शनिवार, 15 जुलाई 2017

अंतरजातीय ब्याह पै ईनाम

अंतरजातीय ब्याह पै ईनाम

सरकार नै न्यारी-न्यारी जातियां के बीच ब्याह नै बढ़ावा देवण की खातर एक योजना चालू करी सै। इसका नाम सै अंतरजातीय विवाह पुरस्कार योजना। सवाल यू सै कि सरकार नै इसी योजना बणावण की ज़रूरत क्यों पड़ी? ब्याह तो असल मैं निजी मसला सै इसमैं सरकार की दखलन्दाजी का के काम?
बात या सै अक म्हारे देश मैं जात-पात की जड़ इतनी गहरी सै बस बूझो मतना। अर इस करकै म्हारे निजी सम्बंधां पै भी बुरा असर पड़ै सै। जड़ै जात के आधार पै किसे आदमी की सामाजिक हैसियत आंकी जान्ती हो उड़ै इन्सान की इन्सानियत कै तो झटका लागणा लाजमी सा सै। एक इन्सान की के जात सै। याहे ना अक ओ किस परिवार मैं पैदा हुया सै? फेर इस बात पर इन्सान का तो बस कोण्या चालता। ओ किस जात के परिवार मैं पैदा हुया, या ना तो बड़प्पन की बात होणी चाहिए अर ना या छोटेपन की बात होणी चाहिए। के कोए इस करकै छोटा कै बड्डा होज्या सै अक ओ किस खास परिवार मैं पैदा हुया सै। सोचण की बात या सै कि माणस की कीमत उसका मोल असल मैं किन बातां तै तय हो सै? कै होणा चाहिये।
सांच बात तो या सै अक किसे बी इन्सान का समाज मैं कद उसके कर्म, उसके व्यवहार, समाज की खातर उसनै के करया सै, ओ कितना भला सै, कितना मेहनती सै अर कितना ईमानदार सै, इन चीजां तै तय होणा चाहिए। कुदरत नै भी कुल मिलाकै सारे इन्सान एक जिसे बणाए सैं। इस तरियां जै ब्याह की बात करैं तो यो दो इन्सानां के बीच का आपसी बंधन सै अर यू बंधन उनकी आपसी समझ अर प्यार पै होणा चाहिए। इसके बीच मैं ऊंच नीच अर जाति की रूकावटां का ल्याणा इन्सानां का अपमान करणा सै, इन्सानियत का अपमान सै। इसे ब्याह शादियां ताहिं समाज मैं बढ़ावा मिलणा चाहिए। जो लड़का या लड़की इसे ब्याह करैं सैं उन ताहिं समाज मैं इज्जत जरूर मिलनी चाहिए। एक इज्जत की जिंदगी जीणा सारे इन्सानां का हक सै चाहे वे किसे भी जात मैं पैदा होरे सैं। दूसरी जाति की लड़की कै लड़के तै ब्याह करण पै म्हारी सरकार नै इनाम देवण की योजना बणा राखी सै। इस योजना का नाम सै अर्न्तजातीय विवाह पुरस्कार। यो इनाम 25 हजार रुपइये का नकद इनाम सै। जै ऊँची जाति का लड़का कै लड़की अनुसूचित जाति के लड़के कै लड़की तै कानूनी रूप तै ब्याह करैं सैं तो इसे ब्याह ताहिं बढ़ावा देवण की खातर सरकार ईनाम देवै सै। नीची जातियां भी जो एक दूसरे की साथ छुआछूत करैं सैं उनके बीच मैं बीजै ब्याह हो सै तो उन ताहिं बी इनाम दिया जावै सै। हिमाचल प्रदेस में ब्याह खातर अर्जी देणी हो सै। इस खातर अर्जी देवण आले नै अपणे विवाह का पंचायत सैक्टरी, कै सब रजिस्ट्रार के दफ्तर मैं ब्याह का पंजीकरण करवाणा ही सै।
इसकी और जानकारी किसे वकील तै बी ली जा सकै सै। सविता फत्ते नै बोली हरियाणा मैं नहीं सै के इसा कानून। फत्ते बोल्या हरियाणा मैं तो पंचायतां का तथाकथित कानून चालै सै जिसमैं अंतरजातीय ब्याह करण आले युवक युवती ताहिं फांसी के फंदे का ईनाम दिया जावै सै। सविता बोली ईबकै जै म्हारे गाम गुहांड मैं कोए इसा अंतरजातीय ब्याह करैगा तो हमनै उसकी मदद करनी चाहिए। सत्ते बोल्या ये बात तो ठीक सै फेर ये खापां आली पंचायत तो हमनै बी जात बाहर कर देंगी। जै ये म्हारे बरगे दो च्यारां नै बी फांसी का हुकम सुणा दे सैं कै मरवा दें सैं जिब्बै बात बणैगी। फेर हमनै ईब सिर पै कफन बांध लिया सै, हम पाछै कोण्या हटां।

जिसकी लाठी उसकी भैंस

जिसकी लाठी उसकी भैंस
जिब तै या सृष्टि रची गई अर माणस नै इस धरती पै पां धरया उसे बख्त तै दुनिया की राजनीति का विधान था अक ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’। फेर सहज-सहज समाज मैं विकास हुया अर लोगां धोरै पीस्सा कट्ठा होवण लागग्या। चीजां के आदान-प्रदान की जगां जिब पीस्से (पूंजी) नै ले ली तो पूंजी किसकै धोरै कितनी से योहे योग्यता का पैमाना शुरू होग्या। या पूंजी सहज-सहज उन लोगां के हाथां मैं कट्ठी होन्ती गई जो औरां की मेहनत का शोषण करकै, औरां नै धोखा दे कै यू पीस्सा कमावण लागे। इसके साथ-साथ एक बात और होन्ती गई अक जिस धोरै पीस्से की ताकत फालतू होगी उसे का राजनीति पै भी कब्जा होन्ता चाल्या गया। राजनीति की चाबी भी पीस्से आले माणसां की गोज में चाली गई। इन पीस्से आल्यां मैं भौतिक संसाधनां नै अपने कब्जे मैं राखण की ताकत बी आगी अर ये पहलवानी ताकत की खरीद भी जितनी चाहवैं उतनी कर सकैं थे। जड़ सौ की बात या सै अक इन सारी बातां का नतीजा यू हुया अक इस पूंजी के राज मैं माणस के मुकाबले मैं माणस के हाथां तैं बणाई औड़ इस पूंजी की ताकत बढ़ती ए चाली गई।
इस पूंजी के राज मैं माणस की कीमत घटगी अर पूंजी की कीमत बढ़गी। अर नतीजे के तौर पै माणसां की रोटी, लते अर मकान की बुनियादी जरूरत भी पूरी नहीं करी जा सकी। पूंजी के राज मैं धनी वर्ग एकला माणस के मूल्यां मैं गिरावट कोण्या ल्यावन्ता, बल्कि मानवाधिकारां की कोताही भी बरते सै। पूंजी के राज के इस चरित्र नै इस दुनिया मैं एक नये राज के विचार को जनम दिया। कार्ल मार्क्स नै मानव-इतिहास का वैज्ञानिक सिद्धान्त बनाया। एक इसे राज का सपना लिया जिसमैं माणस की समता अर गरिमा की पक्की गारंटी करी जा सकै। पूंजी के राज के मुकाबले जनता का राज हो, पूंजी के राज मैं जड़ै भौतिक संसाधनां, परिसंपत्तियां अर धन का इस्तेमाल मुट्ठी भर धनी लोगां की खातर हो सै, वो ना रहै। कई रमलू बरगे न्यों कैहदें सैं अक ये के होवण की बात सैं। फेर इस बात मैं शक नहीं अक जड़ै बी जनता का राज असल मैं आया उड़ै उसकी भोजन, लत्ते, कपड़े, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, वृद्धावस्था संरक्षण आदि जरूरत का पूरा करण का काम खूब हुया। जनता के इस राज मैं इन पूंजी के राज आल्यां नै प्रपंच रचकै अर जनता की कमजोरियां का फायदा ठाकै, जनता का राज चलावण आल्यां मैं भ्रम पैदा करकै, उन देशां मां तै जनता का राज खत्म करकै फेर हटकै पूंजी का राज चला दिया। पूंजी के राज आल्यां नै ठाड्डा प्रचार करया अक पूंजी के राज तै न्यारा जनता की मुक्ति का और कोए भी राह कोण्या। कई देशां के जनता के राज, साम, दाम, दंड, भेद के गुर अपणां कै पूंजी आल्यां नै ढाह दिये।
आज पूरी दुनिया मैं पूंजी के राज आल्यां की बहोतै ठाड्डी यूनियन सै। जिसका प्रधान अमरीका सै अर ये ‘जी-सेवन’ के देश पूरी दुनिया के गरीब देशां पै भी अपणे बरगे अपणे तै माड़े पूंजी आल्यां के मांह कै पूरी दुनिया मैं पूंजी के राज का घघाटा ठारे सैं। विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष अर विश्व व्यापार संगठन की त्रिमूर्ति इनका सबतै कारगर हथियार सै। इस त्रिमूर्ति का काम यो सै अक पूंजी का राज पूरी दुनिया मैं छाज्या अर जड़ै कड़ै भी जनता का राज थोड़ा-घणा बचरया सै अर कै हटकै बणण की आस सै उड़ै यू जनता का रोज मूंधा मार दिया जावै। बाणगी खातर अमरीका को बहुराष्ट्रीय कंपनी सै माइक्रोसौफट अर उसका मालिक सै विलियम गेट्स अर उसकै धोरै सै 90 बिलियन अमरीकी डालर मतलब 387000 करोड़ रपिये की कीमत की धरोहर। आज पूरी दुनिया मैं 457 अरबपति सैं जिनके हाथ मैं धरती के लगभग आधे देशां के सकल घरेलू उत्पाद के बराबर की धन दौलत सै। दुनिया के सबतै अमीर 225 लोगां धोरै लगभग एक ट्रिलियन अमरीकी डालर (42,00,000 करोड़ रपिये) की संपत्ति सै जो दुनिया के 250 करोड़ गरीब लोगां की आय के बराबर सै। भारत मैं टाटा धोरै 37510 करोड़ रपिये बिड़ला के धोरै 19345 करोड़ रपियां की परिसंपत्तियां सैं। अर अडानी अम्बानी जी के तो कहणे ए के सैं।


युवाओं, दलितों और महिलाओं से उम्मीदें

युवाओं, दलितों और महिलाओं से उम्मीदें
गांव की इज्जत के नाम पर होने वाली जघन्य हत्याओं की हरियाणा में बढ़ोत्तरी हो रही है। समुदाय, जाति या परिवार की इज्जत बचाने के नाम पर महिलाओं को पीट-पीट कर मार डाला जाता है। उनकी हत्या कर दी जाती है या उनके साथ बलात्कार किया जाता है। एक तरफ तो महिला के साथ वैसे तो इस तरह का व्यवहार किया जाता है जैसे उसकी अपनी कोई इज्जत ही न हो, वहीं उसे समुदाय की इज्जत मान लिया जाता है और जब समुदाय बेइज्जत होता है तो हमले का सबसे पहला निशाना वह महिला और उसकी इज्जत ही बनती है। अपनी पसंद से शादी करने वाले युवा लड़के लड़कियों को इस इज्जत के नाम पर सार्वजनिक रूप से फांसी पर लटका दिया जाता है। यहाँ के प्रसिद्ध सांगियों व लोक कवियों हरदेवा, लख्मीचंद बाजे, भगत, मेहर सिंह, मांगेराम, चंद्रवादी, धनपत, खेमचंद व दयाचंद की रचनाओं का आलोचनात्मक गुणगान तो बहुत किया गया या हुआ है मगर उनकी आलोचनात्मक समीक्षा की जानी अभी बाकी है। रागनी कंपीटीशनों का दौर एक तरह से काफी कम हुआ है। आडियो कैसटों की जगह, सीडी लेती जा रही है जिनकी सार वस्तु में पुनरुत्थानवादी व उपभोक्तावादी मूल्यों का तालमेल साफ नजर आता है। हरियाणा के लोकगीतों पर भी समीक्षात्मक काम कम हुआ है।
गहरे संकट के दौर में हमारी धार्मिक आस्थाओं को सांप्रदायिकता के उन्माद में बदलकर हमें जात, गोत्र व धर्म के ऊपर लड़वा कर हमारी इन्सानियत के जज्बे को, हमारे मानवीय मूल्यों को विकृत किया जा रहा है। गऊ हत्या या गौरक्षा के नाम पर हमारी भावनाओं से खिलवाड़ किया जाता है। दुलीना हत्याकाण्ड और अलेवा काण्ड गऊ के नाम पर फैलाए जा रहे जहर का ही परिणाम हैं। इसी धार्मिक उन्माद और आर्थिक संकट के चलते हर तीसरे मील पर मंदिर दिखाई देने लगे हैं।
सांस्कृतिक स्तर पर हरियाणा के चार पांच क्षेत्र हैं और इनकी अपनी विशिष्टताएं हैं। हर गाँव में भी अलग-अलग वर्गों व जातियों के लोग रहते हैं। जातीय भेदभाव गहरी जड़ें जमाए है। आर्थिक असमानताएं बढ़ रही हैं। सभी सामाजिक व नैतिक बन्धन तनावग्रस्त होकर टूटने के कगार पर हैं। बेरोजगारी बेतहाशा बढ़ी है। मजदूरी के मौके भी कम से कमस्तर होते जा रहे हैं। मजदूरों का जातीय उत्पीड़न भी बढ़ा है। दलितों पर अन्याय बढ़ा है। कुएँ अभी भी अलग-अलग हैं। परिवार के पितृसत्तात्मक ढांचे में परतन्त्रता बहुत तीखी हो रही है। पारिवारिक रिश्ते नाते ढहते जा रहे हैं। जनतान्त्रिक परिवार बन नहीं पा रहे। इस सबके चलते महिलाओं और बच्चों पर काम का बोझ बढ़ता जा रहा है। मजदूर वर्ग सबसे ज्यादा आर्थिक संकट में है। खेत मजदूरों, भट्ठा मजदूरों, दिहाड़ी मजदूरों व माइग्रेटेड मजदूरों का जीवन-संकट गहराया है। लोगों का गाँव से शहर को पलायन बढ़ा है। कृषि में मशीनीकरण बढ़ा है। तकनीकवाद का जनविरोधी स्वरूप ज्यादा उभर कर आया है। जमीन की ढाई एकड़ जोत पर 80 प्रतिशत के लगभग किसान पहुँच गया है। ट्रैक्टर ने बैल की खेती को पूरी तरह बेदखल कर दिया है। बैल गया तो गाय की महत्ता भी गिर गई। थ्रेशर और हारवेस्टर कम्बाइन ने मजदूरी के संकट को बढ़ाया है। श्यामलात जमीन खत्म हो गई है। कब्जे पर ले ली गई या बाँट ली गई है। अन्न की फसलों पर संकट है। पानी की समस्या ने विकराल रूप धारण कर लिया है। नए बीज, नए उपकरण, रासायनिक खाद व कीटनाशक दवाओं के क्षेत्र में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की दखलन्दाजी और मनमानी लूट ने इस सीमांत किसान के संकट को बहुत बढ़ा दिया है। किसान वर्ग के इस हिस्से में उदासीनता गहरे पैठ गई है और एक निष्क्रिय परजीवी जीवन ताश खेल कर बिताने की प्रवृत्ति बढ़ी है। हाथ से काम करके खाने की प्रवृत्ति का पतन हुआ है। साथ ही साथ दारू व सुलफे का चलन भी बढ़ा है और स्मैक जैसे नशीले पदार्थ की खपत बढ़ी है। सच में कहें तो युवा को नशे के माध्यम से दिशाभ्रमित करने का जाल बिछाया जा रहा है। मगर बड़े हिस्से में एक बेचैनी भी बखूबी देखी जा सकती है। मल्टीनेशनल मालामाल हो रहे हैं, भारतीय कारीगर भुखमरी की ओर जा रहा है। आसामी सिल्क, बालूचेरी की कारीगरी, कटकी, पोचमपाल्ली या बोकई के कारीगरों को मल्टीनेशनल की होड़ में खड़ा कर दिया गया है। अब इस गैरबराबरी की होड़ में भारतीय कारीगर चाहे वह किसी भी क्षेत्र का हो, कैसे टिक पायेगा? दुनिया का 1/8 भाग भूखा है। अब मैकडोनाल्ड को ही लिया जाए यह महानगरों तक कहाँ सीमित है? अब तो शहर शहर, गली-गली में मैकडोनाल्ड, हमारे बच्चों को बर्गर, पिज्जा-बर्गर के उपहार देकर खाने की आदत डालेगा, रिझायेगा, फंसाएगा ताकि कल को वह पूरी, पराठा, इडली-डोसे भूल जाएं और ‘‘बर्गर-पिजा’’ के बगैर रह ही न पाए। बच्चे ही देश का भविष्य हैं जिसने उनको जीता उसी की तूती बोलेगी कल पूरे देश में। आज भारत में युवा की संख्या सबसे ज्यादा है। पहले जैसे साम्राज्य स्थापित करने के लिए देश विशेष की संस्कृति कारीगरी, हुनर, व्यवसाय एवं शिक्षा को नष्ट किया जाता था ताकि साम्राज्य की पकड़ देश विशेष पर और मजबूत हो। इसी प्रकार व्यवसाय, शिक्षा एवं संस्कृति पर ही हमला बोला जा रहा है और हमारे मीडिया इस हमले में मल्टीनेशनल की भरपूर सहायता कर रहे हैं।
हरियाणा में अब गुंथा हुआ आटा, अंकुरित मूंग, चना, बाजरा, मक्की इत्यादि भी विदेशी कम्पनियाँ लाया करेंगे। कुकीज, चाकलेट व केक हमारे घर की शोभा होंगे, जलेबी और रसगुल्ले अतीत की यादगार होंगे। भारतीय कुटीर उद्योग के साथ-साथ अन्य कम्पनियां भी मल्टीनेशनल के पेट में चली जाएंगी। सवाल यही है कि क्या बिना किसी विचार के इतना अन्याय से भरा असमानताओं पर टिका समाज टिका रह सकता है? यदि नहीं तो इसके ठीक उलट विचार भी अवश्य है जो एक समता पर टिके न्यायपूर्ण समाज की परिकल्पना रखता है। उस विचार से नजदीक का संबंध बनाकर ही इस बेहतर समाज के निर्माण में हम अपना योगदान दे सकते हैं। इसके बनाने के सब साधन सी दुनिया में मौजूद हैं। जरूरत है उस नजर को विकसित करने की। आज मानवता के वजूद को खतरा है। यह एक देश का सवाल नहीं है। पूरी दुनिया का सवाल है। जिस रास्ते पर दुनिया अब जा रही है इस रास्ते पर मानवता का विनाश निश्चित है। नव दुनिया यह सब समझ रही है। हरियाणावासी भी समझ रहे हैं। मानवता अपनी गर्दन इस वैश्वीकरण की कुल्हाड़ी के नीचे नहीं रखेगी। मानवता का जिन्दा रहने का जज्बा और मनुष्य के विचार की शक्ति ऐसा होना असम्भव कर देगी। हरियाणा में नव जागरण ने अपने पाँव रखे हैं। युवा लड़के-लड़कियां, दलित और महिलाएं इसके अगवा दस्ते हैं और समाज सुधार का काम अपनी दिशा अवश्य पकड़ेगा। मानवता को नष्ट नहीं होने दिया जाएगा।



