मरया औड़ काटड़ा़ और हाम
हरियाणा के पूर्वजां नै एक परम्परा बणाई। किसनै बणाई अर कद बणाई इस बात का किसे किताब मैं जिकरा कोण्या पान्ता। जै किसै नै बेरा हो अक कूणसी इतिहास की किताब मैं लिख राख्या सै तो हमनै भी बतावण का कष्ट करैं। वा परंपरा सै अक जिब भैंस का काटड़ा मर ज्या तो भैंस दूध देवण मैं आन्ना-कान्या करया करै। अर भैंस की दो खड़ की आन्ना कान्नी भी भैंस के मालिक नै बहोत महंगी पड़ज्या सै। इस बात नै जो भैंस पाल कै दूध बेच कै गुजारा करैं सैं उननै इस बात का खूबै ए बेरा सै। लोगां नै एक नयाब तरीका टोह लिया भैंस पुसावण का। अक मरे औड़ काटड़े के सिर-मुंह अर धड़ मैं भूस्सा भरवा ल्यो अर जिब धार काढ़णी हो तो भैंस कै साहमी उसनै धर्य द्यो। भैंस उसनै चाट लेगी अर दूध देगी। खूंटा ठोक नै भी दो च्यार जागां यो सांग देख्या अर जाणना चाह्या अक इसका नाम के सै? जित बी कोए फेट ज्या खूंटा ठोक उसै तै इसका नाम बूझण लागज्या। सारे न्यों कहवैं अक सै तो सई इसका किमै नाम पर के सै न्यों बेरा ना। कई हरियाणवी संस्कृति की जो कोली भरें हांडे सैं उनपै भी बूझ्या फेर वे भी सिर सा खुजा कै रैहगे। ल्यो थोड़ी-सी वार थाम बी सोच कै देख ल्यो। इतनै एक बात याद आगी अक एक बटेऊ की सुसराड़ मैं कम बण्या करदी। उसका रंग भी घणा काला था कति जैट ब्लैक। ईब कै ओ अपणी सुसराड़ गया तो उसकी सासू बहोत मीठा बोली। सांझ कै हल्वा बणाया अर खुद सासू नै थाली परोसी।
साहमी बैठकै बोली अक बेटा जितने दिन जी करै दस दिन, पन्द्रह दिन म्हिना आड़ै डट। तेरी खूब खातिर दारी करांगे। बटेऊ कै बात समझ नहीं आई अक इतनी सेवा क्यों होरी सै? सारी रात सोचदा रह्या। तड़कै ए गरम गरम परोंठे आगे। सासू राजी खुसी की बूझण लाग्यी। फेर बोली अक जितने दिन जी करै उतने दिन डटिए। बटूऊ बोल्या बिना काम न्यों खाट तोड़दा माणस आच्छा कोण्या लागदा। जै डाट्टण चाहो सो तो किमै काम बताओ। सासू बोली अक काम अर बटेऊ धोरै? बटेऊ बोल्या फेर बी माता जी किमै तो काम हो। सासू बोली अक म्हारी भैंस का काटड़ा मर र्या सै। जिब धार तड़कै सांझ काढूं तो उसके साहमी खड़या हो जाया कर। तो बात या सै अक म्हारे नेता बी अपणे मरे औड़ नेतावां की खोड़ मैं भूस्सा भरवा कै जनता नै लैक्सनां कै टाइम पुसावण नै इसका खूबै इस्तेमाल करैं सैं। तो आई याद अक भूस्स भरे औड़ काटड़ का नाम के सै? नहीं बेरा ना। एक बै फेर सोच कै देखल्यो। थोड़ा-सा दिमाग पै बोझ गेरणा सीखणा चाहिए।
जो भी आकै हमनै भकाज्या सै हम उसकी हां मैं हां करकै नाड़ हिला द्यां सां। अर फेर कहवां सां अक ओहले भाई। हमनै के बेरा था अक न्यों बणज्यागी? अर फेर ताश खेलण लाग ज्यांगे। अर कै दारू की बोतल धर कै बैठ ज्यांगे।
मजाल सै जै इस भूस्स भरे औड़, मरे औड़ काटड़ का नाम एक पोस्टकार्ड पै लिख कै अर हरिभूमि के दफतर मैं भेजद्यां। हो सकै ज्यूकर बासमती चावल का बदेसी कंपनियां नै पेटैंट करवा लिया न्योंए इसके नाम का भी वे बोतडू. के नाम तै पेटैंट करवा लें अर आपां फेर कहवां अक ओहले भाई। के बेरा था न्यों बणज्यागी? या तो बणी बैठी सै। एक बर इसका नाम अखबार मैं आज्यागा तो फेर बदेशी कंपनियां नै आसान नहीं रहवै इसका पेटैंट करवाणा। आया समझ मैं नाम अक ईब्बी नहीं आया सै? के बाट देखो सो अक खूंटा ठोक बता देगा। ना कति नहीं बतावै अर जै बताणा भी चाहवै तो किततै बतावैगा। खुदै बेरा कोण्या। फेर एक बात पक्की सै अक आपां सारे रलकै सोचांगे तो इसका नाम जरूर टोहल्यांगे। आपा मारे पार पड़ैगी। बिराणै भरोसै बैठकै कै राम के भरोसे बैठकै काम कोण्या चालै।
