सत्ते, फते, नफे, कविता, सविता अर सरिता फेर शनिवार नै कट्ठे होगे धापां की बैठक मैं। बात चाल पड़ी नई सरकार पै अक इसनै के के काम जनता के करने चाहियें। कविता बोली - म्हारे गाम मैं च्यार सौ किल्ले धरती है गाम की पंचायत धोरै। पर इसपै किसे ना किसे का कब्जा सै। यू कब्जा हटा कै गरीब किसानां मैं अर मजदूरां मैं या धरती बांट देनी चाहिए। कई किल्ले बणी मैं भी धरती के पड़े सैं पर या बंजर धरती सै। या बी बांट देनी चाहियें मजदूरां मैं अर इस बंजर जमीन की खातर उन ताहिं जरूरी साधन बी दिये जाने की जरूरत सै। नफे एक दम बोल्या - या श्यामलात की जमीन तो उनमैं बंटनी चाहिए जिनके धरती सै। म्हरी पुरानी परम्परा तो याहे मांग करै सै। सत्ते बोल्या - थाम न्यूं कहो सो अक या इनमैं क्यूकर दे सकै सै सरकार। या सरकार कौडियां के दामां पै बदेशी कम्पनियां नै, अम्बानी अर टाटा बिड़ला नै अर धन्ना सेठां नै क्यूकर दे दे सै? फत्ते बोल्या इन सड़कां पै काम करणिया, खेत क्यार मैं काम करणिया, होटलां पै काम करणिया जड़ इन खेत मजदूरां खातर कानून बनना चाहिए जिबै इनकी दुर्गति का किमै इलाज हो सकै सै। नफे बोल्या - इनके मुंह पहलमै ऊपर नै चढ़रे सैं, यू कानून बना के इननै म्हारे सिर पै बिठवा दियो। सविता बोली - केरल मैं सन् 1974 मैं इन खातर कानून पास करया था उड़ै तो कोण्या बैठे ये किसे के सिर पै। आड़ै क्यूकर बैठ ज्यांगे? फेर ईब तो कई बार इनकी गेल्यां डांगर तै बी घटिया ब्यौहार हो सै। कई जागां पै तो इननै बन्धुआ मजदूर राखैं सैं रोटियां मैं। मेरे मामा का कुण्बा फतेहाबाद के एक गाम मैं दस साल बन्धुआ रहया। म्हारी मामी गेल्या के के करी उड़ै मालिक नै ये बतावण की बात कोण्या समझण की बात सै। भला हो अग्निवेश का उसनै मुश्किल तै छडवाया था म्हारा मामा। सत्ते बोल्या - एक बात पर और गौर करण की जरूरत सै मन मोहन सिंह की सरकार नै। सामाजिक न्याय का मामला कसूता उलझता जावै सै अर दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक अर महिलावां पै अत्याचार, हिंसा, वर्ण-लिंग भेद बढ़ता जावै सै। करनाल मैं बाल विवाह का मामला पाछै सी छोरियां नै हौंसला करकै रोक्या था। महेन्द्रगढ़ मैं तो रोज थाली मैं बिठा कै आज बी प्रसासन के अर पुलिस के नाक तलै फेरे दिये जावैं सैं। बेरा ना क्यूं ना दिखते ये बाल विवाह म्हारे परसासन नै। दुलिना काण्ड, हरसौला काण्ड दलितां पै अत्याचार बढ़ते जावैं सैं। महिलावां का तो जिकरा ए कोण्या मार पिटाई, छेड़छाड़, बलात्कार, रोज अखबार अटे पड़े रहवैं सैं खबरां तै। बालक तो होटलां पै अर इन परसासनिक अधिकारियां के घरां बी खूब काम करते देखे जा सकैं। अनुसूचित जाति-अनुसूचित जन जाति अत्याचार निरोधक कानून की धज्जियां उड्डण लागरी सैं। सरिता बोली - सत्ते की बात कुछ तो ठीक सै फेर छुआछात तो ईब कड़ै रैह री सै? सत्ते एक दम बोल्या - जै नहीं रैहरी तो अपणी छोरी का ब्याह सविता के मामा के छोरे गेल्यां करदे नै। नौकरी बी लागरया सै ओ। सरिता बोली - न्यूं क्यूकर ब्याहद्यूं? नफे बोल्या - मेरी बी सुणियो। एक टेम का हिसाब सा बिठाकै जितनी अक खेती आली धरती मैं सिंचाई का परबन्ध करना चाहिये म्हारी सरकार नै। एक इसी वैज्ञानिक जल परबन्ध प्रणाली लागू करनी चाहिये जो म्हारी धरती अर पाणी नै ढंग तै संयोजित करती हो। सविता बोली - खेती खातर सुरक्षित अर विकसित बीज, खाद, कीटनाशक सस्ते दामां पै मिलने चाहियें। नई तकनीक बी ल्याई जा। सत्ते बोल्या - इसमैं कोए सक की गुंजाइस नहीं अक म्हारी सरकार नै खेती खातर, सिंचाई खातर, शिक्षा खातर, सेहत खातर, विज्ञान अर तकनीक खातर और घणा सार्वजनिक निवेश करना चाहिये। जिबै तो कृषि उत्पादन बधैगा, किसान खुशहाल होगा। खेतों मैं नई खोज होणी चाहिये। किसानां ताहिं पूरी ट्रेनिंग देनी चाहिये। सामाजिक कल्याण के काम ज्यूकर पढ़ाई, सेहत, साफ पाणी, शौचालय अर पंचायतां की बी सुध लेवै सरकार। इनका ख्याल करै। दो च्यार गामां मैं और इस पर्चे नै पढ़वा दियो, ज्यूकर हुक्के पै सरकार पै दबाव बणावण की बात चाल पड़ै।
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