आर्थिक अगड़े, सामाजिक पिछड़े
हरियाणा के समर्थन और सुरक्षा के माहौल में यहां के किसान, मजदूर - महिला और पुरुष ने अपने खून पसीने की कमाई से नई तकनीकों, नए उपकरणों, नए खाद बीजों व पानी का भरपूर इस्तेमाल करके खेती की पैदावार को एक हद तक बढ़ाया, जिसके चलते हरियाणा के एक तबके में संपन्नता आई, मगर हरियाणवी समाज का बड़ा हिस्सा इसके वांछित फल नहीं प्राप्त कर सका। यह एक सच्चाई है कि हरियाणा के आर्थिक विकास के मुकाबले में सामाजिक विकास बहुत पिछड़ रहा है। ऐसा क्यों हुआ? यह एक गंभीर सवाल है। हरियाणा के सामाजिक-सांस्कृतिक क्षेत्र पर शुरू से ही इन्हीं संपन्न तबकों का गलबा रहा है।
देश के विभाजन के वक्त जो तबके हरियाणा में आकर बसे उन्होंने हरियाणा की दरिद्र संस्कृति को कैसे प्रभावित किया इस पर भी गंभीरता से सोचा जाना शायद बाकी है। क्या हरियाणा की संस्कृति महज रोहतक, जींद व सोनीपत जिलों की संस्कृति है? क्या हरियाणवी डायलेक्ट एक भाषा का रूप ले सकता है? इस पर समीक्षात्मक रुख अपनाकर इसे विश्लेषित करने की आवश्यकता है। क्या पिछले दस पन्द्रह सालों में और ज्यादा चिंताजनक पहलू हरियाणा के सामाजिक-सांस्कृतिक माहौल में शामिल नहीं हुए हैं। व्यक्तिगत स्तर पर महिलाओं और पुरुषों ने बहुत सी सफलताएं हासिल की हैं।
समाज के तौर पर 1857 की आजादी की पहली जंग में सभी वर्गों, सभी मजहबों व सभी जातियों के महिला पुरुषों का सराहनीय योगदान रहा है जिसका असली इतिहास भी कम लोगों तक पहुंच सका है। हमारे हरियाणा के गांवों में पहले भी और कमोबेश आज भी गाँव की संस्कृति, गांव की परम्परा, गांव की इज्जत, गांव की शान के नाम पर बहुत छल-प्रपंच रचे गये हैं और वंचितों, दलितों व महिलाओं के साथ न्याय की बजाए बहुत ही अन्यायपूर्ण व्यवहार किए जाते रहे हैं। उदाहरण के लिए हरियाणा के गांवों में एक पुराना तथाकथित भाईचारे व सामूहिकता का हिमायती रिवाज रहा है कि जब भी तालाब की खुदाई का काम होता है तो पूरा गांव मिलकर इसको करता है। रिवाज यह रहा है कि गांव की हर देहल से एक आदमी तालाब की खुदाई के लिए जाएगा। पहले हरियाणा के गांव की जीविका पशुओं पर आधारित रही है। गांव के कुछ घरों के पास 100 से अधिक पशु होते थे। इन पशुओं का जीवन गांव के तालाब के साथ अभिन्न रूप से जुड़ा होता था। गांव की बड़ी आबादी के पास न जमीन होती थी न पशु होते थे।
अब ऐसे हालात में एक देहल पर तो सौ से ज्यादा पशु हैं वह भी एक आदमी खुदाई के लिए भेजता था और बिना जमीन व पशु वाला भी अपनी देहल से एक आदमी भेजता था। यह तो महज एक उदाहरण है परम्परा में गुंथे अन्याय को न्याय के रूप में पेश करने का। महिलाओं के प्रति असमानता व अन्याय पर आधारित हमारे रिवाज, हमारे गीत, चुटकले व हमारी परम्पराएं आज भी मौजूद हैं। इनमें मौजूद दुखांत को देख पाने की दृष्टि अभी विकसित होनी बाकी है। लड़का पैदा होने पर लड्डू बाँटना, मगर लड़की पैदा होने पर मातम मनाना, लड़की होने पर जच्चे की छठ मनाना, लड़के का नामकरण करना, श्मशान घाट में औरत के जाने की मनाही, घूँघट करना, यहाँ तक कि गाँव की चौपाल से घूँघट करना आदि बहुत से रिवाज हैं जो असमानता को बढ़ावा देते हैं।
