दैनिक हरिभूमि दिनांक 26 अक्तूबर के संपादकीय पृष्ठ पर किन्हीं खूंटा ठोक ने ‘गऊ बचाओ माणस मारो’ शीर्षक से जो लेख लिखा है वह घोर आपत्तिजनक और सर्वथा मिथ्या है। उनके अनुसार ‘‘एक सवाल तो साफ सै अक गाय म्हारी माता कदे कदीमी जमाने तै नहीं सै। गाय का मांस भी म्हारे पूर्वज खूब खाया करते। म्हारे पूर्व आर्य थे या हम मानां सां। म्हारे ग्रंथां म्हं गऊ मारके उसका भोज करण का जिकरा एक जागां नहीं कई जागां म्हं कर राख्या सै। मनुस्मृति अध्याय-तीन श्लोक 271 म्हं लिख राख्या सै अक गाय, बर्धी का मांस अर दूध अर दूध तै बणी चीजां तै पितरां का तर्पण करण तैं बारह साल तांहि तृप्त रहवैं सैं।’’ देखिये मनुस्मृति अध्याय-3 श्लोक 271 इस प्रकार है -
संवत्सरं तु गव्येन पयसा पायसेन च।
वार्ध्रीणसस्य मांसेन तृप्तिर्द्वादशवार्षिकी।
यहां पर बिल्कुल स्पष्ट लिखा है - ‘गव्येन पयसा पायसेन च’ गाय के दूध से और दूध से बनी पायस (खीर) से एक वर्ष तक तृप्ति होती है। गाय के मांस का यहां कोई ‘जिकरा’ नहीं है। वार्ध्रीणस के मांस से बारह वर्ष की तृप्ति लिखी है। मनुस्मृति की टीका में कुल्लूकभट्ट ने ‘वार्ध्रीणस’ शब्द का अर्थ लिखा है - ऐसा सफेद बूढ़ा बकरा जिसकी अनेक संतान हो चुकी हों, जो क्षीणशक्ति हो और पानी पीते समय जिसके लंबे दोनों कान और जीभ जल का स्पर्श करते हों।
ध्यान रहे, इस अध्याय के 122 से 284 संख्या तक के श्लोकों में मृतक श्राद्ध का वर्णन होने से ये श्लोक प्रक्षिप्त हैं। मनु ने जीवित पितरों के श्राद्ध का विधान किया है (3.80-82) मृतक-श्राद्ध मनु की मान्यता के विरुद्ध है। दूसरा मिथ्याकथन - ‘‘वशिष्ठ स्मृति के चौथे अध्याय म्हं लिख राख्या बताया अक पूजा के खात्तर तगड़ा बुलध अर बकरा पकाणा चाहिए।’’
इस भाषा से प्रतीत होता है कि लेखक ने वशिष्ट स्मृति देखी ही नहीं। वशिष्ठ स्मृति के चौथे अध्याय में 131 श्लोक हैं, जिनमें गृहस्थ धर्म के अंतर्गत विवाह, गर्भाधान और सीमन्तोन्नयन संस्कारों का वर्णन है। मैंने पूरे अध्याय का पाठ किया, किसी भी श्लोक में तगड़े बैल, बकरा पकाने की चर्चा नहीं है। तीसरा प्रसंग - ‘‘बृहदारण्यकोपनिषद् 6.4.18 म्हं लिख्या सै अक गुणीपुत्र की प्राप्ति के खात्तर गाय अर सांड का मांस खाणा चाहिए।... पत्नी की गेल्यां मिलकै सांड अर बुलध का मांस घी भात की साथ खाणा चाहिए।’’ बृहदारण्यकोपनिषद् शतपथब्राह्मण का अंतिम भाग है। उद्धृत अंश गर्भाधान प्रकरण का है। इसमें गृहस्थ दंपत्ति इच्छानुसार श्रेष्ठ पुत्र और पुत्री की प्राप्ति के लिए अपना भोजन किस प्रकार करें, उसका विधान 14 से 18 तक की पांच कण्डिकाओं में किया गया है। माषौदन-उड़द और चावल के स्थान पर प्रेस अथवा लेखक के प्रमादवश ‘मांसौदन’ पाठ हो गया है। कुछ भी हो यह पाठ इस प्रकरण के सर्वथा विपरीत है। क्योंकि 14वीं से 18वीं कण्डिका तक क्षीरौदन, दध्योदन, उदौदन, तिलौदन के पश्चात ‘माषौदन’ ही प्रासंगिक है ‘मांसौदन’ नहीं। इसमें तिल के बाद माष का उल्लेख है। इसी क्रम में यहां पर दूध, दही, जल और तिल के बाद माष का ही पाठ होना चाहिए, मांस शब्द एकदम अप्रासंगिक है। इसी प्रकार उक्षा और ऋषभ शब्द को केवल बैल अथवा सांड अर्थ में रूढ़ मानना भी अज्ञानता ही मानी जाएगी। शास्त्रों में उक्षा का अर्थ समुद्र और सूर्य भी है। इसी प्रकार ऋषभ का अर्थ ऋषि, उत्कृष्ट गुणकर्मस्वभाववाला राजा, बलवान, विज्ञानवान (परमयोगी) भी होता है। इसके अलावा, महाभारत शांतिपर्व अ.337 श्लोक 4-5 में स्पष्ट लिखा है-
बीजैर्यज्ञेषु यष्टव्यमिति वै वैदिकी श्रुतिः। अज-संज्ञानि बीजानि च्छागं नो हन्तुमर्हथ। ऋषियों ने कहा - हे देवताओं! यज्ञों में बीजों द्वारा यजन करना चाहिए, ऐसी वैदिक श्रुति है। बीजों का ही नाम ‘अज’ है अतः बकरे का वध करना उचित नहीं।
यहां यौगिक अर्थ में बीजों को अज कहा गया है। इसी प्रकार ईश्वर का नाम भी इसलिए ‘अज’ है। ‘अजो न क्षां दाधार पृथ्वीं’ (ऋृ 1.67.3) (ऋृ 7.35.13) इत्यादि ऋचाओं में ‘अ’ का अर्थ अजन्मा परमात्मा है। यदि अज का लौकिक रूढ़ अर्थ लिया जायेगा तो बकरा पृथिवी आदि लोकों को धारण कैसे कर सकता है? इसी प्रकार ‘उक्षा’ शब्द को देखकर किसी ने बैल का ग्रहण किया होगा, क्योंकि उक्षा बैल का भी नाम है। परन्तु इतने बड़े भूगोल के धारण करने का सामर्थ्य बैल में कहां से आवेगा? इसलिए ‘उक्षा’ वर्षा द्वारा भूगोल के सेचन करने से ‘सूर्य’ का नाम है। (सत्यार्थप्रकाश, समु. 8)। महाभारत (अनुशासन पर्व अ. 145) में मांस-भक्षण और हिंसा का निषेध कई श्लोकों में देखा जा सकता है जैसे - जो मनुष्य अपने स्वाद के लिए प्राणियों की हिंसा करता है वह व्याघ्र, गृध्र, शृगाल और राक्षसों के तुल्य है। ‘गाय हमारी माता कदे कदीमी जमाने तै नहीं सै।’ यह कथन भी लेखक की अल्पज्ञता को ही दर्शाता है। अंत में संपादकमंडल से मेरा यही नम्र निवेदन है कि मिथ्या और विवादास्पद जनविरोधी लेख को प्रकाशित न करें। लेखक को भी बिना प्रमाण के मिथ्या प्रलाप नहीं करना चाहिए।
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