रमलू एक दिन स्कूल मैं चाल्या गया। उड़ै नेता जी आरे थे। बड़ी-बड़ी बात मारी नेता जी नै। रमलू नै स्वाद कोण्या आया। ओ स्कूल की बिल्डिंग कान्हीं देखण लाग्या। मंडेरयां की ईंट झड़ली। रेही नै ईंट खाली। चारदीवारी का खण्डर होग्या। रमलू कै ध्यान आया कि स्कूल की या बिल्डिंग तो म्हारे दादा हर नै गाम मैं चन्दा करकै बणवाई थी। सरकार नै नहीं लाया पीला पीस्सा बी। फेर सरकार नै ये बिल्डिंग ले ली। स्कूल के नाम का पीस्सा बजट मैं आन्ता अर बी डी ओ अर दो च्यार गाम के सफेदपोशां की गोज मैं चाल्या जान्ता। रमलू बहोत दुखी हुया स्कूल की इमारत की हालत देख कै नै। उसने अपणे आप पै बहोत गुस्सा आया कि इन बातां का बेरा क्यूं ना लाया? रमलू तै बैठया नहीं रहया गया। उसनै सोच्ची कि एक बै पेशाब करयाऊं हो सकै सै इतनै नेता जी का भाषण खत्म होले। पेशाब करण गया तो कितै पेशाब घर टोहया ना पाया। 600 बालक (छोरे-छोरी) पढ़ैं स्कूल मैं अर 22 अध्यापक पढ़ावैं, जिनमैं पांच तो गाम की बहु सैं।
बिना पेशाब घर क्यूकर काम चाल रहा सै? फिर रमलू कै तावला सा ख्याल आग्या कि गाम मैं भी तो दो च्यार घरां नै छोड़ कै शौचालय कोण्या किसे बी घर मैं फेर बी काम चालरया सै। यो स्कूल मैं भी गाम का असर सै, गाम की परछाई सै। फेर रमलू के मन मैं आया अक स्कूल का असर गाम पै होणा चाहिए था यू गाम का असर स्कूल पै क्यूकर आग्या? रमलू नै बहोत सोच्या फेर उसकी पकड़ मैं कोनी आई बात।
जितने मेरे मास्टरजी अर बहन जी सैं उननै तो सोचना चाहिए। हो सकै सै कई जणे पढ़कै न्यों कैह देंगे कि म्हारे स्कूल मैं तो पेशाब घर अर शौचालय सैं। फेर जित सै उसका के हाल सै इसपै लिखण खातर जागां की कमी सै। थोड़े लिखनै ज्यादा समझियो। रमलू नै हिसाब लाया उनके अपने गाम मैं च्यार प्राइवेट स्कूल खुलगे। किसे स्कूल मैं 200 बालक सैं। किसे मैं 120 सैं जड़ सौ तै घाट किसे स्कूल मैं बालक कोण्या। सरकार स्कूल मैं कै तो दलितों के बालक रैहगे।
अर कै घणे गरीब ब्राह्मण अर जाट के बालक, कै जित दूसरी स्वर्ण जात सैं उनके गरीब तबक्यां के बालक। रमलू नै नजर मारकै देख्या कि जो पांच बहु इस स्कूल में पढ़ावैं सैं उनके बालक बी कोण्या पढ़ते स्कूल मैं। दो च्यार भट्ठे आले सैं उनके बालकां खातर कस्बे के स्कूल की बस आया करै। रमलू का ध्यान गया कि ईबबी गाम मैं इसे 70-80 बालक पाज्यांगे जिनमैं स्कूल का मुंह नहीं देख लिया सै।
रमलू तै टिक्या कोण्या गया अरै औ सरपंच धोरै चाल्या गया। सरपंच बी जणू तै भरया बैठया था। पाछले सरपंच के चिट्ठे खोल कै धर दिये। स्कूल की चारदीवारी के दो बर पीस्से आये फेर बनी तो एक बर बी कोण्या (उसनै या नहीं बताई कि पीस्से तो हटकै फेर आरे सैं स्कूल की चारदीवारी बनावण के)। यो तालाब के घाट बणावण का पीस्सा आया था। घाट बण्या देख्या सै के जोहड़ पै? खुदाई का पीस्सा आया फेर कड़ै खुदाई हुई?
जड़ रमलू कै या बात पक्की जंचा दी कि पहलड़े सरपंच नै यू गाम मूंधा मार दिया। रमलू पहलड़े सरपंच धौरे गया। ओ ईब आले सरपंच के कारनामे लेकै बैठग्या। जड़ रमलू चाहवै था तो स्कूल के बारे में कुछ करना फर भूतपूर्व अर वर्तमान सरपंचां नै उसकी भम्भीरी बणा दी।
सांझ नै सरिता बोली - के बात आज तो किमै घणा ए दुखी होरया सै? रमलू नै सारा किस्सा सुणा दिया। सरिता बोली - इतना माड़ा मन क्यूं करै सै। गाम मैं स्कूल का भला चाहवण आले बी बहोत सैं फेर वे न्यारे-न्यारे सैं। वा अपनी आंगनबाड़ी वर्कर, वा सरला बहिन जी, वो थाम्बू का राजबीर। इन सबनै कट्ठै करकै एक मीटिंग करांगे। अर उसमैं बिचार करांगे कि स्कूल यो म्हारा स्कूल क्यूंकर बचै? और किसेनै चिन्ता कोण्या इस बात की।
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