननै अपणें हाथ तै चिट्ठी लिखकै मंत्री बणण का न्यौता दिया था। जै वाजपेई जी न्यों न्यौते निधारां मैं गड़बड़ करैगा तै जनता बिगड़े बिना नहीं मानैगी। फेर वाजपेई जी बी किस किस नै याद राखैं?
एक चीज समझ मैं कोण्या आई इस लड़ाई की अक लड़णा तै भाजपा अर कांग्रेस आई नै चाहिये था। पर ये दोनूं तै नेड़े नेड़े नै आवंते दीखैं अर भाजपा गैल्यां जिननै घी खिचड़ी रैहना चाहिए था वे भाजपा तै दूर होन्ते जावैं सैं, इसकै खिलाफ बोलैं सैं। 11 दिसम्बर की हड़ताल मैं कांग्रेस नै समर्थन करणा चाहिये था पर कोनी करया। जयललिता नै समर्थन करया अर बीजू जनता दल नै करया। संघ परिवार भी इन विधेयकां नै ले कै भाजपा सरकार कै खिलाफ आण डट्या मैदान मैं। इननै तो कठ्ठा रहणा चाहिये था आपणी परंपरा निभाणी चाहिये थी। पर ये आपस मैं लड़ण लागरे सैं। बीजेपी तै अनुशासन आली पार्टी बताई जा थी तो यो चौड़े सड़क पै ईब के होण लागरया सै? यो हो के रहया सै? या किसी लड़ाई सै? न्यों कहया करैं अक झोटे-झोटे लड़ै अर झाड़ां का खोह। इन राजनेतावां नै या जनता ईब झाड़ बोझड़े समझनी छोड़ लेनी चाहिये। जनता रैफरी बण कै इस सारी लड़ाई नै देखण लागरी सै। जनता की रैफरसिप बड़े बड़यां नै रैफरसिप सिखा दे सै फेर भाजपा, कांग्रेस, मुलायम, कांशी अकाली, लालू अर जयललिता किस खेत की मूली सैं? देश की जनता अपणे अनुभव तै सीखण लागरी सै अर एक बख्त इसा जरूर आवैगा जिब जनता की राजनीति करणियां की जीत जरूर होगी।
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मंगलवार, 3 जनवरी 2017

के बेरा था नयूं बणज्यागी ????

इब कोन्या ----------
एक बै एक साड़ी बेचण आला गाम मैं आग्या । उसनै एक घरबारण ताहिं कहया --देखै के सै ! घणी बढ़िया साड़ी सै ।  बस चार सौ रूपईयाँ  की । लेकै देख । सारी उम्र याद राखैगी  -----
घरबारण बोली ---- ना बाबा ना !! इसका रंग कच्चा लिकड़ाया  तो मैं के करूंगी ? देणी सै तो सौ रूपईयाँ मैं दे दे । 
---------घणी ए वार खींचतान चालती रही । 
हार करकै साड़ी आला बोल्या -------चाल तेरा जो जी करै वो दे दे । 
घरबारण डेढ़ सौ रूपईये दे दे दिए #####
उस दिन पाछै घरबारण नै साड़ी का पैंडा ए कोण्या छोड़्या । पड़ौसन कहती ----- हाय ! कितनी बढ़िया साड़ी ।  किततैं  खरीद कै ल्याई ?