आर्थिक अगड़े, सामाजिक पिछड़े

आर्थिक अगड़े, सामाजिक पिछड़े
हरियाणा के समर्थन और सुरक्षा के माहौल में यहां के किसान, मजदूर - महिला और पुरुष ने अपने खून पसीने की कमाई से नई तकनीकों, नए उपकरणों, नए खाद बीजों व पानी का भरपूर इस्तेमाल करके खेती की पैदावार को एक हद तक बढ़ाया, जिसके चलते हरियाणा के एक तबके में संपन्नता आई, मगर हरियाणवी समाज का बड़ा हिस्सा इसके वांछित फल नहीं प्राप्त कर सका। यह एक सच्चाई है कि हरियाणा के आर्थिक विकास के मुकाबले में सामाजिक विकास बहुत पिछड़ रहा है। ऐसा क्यों हुआ? यह एक गंभीर सवाल है। हरियाणा के सामाजिक-सांस्कृतिक क्षेत्र पर शुरू से ही इन्हीं संपन्न तबकों का गलबा रहा है।
देश के विभाजन के वक्त जो तबके हरियाणा में आकर बसे उन्होंने हरियाणा की दरिद्र संस्कृति को कैसे प्रभावित किया इस पर भी गंभीरता से सोचा जाना शायद बाकी है। क्या हरियाणा की संस्कृति महज रोहतक, जींद व सोनीपत जिलों की संस्कृति है? क्या हरियाणवी डायलेक्ट एक भाषा का रूप ले सकता है? इस पर समीक्षात्मक रुख अपनाकर इसे विश्लेषित करने की आवश्यकता है। क्या पिछले दस पन्द्रह सालों में और ज्यादा चिंताजनक पहलू हरियाणा के सामाजिक-सांस्कृतिक माहौल में शामिल नहीं हुए हैं। व्यक्तिगत स्तर पर महिलाओं और पुरुषों ने बहुत सी सफलताएं हासिल की हैं।
समाज के तौर पर 1857 की आजादी की पहली जंग में सभी वर्गों, सभी मजहबों व सभी जातियों के महिला पुरुषों का सराहनीय योगदान रहा है जिसका असली इतिहास भी कम लोगों तक पहुंच सका है। हमारे हरियाणा के गांवों में पहले भी और कमोबेश आज भी गाँव की संस्कृति, गांव की परम्परा, गांव की इज्जत, गांव की शान के नाम पर बहुत छल-प्रपंच रचे गये हैं और वंचितों, दलितों व महिलाओं के साथ न्याय की बजाए बहुत ही अन्यायपूर्ण व्यवहार किए जाते रहे हैं। उदाहरण के लिए हरियाणा के गांवों में एक पुराना तथाकथित भाईचारे व सामूहिकता का हिमायती रिवाज रहा है कि जब भी तालाब की खुदाई का काम होता है तो पूरा गांव मिलकर इसको करता है। रिवाज यह रहा है कि गांव की हर देहल से एक आदमी तालाब की खुदाई के लिए जाएगा। पहले हरियाणा के गांव की जीविका पशुओं पर आधारित रही है। गांव के कुछ घरों के पास 100 से अधिक पशु होते थे। इन पशुओं का जीवन गांव के तालाब के साथ अभिन्न रूप से जुड़ा होता था। गांव की बड़ी आबादी के पास न जमीन होती थी न पशु होते थे।
अब ऐसे हालात में एक देहल पर तो सौ से ज्यादा पशु हैं वह भी एक आदमी खुदाई के लिए भेजता था और बिना जमीन व पशु वाला भी अपनी देहल से एक आदमी भेजता था। यह तो महज एक उदाहरण है परम्परा में गुंथे अन्याय को न्याय के रूप में पेश करने का। महिलाओं के प्रति असमानता व अन्याय पर आधारित हमारे रिवाज, हमारे गीत, चुटकले व हमारी परम्पराएं आज भी मौजूद हैं। इनमें मौजूद दुखांत को देख पाने की दृष्टि अभी विकसित होनी बाकी है। लड़का पैदा होने पर लड्डू बाँटना, मगर लड़की पैदा होने पर मातम मनाना, लड़की होने पर जच्चे की छठ मनाना, लड़के का नामकरण करना, श्मशान घाट में औरत के जाने की मनाही, घूँघट करना, यहाँ तक कि गाँव की चौपाल से घूँघट करना आदि बहुत से रिवाज हैं जो असमानता को बढ़ावा देते हैं।
बाजार के कुप्रभावों के चलते महिला पुरुष अनुपात चिंताजनक स्तर तक चला गया है, मगर पढ़े-लिखे हरियाणवी इनका निर्वाह करके बहुत फख्र महसूस करते हैं। यह केवल महिलाओं की संख्या कम होने का मामला नहीं है बल्कि सभ्य समाज में इंसानी मूल्यों की गिरावट और पाशविकता को दर्शाता है। हरियाणा में पिछले कुछ सालों से यौन अपराध, दूसरे राज्यों से महिलाओं को खरीदकर लाना और यौन शोषण तथा बाल विवाह आदि का चलन बढ़ा है। सती, बाल विवाह, अनमेल विवाह के विरोध में यहाँ बड़ा सार्थक आंदोलन नहीं चला। स्त्री शिक्षा पर बल रहा मगर कोएजूकेशन का विरोध किया गया, स्त्रियों की सीमित सामाजिक भूमिका की भी हरियाणा में अनदेखी की गई। उसको अपने पीहर की संपत्ति में से कुछ नहीं दिया जा रहा। जबकि इसमें उसका कानूनी हक है। चुन्नी उढ़ा कर शादी करके ले जाने की बात चली है और दलाली, भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी से पैसा कमाने की बढ़ती प्रवृत्ति चारों तरफ देखी जा सकती है। यहां समाज के बड़े हिस्से में अंधविश्वास, भाग्यवाद, छुआछूत, पुनर्जन्मवाद, मूर्तिपूजा, परलोकवाद, पारिवारिक दुश्मनियां, झूठी आनबान के मसले, असमानता, पलायनवाद, जिसकी लाठी उसकी भैंस, मूंछों के खामखा के सवाल, परिवारवाद, परजीविता, तदर्थता आदि सामंती विचारों का गहरा प्रभाव नजर आता है। ये प्रभाव अनपढ़ ही नहीं पढ़े लिखे लोगों में भी कम नहीं हैं। हरियाणा के मध्यमवर्ग का विकास एक अधखबड़े मनुष्य के रूप में हुआ।
पंचायतें महिला विरोधी व दलित विरोधी फैसले करती रहती हैं और इन्हें नागरिक को मानने पर मजबूर करती हैं। राजनीति व प्रशासन मूक दर्शक बने रहते हैं। यह अधखबड़ा, मध्यमवर्ग भी कमोवेश इन पंचायतों के सामने घुटने टिका देता है। हरियाणा में सर्वखाप पंचायतों के सामने घुटने टिका देता है। हरियाणा में सर्वखाप पंचायतों द्वारा जाति, गोत, संस्कृति, मर्यादा आदि के नाम पर महिलाओं के नागरिक अधिकारों के हनन में बहुत तेजी आई है और अपना सामाजिक वर्चस्व बरकरार रखने के लिए जहाँ एक ओर से जातिवादी पंचायतें घूंघट, मार पिटाई, शराब, नशा, लिंग पार्थक्य, जाति के आधार पर अपराधियों को संरक्षण देना आदि सबसे पिछड़े विचारों को प्रोत्साहित करती हैं, वहीं दूसरी ओर लड़कियों की सामाजिक पहलकदमी और रचनात्मक अभिव्यक्ति को रोकने के लिए तरह-तरह के फतवे जारी करती हैं। जौंधी व नयाबास की घटनाएं तथा इनमें इन पंचायतों द्वारा किए गए फैसले जीते जागते उदाहरण हैं। युवा लड़कियां केवल बाहर ही नहीं बल्कि परिवार में भी अपने लोगों द्वारा यौन हिंसा और दहेज हत्या की शिकार हो रही हैं।

मरया औड़ काटड़ा़ और हाम

मरया औड़  काटड़ा़ और हाम
हरियाणा के पूर्वजां नै एक परम्परा बणाई। किसनै बणाई अर कद बणाई इस बात का किसे किताब मैं जिकरा कोण्या पान्ता। जै किसै नै बेरा हो अक कूणसी इतिहास की किताब मैं लिख राख्या सै तो हमनै भी बतावण का कष्ट करैं। वा परंपरा सै अक जिब भैंस का काटड़ा मर ज्या तो भैंस दूध देवण मैं आन्ना-कान्या करया करै। अर भैंस की दो खड़ की आन्ना कान्नी भी भैंस के मालिक नै बहोत महंगी पड़ज्या सै। इस बात नै जो भैंस पाल कै दूध बेच कै गुजारा करैं सैं उननै इस बात का खूबै ए बेरा सै। लोगां नै एक नयाब तरीका टोह लिया भैंस पुसावण का। अक मरे औड़ काटड़े के सिर-मुंह अर धड़ मैं भूस्सा भरवा ल्यो अर जिब धार काढ़णी हो तो भैंस कै साहमी उसनै धर्य द्यो। भैंस उसनै चाट लेगी अर दूध देगी। खूंटा ठोक नै भी दो च्यार जागां यो सांग देख्या अर जाणना चाह्या अक इसका नाम के सै? जित बी कोए फेट ज्या खूंटा ठोक उसै तै इसका नाम बूझण लागज्या। सारे न्यों कहवैं अक सै तो सई इसका किमै नाम पर के सै न्यों बेरा ना। कई हरियाणवी संस्कृति की जो कोली भरें हांडे सैं उनपै भी बूझ्या फेर वे भी सिर सा खुजा कै रैहगे। ल्यो थोड़ी-सी वार थाम बी सोच कै देख ल्यो। इतनै एक बात याद आगी अक एक बटेऊ की सुसराड़ मैं कम बण्या करदी। उसका रंग भी घणा काला था कति जैट ब्लैक। ईब कै ओ अपणी सुसराड़ गया तो उसकी सासू बहोत मीठा बोली। सांझ कै हल्वा बणाया अर खुद सासू नै थाली परोसी।
साहमी बैठकै बोली अक बेटा जितने दिन जी करै दस दिन, पन्द्रह दिन म्हिना आड़ै डट। तेरी खूब खातिर दारी करांगे। बटेऊ कै बात समझ नहीं आई अक इतनी सेवा क्यों होरी सै? सारी रात सोचदा रह्या। तड़कै ए गरम गरम परोंठे आगे। सासू राजी खुसी की बूझण लाग्यी। फेर बोली अक जितने दिन जी करै उतने दिन डटिए। बटूऊ बोल्या बिना काम न्यों खाट तोड़दा माणस आच्छा कोण्या लागदा। जै डाट्टण चाहो सो तो किमै काम बताओ। सासू बोली अक काम अर बटेऊ धोरै? बटेऊ बोल्या फेर बी माता जी किमै तो काम हो। सासू बोली अक म्हारी भैंस का काटड़ा मर र्या सै। जिब धार तड़कै सांझ काढूं तो उसके साहमी खड़या हो जाया कर। तो बात या सै अक म्हारे नेता बी अपणे मरे औड़ नेतावां की खोड़ मैं भूस्सा भरवा कै जनता नै लैक्सनां कै टाइम पुसावण नै इसका खूबै इस्तेमाल करैं सैं। तो आई याद अक भूस्स भरे औड़ काटड़ का नाम के सै? नहीं बेरा ना। एक बै फेर सोच कै देखल्यो। थोड़ा-सा दिमाग पै बोझ गेरणा सीखणा चाहिए।
जो भी आकै हमनै भकाज्या सै हम उसकी हां मैं हां करकै नाड़ हिला द्यां सां। अर फेर कहवां सां अक ओहले भाई। हमनै के बेरा था अक न्यों बणज्यागी? अर फेर ताश खेलण लाग ज्यांगे। अर कै दारू की बोतल धर कै बैठ ज्यांगे।
मजाल सै जै इस भूस्स भरे औड़, मरे औड़ काटड़ का नाम एक पोस्टकार्ड पै लिख कै अर हरिभूमि के दफतर मैं भेजद्यां। हो सकै ज्यूकर बासमती चावल का बदेसी कंपनियां नै पेटैंट करवा लिया न्योंए इसके नाम का भी वे बोतडू. के नाम तै पेटैंट करवा लें अर आपां फेर कहवां अक ओहले भाई। के बेरा था न्यों बणज्यागी? या तो बणी बैठी सै। एक बर इसका नाम अखबार मैं आज्यागा तो फेर बदेशी कंपनियां नै आसान नहीं रहवै इसका पेटैंट करवाणा। आया समझ मैं नाम अक ईब्बी नहीं आया सै? के बाट देखो सो अक खूंटा ठोक बता देगा। ना कति नहीं बतावै अर जै बताणा भी चाहवै तो किततै बतावैगा। खुदै बेरा कोण्या। फेर एक बात पक्की सै अक आपां सारे रलकै सोचांगे तो इसका नाम जरूर टोहल्यांगे। आपा मारे पार पड़ैगी। बिराणै भरोसै बैठकै कै राम के भरोसे बैठकै काम कोण्या चालै।



