शनिवार, 15 जुलाई 2017

किसान की गाढ़ी कमाई के दावेदार

किसान की गाढ़ी कमाई के दावेदार

माणस सामाजिक पशु सै। मनुष्य अर पशु मैं योहे फरक सै अक माणस अपने भले अर बुरे की खातर अपणे समाज पै बहोत निर्भर रहवै सै। असल मैं पशु जगत के घणे ठाड्डे-ठाड्डे बैरिया कै रैहन्ते अर बख्त-बख्त पै आवण आले हिम युग जीसे भयंकर प्राकृतिक उपद्रवां तै बचण मैं, उसके हाथां नै अर फेर दिमाग नै जो उसकी मदद करी सै उसमैं मनुष्य का समाज के रूप मैं संगठन बहोत घणा सहायक हुया सै। इस समाज नै शुरू मैं कमजोर माणसां की ताकत को सैकड़यां माणसां की एकता द्वारा बहोत घणा बढ़ा दिया। ईसे ताकत के दम पै माणस नै अपणे प्राकृतिक अर दूसरे बैरियां तै रक्षा पावण मैं मदद देते होंए भी अपणे भीतर तै ईसे बैरी पैदा कर दिये जिननै उन प्राकृतिक अर पाशविक बैरियां तै भी फालतू माणस की जिंदगी नरक बणावण का काम करया सै। समाज का अपणे भीतर के माणसां के प्रति न्याय करणा पहला फरज सै। न्याय का मायना यो होणा चाहिए अक हरेक माणस अपने श्रम के फल का उपयोग कर सकै। लेकिन आज हम उल्टा देख रहे सां। धन वोह सै जो आदमी के जीवन की खातर बहोत जरूरी सै। खाणा, कपड़ा, मकान ये सारी चीज सैं जिन को असली धन कहणा चाहिए। असली धन के उत्पादक वेहे सैं जो इन चीजां नै पैदा करैं सैं। किसान असली धन का उत्पादक सै क्योंकि ओह मिट्टी नै अपणे श्रम तै गिहूं, चावल, कपास के रूप में बदल दें सैं। दो घंटे रात रैहन्ते खेतां मैं पहोंचना। जेठ की तपती दोफारी हो चाहे पोह का जाड्डा हो, ओ हल जोतै कै ट्रैक्टर चलावै, पाणी लावै, जमीन नै कस्सी तै एकसार करै अर उसके हाथां मैं कई कई आट्टण पड़ज्यां सैं फेर बी ओ मेहनत तै मुंह नहीं चुरान्ता। क्योंकि उसनै इस बात का बेरा सै अक धरती माता के दरबार मैं रिश्वत कोन्या चालती अर ना चाल सकती। धरती स्तुति - प्रार्थना तै अपणे दिल नै खोल कोण्या सकदी। या निर्जीव माट्टी सोने के गिहूं, बासमती चावल अर अंगूरी मोतियां के रूप मैं जिब बदलै सै जिब धरती माता देख लेवै सै अक किसान ने उसकी खातिर अपणे खून के कितने घणे पसीने दिये, कितनी बार थकावट करकै उसका बदन चूर-चूर होग्या अर कस्सी चाणचणक उसके हाथ तै छूटगी।
गिहूं बण्या बणाया तैयार एक-एक जागां दस बीस मण धरया औड़ कोण्या मिलता। यो पन्दरा-पन्दरा, बीस-बीस मण की ढेरी एक जागां देख कै एक बर तो उसका जी खिले उठै सै। महीन्यां की भूख तै अधमरे उसके बालक बड़ी चाह भरी नजरां तै उस ढेरी नै देखैं सैं। वे समझैं सैं अक दुख की अंधेरी रात कटण आली सै अर सुख का तड़का साहमी सै। उननै के बेरा अक उनकी या ढेरी जो उनके मां-बाप नै इतने कष्टां तै पैदा करी सै या उनके खावण खातर कोण्या। इसके खावण के अधिकारी सबतै पहलम वे स्त्री-पुरुष सैं जिनके हाथ मैं एक बी आट्टण कोण्या, जिनके हाथ गुलाब जिसे लाल अर मक्खन बरगे मुलायम सैं, जिनकी जेठ की दोफारी ए.सी. तलै कै शिमला मैं बीतै सै। जाड्डा जिनकी खातर सर्दी की तकलीफ नहीं ल्यान्ता बल्कि मुलायम ऊन अर कीमती गर्म कपड़यां नै सारे बदन नै ढक कै आनन्द के सारे राह खोल दे सै। निठल्ले अर निकम्मे ये बड्डे आदमी, जमींदार, महाजन, मिल मालिक, बड्डी तनखा आले नौकर, पुरोहित अर दूसरी कई ढाल की जोंक किसान की कष्ट कमाई के भोजन का सबतै पहलम हक राखैं सैं। अर यू किसान आत्महत्या करण ताहिं फांसी खातर जेवड़ी टोहन्ता हांडै सै। कै सल्फास की गोली खाकै निबटारा पाले सै। फेर एक पार्टी ब्यान दे सै अखबार मैं अक हम आगे तो सारे कर्जे माफ कर द्यांगे। को इनतै न्यों तो बूझ ले अक ये इसा राह क्यूं ना बांध देवैं अक किसान पै कर्ज चढ़ैए कोण्या। छोटूराम नै हरियाणा के किसान का करजे अर कुड़की तै पैंडज्ञ एक बै छटवाया। 50-60 साल मैं फेर उड़ै पहोंच लिया किसान। ईब ली सरकार नै लोन की खातर बजट बधा दिया। मतलब किसान और करज़ा लेगा अर बहुराष्ट्रीय कंपनियां के बीज खरीदैगा अर करजे मैं गले ताहिं डूबैगा अर फेर फंासी खावैगा।





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