म्हारे हरियाणा की लड़कियां
युवा लड़कियां आज हरियाणा के समाज म्हं सबतै असुरक्षित नागरिक सैं। इन युवा लड़कियां नै ईसी परिस्थितियां क्यूंकर मिलैं अक ये अपने नागरिक अधिकारां का इस्तेमाल कर सकैं अर हर बख्त डरी औड़, असुरक्षित अर कुचली हुई ना रहवैं।
जै रूचिका बरगी युवा लड़की नै बखत रहते न्याय मिलता तो उसनै आत्महत्या ना करणी पड़ती। वा बहोत संघर्षशील युवा लड़की थी। इस केस के पाच्छे की परिस्थितियां का दबाव आज हरियाणा की लाखों युवा लड़कियां झेलण लागरी सैं। हर युवा लड़की अपणी ढाल के न्यारे संघर्ष की तसवीर सै। महिलाएं बड़े पैमाने पै छेड़खानी, अपहरण अर बलात्कार जीसे अपराधां का शिकार होवण लागरी सैं। तमाम युवा लड़कियां जो सार्वजनिक स्थलां अर संस्थावां म्हं रहवैं सैं वा भी सर्वव्यापी असुरक्षा तै घिरी सैं।
इन लड़कियां के माता-पिता स्वयं बी मानसिक तनाव अर असुरक्षा मैं रहवण लागरे सैं। कम अवसरां के बावजूद युवा लड़कियां खेल-कूद, पढ़ाई अर साक्षरता बरगे सामाजिक कामां म्हं बहोत आच्छा प्रदर्शन करकै दिखावण लागरी सैं। गरीब युवा लड़कियां अनेक छोटे-मोटे रोजगार करकै घरां नै चलावण म्हं आर्थिक मदद बी करैं सैं। सौ का तोड़ यो सै अक लड़कियां म्हं सामाजिक भागीदारी अर आर्थिक संकट तै घिरे परिवारां मैं एक रचनात्मक सक्रिय भूमिका निभावण की गहरी इच्छा पैदा हुई सै।
एक कान्हीं तै वे बाल श्रमिक के रूप म्हं, घर मैं छोटे-बाहण भाइयां की देखभाल करते हुए ईंधन अर पानी जुटाते हुए, असंगठित क्षेत्र में अनेक ऊबाऊ काम करते हुए, आर्थिक संकट तै घिरे परिवारां नै चलावण म्हं महत्वपूर्ण योगदान देवण लागरी सैं। दूजे कान्हीं समाज म्हं इन ताहिं बोझ के रूप मैं देख्या जावै सै। घर-परिवार, शिक्षा संस्थावां आदि म्हं कितै बी इसा माहौल कोन्या अक वे अपना दुखड़ा किसे नै सुणा सकैं, अपनी समस्या सांझी कर सकैं। सांप्रदायिक अर जातिवादी ताकतें खासतौर पै इन लड़कियां नै एक तरफ तो ‘भारतीय नारी’ और ‘मर्यादा’ का पाठ पढ़ाण मैं लागरी सैं अर दूसरी तरफ वैश्वीकरण तै जुड़ी अन्ध उपभोक्तावादी संस्कृति के अंदर युवा लड़कियां सबतै आसान शिकार के तौर पै देखी जा रही हैं।
राजनीति का अपराधीकरण, दलाली, भ्रष्टाचार अर रिश्वतखोरी तै पीस्सा कमावण आले नवधनिक वर्ग अर उनके लड़के खासतौर पै अपराधियां की ढाल साहमी आवण लागरे सैं। युवा लड़कियां केवल बाहर ही नहीं परिवार के अंदर ‘परिजनों’ के द्वारा भी यौन हिंसा और दहेज हत्या का शिकार हो रही सैं।
छोटी बच्चियों के साथ भी परिवारां म्हं पड़ौसियां अर कै ‘विश्वसनीय’ लोगां द्वारा यौन उत्पीड़न का चलन ही चाल पड़या सै। म्हारा समाज घटिया फूहड़ फिल्मां, छेड़खानी, मीडिया मैं पोर्नोग्राफी, यौन उत्पीड़न और रईसजाद्यां की निरंकुशता के खिलाफ तो चुसकता ना, कोए विरोध अभियान नहीं छेड़ता।
हां युवा लड़कियां के पहनने-औढ़ने, हंसने-बोलणे पै कड़ी नजर राखना चाहवै सैं।
युवा लड़कियां घोर यातना अर घुटन के बीच जीवण लागरी सैं। एक कान्हीं उन ताहिं ‘ब्यूटी पैकेज’ दिया जाण लागरया सै, उपभोग की चीज की छवि बनाई जारी सै, दूसरी कान्हीं संस्कृति, जाति अर परिवार की लाज के रूप म्हं उनके तमाम मानवीय अधिकार छीने जावण लागरे सैं। उन ताहिं तरहा-तरहां तै दंडित करया जा सै, उनका चरित्र हनन करया जारया सै अर गुंडे लफंगे खुल्ले घूमैं सैं। हरियाणा मैं लड़कियां के मामले मैं खासतौर पै शरीफ अर बदमाश लोगां के बीच की दूरी जणो मिटती जाण लागरी सै। बीमार सामाजिक वातावरण का इलाज करण की बजाय लड़कियां का इलाज करया जाण लागरया सै, उनकी भ्रूण हत्या करी जावण लागरी सै।
इन युवा लड़कियां की खात्तर नागरिक समाज, नागरिक अधिकार एक मुख्य एजेंडा सै। पाछले सालां म्हं युवा लड़कियां म्हं गहरा आक्रोश पैदा हुया सै। उनकी मांग सै अक म्हारी खातर न्याय की मांग का निषेध क्यंू अर ‘धरती पुत्रां’ नै स्वेच्छाचारिता की पूरी छूट क्यों? जातिवादी ताकतों द्वारा मनमाने ढंग तै फतवे जारी करणा अर युवा लड़के-लड़कियों की हत्या जारी सै।
बतावण की जरूरत नहीं अक हम आपणी प्रगतिशीलता की, उच्च विचारों की, संस्कारवान होणे की मुनादी करण म्हं सब तै आग्गै खड़े दिखाई देवैं सैं। बेसक किसी मुद्दे तै म्हारा दूर का बी नाता-रिस्ता ना हो, फेर बी हम उस म्हं पंजा फंसावण नै तैयार रहवैं सैं। पर जिब कोई मसला, समस्या अपणे घर-परिवार नै समझावण-बुझावण की, उन्हें पटरी पै ल्यावण की सामने खड़ी दीखै सै, तो उस बखत हम उस तै कन्नी काटण म्हं आपणी भलाई समझैं सैं अर मौन साध ले सैं। योहे कारण सै अक आज म्हारी बाहण-बेटियां अपणे अनिश्चित भविष्य के बारे म्हं सोच-सोच कै सिर धुणती नजर आवैं सैं।
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