बुश दादा सुणिए

बुश दादा सुणिए
बुश दादा म्हारे कान्ही की राम राम तनै। मनै बहोत बिचार करया अक लिखूं अक ना लिखूं? फेर दिल कोन्या मान्या। दिल नै गवाही दी अक खुल्ली चिट्ठी ना तै गोपनीय चिट्ठी लिख दी जा फेर लिखना जरूर चाहिए। मेरी थारे तै हाथ जोड़ कै बिनती सै अक और किसे नै या चिट्ठी मतना दिखाइयो। पाछली बरियां कश्मीर विधान सभा पै बार-बार हमले (आतंकी) हुए तो हमनै थारे ताहिं जो खत लिख्या था उसनै लेकै म्हारे विपक्ष नै म्हारी खाट खड़ी करण मैं कसर कोन्या छोड्डी। कै तो इस विपक्ष नै थारे जाथर का कोनी बेरा अर कै ये म्हरी थारे कान्ही की जो श्रद्धा भक्ति सै उसनै देख कै ये जलैं सैं। जलें जांगे। इनका काम तो बस जलना ए सै। फेर दादा तों यकीन राख इनके जलण तै म्हारी भक्ति मैं कसर नहीं आवैगी, ले मनैं राम की सूं। फेर एक बात सै ज्यूकर राम जी अपने भक्तां का ख्याल राखैं सैं न्यांेए तमनै म्हारा भी ख्याल राखणा चाहिये। इसा लागै सै जणों पाछले कुछ दिनां तै थाम म्हारे तै नाराज सो। उल्टा बख्त तै हमनै थारी बहोतै घणी जरूरत सै। माड़े बख्त सैं म्हारे, हम देखैं सैं साहरे थारे। दादा तमनैं बेरा सै अक इस बख्त राहु अर केतु सारे म्हारी कुण्डली मैं कट्ठे होरे सैं। घणे कष्ट मैं सां हम। थामनै बेरा सै अक मंदिर आले उत्तर प्रदेश मैं अर साथ की साथ पंजाब मैं लैक्शन आगे। पंजाब की तो देखी जागी उड़ै तो घणे तै घणा योहे होवैगा अक कांग्रेस हटकै आज्यागी अर उसकी आपां नै घणी चिंता कोन्या। फेर उत्तर प्रदेश मैं तो म्हारै पसीने आरे सैं। दादा तमनै तो बेरा ए होगा अक म्हारे इन विपक्षी दुष्टां नै गलजोट कर लिया अर लोक मोर्चा बणा लिया। इतनै मैं एक कोन्या बात थमती दिखाई देन्ती। पिछले पांच साल मैं जो म्हारे याड़ी थे वे भी म्हारे चहोंटकी भरण लागरे सैं। हमनै तीन-तीन मुख्यमंत्री बदल कै देख लिये फेर ये विपक्षी पां नहीं टिकण देन्ते। अर याड़े की जनता भी नहीं सुधरी। हमनै इस जनता  खात्तर कै नहीं कर्या पर या या जनता हमनै झूठा कहवै सै। जनता कहवै सै अक राम के नाम पै हमनै जनता बेवकूफ बणादी अर कानून व्यवस्था टाण्ड पै धरदी। यो लैक्शन जीतना मुश्किल लागै सै। जनता नै ईब के कैहकै भकावां? पहलमैं हजारां वादे कर लिये थे पूरा कोए कर नहीं पाए। मुश्किल तै संसद पै आतंकवादियां के हमले नै राह काढ्या था। हमनै लोकसभा मैं आर-पार की लड़ाई का ऐलान कर दिया। हमनै अपणे दम पै आतंक का खात्मा करण की घोषणा कर दी। यो तै पाछै बेरा लाग्या अक गल्ती होगी। हमनै दादा थारे साहरै इसतै निपटण की घोषणा करनी चाहिए थी। इस गल्ती की सजा थामने म्हारे ताहिं संयम बरतन की बात कैहकै दे दी। हम सोचां थे हमला करकै उत्तर प्रदेश का लैक्शन आगे नै सरका ल्यांगे। फेर थारी या सजा घणी महंगी पड़दी दीखै सै दादा।
हमनै दादा थारा हरेक हुकम माण्या सै। थामनै काठमांडू मैं परवेज मुशर्रफ तै हाथ मिलावण का इशारा करया, हमनै मिला लिया। थामनै कह्या अक पोटो जारी करद्यो, हमनै कर दिया। थामनै हुकम दिया अक अपणी सरकारी पूंजी सेठां ताहिं बेच द्यो, हमनै बेच दी अर बेचण लागरे सां। थामनै कह्या छंटनी करो, हमनै हजारां लोग नौकरी पर तै ताह दिये। थामनै कह्या किसानां की सब्सिडी खत्म करद्यो, हमनै करदी। फेर दादा ईब एक बात तो म्हारी बी सुणले अक हमनै यो संयम तोड़ण की इजाजत दे दे। असल मैं हम म्हारी सीमा पै अपणी सेना खड़ी करगे, ईब उल्टी के कैहकै बुलावां? घणे नहीं तो थोड़े से तोप के गोले फोड़ण की, टैंकां नै हरकत मैं आवण की अर हजार पांच सौ जवान तै कम तै कम शहीद करावण की इजाजत दे दे। बस इसमैं ए म्हारा बी अर थारा बी बेड़ा पार होज्यागा। थारी कंपनियां नै नये ताबूत बनावण का आडर मिल ज्यागा अर कंडम हुआ औड़ गोला बारूद जो थारै धोरै सै उसने हम खरीद ल्यांगे। दादा एक बै इजाजत दे दे। म्हारे चेले चांटे युद्धोन्माद का जनून जनता के सिर पै चढ़ावण लागरे सैं। थारे हुक्म की देर सै। युद्ध के कारण जनता बाकी सब किमै भूल ज्यागी। यू.पी. अर पंजाब का लैक्शन बी।
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बुश का नया सिद्धांत

बुश का नया सिद्धांत
बुश नै साफ अर छाती काढ़ कै या बात बताई सै अक आवण आले दिनां म्हं अमरीका दुनिया म्हं के के गुल खिलावैगा। उसकी रणनीति के होगी। अमरीका पूरी दुनिया पै अपणा झण्डा अर डण्डा घुमाना चाहवै सै।
सारी दुनिया पै कब्जा करणा चाहवै सै। एक दस्तावेज त्यार करया गया सै जिसका नाम सै ‘द नेशनल सिक्योरिटी स्ट्रेटजी ऑफ यूनाइटेड स्टेट्स’। इसका मतलब सै अमरीका की राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति। यो दस्तावेज तेंतीस पेज का बताया।
अमरीकी संसद के साहमी यो दस्तावेज पेश करया सै। इस बुश-सिद्धांत की खास-खास बात के सैं? बेरा सै के? ना कोण्या बेरा लागता। तो लागदार इन बातां का बेरा तो लाणा पड़ैगा। इस म्हं दो नयी बात कही गई सैं। पहली बात तो अमरीका नै या कही सै अक जनसंहार के हथियार विकसित करण आले शत्रु देशां कै आतंकवादी ग्रुपां कै खिलाफ अमरीका पहलमै कार्यवाही कर देगा। दूसरी बात कही सै अक अमरीका इस बात की इजाजत नहीं देगा अब उसकी सैन्य सर्वोच्चता ताहिं उस ढाल की चुनौती कदे बी दी जावै जिस ढाल की शीत युद्ध के बख्तां म्हं दी गई थी।
पहली बात का मतलब यो बी सै अक अमरीका आतंकवाद के खतरे का नाम ले कै किसे बी दुनिया की संस्था तै बिना बुझे उस देश पै एकला एक हमला ठोक दे। दूसरे देशां नै देखणा पड़ैगा अक वे उन आतंकवादी देशां की मदद ना करैं।
इसका मतलब साफ सै अक अमरीका दुनिया का सबतै बड्डा ‘दादा’ पाक लिया। उसके हुक्म ना माणण आले देशां की खबर वो कदे बी अर क्यूकरै बी ले सकै सै। इसे अधिकार के हिसाब तै ओ हाल म्हं इराक नै सबक सिखावण की बात करण लागरया सै। कमाल की बात तो या सै अक दुनिया म्हं सबतै पहलम भारत नै अमरीका को इस बात का समर्थन कर दिया।
अमरीका दुनिया का सबतै बड्डा दादा से अर रहवैगा या बात मान ली। मतलब साफ सै अक बुश की दादागिरी आगै हमनै गोड्डे टेक दिये। बहाणा यू बणाया अक यू नया दस्तावेज भी पुराने दस्तावेजां जिसा सै इस म्हं नया कुछ बी कोण्या।
दूसरी बात जो बुश नै कही उसका मतलब ये सै अक अमरीका इस बात नै कति बर्दाश्त नहीं करैगा अक उसके प्रभुत्व के दायरे तै बाहर का कोए बी देश सैन्य शक्ति खड़ी करै जो अमरीका के मुकाबले की हो। ये चुनौती देवण आले देश चाहे चीन जिसे उभरते देश हों अर चाहे इराक बरगी क्षेत्रीय ताकत हों। इस तरां की इनकी हरकत बैरी की हरकत मानी जागी अर अमरीका इसे देशां कै खिलाफ किते ताहिं बी जा सकै सै। अमरीका की हां म्हं हां जितनी वार उतनी वार ठीक। अर हां म्हं हां नहीं तो फेर हमलों की खात्तर त्यार रहो।
अमरीका के हितां की अनदेखी कोए देश नहीं करैगा अर जै कोए इसा करैगा तो इसका खामियाजा भरैगा। 112 अरब बैरल के तेल भंडार की साथ ईब इराक अमरीका के निशाने पै सै। क्यूं? क्यूं के अमरीका का कहया कोण्या माणण नै त्यार।
पश्चिम एशिया एशिया म्हं इराक बरगा देश ताकतवर होज्या यू अमरीका नहीं पचा सकदा। देखिये बुश यो तेरा नया सिद्धांत कदे सारी दुनिया नै ले कै डूब ज्या अर फेर तो भी हरियाणे आल्यां की तरियां कहवै ओहले! मनै के बेरा था न्यों बणज्यागी।
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आओ आपणे मांह बी झांक कै देखलें

आओ आपणे मांह बी झांक कै देखलें
     म्हारा गाम, म्हारा भाईचारा, म्हारी इज्जत, म्हारे बालक, म्हारा गुहांड, म्हारे बेटा-बेटी, म्हारी बहु, म्हारे बाहण अर भाई। इन रिश्तयां का खोखलापन कति सबकै साहमी आ लिया। पर चाला तो योह सै अक हाम फेर बी इन रिश्तयां की कोली भरे बैठे सां। फेर गाम की इज्जत के बारे मैं म्हारी समझ के सै, इसतैं भी कई बात जुड़ै सैं। गाम की इज्जत के मायने के सैं, इस पर चर्चा अर बहस की जरूरत सै। आज गामां का के हाल हो लिया, इसपै चर्चा करण की जरूरत सै।
     इतना बुरा हाल क्यों हो लिया इस पर भी बहस चलावणी चाहिए। म्हारे मन तो साफ सैं फेर क्यों इतनी गंदगी फैलगी? म्हारी नजर मैं तो कोए खोट नहीं फेर बलात्कार करण आले लोगां की हिम्मायत मैं एसपी अर डीसी कै ट्रॉली भर भर कै कूण ले ज्यावैं सैं? दारू पीवणीयां, पीस्से खावणिया, लड़की गेल्यां छेड़खानी करणियां नै सरपंच कूण बणावै सै? गाम मैं सुलफा, दारू अर स्मैक कूण बिकवावै सै? गाम मैं वेश्यावृत्ति कूण फैलावै सै? गाम की छोरियां अर बहुआं की गेल्यां भद्दे मजाक कर टोंट कौण कसै सै? बाहण की गेल्यां चाचा कै मामा कै पड़ोस का छोरा अवैध संबंध क्यूं बणावै सै? बहू की गेल्यां सुसरा क्यों गिरकावै सै? एकली देख कै बहू की इज्जत पै हाथ क्यों उठावै सै?
     खेत-क्यार मैं कमजोर तबक्यां की औरतां गेल्या जोर-जबरदस्ती कौण करता पावै सै? नामर्दी नौजवानां मैं क्यों बढ़ती जावै सै? बाहण-भाई के रिश्ते बच कड़ै रहैं सैं? आज ताहिं किसे ऊंची जाति के खाते-पीते परिवार ताहिं फांसी का फतवा म्हारी पंचायतां नै उसके छोरे ताहिं क्यंू नहीं सुनाया? बिगाड़ करण मैं सबतै आगै सै यू छोरा। सबनै बेरा। फेर तलै ए तलै सब किमै चालै सै। ऊपर दिखाई नहीं देवणा चाहिए। जै इतनी ए चिंता सै इन पंचायतां नै गाम की इज्जत की तो इनपै क्यूं ना फांसी का हुकम? इतनी खामी आगी गामां मैं उन पर तो कदे पंचायत नहीं अर जो बालक नौजवान अपनी मर्जी तै ब्याह करकै घर बसाना चाहवैं सैं वे समाज मैं बिगाड़ करते दीखैं सैं इन असली गाम बिगाडुआं नै। एक हरिजन का छोरा अर किसी बड़ी जात की छोरी उसै गाम की आपस मैं ब्याह करलें सैं तो उन ताहिं मौत का फतवा दे दिया जावै सै। जहर दे कै मार दिये जावैं सैं। छोरी नै मामा कै खन्दा देंगे अर दस पन्दरा दिन पाछै कै म्हिने पाछै बेरा आवैगा गाम मैं, अक बिमला के पेट मैं चाणचक दर्द हुया अर वा मरगी। सारा गाम जाणै सै अक वा मारी गई सै? उसके मारण आल्यां नै उस ताहिं मारण का हक किसनै दिया? अन्तरजातीय ब्याह करया, दोनूं 18 साल तै फालतू उमर के तो गाम तीसरा तेली कूण? कानून कहवै सै अक 18 साल तै ऊपर के दो व्यस्क आपस मैं ब्याह कर सकैं सैं तो फेर ये पंचायत क्यूं रोज मौत के फतवे देवण लागरी सैं इन नौजवानां नै? म्हारा कानून, म्हारे अफसर, म्हारी पुलिस अर म्हारे नेता क्यूं इन फांसी का हुकम सुणावण आले सफेद पोश बदमाशां का विरोध नहीं करते? क्यूं इन पर कानूनी शिकंजा नहीं कस्या जान्ता? आपस मैं ब्याह करणा जुल्म कड़ै सै? जै जुल्म नहीं तो फेर ये ब्याह करणिये रोज क्यूं फांसी तोड़े जावण लागरे सैं? क्यूं हम चुप्पी साधरे सां? हमनै के हक सै किसे की ज्याण लेवण का? बहोत हो लिया। ईब तो इस बर्बरता का खात्मा होणा ए चाहिए। किसे नै किसे नै तो आगै इन नौजवानां की हिम्मायत मैं आणा पड़ैगा। खूंटा ठोक तो लिया आ बाकी थारा थामनै बेरा होगा।

गो-मांस भक्षण का निराधार प्रलाप


दैनिक हरिभूमि दिनांक 26 अक्तूबर के संपादकीय पृष्ठ पर किन्हीं खूंटा ठोक ने ‘गऊ बचाओ माणस मारो’ शीर्षक से जो लेख लिखा है वह घोर आपत्तिजनक और सर्वथा मिथ्या है। उनके अनुसार ‘‘एक सवाल तो साफ सै अक गाय म्हारी माता कदे कदीमी जमाने तै नहीं सै। गाय का मांस भी म्हारे पूर्वज खूब खाया करते। म्हारे पूर्व आर्य थे या हम मानां सां। म्हारे ग्रंथां म्हं गऊ मारके उसका भोज करण का जिकरा एक जागां नहीं कई जागां म्हं कर राख्या सै। मनुस्मृति अध्याय-तीन श्लोक 271 म्हं लिख राख्या सै अक गाय, बर्धी का मांस अर दूध अर दूध तै बणी चीजां तै पितरां का तर्पण करण तैं बारह साल तांहि तृप्त रहवैं सैं।’’ देखिये मनुस्मृति अध्याय-3 श्लोक 271 इस प्रकार है -
संवत्सरं तु गव्येन पयसा पायसेन च।
वार्ध्रीणसस्य मांसेन तृप्तिर्द्वादशवार्षिकी।
यहां पर बिल्कुल स्पष्ट लिखा है - ‘गव्येन पयसा पायसेन च’ गाय के दूध से और दूध से बनी पायस (खीर) से एक वर्ष तक तृप्ति होती है। गाय के मांस का यहां कोई ‘जिकरा’ नहीं है। वार्ध्रीणस के मांस से बारह वर्ष की तृप्ति लिखी है। मनुस्मृति की टीका में कुल्लूकभट्ट ने ‘वार्ध्रीणस’ शब्द का अर्थ लिखा है - ऐसा सफेद बूढ़ा बकरा जिसकी अनेक संतान हो चुकी हों, जो क्षीणशक्ति हो और पानी पीते समय जिसके लंबे दोनों कान और जीभ जल का स्पर्श करते हों।
ध्यान रहे, इस अध्याय के 122 से 284 संख्या तक के श्लोकों में मृतक श्राद्ध का वर्णन होने से ये श्लोक प्रक्षिप्त हैं। मनु ने जीवित पितरों के श्राद्ध का विधान किया है (3.80-82) मृतक-श्राद्ध मनु की मान्यता के विरुद्ध है। दूसरा मिथ्याकथन - ‘‘वशिष्ठ स्मृति के चौथे अध्याय म्हं लिख राख्या बताया अक पूजा के खात्तर तगड़ा बुलध अर बकरा पकाणा चाहिए।’’
इस भाषा से प्रतीत होता है कि लेखक ने वशिष्ट स्मृति देखी ही नहीं। वशिष्ठ स्मृति के चौथे अध्याय में 131 श्लोक हैं, जिनमें गृहस्थ धर्म के अंतर्गत विवाह, गर्भाधान और सीमन्तोन्नयन संस्कारों का वर्णन है। मैंने पूरे अध्याय का पाठ किया, किसी भी श्लोक में तगड़े बैल, बकरा पकाने की चर्चा नहीं है। तीसरा प्रसंग - ‘‘बृहदारण्यकोपनिषद् 6.4.18 म्हं लिख्या सै अक गुणीपुत्र की प्राप्ति के खात्तर गाय अर सांड का मांस खाणा चाहिए।... पत्नी की गेल्यां मिलकै सांड अर बुलध का मांस घी भात की साथ खाणा चाहिए।’’ बृहदारण्यकोपनिषद् शतपथब्राह्मण का अंतिम भाग है। उद्धृत अंश गर्भाधान प्रकरण का है। इसमें गृहस्थ दंपत्ति इच्छानुसार श्रेष्ठ पुत्र और पुत्री की प्राप्ति के लिए अपना भोजन किस प्रकार करें, उसका विधान 14 से 18 तक की पांच कण्डिकाओं में किया गया है। माषौदन-उड़द और चावल के स्थान पर प्रेस अथवा लेखक के प्रमादवश ‘मांसौदन’ पाठ हो गया है। कुछ भी हो यह पाठ इस प्रकरण के सर्वथा विपरीत है। क्योंकि 14वीं से 18वीं कण्डिका तक क्षीरौदन, दध्योदन, उदौदन, तिलौदन के पश्चात ‘माषौदन’ ही प्रासंगिक है ‘मांसौदन’ नहीं। इसमें तिल के बाद माष का उल्लेख है। इसी क्रम में यहां पर दूध, दही, जल और तिल के बाद माष का ही पाठ होना चाहिए, मांस शब्द एकदम अप्रासंगिक है। इसी प्रकार उक्षा और ऋषभ शब्द को केवल बैल अथवा सांड अर्थ में रूढ़ मानना भी अज्ञानता ही मानी जाएगी। शास्त्रों में उक्षा का अर्थ समुद्र और सूर्य भी है। इसी प्रकार ऋषभ का अर्थ ऋषि, उत्कृष्ट गुणकर्मस्वभाववाला राजा, बलवान, विज्ञानवान (परमयोगी) भी होता है। इसके अलावा, महाभारत शांतिपर्व अ.337 श्लोक 4-5 में स्पष्ट लिखा है-
बीजैर्यज्ञेषु यष्टव्यमिति वै वैदिकी श्रुतिः। अज-संज्ञानि बीजानि च्छागं नो हन्तुमर्हथ। ऋषियों ने कहा - हे देवताओं! यज्ञों में बीजों द्वारा यजन करना चाहिए, ऐसी वैदिक श्रुति है। बीजों का ही नाम ‘अज’ है अतः बकरे का वध करना उचित नहीं।
यहां यौगिक अर्थ में बीजों को अज कहा गया है। इसी प्रकार ईश्वर का नाम भी इसलिए ‘अज’ है। ‘अजो न क्षां दाधार पृथ्वीं’ (ऋृ 1.67.3) (ऋृ 7.35.13) इत्यादि ऋचाओं में ‘अ’ का अर्थ अजन्मा परमात्मा है। यदि अज का लौकिक रूढ़ अर्थ लिया जायेगा तो बकरा पृथिवी आदि लोकों को धारण कैसे कर सकता है? इसी प्रकार ‘उक्षा’ शब्द को देखकर किसी ने बैल का ग्रहण किया होगा, क्योंकि उक्षा बैल का भी नाम है। परन्तु इतने बड़े भूगोल के धारण करने का सामर्थ्य बैल में कहां से आवेगा? इसलिए ‘उक्षा’ वर्षा द्वारा भूगोल के सेचन करने से ‘सूर्य’ का नाम है। (सत्यार्थप्रकाश, समु. 8)। महाभारत (अनुशासन पर्व अ. 145) में मांस-भक्षण और हिंसा का निषेध कई श्लोकों में देखा जा सकता है जैसे - जो मनुष्य अपने स्वाद के लिए प्राणियों की हिंसा करता है वह व्याघ्र, गृध्र, शृगाल और राक्षसों के तुल्य है। ‘गाय हमारी माता कदे कदीमी जमाने तै नहीं सै।’ यह कथन भी लेखक की अल्पज्ञता को ही दर्शाता है। अंत में संपादकमंडल से मेरा यही नम्र निवेदन है कि मिथ्या और विवादास्पद जनविरोधी लेख को प्रकाशित न करें। लेखक को भी बिना प्रमाण के मिथ्या प्रलाप नहीं करना चाहिए।