--- हफ्ते मैं मैली करदी साड़ी । घरबारण गई जोहड़ पै साड़ी धोवण । 
सारा जोहड़ लाल कर दिया साड़ी नै । -----सारा रंग छूटग्या साड़ी का -----छूटती ए बोली ----ओहले मनै के बेरा था रंग उतरज्यागा  । बाकी नहीं रही घरबारण कै ।  नयों बोली------आवण दे जाये रोये नै ।  पीसे उलटे नहीं लिए तै मेरा बी नाम धमलो नहीं ।  
---फेर एक महीना बाट देखी पर जाये रोया कौनी आया ------। 
रमलू सुणकै  कमलू की बात अर बोल्या ------ इब्बी इसी इसी बावली 
रैहरी  सैं  म्हारे गाम मैं ।  भैंसवाल मैं तो सुन्या करते अक इब्बी बावले रैहरे सैं ।  --------- एक भैंसवाल का रिश्तेदार भी आरया था ---
वो बोल्या --- इब कोन्या रैहरे बावले भैंसवाल मैं । 
   रमलू नै एक चुटकला सुणाया रिश्तेदार ताहिं -----------
म्हारा एक क्लासफैलो था धनपत खर खोदे का  ओह ब्याह दिया भैंसवाल । नयी नयी शादी ।  दोनू सिनेमा देखण चले गए राज टाकीज मैं । फिल्म शुरू होगी ।  न्यूज आई ।  उनमैं कई बूढ़े बैठे बैठे होक्का पीवण लागरे थे । 
 ---  देखते की साथ धनपत की बहु नै तो एक हाथ लाम्बा घूंघट  कर लिया ।  हाफ टेम हुया  तै धनपत नै बूझी अक किसी लागी फिल्म ? 
वा बोली------फिल्म शुरू होंते की साथ वे बूढ़े आ बैठे थे ।  मनै तै जीबै घूंघट कर लिया था । फिल्म क्यूकर  देखती । ओ भैंस वालिया बी सुनै था ओ बोल्या ---- उसनै तो कदे गाम मैं भी घूंघट ना काढ्या तै उड़ै क्यूकर काढ़ लिया ? कमलू अर ठमलू जोर कै  हँस पड़े अर बोले -------तों ठीक कहवै था रमलू अक भैंस वाल के लोग इब्बी बावले रैहरे सैं ।  डमलू  बोल्या ------ भैंसवाल की तै ठीक फेर आडूआँ की तै म्हारे गाम मैं भी कमी कोन्या । किस किस का नाम गिनाऊँ । फाँचर ठोकां की एक नयी नस्ल पैदा होगी । कढ़ी बिगाड़ भी कई पा ज्यांगे ।  बांडे फांडे बी घाट नहीं । म्हारा गाम तै पूरा चिड़ियाघर होरया सै । हमनै लूट कै खावणिया कै यो पिछड़ापन खूब काम आवै सै । ज्युकर आज काल नोटबंदी पै धुम्मा ठा राख्या अर हम कहन लागरे सां करया तो ठीक बेशक दुखी होना पडरया सै । हम दिमाग पै जोर देण की कसम खाये बैठे साँ । कोए ना और धरती भिड़ी होवैगी जिब कहवैगा मनै के बेरा था नयूं बणज्यागी ????
आंडी रणबीर 


सोमवार, 2 जनवरी 2017

खरीदी बहू’ हरियाणा की


सते,नफे, फते,कविता,सविता,सरिता अर भारपाई ष्षनिवार नै कठ्ठे होकै बतलाये। सते बोल्या- चहणियां मैं जावण नै होरे सैं फेर ब्याह बिना ईब्बी ना सरता।नफे बोल्या- के बात सते आज बहोत गुस्से मैं दीखै सै। सते बोल्या- ओ नहीं सै म्हारी गाल मैं नसीब सिंह ओ पिचहतर साल का होरया सै। ल्याया सै बंगाली बहू।सरिता बोली- वो तो सात हजार मैं खरीद कै ल्याया सै अर दो हजार वो नहीं सै गुगण क्यांकै रमेष उसनै यू ब्याह करवावण के सर्विस चार्ज लिये सैं।