बाजार के कुप्रभावों के चलते महिला पुरुष अनुपात चिंताजनक स्तर तक चला गया है, मगर पढ़े-लिखे हरियाणवी इनका निर्वाह करके बहुत फख्र महसूस करते हैं। यह केवल महिलाओं की संख्या कम होने का मामला नहीं है बल्कि सभ्य समाज में इंसानी मूल्यों की गिरावट और पाशविकता को दर्शाता है। हरियाणा में पिछले कुछ सालों से यौन अपराध, दूसरे राज्यों से महिलाओं को खरीदकर लाना और यौन शोषण तथा बाल विवाह आदि का चलन बढ़ा है। सती, बाल विवाह, अनमेल विवाह के विरोध में यहाँ बड़ा सार्थक आंदोलन नहीं चला। स्त्री शिक्षा पर बल रहा मगर कोएजूकेशन का विरोध किया गया, स्त्रियों की सीमित सामाजिक भूमिका की भी हरियाणा में अनदेखी की गई। उसको अपने पीहर की संपत्ति में से कुछ नहीं दिया जा रहा। जबकि इसमें उसका कानूनी हक है। चुन्नी उढ़ा कर शादी करके ले जाने की बात चली है और दलाली, भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी से पैसा कमाने की बढ़ती प्रवृत्ति चारों तरफ देखी जा सकती है। यहां समाज के बड़े हिस्से में अंधविश्वास, भाग्यवाद, छुआछूत, पुनर्जन्मवाद, मूर्तिपूजा, परलोकवाद, पारिवारिक दुश्मनियां, झूठी आनबान के मसले, असमानता, पलायनवाद, जिसकी लाठी उसकी भैंस, मूंछों के खामखा के सवाल, परिवारवाद, परजीविता, तदर्थता आदि सामंती विचारों का गहरा प्रभाव नजर आता है। ये प्रभाव अनपढ़ ही नहीं पढ़े लिखे लोगों में भी कम नहीं हैं। हरियाणा के मध्यमवर्ग का विकास एक अधखबड़े मनुष्य के रूप में हुआ।
पंचायतें महिला विरोधी व दलित विरोधी फैसले करती रहती हैं और इन्हें नागरिक को मानने पर मजबूर करती हैं। राजनीति व प्रशासन मूक दर्शक बने रहते हैं। यह अधखबड़ा, मध्यमवर्ग भी कमोवेश इन पंचायतों के सामने घुटने टिका देता है। हरियाणा में सर्वखाप पंचायतों के सामने घुटने टिका देता है। हरियाणा में सर्वखाप पंचायतों द्वारा जाति, गोत, संस्कृति, मर्यादा आदि के नाम पर महिलाओं के नागरिक अधिकारों के हनन में बहुत तेजी आई है और अपना सामाजिक वर्चस्व बरकरार रखने के लिए जहाँ एक ओर से जातिवादी पंचायतें घूंघट, मार पिटाई, शराब, नशा, लिंग पार्थक्य, जाति के आधार पर अपराधियों को संरक्षण देना आदि सबसे पिछड़े विचारों को प्रोत्साहित करती हैं, वहीं दूसरी ओर लड़कियों की सामाजिक पहलकदमी और रचनात्मक अभिव्यक्ति को रोकने के लिए तरह-तरह के फतवे जारी करती हैं। जौंधी व नयाबास की घटनाएं तथा इनमें इन पंचायतों द्वारा किए गए फैसले जीते जागते उदाहरण हैं। युवा लड़कियां केवल बाहर ही नहीं बल्कि परिवार में भी अपने लोगों द्वारा यौन हिंसा और दहेज हत्या की शिकार हो रही हैं।
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