हरियाणा के एक गाम का किस्सा है। इस गाम का कोए भी नाम हो सकै सै। मान लिया इस गाम का नाम रामपुर सै। इस गाम की आबादी 2000 के लगभग सै। इसमैं 35 प्रतिशत जाटां के घर सैं, जिनमैं 16 गोतां के लोग शामिल सैं। इनै गोतां मां तै एक गोत के नाम तै यू गाम गुहांड मैं जाण्या जावै सै। बाकी पन्दरा गोत इस गोत के मातहत सैं ज्यूकर कबील्यां मैं सारा कबीला कबीले के सरदार के मातहत हुया करदा। बाकी बाहमणा के गोतां का कोए जिकरा ना, दलितां के गोतां की कोए बूझ ना पर बिचारे कुम्हारां नै अर धानक भाइयां की तो बूझ करै ए कूण था। जबकि 15 प्रतिशत जनता ब्राह्मण परिवारां तै सै अर 26 प्रतिशत लोग दलित भाई सैं। दस प्रतिशत के लगभग पिछड़े वर्ग के लोग बी सैं। छह सात घर पंजाबियां के बी सैं अर तीन घर मुसलमानां के सैं। कुछ परिवारां नै छोड़ के जाटां के घरां मैं ईब टयूबवैल के पानी के कनैक्शन आगे।
इन परिवारां नै पानी की खात्तर ईब डिग्गी के पानी के नलक्यां पै घंटों पानी के आवण का इंतजार कोनी करना पड़ता। ईब तो कुछ परिवारां की भैंसां की बी चान्दी होगी। गाल मैं ए नहवाई जावैं सैं। गरीब जाट परिवारां धोरै पानी का यू जुगाड़ कोन्या। उन धोरै कनेक्शन के 4000 कै पांच हजार रुपइये कोन्या। आए मिहनै दो सौ तीन सौ रुपइये खर्च बी उन धौरै कोन्या। कुछ परिवारां नै खाते पीते परिवारां धोरै एक घंटे पानी के 50 रुपइये मिहना के हिसाब तै पानी ले राख्या सै। गाम के बहोत से घर अर खास करकै दलित अर कमजोर तबक्यां के लोग सैं जिननै के तो डिग्गी के पानी तै काम चलाना पड़ै सै अर कै नलके के पानी तै अर कै एकाध कुआं बचरया हो तै उसके पानी तै।
डिगियां का जो हाल सै वो सबनै बेरा से। जंगल के हाथ बी उसमैं धौवैं, डांगर बी उसमैं नहावैं, मरे औड़ कुत्ते उसमैं पड़े रहवैं अर और बेरा ना के के। धरती तै तले के पानी का बी सत्यानाश करण मैं कसर नहीं रैहरी। हमनै रासायनिक खाद अर कीटनाशक दवाईयां तै खेत जमा आंट दिये। ये कीटनाशक धरती तले के पानी नै भूंडी ढाल खराब करण लागरे सैं। इस धरती तै तले के पानी करकै बी गाम के हर घर मैं खाज, कालजा दुखना, पेट का दर्द, खांसी बरगी बीमारी पलाथी मारकै बैठगी। कई बै तो पानी दो तीन किलोमीटर तै ल्यावणा पडै़ सै। कमजोर परिवारां की महिला कै बालक अपने-अपने बर्तन ठाकै पाणी ल्यावंते पा ज्यांगे। कई गामां मैं तो धरती तै तले के पाणी का चौआ भी तले नै ए जावण लागरया सै। ये पाणी प्यावण आले ट्यूबवैल कदे बी बैठ सकै सै फेर पाणी कित तै आवैगा गाम मैं, या किसे की चिन्ता कोन्या। बिसलेरी का पानी खरीदण का ब्यौंत नहीं अपने पाणी का ख्याल नहीं, ठीक सै गेर रै पत्ता गेर, इस खूंटा ठोक की तो आदत होरी सै, हमनै बिसरावण की। दस्तां मैं, पेट दरद मैं, खांसी मैं डॉक्टर कै म्हिने के दौ सौ चार सौ रुपइये पूज के आवण मैं कोए एतराज नहीं, फेर खूंटा ठोक की बिना पीस्से की सलाह मानन ताहिं फुरसत कोन्या ताश खेल्लण तै। ठीक सै। इन टयूबवैलां का पानी टैस्ट तो करवा कै देखल्यो हो सकै सै इस खाज अर पेट दरद का कारण इसमैं पाज्या।
हम बदेशी कम्पनियां के घर भरण लागरे सां अपनी कमाई तै। बिशलेरी का पानी बदेशी कम्पनी का, सबमरसिबल पम्प सैट बदेशी कम्पनी का, कीटनाशक बदेशी कम्पनी का, शरीर म्हारा, अर बीमारी म्हारी फेर इन बीमारियां खात्तर दवाई बदेशी कम्पनियां की। हम फेर बी ताशां पै बैठे न्यो कैहद्या सां म्हारै ये बदेशी के सेहद करैं सैं? अर यो बुश इन कम्पनियां का सरदार। यो हटकै फेर आग्या अमरीका का राष्ट्रपति बणकै अर हम फेर कैह द्यां सां आग्या तो आग्या हमनै के लेना-देना इसतै। मेरे बीरा लेना देना सै। म्हारे पानी के प्रदूषण तै, म्हारी पेट की बीमारी तै इसका लेना-देना सै। किल्ला एक खरीद के सारे गुहांड के पाणी पै बी कब्जा कर लिया अर हम बैठे-बैठे कहवां सां ‘‘गेर रै गेर पत्ता गेर, के समाधान हो इसका’’? पहली बात तो इन बातां पै आप्पां सोचना शुरू करां। हरियाणा मैं छह हजार तै फालतू गाम सैं। एक जवाब तै सारे गामां का काम कोन्या चालै। छह हजार गामां नै अपने-अपने ढंग तै सोचना पड़ैगा।
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