नफे बोल्या- उसकी उमर कितनी सै। कविता बोली - वातो पन्दरा साल की बतावै थी। फेर उसकै म्हारी बोली तो कोन्या समझ मैं आन्ती।नफे बोल्या-यो किसा ब्याह। नसीब सिंह 75 साल का अर वा बहू 15 साल की। योतो कसूता बेमेल ब्याह सै जै इसनै ब्याह बी मानैं तो। नसीब सिंह नै इसा क्यूं करया।सते बोल्या- कहवै तो न्यूं था अक वंष चलावण की खातर एक छोरा सा तो होणा ए चाहिये। नफे सिंह बोल्या-तो इसकी खातर खरीद कै लियाओ बहू।सविता बोली- इसे छोरे आली मानसिकता के कारण तो हरियाणा मैं लड़कियां की संख्या चिन्ताजनक रुप तै घटती जावण लागरी सै।फते बोल्या-सविता जिब इसमैं कौनसी चिन्ता की बात सै। ये थोड़ी होगी तो इनकी तो समाज मैं कीमत बधैगी। लोग आंख्यां पै बिठाकै राखैंगे लुगाईयां नै। सविता बोली- याहे तो गलत फहमी सै फते।छोरियां की समाज मैं संख्या कम होवण करकै कीमत कोन्या बधै।इनपै हिंसा बधैगी।ये प्याज टमाटर थोड़ा ए सैं जो 60 रुपये किलो होज्यांगे।कविता बोली-या बात तो मनै सविता की सही लागै सै।पाछै सी अखबार मैं पढ़या था अक हैदराबाद के व्यापारी हरियाणा की मुर्रा भैंस एक लाख रुपये की खरीद कै लेगे।अर हम पांच पांच हजार मैं बहू उड़ीसा, बंगाल आसाम अर बिहार तै खरीद कै ल्यावां।यासै म्हारी कीमत तो।नफे बोल्या-कोए गाम नहीं बचरया जित 150 अर 200 ताहिं की संख्या मैं लड़के ना हों जो ओवर ऐज ना हो लिए हों। तड़कैं ए एड्डी ठाकै बाट देखनी षुरु करदें सैं सगाई आल्यां की।सविता बोली- नौकरी ना, गरीबी बधगी,उपर तै बिन ब्याहे,साथ मैं टी वी का नषे, सैक्स अर हिंसा का सोच्या समझ्या पैकेज। इसे करकै ये तरां तरां के विकृत रास्ते अपनावैं सैं। इसे करकै समाज मैं रेप,छेड़खानी,बदमाषी की घटना दिन पै दिन बधती जावण लागरी सैं। सते बोल्या-एक खास बात और सै अक म्हारे गुहांड मैं जाटां की फालतू संख्या आलेे गाम फालतू सैं। इनमैं खाते पीते परिवारां आले बालकां की तो इब्बै ब्याह षादी क्यूकरै हो ज्यावैं सैं बाकी तो सिर पर कै हाथ फिरांदे हांडे जावैं सैं।सविता बोली- हां गुजरां,यादवां अर रोड़ां मैं बी इसा ए हाल बताया। बाहर तैं महिलावां नै खरीद कै ल्यावैं सैं।पाछै सी 10-12 गामां का सर्वे करकै देख्या था इन ज्ञान विज्ञान आल्यां नै। इनमैं 50 महिला थी जो दूसरे प्रदेषां तै खरीद कै ल्या राखी थी। इसमैं रोहतक,भिवानी, जीन्द अर झझर के जिल्यां के गाम थे।बलियाना अर बहुअकबरपुर नै तो सारे गामां के रिकाट तोड़ राखे थे।सते बोल्या- फेर इननै ‘असली बहू’ का दरजा बी तो कोन्या देन्ते। उनकै म्हारी बोली समझ मैं आवै ना म्हारै उनकी बोली समझण मैं दिक्कत आवै। आज के युग मैं किसे माणस तै उसकी भापा-बोली खोस्सण तै माड़ा काम कोए दूसरा कोनी हो सकदा।