जै याही रही चाल, देखियो के होगा

जै याही रही चाल, देखियो के होगा
म्हारे चमचमाते इंडिया मैं इस छलांग मारते माहौल मैं जै 1998 से चालते आवण आले ‘सुराज’ के बख्तां मैं जै कुछ लोग चांद पै नहीं भी पहुंचे तो भी काच्चे काटण लागरे सैं इस बात मैं झूठ कड़ै सै? एक बात तै हो सकै सै या बात म्हारे हरियाणा आले भोले भाले भाई-बाहणां कै के बेरा समझ मैं आज्या। म्हारे देश मैं जितने भी नैगम कर, तट कर आयकर अर केंद्रीय उत्पाद शुल्क भरण आले जितणे भी लोग लुगाई सैं, उनपै कर की मद मैं बकाया 31 मार्च 1998 मैं 47,888 करोड़ रुपइये था। कितना था? सैंतालीस हजार आठ सौ अठासी करोड़। यू पीस्सा 31 मार्च सन् 2002 मैं कितना होग्या बेरा सै? कोण्या बेरा? हां क्यूंकर बेरा लागै, रोटी रोजी तै फुरसत कोण्या अर कै ताश खेलण तै फुरसत कोण्या। जड़ बात या सै कि हमनै इस बात का बेरा लावण की ना तो इच्छा अर ना म्हारे धोरै बख्त इसे काम खातर। ठीक सै ना? तो ले हम बतादें इसका हिसाब। यू पीस्सा मार्च 2002 मैं 86,342 करोड़ था। देख्या च्यार साल मैं दुगणा होग्या। एक अंदाजा यू भी सै कि ईब तो यू पीस्सा 1000 अरब की रेखा पार करग्या दीखै सै। फेर कई न्यों कैहदें सैं जिब करग्या होगा इसका म्हारी सेहत पै के असर सै? इसपै भी बात हो ज्यागी फेर या बात मान तो ल्यो कि 1000 अरब म्हारे सरकार के खजाने मैं आणा चाहिए था ओ कोण्या आया।
एक सोने पै सुहागे आली बात और सै कि म्हारे देश के बड्डे बड्डे कारखानेदार बैंकां का पीस्सा डकारें बैठे सैं। बेरा सै कितना पीस्सा सै यो? ईब न्यून न्यून मतना देखै अर बता कै सोच कितना पीस्सा डकार राख्या सै इननै। के सोच्या? सौ करोड़? एक हजार करोड़? पचार हजार करोड़? इसतै फालतू तो के डकारग्या होगा न्यों मतना सोचो। पूरा एक लाख करोड़ रुपइया डकारे बैठे सैं अर ईबै तो आए साल डकाराणै लागरे सैं। फेर इसतै फालतू लूट क्यूंकर मचाई जा सकै सै? सबतै बड्डा चाला यू सै अक फेर बी गुडफील, साइनिंग इंडिया अर और बेरा ना क्यां क्यां के बाहणै म्हारे सरकारी खजाने के 500 करोड़ रपिए बहाए जावण लागरे थे। इब यू सारा पीस्सा जिन लोगां की गोज मैं गया उन ताहिं तो इंडिया कसूता चमकण लागरया सै। फेर इसमैं उस इंडियावासी का जिकरा कोण्या जो अपणा घर मिट्टी के तेल तै चलावैं सैं अर न्यूं भी नहीं बताया जान्ता कि 1998 मैं एक लीटर माट्टी के तेल का भा दो रपइये ठावन पीस्से था अर यू चमक कै जनवरी 2004 मैं दस रुपइये होग्या।
न्यूएं डीजल का भा बध गया, पैट्रोल का भा, गैस सिलेंडर एक सौ पैंतीस रुपइये ठानवैं पीस्से का था ओ दो सौ इक्तालिस रुपइये साठ पीस्से का होग्या। देख्या कैरोसीन, डीजल, पैट्रोल, अर रसोई गैस क्यूंकर चमकण लागरे सैं। के कहया नहीं चमकते? जाओ चश्मे चढ़वा कै आओ अर देखो पूरा इंडिया क्यूंकर जगमगावण लागरया सै। अर जै साइनिंग इंडिया आल्यां ताहिं जनता नै एक मौका और दे दिया तो देखियो किसा चमका देंगे पूरे इंडिया नै। पूरी दुनिया मैं इंडिया-इंडिया हो ज्यागा। यूरिया जो 98 मैं 3680 रुपइये था ओ 4830 रुपइये टन होग्या। अर लैक्सनां पाछै यूरिया की कीमत 8000 रुपइये टन हो गयी। बिजली की यूनिट की कीमत बधग्यी अर भारत का कमेरा दारू पी कै टन हो ज्यागा। दारू पीये पाछै तो इंडिया और भी चमकता दीखैगा। देखियो घणा मतना चमका दियो इंडिया नै।

म्हारा पाला कुणसा ?

म्हारा पाला कुणसा ?
सते, नफे, फते, सविता, कविता, सरिता धापां हरके घरां कट्ठे होगे। सरिता माड़ा मुंह लटका री थी। सविता बोली - सरिता के बात बेबे मुंह क्यूं लटकारी सै? सरिता बोली - सुभाष की चिट्ठी आई सै। उसनै लिख्या सै अक आड़ै फौज मैं चरचा सै कि आणे वाले टेम म्हं कदै बी अमरीका आला बुश म्हारे देश की सरकार कै दाब लावैगा अक भारत की फौज इराक मैं भेजी जावै। उनकी बटालियन का नंबर आवण की बात वो लिख राखी सै। नफे - इसमैं मुंह ढीला करण की कौनसी बात सै? आच्छा इराक की सैर करकै आवैगा। थारे ताहिं तो किमै ल्यावैएगा उड़े तै। सरिता - उड़ै तो छापामार लड़ाई छिड़री बताई अमरीकियां मैं अर इराकियां मैं? उड़ै जाकै उल्टा क्यूंकर आवैगा म्हारा फौजी।
सविता बोली - फौज मैं माणस कद कुर्बाण होज्या या बात तो न्यारी सै पर असली बात तो या सै अक भारत की फौज इराक मैं क्यूं जावै? सते बीच मैं बोल्या मनै तो इसा लागै सै कि म्हारी फौज नै इराक मैं नहीं जाणा चाहिए। पहलम तो बुश नै बिना बात हथियारां का बाहणा करकै इराक पै हमला बोल दिया। सारा इराक तहस-नहस करकै गेर दिया। हजारां लोग मारे गये। बाकी नुकसान हुया वो अलग। फत्ते तै नहीं डट्या गया अर बोल्या - अर जिन हथियारां का बाहणा ले कै इराक पै हमला करया था बुश नै वे हथियार तो टीवी पै कदे बी कोन्या दिखाये बुश महाराज नै। सविता बोली - दिखावै कड़ै तै था। हों तो दिखावै।
कविता घणी वार तै चुपचाप उनकी बात सुणण लागरी थी वा बोली - इराक आले अपणे तेल के भंडारां पै अपणा कब्जा क्यूं छोड़ैंगे? सत्ते बोल्या - वे कड़ै छोड़कै राज्जी सैं। बुश नै उड़ै अपणी पिट्ठू सरकार बणवा ली। ईब या पिट्ठू सरकार बुश के कहे तैं तेलां के भंडार बेच्चण लागरी सै उन कंपनियां ताहिं जिन ताहिं बुश अर उसके चेले चान्टे इशारा करैं सैं। वे क्यूकर इशारा करैं सैं या लांबी कहाणी सै।
फत्ते बोल्या ज्यूकर म्हारली सरकार नै बी अमरीका के कहे तैं मुनाफा कमावण आली बाल्को बरगी कंपनी बी कौड़ियां के भा बेच दी थी। तो म्हारी जनता नै वा सरकारै मूंधी मारदी। सविता बोली - इराक के लोग मनै तो सही लागे। वे अपणे तेल के भंडारां पै कौड़ियां के दामां पै अमरीकी कंपनियां का कब्जा क्यूं होवण देंगे? वे अमरीकी फौज पै दा लाकै हमला बोलैं सैं तो सही करैं सैं? अमरीकी सेना के फौजी मारें जावैं सैं। ईब अमरीका मैं लैक्शनां आण वाले अर बुश नै धरती भीड़ी होन्ती आवै सै। बुश चाहवै सै कि अमरीकी फौज नै तो वो उल्टी बुला ले अर भारत देश की फौज नै इराक मैं भेज दे। धापां कदे-कदे बोल्या करै वा बी सारी बात सुण कै बोली - यो आच्छा तमाशा, इराक के तेल के भंडारां पै कब्जा तो अमरीका का अर उसकी रुखाली करैगी भारत की फौज। या बात तो कतिए गलै ना उतरकै देती। सत्ते बोल्या - सरिता के फौजी सुभाष की बात मैं दम लागै सै। भारत की सरकार इराक मैं अपणी फौज ना भेजै इस खातर हमनै किमै करणा चाहिए। धापां बोली - हम के कर सकां सां? सविता बोली - ताई हम के नहीं कर सकदे? हम म्हारे देश की सरकार बदल सकां सां तो के सरकार नै इराक मैं फौज भेजण तै नहीं रोक सकदे?
धापां बोली - वा बात न्यारी थी या बात न्यारी सै। सत्ते बोल्या - कति न्यारी कोण्या। दिल्ली मैं हथियारां की दौड़ के खिलाफ एक संस्था सै वे पूरे हिंदुस्तान के लोगां तै अपील करण लागरे सैं अक जद बी फौज भेज्जण की बात उठै तो थाम इस बात के खिलाफ आवाज ठाइयो। इस बारे म्हं सारा देश एकमत सै अक अमरीका की गाद्दड़ भबकी तै डरण की जरूरत ना सै। म्हारा देश कोय मोम की गुड़िया कोन्या जो बुश की घुड़की तै पिंघल ज्यागा। ईब तो समझ गए मेरे भाई। इसमैं हरियाणा के समझदार लोगां नै हिस्सेदारी करणी चाहिए।






मार गई सरसों की मार

मार गई सरसों की मार
आज शहरां म्हं भीड़ तो सै फेर पहलम तै कम सै। कारण सै लामनी का। सरसों तै किसान नै काट ली अर काढ़ कै मंडी म्हं लियाया अर गिहूंआ की लामणी आधी अक होली अर आधी रैहरी सै। सरसों का भा केंद्र की सरकार नै काढ्या सतरा सौ तीस रपईये क्वींटल।
हरियाणा की सरकार नै भा गिरा दिया सतरा सौ का। किसान जिब मंडी म्हं पहोंचया तो उड़ै कोए खरीदणिया ए कोन्या पाया। सरकारी खरीद की एक दुकान अर तीन कर्मचारी वे किस किसकी सरसम खरीदें? आढ़तियां नै पन्दरा सौ तै ऊपर की बोली लाई ना। ऊपर तैं पचास रपिए आढ़त कै और मांगै किसानां पै। जाम लाया। सरकार धोरै बात पहोंची अर सरकार नै बी हुकम दे दिया फेर बात तो उड़ै की उड़ै खड़ी सै आज तेरा तारीख ताहिं। आढ़त का पीस्सा तो सरकार नै देणा चाहिए पर कूण समझावै?
अखबारां मैं खबर थी अक कन्फैड की साथ-साथ हैफेड बी खरीदैगी। किसान सुखपुरे चौक पै पहुंचे तो उड़ै बी दिखावा ए सा पाया। फेर मंडी म्हं ल्याये। कई किसान तै तीन दिन तै पड़ै सैं मंडी म्हं अर अपनी सरसों नै पन्दरा सौ म्हं अर उसतै बी तलै बेच कै जाण नै तैयार सैं फेर कोए सूंघता ए कोन्या उनकी सरसों नै अर आड़े ताहिं दुखी हो लिया अक जै कोए उनकी खात्तर आवाज बी ठावै सै तो उसनै भय लागै अक कदे या पन्दरा सौ म्हं बी ना बिकै। सुन्या सै दिल्ली का किसान बी दुखी होकै अपनी सरसों रोहतक लियाया तो और भीड़ मचगी अर अफसरां नै फरद मांगनी सुरू कर दी किसानां धोरै। एक संकट और बधा दिया।
किसान की दिक्कत या सै अक आगे पाछे की सोचना उसने बंद कर राख्या सै। करै तो के करै? एक औड़ नै कुंआ सै अर दूजे औड़ नै खाई। ताजे-ताजे लैक्सन होए थे कई-कई हजार की माला घाली थी कईयां नै तो कर्ज पै पीस्सा ठाया था। एकै म्हिने भीतर किसान ताहिं तो ट्रेलर दिखा दिया अर बाकी बी सहज सहज देख लेवांगे। किसानों नै कट्ठे होकै मिल बैठ कै सोचना पड़ैगा। यो बस सिरसम का रोला नहीं सै। गिहूं आण लागरी सै अर उसकी गेल्या बी इसी ए बणती दिखै सै। तो के करया जा? दो बात सैं।
एक तो तत्काल के करया जा अर एक लाम्बे दौर म्हं के करया जा अक किसान इस मंडी की लूट तै क्यूंकरै निजात पावै। बेरा ना वे किसानों के हितैसी यूनियनां आले कित सैं? किसान खड़या पिट्टण लागरया अर वे बेरा ना कित किसके आदर सत्कार म्हं लागरे सैं अर कै घणी कसूती योजना बनावण म्हं मसगूल सैं। एक बात तो किसान नै या समझनी पड़ैगी अक इस सारे मामले के तार डब्ल्यूटीओ तै जुड़रे सैं। क्यूंकर?
इसकी चरचा होक्यां पै बैठ कै करियो अर ईब हारे औड़ कै जीते औड़ जिब धन्यवादी दौरे पै आवैं तो इन धोरै बूझ कै देखियो अक यो डब्ल्यूटीओ किस बला का नाम सै? हमनै इसकी पहलम बी चरचा करी सै अर फेर बी करल्यांगे। सौ का तौड़ यो सै अक लड़ाई लाम्बी लड़नी पड़ैगी ये तास गेरकै।
दूसरी बात या सै अक यो जागां-जागां मंडी क्यों खोल राखी सैं सरकार नै? डीघल म्हं मंडी, बेरी म्हं मंडी, महम म्हं मंडी और तै और मदीने म्हं मंडी तो फेर किसान रोहतक क्यूं आवैं? अर कै झज्जर क्यूं जावैं? रोजगार बी बधैगा अर किसानां नै संकट तै बी छुटकारा मिलैगा। जै इन मंडियां म्हं सरसों की खरीद सरकार करले तो। तेजी तै पहलकदमी करकै कदम ठावण की जरूरत सै। इसतै हरियाणा के च्यार बालकां नै रोजगार बी मिलैगा अर किसान नै बी राहत मिलैगी।
दूसरी बात अक सरसों की खरीद की कोए पक्की रसीद किसानां ताहिं कोन्या दी जान्ती। एक परची पै लिखकै दे दें सैं। पक्की रसीद मिलनी चाहिए। फेर किसान नै या साफ समझ लेनी चाहिए अक हिम्मती का राम हिम्माती हो सै, तास खेलण आले आलसी माणस का नहीं। एक बै सोचना सुरू कर ले फेर राह गोन्डे तो आप पाज्यांगे। रै बीरा! हाम नै तै दूर के ढोल सुहावने लागते दिखाई देवैं सैं। जिब परदेस म्हं ‘चौटाला एंड संस’ की सरकार की डुगडुगी बाज रही थी अर हर किसान की नाक म्हं दम आ राक्ख्या था तै सोच्चा कर दे अक ओ सुभदिन कदसिक आवैगा जद इस ‘प्राइवेट लिमिटेड’ सरकार तै पिंड छुट्टैगा अर चैन की सांस लेवैंगे। अब जिब योह नवी सरकार आई तै किसानां नै फेर वही धक्के खाणे पड़ रये सैं। इस लियो फेर समझाऊं सूं अक -
चूची बच्चा तैयारी करल्यां यो रस्ता बिना लड़ाई कोन्या
सरसों पीट दी क्यों म्हारी ईब बची कति समाई कोन्या
खूनी कीड़े खावैं चौगरदे क्यों देता कति दिखाई कोन्या
आगली पीढ़ी गाल बकैगी जै तसबीर नई बनाई कोन्या
अपने पाह्यां चाल पड़ां क्यों टोही असली राही कोन्या

