सम्भलो
संभालो बारूद के ढेर पर बैठे हैं हम । फांसी का कर या गोली से हो जाती हैं कई जान कम । गाँधी के देश में कैसे और क्यों उगी बंदूकों की फसल ? भारतीय संस्कृति क्यों हो रही विफल ? कहाँ गयी हम सब की वह भारतीय अक्ल । गाँधी को भी भुला दिया ज्यों ही किया क़त्ल । छोटे हथियारों का मामला दूजा नंबर था कुछ दिन पहले अब पहला नंबर हो गया हथियारों की खरीद में । कानून 1858 का आज भी हमारा है । मुझे बदल दो मैं तो हो गया नाकारा हूँ वह बोल रहा । उन्नीस सौ बासठ के बस एक संसोधन का सहारा है । सब चलता है यारो यहाँ सब मत खाओ गम । एक तरफ ये नारा होड़ ख़त्म हो हथियारों की । दूजे तरफ नुमाईश लगाई दुकानदारों की । छह सौ देशी और विदेशी से ज्यादा इनके ही सरदारों की । हथियारों को बनाया तो चलेंगे किते ना किते तो जरूर कहीं पर । चलैंगे तो ज्यान भी लेंगे पास कै फेर दूर किते । हथियार ख़त्म हों नारे बस हवा में घुमते रहते हैं अब कभी कभी , हथियारों का व्योपार बढ़ रहा है । बारूद के ढेर पर बैठे सां हम । तो के किया जावै ? म्हारे बच्चों को तो ट्यूशन तैं फुरसत कोणी , पड़ौसी का बच्चा भगत सिंह ज्यावै । अर इस गंदे समाज नै ठीक करने का बीड़ा ठा लेवै । सौ दो सौ रपिये की मदद साल छह मिहने मैं म्हारे तैं भी आकै लेज्यावै । इन जालिमों की हकूमत कब तक चलेगी रै ? गरीबों की बात कदे तो बनैगी रै । सवाल यु सै अक बारूद के ढेर पर तो भारत देश बैठाया सै फेर करया जावै तो के करया जावै ? एक कवी की लिखी कुछ बातें शायद इस बख्त सही हों -- भारत को सही तस्वीर की फिलहाल जरूरत सै । बुराई फैलती जा रही थी इस भारत के समाज मैं । सावित्री बाई फुल्ले और ज्योतिबा फुल्ले उभरे थे नए अंदाज मैं । दोहों वाले उस कबीर की फिलहाल जरूरत सै । अंडी फंडी पाखंड के खिलाफ जमकै
लड़ी लड़ाई जिसनै उस आंबेडकर फ़कीर की जरूरत सै । 1857 मैं हजारों फांसी का फंदा चूम गए । राज गुरु सुख देव आजादी की खातर झूम गए । उस भगत सिंह रणधीर की फिलहाल जरूरत है । जालियां वाले बाग़ मैं जिसने गोलियां चलायी देखो । जालिम डायर पै लन्दन मैं गोली चलायी देखो । उस उधम सिंह बलबीर की जरूरत सै । मजदूर किसान की खातर जिंदगी ही गुजार दई । मार्क्स नै दुनिया बारे एक नयी विचार दई । मार्क्सवादी सूरवीर की की फिलहाल जरूरत है । महिला दलित का दोस्त हो जो आज चाहिए समाज इसा । पूंजीवादी राज अन्यायी खत्म हो मंदी का राज ईसा । इसकी तोड़ने की जंजीर फिलहाल जरूरत सै । पूरा समाज रसातल की तरफ धकेल जा रहा है यो । तलछट पे फैंके लोगों को समझ आ रहा है यो । एक पैनी नजर गंभीर की फिलहाल जरूरत सै । आज बख्त पीस्से आल्याँ का सै बाजार का सै । फेर बख्त गरीब मानस का जरूर आवैगा । हैवानियत के उप्पर इंसानियत एक दिन जीत जरूर दर्ज करवावैगी । फेर यूं अपने आप कोन्या होवै । समझदार अर ईमानदार लोगों नै आगै आना पड़ेगा । आज के सिस्टम का गोरख धंधा समझना और समझाना पड़ैगा । संघर्ष का बिगुल मिलजुल कै और तेज़ी तैं बजाणा पड़ै गा ॥
रणबीर
22 . 3 . 2017