सविता बोली-उस सर्वेक्षण मैं तो और बी कई भयानक सच्चाई साहमी आई।ये महिला ‘दोयम दर्जे की पत्नी’ कै ‘ल्याई औड़ बहू’ कै ‘खरीदी औड़ बहू’ के हिसाब तै जानी जावैं सैं।कई जागां तो इननै प्रदेषां के नाम तै बुलावैंगे ज्यूकर‘पारवी बहू’, ‘बिहारी बहू’, ‘बंगाली बहू’आदि आदि।इसतै न्यारा इनका रहन सहन,तौर तरीके,खानपान सबै किमै तो बदल ज्यावैं सैं।कविता बोली - कमाल की बात सै अक पूरे समर्पण अर मूल पहवान खोए पाछै बी ये महिला‘अन्य’, ‘बाहरी’अर कै ‘खरीदी औड़’बहू के रुप मैंए मानी जावैं सैं। सरिता बोली- इननै भयंकर एकान्त अर सामाजिक अलगााव का सामना करना पड़ै सै।पषुआं तै बी बदतर जिन्दगी जीवैं सैं ये।कई घरां मैं षुरु षरु मैं बेल मारकै राखैंगे अक कदे या भाज ना जावै।सविता बोली- ‘गरीब की बहू सबकी जोरु’आली बात इस तथाकथित सभ्य समाज मैं आज ‘ बाहरी बहू घर मैं सबकी जोरु’ के रुप मैं बदलगी।कई बर तो दो दो तीन तीन बर बेच दी जावैं सैं।सते बोल्या- या किसी विचित्र बात सै अक म्हारे गुहांड मैं अन्तर्जातीय ब्याह करण पै तो लड़के लड़कियां की हत्या करदी जावै अर इस ढ़ाल की अंतर्जातीय खरीद फरोख्त की पूरी इजाजत सै। अर ये म्हारे नौजवान बी मुंह नहीं खोलते इसी बातां पै।नफे सिंह बोल्या- हरियाणा मैं महिलावां की खरीद फरोख्त का धन्धा पूरे जोरां पै चालरया सै अर इसमैं बिचौलियां की चान्दी होरी सै वे मनमाने ढ़ग तै इस माहौल का फायदा ठारे सैं। सविता बोली- खरीद फरोख्त के इस घिनौने व्यापार मैं बाजार मतलब ‘मंडी’अर पितृसता के सबतै पिछड़े रुप रंग दोनूं एक होगे दीखैं सैं। जो ‘बाजार’मैं पीस्सा खरच करैगा उसनै बदले मैं खरीद्या औड़ एक गुलाम मिलैगा जिसनै उन पीस्यां के एवज मैं सारी उमर गुलामी करनी सै।जै वा खरीदी औड़ी महिला अपनी गुलामी का विरोध करै तो वा दोबारा खरीदी अर बेची जा सकै सै। कविता बोली-एक और बात समझ मैं नहीं आन्ती अक हरियाणा मैं एक तरफ तो दहेज का व्यापार धड़ल्ले तै चाल रह्या अर बधता जावण लागर्या सै अर दूजे कान्ही महिलावां ने खरीद कै ल्यावण का रिवाज बधता जावण लागर्या सै। योके रास्सा सै। हरियाणा के बु़िद्धजीवी करैंगे कदे इस ढाल की बातां पै बिचार। सविता बोली-हरियाणा के बुद्धिजीवियां नै कड़ै फुरसत सै अपने कैरियर तै, अपने बालकां के कैरियर तै जो म्हारी इन पेचीदा बातां पे गौर करैंगे। क्यों बख्त बरबाद करैंगे वे अपना। फेर एक बात साफ सै अक जो बात कविता नै ठाई सै उसमैं साफ झलकै सै अक दोनों हालातां मैं महिला का अवमूल्यन सै। औरत की खातर एक इन्सान के रुप मैं दोनों सौदे अपमान जनक सैं।आई किमै समझ मैं अक गई सिर पर कै!

रणबीर