मेरे बीरा! देखियो के होगा

मेरे बीरा! देखियो के होगा
     आज के दिन संसार की आबादी 6.3 अरब सै। एक ताश खेलणा छोड़ कै मेरे बीरा अंदाजा लाइयो अक 2050 मैं दुनिया की आबादी कितनी हो ज्यागी? ‘गेर रै गेर पत्ता गेर। इस खूंटा ठोक नै और किमै कोण्या, म्हारे ताशां के पाछै पड़या रहवै सै सारी हाण।’ दूसरा - ‘फेर गलत तो किमै कैहन्ता ना। म्हारे थारे हक की ए बात करै सै ओ सारी हाण।’ पहला - ‘कड़े के हकां की बात औ तो कै तो महिलां नै बिगाड़ण मैं लाग्या रहवै सै अर कै दलितां नै सुसकारण मैं लाग्या रहवै सै।’ दूसरा - ‘महिलावां के अर दलितां के अक जो उन्नै हजारां सालतै नहीं मिले उनकी बात करना क्यूंकर गलत होग्या भाई?’ पहला - मेरे अर तेरे बीच मैं पाले बंदी करवा दी इसनै तो? दूसरा - के गलत कर दिया जिब? या पाले बंदी तो खूंटा ठोक के बिना बी बणदी आवै सै अर म्हारे समाज की कड़वी सच्चाई सै या। पहला - जिकरा तो जनसंख्या पै था। बतादे कितनी हो ज्यागी 2050 मैं। दूसरा - जो हिसाब खूंटा ठोक नै लाया सै इस हिसाब तै तो या दसियां अरब हो ज्याणी चाहिए। पहला - ‘इतनी जनसंख्या कड़ै नावड़ैगी?’
     खणखरे बुद्धिजीवी इसनै 9 अरब मानैं सैं। 9 अरब इन्सान हो ज्यांगे। म्हारे प्रकृति के संसाधनां पै ईबै बहोत घणी दाब पड़री सै। सबते फालतू भूखे लोग 23‑3 करोड़ भारत मैं रहवैं सैं। पूरे दक्षिण एशिया मैं हर चौथा माणस भूखा सोवै सै। मानव विकास सूचकांक के हिसाब तै संसार के 175 देशां मैं विकास के हिसाब तै भारत का स्थान 127 है? सै ना कितनी श्यान की बात। देखो कितने गर्व करण की बात सै। हरियाणा का छोरियां नै मां के पेट मैं मारण मैं भारत मैं सबतै ऊपर नाम आवै सै। देख्या कितनी श्यान अर इज्जत की बात सै म्हारी खातर। दुनियां के तीन सौ करोड़ लोग दो अमेरिकी डालर पै जिंदगी गुजारैं सैं। अर जै इनमां तै किसे नै बूझो - सुणा रिसाले के हाल सै? तो सैड़ दे सी कहवैगा - बस बूझै ना तीजां केसे कटरे सैं। ईसे आडू. बी हरियाणा मैं ए पा जा सकैं सैं ना तो माणस तो न्योंए कहवैगा - बहोत मुश्किल तै गुजारा होवे सै।
     जै सारी दुनिया मैं पैदा खाद्यान्न समान रूप तै सबमैं बांट दिया जावै तो हरेक माणस नै 2760 कैलरी का खाणा मिल सकै सै। भूख का मतलब सै जै माणस 1960 कैलरी का भोजन नहीं खा सकै तो भूखा सै। मतलब साफ सै अक दुनिया के काम करणिया नै (किसान, मजदूर कर्मचारी) नाज पैदा करण मैं कसर कोण्या छोड्डी फेर कसर रैहगी इसके बंटवारे की।
     आज के वैश्वीकरण के जमाने मैं सार्वजनिक संसाधनां का निजी हाथां मैं हस्तान्तरण तेजी तै होवण लागरया सै। देश आजाद हुये पाछै लोगां धोरै लेकै म्हारी सरकार नै जो सार्वजनिक संपत्ति बनाई थी ईब वा कौड़ियां के मोल देशी बदेशी कंपनियां ताहिं बेची जावण लागरी सैं (रिश्वत खाकै)। म्हारे बिजली घर म्हारे तेल के भंडार जिननै विकसित करण मैं लाखां-करोड़ां रुपइये खर्च हुए थे वे भी बेचे जावण लागरे सैं। यू सारा काम अमेरिका की दाब मैं होवण लागरया सै। यूं धंधा तीसरी दुनिया के सारे देशां मैं चला राख्या सै अमेरिका नै अपणे याड़ी देशां की साथ मिलकै।
     आज दुनिया के 20 प्रतिशत लोगां धोरै, दुनिया के 80 प्रतिशत संसाधन सैं। हैरानी की बात या सै अक इन संसाधनां मैं भी इन 20 प्रतिशत लोगां का पूरा कोण्या पाटरया। जै हम चाहवां सां कि म्हारे संसाधनां पै म्हारा अधिकार रहवै तो यू पंूजीवादी विकास का मुनाफे अर खुले बाजार पै टिक्या औड़ विकास का माडल बदलणा पड़ैगा। आज जो लोग संसाधन कै सबतै नेड़े रैहके भी सबतैं दूर सैं उनके बारे मैं सोचणा पड़ेगा। पाणी म्हारा अर उसनै काढ़कै म्हारे ताहिं बेचै नेस्ले। यू समालखा मैं होर्या, यू पूरी दुनिया मैं होरया। लेल्यो रै ईबी सम्भाला अर बगाद्यो इन ताशां नै, अर बूझो ये सवाल अक हमनै इतना कमाया फेर बी हम गरीब क्यूं?





यह सोच सै औरत नै ‘देवी’ मानण आलां की

यह सोच सै औरत नै ‘देवी’ मानण आलां की
     आज धार्मिक परंपरावा अर संस्कृतियां खासकर हिंदू धर्म तै जड़ै कर्मकांडा के नाम पै महिलावां के संवैधानिक अर कानूनी अधिकारां पै कसूता हमला बोल्या जावण लागरया सै। आज यो बहोत जरूरी होग्या सै अक हम संस्कृति नै झाड़-पोंछ कै उस पक्ष नै समझां अर देखां अक वो किस स्तर ताहिं महिला विरोधी सै। पुत्री का कत्ल करकै घर-घर म्हं पुत्र-प्राप्ति होवण लागरी सै। इसकी जड़ बहोत घणी डूंघी सैं।
     म्हारे समाज की पितृ सत्तात्मक व्यवस्था म्हं धन दौलत के वारिस के रूप म्हं पुत्र की कामना करी गई है। ऋग्वेद म्हं पुत्रां की खात्तर तीन शब्दां का प्रयोग पाया जावै सै - वीर, पुत्र अर सूनु। ऋषि कक्षीवत एक सुक्त म्हं कहवैं सैं अक ‘पतिः स्यां सुगवः सुवीरः’। पुत्रां की लालसा आले दंपत्ति प्रार्थना करैं सैं - ‘कामोरायः सुवीर्यस्य’ अर प्रजापति उननै आश्वासन देन्ते औड़ कहवैं सैं मनै पृथ्वी पै प्रजा को पैदा किया सै, इब स्त्रियां द्वारा पुत्रां नै उत्पन्न करूंगा। ‘अहम जनिभ्यो अपरीषु पुत्रान’ यो कर्मकांड गर्भाधान संस्कार का एक हिस्सा हुया करदा। सप्तसदी के बाद मैंहे वधू ताहिं आर्शीवाद दिया जाया करदा अक इंद्र उसनै दस पुत्र प्रदान करै। ‘दशस्यां धेही’ आज भी हिंदू धर्मानुसार विवाह म्हं सात फेरयां अर कन्यादान के पाछै ऋग्वेद का वोहे मंत्र दोहराया जावै सै। ‘ओम् इमां त्वमिन्त्र मीरः सुपुत्रात् सुभगात कधि दशास्यत धेहि पतिमेका दशत कुरु’। अर्थात् इब इस स्त्री नै तुम योग्य पुत्रवती एवं सौभाग्यवती बनाओ। इसनै दस पुत्रां की जननी बनाओ। बृहदारण्यक उपनिषद म्हं याज्ञवल्क्य नै मनुष्य की तीन इच्छयावां म्हं पुत्रेषणा, वित्तेषणा अर लोकेषणा का उल्लेख करया सै। अर्थात् पहलम पुत्र अर फेर उसकी खात्तर धन अर पुत्र के कामां तै लोक मैं सम्मान पाते हुए अंत मैं स्वर्ग प्राप्ति।
     विष्णु धर्म सूत्र कहवैं सैं - पुत्र पुत नामक नरक तै पिता का उद्धार करै सै। मनु के विधान म्हं ज्येष्ठ पुत्र के जन्म की साथ-साथ पुरुष पितृ ऋण तै मुक्त होकै अमृतत्व लाभ करै सै। पौत्र समस्त पापां तै मुक्त करै सै अर प्रपौत्र सूर्यलोक म्हं वास का कारण बणै सै। अर्थात् पुरुष की वंस रक्षा परंपरा की खात्तर बेटे तै लेकै बेटे के बेटे अर उसके बी बेटे मतलब तीन पीढ़ी ताहिं पक्की शास्त्रीय व्यवस्था करी गई सै। पुत्र लालसा ताहिं बड़ी मनोवैज्ञानिक चतुराई से शास्त्रकारां नै माणस के मन की गहराई म्हं रोप देवण की चेष्टा मैं स्वर्ग अर नरक की कल्पना करी अर या विधान सबकै योह आतंक कायम कर दिया अक पुत्रहीन की खात्तर नरक अवश्यंभावी सै। ऐतरेय ब्राह्मण कहवैं सै ऋणमस्मिन्त संतयति अमृतत्व च गच्छति, पिता पुत्रस्य जातस्य पश्येत चेत जीवतो मुखं’। जै पिता जिवित पुत्र का मुख देख ले तो वो अपने सारे ऋणां तै मुक्त होज्या सै अर अमृतत्व को प्राप्त कर लेवै सै। ‘यावतः पृथिव्यां भोगाया वंतो जात वेदसि, यावंतः अप्सु प्राणिनां भूयान पुत्रे पितुः ततः’। इस संसार म्हं पैदा होवण आले जीवा की खात्तर जितने भी भोग अर सुख के साधन धरती अर अग्नि अर जल म्हं सैं उनतै भी फालतू पिता की खात्तर पुत्र म्हं सैं। शाश्वत पुत्रेण पितरः अति आयन बहुलं तमः, आत्मा हि जज्ञ आत्मनः स इरावती अति तारिणी’। पिता सदा पुत्र द्वारा ही विपत्तियाँ नै पार करै सै। आत्मा-आत्मा तै पैदा होकै पुत्र कहलावै सै अर वाहे संसार कै पार ले जावण आली श्रेष्ठतम नाव सै। ‘सखा है जाया कृपणं ह दुहिता ज्योतिहं पुत्रः परमे व्योमन। स्त्री सखा है, पुत्री दुख का कारण, पुत्र परलोक मैं भी ज्योति दिखावण का काम करै सै।
     इन उदाहरणां पै गौर करां तो बड़ी हैरानी होवै सै। मां के शरीर का एक अंस उसतै उत्पन्न पुत्र पिता तै स्वर्ग, अमृतत्व, इहलोक, परलोक, सब कुछ देवै सै फेर माता को देवण की खात्तर कोए शास्त्रीय विधान क्यों नहीं सै? पितृसत्ता नै शाश्वत बनाए राखण खात्तर औरत के लिए एकमात्र आदर्श पुत्र की माता होना था। मनु न और अनेकां ने उसे केवल खेत मान्या, जिस म्हं पुरुष बीज बोवण का काम करै सै। मनु ए नहीं कौटिल्य नै भी स्वीकृति दी ‘पुत्रार्थे क्रयते भार्या’। अर्थात् पुत्र की खात्तर ही पत्नी की जरूरत सै। ऐतरेय ब्राह्मण नै बार-बार कहया सै अक पुरुष नै खुस अर संतुष्ट राखण का सर्वोत्तम उपाय सै पुत्र को जनम देना। मनु नै कहया जै ब्याह के आठ बरस पाछै बी स्त्री संतान नै जनम ना दे अथवा दस बरस ताहिं जै कन्या नै जनम दे अथवा मृत पुत्रां नै जनम दे, तो पुत्र लाभार्थ पति दूसरा ब्याह करै। क्योंकि पुत्र जनन तै न्यारा स्त्री का कामै के था? ‘प्रजनार्थ स्त्रियः सृष्टा’। गर्भाधान पाछै पुंसवन संस्कार मैं गर्भ को पुत्र म्हं बदलण की खात्तर प्रार्थना का विधान बी सै। अभागे का बैल मरे। सुभागे की बेटी। या कहावत के दर्शावै सै? जै लड़की का, औरत का अस्तित्व बचाना सै तो इस ‘पुत्र लालसा’ कै खिलाफ जंग का बिगुल बजाना ए पड़ैगा। फेर न्यों ना कहियो म्हारी पुरानी परंपरावां पै चोट करै सै यो खूंटा ठोक।

किसान की गाढ़ी कमाई के दावेदार

किसान की गाढ़ी कमाई के दावेदार

माणस सामाजिक पशु सै। मनुष्य अर पशु मैं योहे फरक सै अक माणस अपने भले अर बुरे की खातर अपणे समाज पै बहोत निर्भर रहवै सै। असल मैं पशु जगत के घणे ठाड्डे-ठाड्डे बैरिया कै रैहन्ते अर बख्त-बख्त पै आवण आले हिम युग जीसे भयंकर प्राकृतिक उपद्रवां तै बचण मैं, उसके हाथां नै अर फेर दिमाग नै जो उसकी मदद करी सै उसमैं मनुष्य का समाज के रूप मैं संगठन बहोत घणा सहायक हुया सै। इस समाज नै शुरू मैं कमजोर माणसां की ताकत को सैकड़यां माणसां की एकता द्वारा बहोत घणा बढ़ा दिया। ईसे ताकत के दम पै माणस नै अपणे प्राकृतिक अर दूसरे बैरियां तै रक्षा पावण मैं मदद देते होंए भी अपणे भीतर तै ईसे बैरी पैदा कर दिये जिननै उन प्राकृतिक अर पाशविक बैरियां तै भी फालतू माणस की जिंदगी नरक बणावण का काम करया सै। समाज का अपणे भीतर के माणसां के प्रति न्याय करणा पहला फरज सै। न्याय का मायना यो होणा चाहिए अक हरेक माणस अपने श्रम के फल का उपयोग कर सकै। लेकिन आज हम उल्टा देख रहे सां। धन वोह सै जो आदमी के जीवन की खातर बहोत जरूरी सै। खाणा, कपड़ा, मकान ये सारी चीज सैं जिन को असली धन कहणा चाहिए। असली धन के उत्पादक वेहे सैं जो इन चीजां नै पैदा करैं सैं। किसान असली धन का उत्पादक सै क्योंकि ओह मिट्टी नै अपणे श्रम तै गिहूं, चावल, कपास के रूप में बदल दें सैं। दो घंटे रात रैहन्ते खेतां मैं पहोंचना। जेठ की तपती दोफारी हो चाहे पोह का जाड्डा हो, ओ हल जोतै कै ट्रैक्टर चलावै, पाणी लावै, जमीन नै कस्सी तै एकसार करै अर उसके हाथां मैं कई कई आट्टण पड़ज्यां सैं फेर बी ओ मेहनत तै मुंह नहीं चुरान्ता। क्योंकि उसनै इस बात का बेरा सै अक धरती माता के दरबार मैं रिश्वत कोन्या चालती अर ना चाल सकती। धरती स्तुति - प्रार्थना तै अपणे दिल नै खोल कोण्या सकदी। या निर्जीव माट्टी सोने के गिहूं, बासमती चावल अर अंगूरी मोतियां के रूप मैं जिब बदलै सै जिब धरती माता देख लेवै सै अक किसान ने उसकी खातिर अपणे खून के कितने घणे पसीने दिये, कितनी बार थकावट करकै उसका बदन चूर-चूर होग्या अर कस्सी चाणचणक उसके हाथ तै छूटगी।
गिहूं बण्या बणाया तैयार एक-एक जागां दस बीस मण धरया औड़ कोण्या मिलता। यो पन्दरा-पन्दरा, बीस-बीस मण की ढेरी एक जागां देख कै एक बर तो उसका जी खिले उठै सै। महीन्यां की भूख तै अधमरे उसके बालक बड़ी चाह भरी नजरां तै उस ढेरी नै देखैं सैं। वे समझैं सैं अक दुख की अंधेरी रात कटण आली सै अर सुख का तड़का साहमी सै। उननै के बेरा अक उनकी या ढेरी जो उनके मां-बाप नै इतने कष्टां तै पैदा करी सै या उनके खावण खातर कोण्या। इसके खावण के अधिकारी सबतै पहलम वे स्त्री-पुरुष सैं जिनके हाथ मैं एक बी आट्टण कोण्या, जिनके हाथ गुलाब जिसे लाल अर मक्खन बरगे मुलायम सैं, जिनकी जेठ की दोफारी ए.सी. तलै कै शिमला मैं बीतै सै। जाड्डा जिनकी खातर सर्दी की तकलीफ नहीं ल्यान्ता बल्कि मुलायम ऊन अर कीमती गर्म कपड़यां नै सारे बदन नै ढक कै आनन्द के सारे राह खोल दे सै। निठल्ले अर निकम्मे ये बड्डे आदमी, जमींदार, महाजन, मिल मालिक, बड्डी तनखा आले नौकर, पुरोहित अर दूसरी कई ढाल की जोंक किसान की कष्ट कमाई के भोजन का सबतै पहलम हक राखैं सैं। अर यू किसान आत्महत्या करण ताहिं फांसी खातर जेवड़ी टोहन्ता हांडै सै। कै सल्फास की गोली खाकै निबटारा पाले सै। फेर एक पार्टी ब्यान दे सै अखबार मैं अक हम आगे तो सारे कर्जे माफ कर द्यांगे। को इनतै न्यों तो बूझ ले अक ये इसा राह क्यूं ना बांध देवैं अक किसान पै कर्ज चढ़ैए कोण्या। छोटूराम नै हरियाणा के किसान का करजे अर कुड़की तै पैंडज्ञ एक बै छटवाया। 50-60 साल मैं फेर उड़ै पहोंच लिया किसान। ईब ली सरकार नै लोन की खातर बजट बधा दिया। मतलब किसान और करज़ा लेगा अर बहुराष्ट्रीय कंपनियां के बीज खरीदैगा अर करजे मैं गले ताहिं डूबैगा अर फेर फंासी खावैगा।





