शनिवार, 15 जुलाई 2017

म्हारा पाला कुणसा ?

म्हारा पाला कुणसा ?
सते, नफे, फते, सविता, कविता, सरिता धापां हरके घरां कट्ठे होगे। सरिता माड़ा मुंह लटका री थी। सविता बोली - सरिता के बात बेबे मुंह क्यूं लटकारी सै? सरिता बोली - सुभाष की चिट्ठी आई सै। उसनै लिख्या सै अक आड़ै फौज मैं चरचा सै कि आणे वाले टेम म्हं कदै बी अमरीका आला बुश म्हारे देश की सरकार कै दाब लावैगा अक भारत की फौज इराक मैं भेजी जावै। उनकी बटालियन का नंबर आवण की बात वो लिख राखी सै। नफे - इसमैं मुंह ढीला करण की कौनसी बात सै? आच्छा इराक की सैर करकै आवैगा। थारे ताहिं तो किमै ल्यावैएगा उड़े तै। सरिता - उड़ै तो छापामार लड़ाई छिड़री बताई अमरीकियां मैं अर इराकियां मैं? उड़ै जाकै उल्टा क्यूंकर आवैगा म्हारा फौजी।
सविता बोली - फौज मैं माणस कद कुर्बाण होज्या या बात तो न्यारी सै पर असली बात तो या सै अक भारत की फौज इराक मैं क्यूं जावै? सते बीच मैं बोल्या मनै तो इसा लागै सै कि म्हारी फौज नै इराक मैं नहीं जाणा चाहिए। पहलम तो बुश नै बिना बात हथियारां का बाहणा करकै इराक पै हमला बोल दिया। सारा इराक तहस-नहस करकै गेर दिया। हजारां लोग मारे गये। बाकी नुकसान हुया वो अलग। फत्ते तै नहीं डट्या गया अर बोल्या - अर जिन हथियारां का बाहणा ले कै इराक पै हमला करया था बुश नै वे हथियार तो टीवी पै कदे बी कोन्या दिखाये बुश महाराज नै। सविता बोली - दिखावै कड़ै तै था। हों तो दिखावै।
कविता घणी वार तै चुपचाप उनकी बात सुणण लागरी थी वा बोली - इराक आले अपणे तेल के भंडारां पै अपणा कब्जा क्यूं छोड़ैंगे? सत्ते बोल्या - वे कड़ै छोड़कै राज्जी सैं। बुश नै उड़ै अपणी पिट्ठू सरकार बणवा ली। ईब या पिट्ठू सरकार बुश के कहे तैं तेलां के भंडार बेच्चण लागरी सै उन कंपनियां ताहिं जिन ताहिं बुश अर उसके चेले चान्टे इशारा करैं सैं। वे क्यूकर इशारा करैं सैं या लांबी कहाणी सै।
फत्ते बोल्या ज्यूकर म्हारली सरकार नै बी अमरीका के कहे तैं मुनाफा कमावण आली बाल्को बरगी कंपनी बी कौड़ियां के भा बेच दी थी। तो म्हारी जनता नै वा सरकारै मूंधी मारदी। सविता बोली - इराक के लोग मनै तो सही लागे। वे अपणे तेल के भंडारां पै कौड़ियां के दामां पै अमरीकी कंपनियां का कब्जा क्यूं होवण देंगे? वे अमरीकी फौज पै दा लाकै हमला बोलैं सैं तो सही करैं सैं? अमरीकी सेना के फौजी मारें जावैं सैं। ईब अमरीका मैं लैक्शनां आण वाले अर बुश नै धरती भीड़ी होन्ती आवै सै। बुश चाहवै सै कि अमरीकी फौज नै तो वो उल्टी बुला ले अर भारत देश की फौज नै इराक मैं भेज दे। धापां कदे-कदे बोल्या करै वा बी सारी बात सुण कै बोली - यो आच्छा तमाशा, इराक के तेल के भंडारां पै कब्जा तो अमरीका का अर उसकी रुखाली करैगी भारत की फौज। या बात तो कतिए गलै ना उतरकै देती। सत्ते बोल्या - सरिता के फौजी सुभाष की बात मैं दम लागै सै। भारत की सरकार इराक मैं अपणी फौज ना भेजै इस खातर हमनै किमै करणा चाहिए। धापां बोली - हम के कर सकां सां? सविता बोली - ताई हम के नहीं कर सकदे? हम म्हारे देश की सरकार बदल सकां सां तो के सरकार नै इराक मैं फौज भेजण तै नहीं रोक सकदे?
धापां बोली - वा बात न्यारी थी या बात न्यारी सै। सत्ते बोल्या - कति न्यारी कोण्या। दिल्ली मैं हथियारां की दौड़ के खिलाफ एक संस्था सै वे पूरे हिंदुस्तान के लोगां तै अपील करण लागरे सैं अक जद बी फौज भेज्जण की बात उठै तो थाम इस बात के खिलाफ आवाज ठाइयो। इस बारे म्हं सारा देश एकमत सै अक अमरीका की गाद्दड़ भबकी तै डरण की जरूरत ना सै। म्हारा देश कोय मोम की गुड़िया कोन्या जो बुश की घुड़की तै पिंघल ज्यागा। ईब तो समझ गए मेरे भाई। इसमैं हरियाणा के समझदार लोगां नै हिस्सेदारी करणी चाहिए।






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