शनिवार, 15 जुलाई 2017

मेरे बीरा! देखियो के होगा

मेरे बीरा! देखियो के होगा
     आज के दिन संसार की आबादी 6.3 अरब सै। एक ताश खेलणा छोड़ कै मेरे बीरा अंदाजा लाइयो अक 2050 मैं दुनिया की आबादी कितनी हो ज्यागी? ‘गेर रै गेर पत्ता गेर। इस खूंटा ठोक नै और किमै कोण्या, म्हारे ताशां के पाछै पड़या रहवै सै सारी हाण।’ दूसरा - ‘फेर गलत तो किमै कैहन्ता ना। म्हारे थारे हक की ए बात करै सै ओ सारी हाण।’ पहला - ‘कड़े के हकां की बात औ तो कै तो महिलां नै बिगाड़ण मैं लाग्या रहवै सै अर कै दलितां नै सुसकारण मैं लाग्या रहवै सै।’ दूसरा - ‘महिलावां के अर दलितां के अक जो उन्नै हजारां सालतै नहीं मिले उनकी बात करना क्यूंकर गलत होग्या भाई?’ पहला - मेरे अर तेरे बीच मैं पाले बंदी करवा दी इसनै तो? दूसरा - के गलत कर दिया जिब? या पाले बंदी तो खूंटा ठोक के बिना बी बणदी आवै सै अर म्हारे समाज की कड़वी सच्चाई सै या। पहला - जिकरा तो जनसंख्या पै था। बतादे कितनी हो ज्यागी 2050 मैं। दूसरा - जो हिसाब खूंटा ठोक नै लाया सै इस हिसाब तै तो या दसियां अरब हो ज्याणी चाहिए। पहला - ‘इतनी जनसंख्या कड़ै नावड़ैगी?’
     खणखरे बुद्धिजीवी इसनै 9 अरब मानैं सैं। 9 अरब इन्सान हो ज्यांगे। म्हारे प्रकृति के संसाधनां पै ईबै बहोत घणी दाब पड़री सै। सबते फालतू भूखे लोग 23‑3 करोड़ भारत मैं रहवैं सैं। पूरे दक्षिण एशिया मैं हर चौथा माणस भूखा सोवै सै। मानव विकास सूचकांक के हिसाब तै संसार के 175 देशां मैं विकास के हिसाब तै भारत का स्थान 127 है? सै ना कितनी श्यान की बात। देखो कितने गर्व करण की बात सै। हरियाणा का छोरियां नै मां के पेट मैं मारण मैं भारत मैं सबतै ऊपर नाम आवै सै। देख्या कितनी श्यान अर इज्जत की बात सै म्हारी खातर। दुनियां के तीन सौ करोड़ लोग दो अमेरिकी डालर पै जिंदगी गुजारैं सैं। अर जै इनमां तै किसे नै बूझो - सुणा रिसाले के हाल सै? तो सैड़ दे सी कहवैगा - बस बूझै ना तीजां केसे कटरे सैं। ईसे आडू. बी हरियाणा मैं ए पा जा सकैं सैं ना तो माणस तो न्योंए कहवैगा - बहोत मुश्किल तै गुजारा होवे सै।
     जै सारी दुनिया मैं पैदा खाद्यान्न समान रूप तै सबमैं बांट दिया जावै तो हरेक माणस नै 2760 कैलरी का खाणा मिल सकै सै। भूख का मतलब सै जै माणस 1960 कैलरी का भोजन नहीं खा सकै तो भूखा सै। मतलब साफ सै अक दुनिया के काम करणिया नै (किसान, मजदूर कर्मचारी) नाज पैदा करण मैं कसर कोण्या छोड्डी फेर कसर रैहगी इसके बंटवारे की।
     आज के वैश्वीकरण के जमाने मैं सार्वजनिक संसाधनां का निजी हाथां मैं हस्तान्तरण तेजी तै होवण लागरया सै। देश आजाद हुये पाछै लोगां धोरै लेकै म्हारी सरकार नै जो सार्वजनिक संपत्ति बनाई थी ईब वा कौड़ियां के मोल देशी बदेशी कंपनियां ताहिं बेची जावण लागरी सैं (रिश्वत खाकै)। म्हारे बिजली घर म्हारे तेल के भंडार जिननै विकसित करण मैं लाखां-करोड़ां रुपइये खर्च हुए थे वे भी बेचे जावण लागरे सैं। यू सारा काम अमेरिका की दाब मैं होवण लागरया सै। यूं धंधा तीसरी दुनिया के सारे देशां मैं चला राख्या सै अमेरिका नै अपणे याड़ी देशां की साथ मिलकै।
     आज दुनिया के 20 प्रतिशत लोगां धोरै, दुनिया के 80 प्रतिशत संसाधन सैं। हैरानी की बात या सै अक इन संसाधनां मैं भी इन 20 प्रतिशत लोगां का पूरा कोण्या पाटरया। जै हम चाहवां सां कि म्हारे संसाधनां पै म्हारा अधिकार रहवै तो यू पंूजीवादी विकास का मुनाफे अर खुले बाजार पै टिक्या औड़ विकास का माडल बदलणा पड़ैगा। आज जो लोग संसाधन कै सबतै नेड़े रैहके भी सबतैं दूर सैं उनके बारे मैं सोचणा पड़ेगा। पाणी म्हारा अर उसनै काढ़कै म्हारे ताहिं बेचै नेस्ले। यू समालखा मैं होर्या, यू पूरी दुनिया मैं होरया। लेल्यो रै ईबी सम्भाला अर बगाद्यो इन ताशां नै, अर बूझो ये सवाल अक हमनै इतना कमाया फेर बी हम गरीब क्यूं?





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