दिन म्हं तारे दीख ज्यां, जिब पड़ै वोट की चोट

दिन म्हं तारे दीख ज्यां, जिब पड़ै वोट की चोट
     सत्ते, फत्ते, नफे, सविता, कविता, अनिता अर भरतो ईब के शनिचर नै कट्ठे हुये तो चर्चा हाल के चुनावां पै चाल पड़ी। नफे अनिता तै बूझण लाग्या - ईबकै थारले किंघाण गेरैंगे वोट? अनिता बोली - म्हारल्यां का मन तो ईबकै बदलण का बणरया सै। नफे बोल्या - क्यूं? ईसा क्यूं? अनिता बोली - म्हारे प्रदेश की हालत के किसे तै ल्हुकारी सै। जनता आज खेती बाड़ी, उद्योग अर रोजगार की चौतरफा तबाही के बिचालै किस अपमान, दहशत अर असुरक्षा के माहौल मैं जीवन लागरी सै इसका तो सबनै बेरा सै। पहरावर के सरपंच जो दलित था का आज ताहिं कोए बेरा कोन्या। ऊं सबनै बेरा सै अक कौन ठाकै लेगे अर किसनै मारया होगा, फेर पुलिस नै बेरा कोन्या पाटया। ना नौकरी, ना दिहाड़ी, ना पढ़ाई अर ना दवाई का इंतजाम, ना बिजली, पानी, खेती मैं छोटे किसान कै कोए बचत ना, कर्जे का बोझ बढ़ता आवै, ना इज्जत-आबरू बची और तै और पीवण का पाणी ताहिं बिकण लागरया सै। हो सकै सै थोड़े से दिनां मैं सांस लेवण ताहिं हवा बी बिकण लागज्या। नफे बोल्या - विकास कितना होग्या यो तो दीखता ए ना थमनै। जै राज की बदल होगी तो हरियाणा उजड़ ज्यागा। ताऊ का बालक सै हरियाणा। इसनै जवान हो लेवण दयो। कविता बोली - अनिता नै सौलां आने सही बात कही सै। थारे घरां मैं उस छोरी गेल्यां के बणी उसका हुया किमै? तनै बी जोर लाया थारे एमएलए ने बी एड्डी-चोटी ताहिं का जोर लाया अर मंत्री नै बी पां पीटिया खूब करे फेर बलात्कारी के तो और ऊपर ताहिं तार जुड़रे थे। थाम सारे हारकै नहीं बैठे थे उस केस मैं। सत्ते बोल्या - इन बातां पै तो नफे कै सांप सूंघ ज्यागा। अर जो या बात कही अक हरियाणा ताऊ का बालक सै तो भाई हम तो ईब ताहिं न्योंए मान्या करते अक हरियाणा का बालक ताऊ सै। अर जै बदल नहीं होई ते जो किमै थोड़ा घणा उजड़ण तै बचरया सै ओ और उजड़ ज्यागा। गामां मैं कस्ब्यां मैं सत्ता के मलंगां की धींगामस्ती, छीना-झपटी, बेहया किस्म की लूटखोरी का आलम चारों कान्ही सै। हफ्ता वसूली, हेरा-फेरा अर रिश्वतखोरी की गैल अय्यासी मैं डूबी सत्ता की पतनशील राजनीति हरियाणा की इस तबाही का रोजाना जश्न मनावै सै। लोकराज का यो भी एक रूप सै अक लोकलाज की चादर बगा कै धड़ल्ले तै बेलगाम हो कै राज चलाओ।
     कविता बोली - सत्ते नै सही बात कही। गुंडे, हत्यारे, तस्कर, भूमाफिया चलावण आले बिल्डर्स, ठेकेदार, कमीशन खोर, भ्रष्ट अफसर, व्हीलर डीलर अर नीचै पंचायत लुग हराम की कमाई पै पलण आले दूसरे गुर्गे, भाई-भतीजे, जात-गोत के मुखिया जो सब उनकी छत्रछाया मैं मलाई खा-खा कै मोटे होवण लागरे सैं सारे उनकी गेल्यां सैं। फत्ते बोल्या - फेर बी उननै डर सै अक कदे हरियाणा के किसान, मजदूर, खेतीहर, कर्मचारी अर छोटे दुकानदार वोट की कसूती चोट ना मारदें। सविता बोली - फेर देवां किसनै वोट? फत्ते बोल्या - बदल तै जरूर ल्याणी सै इबकै, वोट चाहे काले चोर ताहिं देणी पड़ियो। सविता बोली - न्यूं क्यूंकर एक चोर नै हटा कै दूसरे चोर नै बिठाएं क्यूंकर काम चालैगा? अनिता बोली - ज्यूकर 312 गण्डे कै कनसूआ लागे पाछै पूरे हरियाणा तै खातमा करणा पड़या था न्योंए इन चोरां की राजनीति का खात्मा तो करना बहोत जरूरी होग्या। यू खरणा तो बदलणा पड़ैगा। नया खरणा टोहना पड़ैगा। पीस्से आल्यां की पार्टी बहोत देख ली ईब तै इसी पार्टी देखनी पड़ैंगी जो म्हारे दुख-सुख मैं, म्हारी बीमारी मैं, म्हारी गेल्यां रहन्ती हों। उनकी ताकत बढ़ानी पड़ैगी अर ज्यूकर केंद्र मैं डाकू ताहकै छोटे चोर जनता लियाई अर उनके लगाम घालण ताहिं वामपंथ नै बी जिता ल्याई, कोए इसा ए सा जुगाड़ आड़ै भी देखणा पड़ैगा। पांच-च्यार लगाम कसणिया भी हमनै विधानसभा मैं भेजणे पड़ैंगे। चोरों मैं भी सारे एकसे कोन्या, देखना पड़ैगा कि बदल खातर कोण जीत सकै सै उसनै बणावां।
     फत्ते बोल्या - ये पोलिटिशियन अपने आप नै घणे तीस मारखां समझैं सैं ना तो इननै इस बात का बी बेरा होवणा चाहिए अक जनता बी ईब खूब स्याणी होरी सै। खूब सोच-समझ कै वोट गेरेंगी। कई साल पहलम की बात सै जिब चौ. रणबीर सिंह का बडला छोरा खड़या था, बाबा मस्तनाथ के बाबा जी खड़े थे अर हरीचंद हुड्डा किलोई तै खड़े थे। रोहतक तै कप्तान की कार मैं बैठदा, बोहर अस्थल जा कै हलवा बाबा का खान्दा अर भालौट धोरै कार मैं तै उतर कै न्यों कैहन्दा - कार किसे की, हलवा किसे का अर वोट किसे की। कविता बोली - जनता अपने गाम की, अपने मोहल्ले की, अपने शहर की, अपनी सुरक्षा की बातां पै जरूरतां पै बात करै उम्मीदवार तै, अर सोच समझ कै वोट दे म्हारा तो योहे कहणा सै। सत्ते बोल्या - जनता इतणी स्याणी होन्ती तो फेर के कैहणे थे। सविता बोली - संसद के चुनावां मैं के आपां गये थे जनता नै बतावण ताहिं। ना किसे और नै बताया तामिलनाडू अर आंध्र प्रदेश मैं जाकै अक हरियाणा मैं सूपड़ा साफ करैगी जनता। पूरे देश की जनता जनार्दन ने पूरी तरियां सोच-समझ कै संसद के चुनाव मैं बदलाव ल्याया था जो यूपीए के तहत काम करै सै। मेरै पूरा यकीन सै अक हरियाणा की जनता आड़ै बी सही सोच-समझ कै इस मौके पै भी आपणे वोट की सही चोट करैगी।





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म्हारे हरियाणा की लड़कियां

म्हारे हरियाणा की लड़कियां
युवा लड़कियां आज हरियाणा के समाज म्हं सबतै असुरक्षित नागरिक सैं। इन युवा लड़कियां नै ईसी परिस्थितियां क्यूंकर मिलैं अक ये अपने नागरिक अधिकारां का इस्तेमाल कर सकैं अर हर बख्त डरी औड़, असुरक्षित अर कुचली हुई ना रहवैं।
जै रूचिका बरगी युवा लड़की नै बखत रहते न्याय मिलता तो उसनै आत्महत्या ना करणी पड़ती। वा बहोत संघर्षशील युवा लड़की थी। इस केस के पाच्छे की परिस्थितियां का दबाव आज हरियाणा की लाखों युवा लड़कियां झेलण लागरी सैं। हर युवा लड़की अपणी ढाल के न्यारे संघर्ष की तसवीर सै। महिलाएं बड़े पैमाने पै छेड़खानी, अपहरण अर बलात्कार जीसे अपराधां का शिकार होवण लागरी सैं। तमाम युवा लड़कियां जो सार्वजनिक स्थलां अर संस्थावां म्हं रहवैं सैं वा भी सर्वव्यापी असुरक्षा तै घिरी सैं।
इन लड़कियां के माता-पिता स्वयं बी मानसिक तनाव अर असुरक्षा मैं रहवण लागरे सैं। कम अवसरां के बावजूद युवा लड़कियां खेल-कूद, पढ़ाई अर साक्षरता बरगे सामाजिक कामां म्हं बहोत आच्छा प्रदर्शन करकै दिखावण लागरी सैं। गरीब युवा लड़कियां अनेक छोटे-मोटे रोजगार करकै घरां नै चलावण म्हं आर्थिक मदद बी करैं सैं। सौ का तोड़ यो सै अक लड़कियां म्हं सामाजिक भागीदारी अर आर्थिक संकट तै घिरे परिवारां मैं एक रचनात्मक सक्रिय भूमिका निभावण की गहरी इच्छा पैदा हुई सै।
एक कान्हीं तै वे बाल श्रमिक के रूप म्हं, घर मैं छोटे-बाहण भाइयां की देखभाल करते हुए ईंधन अर पानी जुटाते हुए, असंगठित क्षेत्र में अनेक ऊबाऊ काम करते हुए, आर्थिक संकट तै घिरे परिवारां नै चलावण म्हं महत्वपूर्ण योगदान देवण लागरी सैं। दूजे कान्हीं समाज म्हं इन ताहिं बोझ के रूप मैं देख्या जावै सै। घर-परिवार, शिक्षा संस्थावां आदि म्हं कितै बी इसा माहौल कोन्या अक वे अपना दुखड़ा किसे नै सुणा सकैं, अपनी समस्या सांझी कर सकैं। सांप्रदायिक अर जातिवादी ताकतें खासतौर पै इन लड़कियां नै एक तरफ तो ‘भारतीय नारी’ और ‘मर्यादा’ का पाठ पढ़ाण मैं लागरी सैं अर दूसरी तरफ वैश्वीकरण तै जुड़ी अन्ध उपभोक्तावादी संस्कृति के अंदर युवा लड़कियां सबतै आसान शिकार के तौर पै देखी जा रही हैं।
राजनीति का अपराधीकरण, दलाली, भ्रष्टाचार अर रिश्वतखोरी तै पीस्सा कमावण आले नवधनिक वर्ग अर उनके लड़के खासतौर पै अपराधियां की ढाल साहमी आवण लागरे सैं। युवा लड़कियां केवल बाहर ही नहीं परिवार के अंदर ‘परिजनों’ के द्वारा भी यौन हिंसा और दहेज हत्या का शिकार हो रही सैं।
छोटी बच्चियों के साथ भी परिवारां म्हं पड़ौसियां अर कै ‘विश्वसनीय’ लोगां द्वारा यौन उत्पीड़न का चलन ही चाल पड़या सै। म्हारा समाज घटिया फूहड़ फिल्मां, छेड़खानी, मीडिया मैं पोर्नोग्राफी, यौन उत्पीड़न और रईसजाद्यां की निरंकुशता के खिलाफ तो चुसकता ना, कोए विरोध अभियान नहीं छेड़ता।
हां युवा लड़कियां के पहनने-औढ़ने, हंसने-बोलणे पै कड़ी नजर राखना चाहवै सैं।
युवा लड़कियां घोर यातना अर घुटन के बीच जीवण लागरी सैं। एक कान्हीं उन ताहिं ‘ब्यूटी पैकेज’ दिया जाण लागरया सै, उपभोग की चीज की छवि बनाई जारी सै, दूसरी कान्हीं संस्कृति, जाति अर परिवार की लाज के रूप म्हं उनके तमाम मानवीय अधिकार छीने जावण लागरे सैं। उन ताहिं तरहा-तरहां तै दंडित करया जा सै, उनका चरित्र हनन करया जारया सै अर गुंडे लफंगे खुल्ले घूमैं सैं। हरियाणा मैं लड़कियां के मामले मैं खासतौर पै शरीफ अर बदमाश लोगां के बीच की दूरी जणो मिटती जाण लागरी सै। बीमार सामाजिक वातावरण का इलाज करण की बजाय लड़कियां का इलाज करया जाण लागरया सै, उनकी भ्रूण हत्या करी जावण लागरी सै।
इन युवा लड़कियां की खात्तर नागरिक समाज, नागरिक अधिकार एक मुख्य एजेंडा सै। पाछले सालां म्हं युवा लड़कियां म्हं गहरा आक्रोश पैदा हुया सै। उनकी मांग सै अक म्हारी खातर न्याय की मांग का निषेध क्यंू अर ‘धरती पुत्रां’ नै स्वेच्छाचारिता की पूरी छूट क्यों? जातिवादी ताकतों द्वारा मनमाने ढंग तै फतवे जारी करणा अर युवा लड़के-लड़कियों की हत्या जारी सै।
बतावण की जरूरत नहीं अक हम आपणी प्रगतिशीलता की, उच्च विचारों की, संस्कारवान होणे की मुनादी करण म्हं सब तै आग्गै खड़े दिखाई देवैं सैं। बेसक किसी मुद्दे तै म्हारा दूर का बी नाता-रिस्ता ना हो, फेर बी हम उस म्हं पंजा फंसावण नै तैयार रहवैं सैं। पर जिब कोई मसला, समस्या अपणे घर-परिवार नै समझावण-बुझावण की, उन्हें पटरी पै ल्यावण की सामने खड़ी दीखै सै, तो उस बखत हम उस तै कन्नी काटण म्हं आपणी भलाई समझैं सैं अर मौन साध ले सैं। योहे कारण सै अक आज म्हारी बाहण-बेटियां अपणे अनिश्चित भविष्य के बारे म्हं सोच-सोच कै सिर धुणती नजर आवैं सैं।