हरियाणा के पूर्वजां नै एक परम्परा बणाई। किसनै बणाई अर कद बणाई इस बात का किसे किताब मैं जिकरा कोण्या पान्ता। जै किसै नै बेरा हो अक कूणसी इतिहास की किताब मैं लिख राख्या सै तो हमनै भी बतावण का कष्ट करैं। वा परंपरा सै अक जिब भैंस का काटड़ा मर ज्या तो भैंस दूध देवण मैं आन्ना-कान्या करया करै। अर भैंस की दो खड़ की आन्ना कान्नी भी भैंस के मालिक नै बहोत महंगी पड़ज्या सै। इस बात नै जो भैंस पाल कै दूध बेच कै गुजारा करैं सैं उननै इस बात का खूबै ए बेरा सै। लोगां नै एक नयाब तरीका टोह लिया भैंस पुसावण का। अक मरे औड़ काटड़े के सिर-मुंह अर धड़ मैं भूस्सा भरवा ल्यो अर जिब धार काढ़णी हो तो भैंस कै साहमी उसनै धर्य द्यो। भैंस उसनै चाट लेगी अर दूध देगी। खूंटा ठोक नै भी दो च्यार जागां यो सांग देख्या अर जाणना चाह्या अक इसका नाम के सै? जित बी कोए फेट ज्या खूंटा ठोक उसै तै इसका नाम बूझण लागज्या। सारे न्यों कहवैं अक सै तो सई इसका किमै नाम पर के सै न्यों बेरा ना। कई हरियाणवी संस्कृति की जो कोली भरें हांडे सैं उनपै भी बूझ्या फेर वे भी सिर सा खुजा कै रैहगे। ल्यो थोड़ी-सी वार थाम बी सोच कै देख ल्यो। इतनै एक बात याद आगी अक एक बटेऊ की सुसराड़ मैं कम बण्या करदी। उसका रंग भी घणा काला था कति जैट ब्लैक। ईब कै ओ अपणी सुसराड़ गया तो उसकी सासू बहोत मीठा बोली। सांझ कै हल्वा बणाया अर खुद सासू नै थाली परोसी।
साहमी बैठकै बोली अक बेटा जितने दिन जी करै दस दिन, पन्द्रह दिन म्हिना आड़ै डट। तेरी खूब खातिर दारी करांगे। बटेऊ कै बात समझ नहीं आई अक इतनी सेवा क्यों होरी सै? सारी रात सोचदा रह्या। तड़कै ए गरम गरम परोंठे आगे। सासू राजी खुसी की बूझण लाग्यी। फेर बोली अक जितने दिन जी करै उतने दिन डटिए। बटूऊ बोल्या बिना काम न्यों खाट तोड़दा माणस आच्छा कोण्या लागदा। जै डाट्टण चाहो सो तो किमै काम बताओ। सासू बोली अक काम अर बटेऊ धोरै? बटेऊ बोल्या फेर बी माता जी किमै तो काम हो। सासू बोली अक म्हारी भैंस का काटड़ा मर र्या सै। जिब धार तड़कै सांझ काढूं तो उसके साहमी खड़या हो जाया कर। तो बात या सै अक म्हारे नेता बी अपणे मरे औड़ नेतावां की खोड़ मैं भूस्सा भरवा कै जनता नै लैक्सनां कै टाइम पुसावण नै इसका खूबै इस्तेमाल करैं सैं। तो आई याद अक भूस्स भरे औड़ काटड़ का नाम के सै? नहीं बेरा ना। एक बै फेर सोच कै देखल्यो। थोड़ा-सा दिमाग पै बोझ गेरणा सीखणा चाहिए।
जो भी आकै हमनै भकाज्या सै हम उसकी हां मैं हां करकै नाड़ हिला द्यां सां। अर फेर कहवां सां अक ओहले भाई। हमनै के बेरा था अक न्यों बणज्यागी? अर फेर ताश खेलण लाग ज्यांगे। अर कै दारू की बोतल धर कै बैठ ज्यांगे।
मजाल सै जै इस भूस्स भरे औड़, मरे औड़ काटड़ का नाम एक पोस्टकार्ड पै लिख कै अर हरिभूमि के दफतर मैं भेजद्यां। हो सकै ज्यूकर बासमती चावल का बदेसी कंपनियां नै पेटैंट करवा लिया न्योंए इसके नाम का भी वे बोतडू. के नाम तै पेटैंट करवा लें अर आपां फेर कहवां अक ओहले भाई। के बेरा था न्यों बणज्यागी? या तो बणी बैठी सै। एक बर इसका नाम अखबार मैं आज्यागा तो फेर बदेशी कंपनियां नै आसान नहीं रहवै इसका पेटैंट करवाणा। आया समझ मैं नाम अक ईब्बी नहीं आया सै? के बाट देखो सो अक खूंटा ठोक बता देगा। ना कति नहीं बतावै अर जै बताणा भी चाहवै तो किततै बतावैगा। खुदै बेरा कोण्या। फेर एक बात पक्की सै अक आपां सारे रलकै सोचांगे तो इसका नाम जरूर टोहल्यांगे। आपा मारे पार पड़ैगी। बिराणै भरोसै बैठकै कै राम के भरोसे बैठकै काम कोण्या चालै।
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