गोदामां मैं सड़ता नाज अर भूखे मरते लोग

गोदामां मैं सड़ता नाज अर भूखे मरते लोग

एक कान्हीं देश के तीन चौथाई लोगां नै पेट भर भोजन नहीं मिलता अर दूजे कान्हीं सरकारी गोदामां मैं 630 लाख टन के लगभग नाज पड़या सै। इसमैं तै कुछ नाज तो 3-4 साल तै लेकै 16 साल ताहिं का पुराणा नाज सै अर लगभग 75 करोड़ रुपइयां का नाज सड़ लिया ईब ताहिं। हैरानी की बात या सै अक जो सरकार बड़ी मुश्किल तै संपूर्ण ग्रामीण योजना के तहत च्यार हजार च्यार सौ चालीस करोड़ रुपइये उपलब्ध करवारी सै, वाहे सरकार गोदामां मैं नाज दबाए राखण की खातर इसकी च्यार गुणा राशि 17000 करोड़ तै फालतू खर्च करण लागरी सै।
म्हारी या प्यारी सरकार रोज लगभग 48 करोड़ रुपइये बस नाज के रख रखाव पै खरच करण लागरी सै। देख्या कितनी चिंता सै म्हारी सरकार नै म्हारे नाज की। नाज धरण खातर जागां थोड़ी पड़गी अर बहोत सारा नाज खुले मैं पड़या सै। गोदामां मैं बंद नाज मां तै लगभग एक चौथाई किसे मुसीबत के बख्त ताहिं बचा कै राख्या जा अर बाकी बच्या औड़ नाज (तीन चौथाई) सस्ती दरां पै राशन की दुकानां पै अर गामां मैं रोजगार की खातर दिया जाणा चाहिए। फेर दिया तो कोण्या। उल्टा इस नाज नै ध्यान मैं राख कै जो स्कीम (सरकारी) बनाई जावण लागरी सै उनतै तो यो साफ जाण पाटै सै अक म्हारी प्यारी सरकार किसानां नै अर ग्रामीण मजदूरां नै छोड़ कै बड्डी कंपनियां अर पीस्से आले सरमायेदारां के हितां की खातर फालतू काम करण लागरी सै। सरकार नै रोला राला पड़े पाछै बड़ी मुश्किल तै थोड़ा सा नाज (50 लाख टन) संपूर्ण रोजगार योजना के तहत रोजगार मूलक कामां पै क्यूकरै खरच करण की इजाजत दी सै।
दूजे कान्ही याहे म्हारी प्यारी फील गुड सरकार इसतै दुगणा नाज सस्ते दामां पै विदेशां मैं बेचण की खातर बड्डी कंपनियां के हवाले कर चुकी सै। ईबै और कोशिश करी जावण लागरी सै अक विदेशां मैं नाज का निर्यात और बढ़ाया जा। देखो रै किसा बुरा जमाना आग्या कि गामां मैं उगाया औड़ नाज गाम नै भुखमरी तै बचावण कि जागां विदेशी व्यापार करण आली कंपनियां की मुनाफाखोरी खातर दिया जावण लागरया सै अर हम बैठे ताश खेलण लागरे सां। अर कहवां सां गेर रै गेर पत्ता गेर। सबतै कसूती बात या सै अक इन कपंनियां ताहिं गरीबी की रेखा की दर तै नाज दिया जावै सै उसे दर पै दिया जावण लागर्या सै। यो नाज बहोत दिनां ताहिं तो गरीबी रेखा की दर तै भी कम कीमत पै इन कंपनियां ताहिं दिया गया। दूजे कान्हीं सरकार नै दो साल पहलम आधे तै भी घणे गरीबां ताहिं गरीबी की रेखा तै ऊपर बता कै उन ताहिं राशन की दुकानां पै सस्ता नाज देवणा बंद कर दिया था। इसमैं सरकार का यो कहणा था कि इन गरीबां नै सस्ता नाज देवणा सरकार नै बहोत खर्चीला पड़ै सै। पर बड्डी कंपनियां द्वारा बड्डे मुनाफे पर विदेशां मैं नाज बेचण की खातर सरकार यो खर्च ठावण नै त्यार सै। इन कंपनियां ताहिं सबतै बढ़िया नाज दिया जावैगा पर इस नाज नै पैदा करण आली ग्रामीण जनता नै राशन मैं कै मजदूरी के बदले मैं कीड़े पड़े औड़ सड़या औड़ नाज दिया जावण लागरया सै। ईबै हाल मैं यू तय करया सै म्हारी सरकार नै अक बड्डी कंपनियां नै उनके अपणे गोदामां मैं 8 लाख टन नाज धरण की खातर 720 करोड़ रुपइये सालाना का ठेका दिया जावैगा।
इस नाज के रख रखाव पै सरकारी गोदामां मैं जो लागत सै उसतै तीन चौथाई फालतू इन कंपनियां ताहिं दिये जावैंगे। ऊपर तै इन कंपनियां ताहिं कई करां मैं छूट दी जागी वा न्यारी। म्हारी प्यारी फील गुड सरकार नै कंपनियां ताहिं यो भी आश्वासन दिया सै अक इन गोदामां मैं जै किसे साल नाज नहीं धरया गया तो भी सरकार उन ताहिं 20 साल ताहिं किराया अर करां मैं छूट देवैगी। आई किमै समझ मैं कि कुणसी तुरूप चाल खेली जावण लागरी सै म्हारी गेल्यां कि न्यों ए पत्ता दाब कै सीप मैं बख्त बिराण करें जाओगे?
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रै देख लिये पंचाती पत्नी नै बाहण बणावैं

रै देख लिये पंचाती पत्नी नै बाहण बणावैं
     सविता, कविता, नीलम, भरपाई, सत्ते, फत्ते, कर्मबीर बैठे टीवी देखण लागरे थे। टीवी पै आसंडा कांड की रील चढ़ा राखी थी जी टीवी आल्यां नै। सारी बात देख-सुण कै बहोत शर्मसार हुये अक यू कीसा फैसला सुणा दिया पंचात नै? सविता बोली - या चुणी होई पंचात सै के आसंडे की? कविता बोली - ना या चुणी औड़ कोण्या या तै स्वयंभू पंचात सै। खाप पंचात का हिस्सा।
     भरपाई बोली - फेर यू सोनिया अर रामपाल का ब्याह तो कोर्ट मैं नहीं होरया के? कविता नै बताया - कोर्ट मैं दर्ज होरया सै। भरपाई बोली तो फेर या पंचात उस सोनीपत आले कोर्ट तै बड्डी होगी के? सत्ते बोल्या - वा कचहरी तो म्हारे संविधान की कचहरी सै अर धर्मसिंह, कांशीराम अर कलाधारी आली कचहरी खाप आली कचहरी सै। भरपाई फेर बोली - मैं भी तो याहे बूझूं सूं अक इस हरियाणा मैं अर इस आसंडे मैं कूणसा कानून लागू होवैगा? भारत के संविधान का कानून अक इन पंचातां का कानून? कविता बोली - योहे तो देखणा सै 22 नवंबर नै, अक भारत का संविधान जीतैगा अक इन पंचातियां के पति-पत्नी नै भाई-बाहण बणावन आले फतवे की जीत होवैगी?
     नीलम बोली - मनै अखबार मैं पढ़या था अक दिल्ली मैं निजामपुर गाम सै उड़ै राठी अर दहिया दोनू गोतां के लोग बसैं सैं अर आपस मैं ब्याह पै कोए रोक टोक नहीं। दहिया की दूसरा गाम की छोरी राठियां कै ब्याही आवैं सैं अर राठिया के दूसरे गाम की छोरी दहिया कै ब्याही आवैं सैं। भरपाई बोली - तो इस आसंडे कै पागलपन क्यूं उठग्या? सत्ते बोल्या - यू समचाणा गाम रहया। इसमैं दहिया, मलिक अर हुड्डा तीनों गोत सैं अर दूसरे गामां मां तै तीनों गोतां की छोरियां के ब्याह इसे गाम मैं होवण लागरे तो ये आसंडे आले इसे आन्डी क्यूं पाकैं सैं? कर्मबीर बोल्या - गुगाहेड़ी मैं मेरे मामा सैं। उड़ै कई गोत सैं अर खेड़े का गोत दलाल सै। फेर दूसरे गामां की दलाल गोत की छोरी म्हारे मामा के गाम के दूसरे गोतां मैं ब्याही जावण लागरी। उड़ै तो कोए बंदिश कोन्या। कविता बोली - हरेक गाम मैं 15-20 गोत आगे सैं, जै इन गोतां आले, खेड़े आले, गोत की दाब मान कै ब्याह करैंगे तो हो लिया ब्याह। एक तो छोरियां नै पेटै मैं मार-मार कै इनकी संख्या घटा दी। 1000 पुरुषां पै 861 औरत रैहगी। हरियाणा मैं अर एक कसूता चाला और कर दिया पढ़े-लिख्यां नै।
     पढ़े लिख्यां 1000 पुरुषां पै 617 औरत रैहगी बताई। पढ़ाई औरत नै पेट मैं मारण के कसूते गुर सिखावै सै। सविता बोली - ये पंचात उन लोगां नै गाम लिकाड़ा क्यूं ना देती जो इन छोरियां नै पैदा होवण तै पहलम मार दें सैं? सत्ते बोल्या - पुराणा समों बदल गया। ईब तो या गोतां की पाबंदी किसे गोत मैं नहीं रैहणी चाहिए अर किसे गाम पै नहीं रैहणी चाहिए। फत्ते बोल्या - या तो म्हारी पुरानी परंपरा सै। राठी की छोरी आसंडे मैं बहू बणकै क्यूंकर आ सकै सै? कविता बोली - म्हारी परंपरा मैं तो बुलधां की खेती कदे कदीमी तै थी। इन पंचातियां तै बूझो इननै बुलधां की खेती की परंपरा तोड़ कै ट्रैक्टर की खेती क्यूं शुरू करदी? अर पहलम रिवाज था अक बालक पैदा होवण पै ओरनाल जंग लागे औड़ चाकू तै के दरांत तै काटया करते अर टैटनस होकै घणे बालक मर जाया करदे। म्हारी परंपरावां तै इतना ए प्यार सै चौ. धर्मसिंह जी नै अर कांशी राम जी नै तो इननै अपणे घर मैं या परंपरा क्यों छोड़ दी? कविता बोली - न्यूं सुण्या सै अक रामपाल के कुनबे के एक दहिया माणस नै या आग लाई सै उल्टी सीधी बात कैहके? भरपाई बोली - तो गाम लिकाड़ा तो पंचात नै उस ताहिं देवणा चाहिए था, ये सोनिया-रामपाल भाई-बाहण किसे बणावैं थे। जे इन पंचातियां कै थोड़ी घणी बी सरम-लिहाज सै तो इननै अपणी मूछां का सवाल छोड़ कै, सोनिया नै मैडीकल मां तै बाइज्जत आसंडे मैं ल्यावैं। नहीं तो हमनै बी चंडीगढ़ के कोर्ट मैं पार्टी बणकै सोनिया का केस लड़णा चाहिए अर इन पंचातियां की एक नहीं सुणणी चाहिए।



कीसी हो केंद्र की सरकार

कीसी हो केंद्र की सरकार
सत्ते फत्ते अर नफे सत्ते हर कै घरां बैठे बतलावण लागरे थे। सते की बहू सविता अर नफे की भाभी कमला भी उड़ै आगी। नफे अर उसकी घर आली खजानी राजस्थान मैं तीन चार दिन ला कै आये थे खजानी के पीहर मैं। सत्ते बोल्या - सुणा कमला के हाल चाल सैं? कमला बोली - लैक्शनां का चर्चा जोरां पै था इबकै तो।
राजस्थान के लोग कीसी सरकार चाहवैं सैं? कमला बोली - राजस्थान आल्यां का तै मनै ना बेरा वे कीसी सरकार चाहवैं सैं फेर सविता अर गाम की कई और लुगाई एक दिन बैठ के जरूर बतलाई थी अक म्हारे देश की कीसी सरकार होणी चाहिए?
सत्ते बोल्या तो आज थाम अपनी भड़ास काढ़ल्यो। फत्ते बोल्या - या तो आच्छी बात सै, हमनै तो ताश खेलण तै फुरसत ना ईसी बातां पै विचार करण की। हां बोलो। कमला अर सविता बोली - हमतै ईसी सरकार चाहवां सां जो -
अमरीका कै आगै गोडे ना टेकै
इराक मैं सेना नहीं भेजै
आजाद अर गुटनिरपेक्ष बिदेशी नीति अपनावै
पूरे देश के हितां की रुखाली हो
धार्मिक कट्टरवाद फैला कै लोगां नै ना जलवावै
दुलीना कांड ना होवण दे। जाति-विद्वेष ना पैदा करै
भाषा के नाम पै लोगां नै ना लड़वावै
गरीबी का पक्का इलाज करण की गारंटी करै
भूख तैं मरण आल्यां का पूरा हांगा लाकै राह टोहवै
बेरोजगार छोरे-छोरियां ताहिं बेरोजगारी भत्ता देवै
भ्रष्टाचार नै जड़ तै पाड़ बगावै
देश के कानून बिदेशियां के हक मैं ना बदलै अर देश की आम जनता के हकां की रुखाली करै
सार्वजनिक क्षेत्र के मुनाफे मैं चालण आले कारखाण्यां नै कति ना बेचै
काला बाजारियां नै जेल मैं ठोक दे
खेती मै सरकारी निवेश ताहिं बढ़ावा देवै
सिंचाई सूखा राहत का इंतजाम करै अर गाम मैं रहणियों के रोजगार का इंतजाम करै
फसल की ठीक कीमत तय करै
डब्ल्यू टी ओ की दाब मैं ना आवै
खेत मजदूरां खात्तर संसद मैं कानून पास करै
भूमि-सुधार कानून का सही इस्तेमाल करै
जन-वितरण प्रणाली नै ठीक तै हटकै चालू करै
सबके स्वास्थ्य की गारंटी दे
बारहवीं ताहिं की शिक्षा सबनै मुफत देवै
संसद मैं अर विधानसभा मैं महिलावां खातिर एक तिहाई सीट रिजर्व करवावै
हड़ताल का अधिकार बरकरार राखै
बिजली का निजीकरण रोकै
नदी का कटाव रोकण की खात्तर पूरा ध्यान देवै। अर दूरगामी योजना बनावै।
फत्ते बोल्या - ईसी सरकार के न्योंए थोड़े बणज्यागी? इसकी खात्तर तो कसूते पापड़ बेलने पड़ैंगे। सविता बोली - हम तो त्यार सैं थाम आपणी बताओ? नफे कै गलै नहीं उतरी ये सारी बात। उसकी पार्टी का ब्योंत नहीं था इन बातां मां तै दो बी पूरी करण का। बात नै घुमा कै बोल्या - कड़ै सै ईसा राज? कमला सहज दे सी बोली - जिब देखण का मन बणावैगा तो ईसा राज कड़ै सै इस बात का बी बेरा तो लाए लेगा। सते बोल्या - जो इसी सरकार कितै नहीं बी सै तो के होग्या। सोच्चण मैं अर बिचार करण मैं के हरजा सै। देश आजाद करावण की बात भी तो पहलम बिचार मैं आई होगी उसतै पाच्छै अमल शुरू हुया होगा?
सविता बोली - आज नहीं तो काल इन बातां पै गौर तो करणा ए पड़ैगा। ये जो सोच्चण के नाम पै दिमागां कै ताले ला राक्खे सैं ये खोलने तो जरूरी सैं। नफे बोल्या - के धिंगताने खुलवावैगी? कमला बोली - पहलम तै मिलकै सोच विचार करांगे अर फेर सबनै साथ ले कै चाल्लांगे। कोए एतराज? नफे बोल्या - फेर कीसा एतराज।


म्हारा स्कूल क्यूंकर बचै ?


रमलू एक दिन स्कूल मैं चाल्या गया। उड़ै नेता जी आरे थे। बड़ी-बड़ी बात मारी नेता जी नै। रमलू नै स्वाद कोण्या आया। ओ स्कूल की बिल्डिंग कान्हीं देखण लाग्या। मंडेरयां की ईंट झड़ली। रेही नै ईंट खाली। चारदीवारी का खण्डर होग्या। रमलू कै ध्यान आया कि स्कूल की या बिल्डिंग तो म्हारे दादा हर नै गाम मैं चन्दा करकै बणवाई थी। सरकार नै नहीं लाया पीला पीस्सा बी। फेर सरकार नै ये बिल्डिंग ले ली। स्कूल के नाम का पीस्सा बजट मैं आन्ता अर बी डी ओ अर दो च्यार गाम के सफेदपोशां की गोज मैं चाल्या जान्ता। रमलू बहोत दुखी हुया स्कूल की इमारत की हालत देख कै नै। उसने अपणे आप पै बहोत गुस्सा आया कि इन बातां का बेरा क्यूं ना लाया? रमलू तै बैठया नहीं रहया गया। उसनै सोच्ची कि एक बै पेशाब करयाऊं हो सकै सै इतनै नेता जी का भाषण खत्म होले। पेशाब करण गया तो कितै पेशाब घर टोहया ना पाया। 600 बालक (छोरे-छोरी) पढ़ैं स्कूल मैं अर 22 अध्यापक पढ़ावैं, जिनमैं पांच तो गाम की बहु सैं।
बिना पेशाब घर क्यूकर काम चाल रहा सै? फिर रमलू कै तावला सा ख्याल आग्या कि गाम मैं भी तो दो च्यार घरां नै छोड़ कै शौचालय कोण्या किसे बी घर मैं फेर बी काम चालरया सै। यो स्कूल मैं भी गाम का असर सै, गाम की परछाई सै। फेर रमलू के मन मैं आया अक स्कूल का असर गाम पै होणा चाहिए था यू गाम का असर स्कूल पै क्यूकर आग्या? रमलू नै बहोत सोच्या फेर उसकी पकड़ मैं कोनी आई बात।
जितने मेरे मास्टरजी अर बहन जी सैं उननै तो सोचना चाहिए। हो सकै सै कई जणे पढ़कै न्यों कैह देंगे कि म्हारे स्कूल मैं तो पेशाब घर अर शौचालय सैं। फेर जित सै उसका के हाल सै इसपै लिखण खातर जागां की कमी सै। थोड़े लिखनै ज्यादा समझियो। रमलू नै हिसाब लाया उनके अपने गाम मैं च्यार प्राइवेट स्कूल खुलगे। किसे स्कूल मैं 200 बालक सैं। किसे मैं 120 सैं जड़ सौ तै घाट किसे स्कूल मैं बालक कोण्या। सरकार स्कूल मैं कै तो दलितों के बालक रैहगे।
अर कै घणे गरीब ब्राह्मण अर जाट के बालक, कै जित दूसरी स्वर्ण जात सैं उनके गरीब तबक्यां के बालक। रमलू नै नजर मारकै देख्या कि जो पांच बहु इस स्कूल में पढ़ावैं सैं उनके बालक बी कोण्या पढ़ते स्कूल मैं। दो च्यार भट्ठे आले सैं उनके बालकां खातर कस्बे के स्कूल की बस आया करै। रमलू का ध्यान गया कि ईबबी गाम मैं इसे 70-80 बालक पाज्यांगे जिनमैं स्कूल का मुंह नहीं देख लिया सै।
रमलू तै टिक्या कोण्या गया अरै औ सरपंच धोरै चाल्या गया। सरपंच बी जणू तै भरया बैठया था। पाछले सरपंच के चिट्ठे खोल कै धर दिये। स्कूल की चारदीवारी के दो बर पीस्से आये फेर बनी तो एक बर बी कोण्या (उसनै या नहीं बताई कि पीस्से तो हटकै फेर आरे सैं स्कूल की चारदीवारी बनावण के)। यो तालाब के घाट बणावण का पीस्सा आया था। घाट बण्या देख्या सै के जोहड़ पै? खुदाई का पीस्सा आया फेर कड़ै खुदाई हुई?
जड़ रमलू कै या बात पक्की जंचा दी कि पहलड़े सरपंच नै यू गाम मूंधा मार दिया। रमलू पहलड़े सरपंच धौरे गया। ओ ईब आले सरपंच के कारनामे लेकै बैठग्या। जड़ रमलू चाहवै था तो स्कूल के बारे में कुछ करना फर भूतपूर्व अर वर्तमान सरपंचां नै उसकी भम्भीरी बणा दी।
सांझ नै सरिता बोली - के बात आज तो किमै घणा ए दुखी होरया सै? रमलू नै सारा किस्सा सुणा दिया। सरिता बोली - इतना माड़ा मन क्यूं करै सै। गाम मैं स्कूल का भला चाहवण आले बी बहोत सैं फेर वे न्यारे-न्यारे सैं। वा अपनी आंगनबाड़ी वर्कर, वा सरला बहिन जी, वो थाम्बू का राजबीर। इन सबनै कट्ठै करकै एक मीटिंग करांगे। अर उसमैं बिचार करांगे कि स्कूल यो म्हारा स्कूल क्यूंकर बचै? और किसेनै चिन्ता कोण्या इस बात की।



खाप कितै सुणती हो तै


आजकाल खापां का खूबै रोला सै अखबारां मैं। आज फलाणी खाप नै जौन्धी मैं पत्नी-पति ताहिं राखी बान्ध कै बाहण बणकै रहवण का फतवा दे दिया। आज राठधाने मैं तथाकथित पंचातीयां नै छोरा-छोरी ताहिं फांसी लाकै मारण का फतवा दे दिया। कितै की खाप की पंचायत नै श्योरान अर काद्यान के ब्याह शादियां के मामले पै फतवे सुणा दिये। कदे खाप की पंचायत नै महिला के सासरे अर पीहर की जायदाद मैं हक कै खिलाफ फतवे जारी कर दिये। कहवण नै हो सकै सै इन खापां की हरियाणा में किसै बख्त पै कोए सकारात्मक भूमिका भी रही हो पर ईब पाछले 15-20 साल के अरसे पै नजर मारकै देखी जावै तो दिल कांप ज्या सै। मध्य युग के बर्बर समाज की याद ताजा होज्या सै। ये खाप घणखरे मामल्यां मैं महिला के हकां के विरोध मैं खड़ी दिखाई देवैं सै। बेरा ना के कारण सै। तालिबान के फतव्यां नै तो आपां सारे रोज रोवां सां पर इन खापां के 16वीं सदी के फरमाना नै आपां सराहवां सां। बात किमै जंची नहीं। कितै ना कितै किमै ना किमै खोट तो जरूरै सै। इन खापां का विकास विरोधी अर महिला विरोधी अर म्हारे नागरिक समाज के भीतर दिये म्हारे हकां का विरोध करण आली मानसिकता नै कोए भी इन्सानियत का मानवता का थोड़ा-सा भी गुर्दा राखणिया माणस क्यूंकर ठीक बता सकै सै? आपां इन खापां की तरफ तै पगड़ी बांध कै अपणी झूठी शान शौकत की गफलत तै 2001 की जनगणना की मैं पूरी दुनिया मैं उछाल ली। इनकी न्यों की न्यों कै कोली भरकै अर इननै जारी राखणा घणा घटिया काम सै अर जिब इसकी कोली पढ़े-लिखे माणस अर बुद्धिजीवी अर वायस चान्सलरां बरगे लोग भरकै खड़े हौज्यां तै समझो नागरिक समाज नै बहोतै भार्या खतरा सै।
पड़ाणा (जींद के एक गांव में) बड्डे गोत की छोरी अर छोटे गोत का छोरा कितै चले गये। बड्डे गोत आल्यां नै बदला लेवण खात्तर छोटे गोत आल्यां (छोरे की बाहण) की छोरी गेल्यां सबकै साहमी गाम बिचालै बलात्कार कर्या। इसतै नीच काम यू गोत के कर सकै था। अर ये गोत अर खाप की पंचात आले अर म्हारे नेता जो इन खापां के रूखाले सैं कति दड़ मारगे अर इस बर्बर कांड पै एक शब्द भी नहीं बोले। इस वोट की घटिया राजनीति नै उनके मुंह कै ताले ला दिये थे। आज हरियाणा मैं 2001 की जनगणना के हिसाब तै महिलावां की संख्या घटती जावण लागरी सै। अल्ट्रासाउण्ड तैं बेरा पाड़ कै छोरी नै पेट मैं ए खत्म करण का घटिया काम हरियाणा आले बड़ी श्यान तैं करैं सैं। इसपै ये गोतां की अर खापां की पंचायत क्यूं ना बोलती? ये पंचाती न्यों कहवैं सैं के होग्या ये थोड़ी होगी तै आच्छा ए सै कीमत बध ज्यागी। ईब इननै कूण समझावै अक इनपै अत्याचार बधैंगे इनकी कीमत नहीं बधै। भाली गाम मैं सुण्या सै तीन जणे मध्य प्रदेश तै पीस्से देकै बहू ल्याये सैं। औरत की भी गां-भैंस की ढालां बोली लागण लागगी इसनै कीमत बधणा मान्या जा सै तो इसे माणसां की बुद्धि का दिवाला ए पिट लिया। जो माणस हरियाणा के समाज मैं सुधार चाहवै सैं उननै सोचणा तो चाहिए अक इन गोत अर खापां की पंचातां गेल्या दो-दो हाथ करे जावैं ताकि इनकी सोच ठीक होज्या।

नाश क्यूकर होग्या


रमलू एक दिन ठमलू नै बोल्या - मेरे एक बात समझ म्हं नहीं आन्ती अक ये वामपंथी इन आर्थिक नीतियां के पाछै क्यूं हाथ धोकै पड़रे सैं? ठमलू बोल्या - ‘बेरा तो मनै बी कोण्या घणा-सा एक बात सै इनकी बात ईब साची सी लागण लागली। पहलम तो जंच्या नहीं करदी फेर ईब जेजावट होन्ती आवै सै।’ रमलू - वा क्यूकर भाई? दीखै सै थोड़ा घणा असर इन वामपंथियां का तेरै भी हो लिया। ठमल्यू बोल्या - ‘मैं तो वामपंथी कोण्या।’ तो फेर ’’ यू आर्थिक सुधार, सुधार की जागां समाज म्हं बिगाड़ पैदा कररे सैं तूं इस बात की हिम्मात क्यूं करै सै? रमलू नै फेर टोक दिया ठमलू। सारे गाम पै नजर मारकै देख्ख ली जो इन आर्थिक सुधारां के नफे नुकसान के बारे म्हं बता सकै फेर कोए माणस नहीं पाया। रमलू बोल्या - चाल रोहतक चालांगे उड़ै ज्ञान-विज्ञान आल्यां धोरै बूझकै आवांगे इनके बारे म्हं। ठमलू बोल्या - रोहतक जावण का भाड़ा लेरया सै? रमलू चुप होग्या। थोड़ी-सी वार म्हं फेर बोल्या - अपणे गाम की वा सुरते की बहू नहीं सै हो सकै सै उसनै किमै बेरा हो इसके बारे म्ह। ठमलू बोल्या - गाम के किसी बी मर्द नै नहीं बेरा तो उस बहू नै क्यूकर बेरा हो सकै सै? रमलू बोल्या - मेरे पक्की जंचै सै, उसनै बेरा सै पर उसतै बात क्यूकर करांगे? ठमलू बोल्या - बात तो कर ल्यांगे फेर करण कूण देवै सै? पांच मिनट चुपचाप बैठे रहे। रमलू बोल्या - रै ठमलू भाभी नै ले चाल अपणी गेल्यां फेर कोए कुछ ना कहवै। तीनूं चाले गये सरोज के घरां। बात शुरू होगी। सरोज नै टूटी फूटी भाषा म्हं बताया। फेर जो बताया उसनै रमलू ठमलू के दिमाग के सारे पट खोल दिये। बेरा ना थारे खुलैंगे अक नहीं खुलैंगे।
एक बात या अक 1998 के जुलाई के महीने ताहिं 1308 आइटमां पर तै आयात पाबंदी हटा ली थी जिसका घरेलू उत्पादन पै सत्यानााशी असर पड़या। दूसरा बीमा, दवा, होटल, पर्यटन, हवाई अड्डे, बंदरगाह आदि म्हं सौ फीसद बदेशी पूंजी की लूट खात्तर दरवाजे खोल दिये। दूरसंचार म्हं 75 फीसद अर बैंकां म्हं 49 फीसद प्रत्यक्ष बदेशी निवेशां की इजाजत दे दी। रक्षा उत्पादन म्हं भी बाड़ ली ये बदेशी कंपनी 26 पीस्से का हिस्सा दे कै। यू तो घणा नाजुक मसला हो सै। तीसरा, कोयले के बेरोक-टोक आयात की इजाजत दे दी। म्हारी अपणी खानां के बंद होवण का खतरा पैदा होग्या। बदेशी कंपनियां ताहिं कोले की खाण अर कोले के उत्पादन के अधिकार भी थम्बा दिये शेरां नै। चौथी बात अक इस्पात मतलब स्टील के आयात की इजाजत देकै स्टील कंपनियां कै कंपकंप चढ़ा दी। पांचवीं बात अक बिजली की जो दुर्गति करी सै वा सबकै साहमी सै। एनरॉन नै किसी लूट मचाई अर फेर भाज खड़ी हुई। 13 दिन के शासन काल म्हं हटकै इस कंपनी ताहिं यू ठेका दिया था भाजपा नै। छठी बात अक तेल की खोज की खात्तर 48 ब्लाक बदेशी कंपनियां कै हवाले कर दिये। घरेलू उत्पाद घटग्या अर बाहर तै तेल मंगवाण के कारण भुगतान संतुलन की दाब बधगी। जो पेटेंट का कानून हटकै बणाया सै उसतैं दवाईयाँ की कीमत खासकर बधगी। लघु उद्योग तो धड़ाधड़ बंद होवण लागरे सैं। इन सारी बातां के असर का अंदाजा इस बात तै लाया जा सकै सै अक वित्त वर्ष दो हजार के आखिर म्हं भारत सरकार की कुल देनदारियां 11,20,049 करोड़ रुपइयां की थी। मतलब देश के सकल घरेलू उत्पाद के 57.23 फीसद कै बरोबर। पाछले तीन बरस म्हं ए इन देनदारियां म्हं तीस हजार करोड़ रुपइयां की बढ़ोतरी होगी। इन देनदारियां पै ब्याज-ब्याज का भुगतान 12,20,00 करोड़ रुपइये सालाना तै ऊपर जा लिया। रमलू और ठमलू सरोज की बात सुणकै ठगे सै रैहगे। उल्टे आवन्ते आवन्ते सोचैं थे अक के बेरा था इतना कर्जा होरया सै म्हारे देश पै। चालदा रमलू बोल्या - भाई ज्ञान विज्ञान की कार्यकर्ता नै ज्ञान बहोत सै। न्यों काई सी छांटदी। ईब तै म्हारे पै सै इसका समाधान टोहवण का काम।


समाज मैं योह के होवण लाग रया सै ?


सत्ते, फते, नफे, कविता, सविता अर सरिता फेर शनिवार नै कट्ठे होगे धापां की बैठक मैं। बात चाल पड़ी नई सरकार पै अक इसनै के के काम जनता के करने चाहियें। कविता बोली - म्हारे गाम मैं च्यार सौ किल्ले धरती है गाम की पंचायत धोरै। पर इसपै किसे ना किसे का कब्जा सै। यू कब्जा हटा कै गरीब किसानां मैं अर मजदूरां मैं या धरती बांट देनी चाहिए। कई किल्ले बणी मैं भी धरती के पड़े सैं पर या बंजर धरती सै। या बी बांट देनी चाहियें मजदूरां मैं अर इस बंजर जमीन की खातर उन ताहिं जरूरी साधन बी दिये जाने की जरूरत सै। नफे एक दम बोल्या - या श्यामलात की जमीन तो उनमैं बंटनी चाहिए जिनके धरती सै। म्हरी पुरानी परम्परा तो याहे मांग करै सै। सत्ते बोल्या - थाम न्यूं कहो सो अक या इनमैं क्यूकर दे सकै सै सरकार। या सरकार कौडियां के दामां पै बदेशी कम्पनियां नै, अम्बानी अर टाटा बिड़ला नै अर धन्ना सेठां नै क्यूकर दे दे सै? फत्ते बोल्या इन सड़कां पै काम करणिया, खेत क्यार मैं काम करणिया, होटलां पै काम करणिया जड़ इन खेत मजदूरां खातर कानून बनना चाहिए जिबै इनकी दुर्गति का किमै इलाज हो सकै सै। नफे बोल्या - इनके मुंह पहलमै ऊपर नै चढ़रे सैं, यू कानून बना के इननै म्हारे सिर पै बिठवा दियो। सविता बोली - केरल मैं सन् 1974 मैं इन खातर कानून पास करया था उड़ै तो कोण्या बैठे ये किसे के सिर पै। आड़ै क्यूकर बैठ ज्यांगे? फेर ईब तो कई बार इनकी गेल्यां डांगर तै बी घटिया ब्यौहार हो सै। कई जागां पै तो इननै बन्धुआ मजदूर राखैं सैं रोटियां मैं। मेरे मामा का कुण्बा फतेहाबाद के एक गाम मैं दस साल बन्धुआ रहया। म्हारी मामी गेल्या के के करी उड़ै मालिक नै ये बतावण की बात कोण्या समझण की बात सै। भला हो अग्निवेश का उसनै मुश्किल तै छडवाया था म्हारा मामा। सत्ते बोल्या - एक बात पर और गौर करण की जरूरत सै मन मोहन सिंह की सरकार नै। सामाजिक न्याय का मामला कसूता उलझता जावै सै अर दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक अर महिलावां पै अत्याचार, हिंसा, वर्ण-लिंग भेद बढ़ता जावै सै। करनाल मैं बाल विवाह का मामला पाछै सी छोरियां नै हौंसला करकै रोक्या था। महेन्द्रगढ़ मैं तो रोज थाली मैं बिठा कै आज बी प्रसासन के अर पुलिस के नाक तलै फेरे दिये जावैं सैं। बेरा ना क्यूं ना दिखते ये बाल विवाह म्हारे परसासन नै। दुलिना काण्ड, हरसौला काण्ड दलितां पै अत्याचार बढ़ते जावैं सैं। महिलावां का तो जिकरा ए कोण्या मार पिटाई, छेड़छाड़, बलात्कार, रोज अखबार अटे पड़े रहवैं सैं खबरां तै। बालक तो होटलां पै अर इन परसासनिक अधिकारियां के घरां बी खूब काम करते देखे जा सकैं। अनुसूचित जाति-अनुसूचित जन जाति अत्याचार निरोधक कानून की धज्जियां उड्डण लागरी सैं। सरिता बोली - सत्ते की बात कुछ तो ठीक सै फेर छुआछात तो ईब कड़ै रैह री सै? सत्ते एक दम बोल्या - जै नहीं रैहरी तो अपणी छोरी का ब्याह सविता के मामा के छोरे गेल्यां करदे नै। नौकरी बी लागरया सै ओ। सरिता बोली - न्यूं क्यूकर ब्याहद्यूं? नफे बोल्या - मेरी बी सुणियो। एक टेम का हिसाब सा बिठाकै जितनी अक खेती आली धरती मैं सिंचाई का परबन्ध करना चाहिये म्हारी सरकार नै। एक इसी वैज्ञानिक जल परबन्ध प्रणाली लागू करनी चाहिये जो म्हारी धरती अर पाणी नै ढंग तै संयोजित करती हो। सविता बोली - खेती खातर सुरक्षित अर विकसित बीज, खाद, कीटनाशक सस्ते दामां पै मिलने चाहियें। नई तकनीक बी ल्याई जा। सत्ते बोल्या - इसमैं कोए सक की गुंजाइस नहीं अक म्हारी सरकार नै खेती खातर, सिंचाई खातर, शिक्षा खातर, सेहत खातर, विज्ञान अर तकनीक खातर और घणा सार्वजनिक निवेश करना चाहिये। जिबै तो कृषि उत्पादन बधैगा, किसान खुशहाल होगा। खेतों मैं नई खोज होणी चाहिये। किसानां ताहिं पूरी ट्रेनिंग देनी चाहिये। सामाजिक कल्याण के काम ज्यूकर पढ़ाई, सेहत, साफ पाणी, शौचालय अर पंचायतां की बी सुध लेवै सरकार। इनका ख्याल करै। दो च्यार गामां मैं और इस पर्चे नै पढ़वा दियो, ज्यूकर हुक्के पै सरकार पै दबाव बणावण की बात चाल पड़ै।