मंगलवार, 18 अक्टूबर 2016

कौन-सी परंपरा ?

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    कौन.सी परंपरा ?
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     या कहानी नहीं सै। या बनी बनाई बात नहीं सै। या असल मैं होए औड़ बात सै जो किसे बी प्रान्त हरियाणा, यूपी, बिहार, पंजाब मैं सकै सै। म्हारे गाम की बात हो सकै सै। थारे गाम की बात हो सकै सै। पड़ोस के गाम की बात हो सकै सै। या म्हारी गली की बात हो सकै सै। या थारी गली की बात हो सकै सै। या किसे बी गली की बात हो सकै सै। या म्हारे घर की बात हो सकै सै। या थारे घर की बात हो सकै सै। डटकै! घणी तावल करने की जरूरत नहीं सै। बातै इतनी गंभीर सै अक क्यूकर करी जा अर करी बी जा अक नहीं करी जा। तो बात या सै अक एक गरीब परिवार था। मां-बाप, एक बेटा दो बेटी। गाम मैं मजदूरी करकै, भैंस का दूध बेच कै अर छह बीघे धरती बाधे पै ले कै बहोत मुश्किल तै गुजारा करैं थे। छोरा ब्याहवण जोगा होग्या। फेर एक तो लड़की मिलना ए मुश्किल काम अर दूसरे ब्याह की खातर खर्चा पानी करने को पैसे नहीं। कई रिश्तेरियां की सिफारिश करकै छोरी पाई थी। कई जगां ब्याज पै 10,000 रुपइये लेवण गया फेर उसकी माड़ी माली हालत देख कै गाम मैं कोए भी तैयार नहीं हुया पीस्सा ब्याज पै देवण नै। एक बर तो ब्याह की तारीख बी आगे नै डिगावनी पड़ी भाई नै। मां न्यारी परेशान। बाबू न्यारा दुखी। करै तो के करै?
     एक गाम के बड्डे पंचायती नै हां भरी ब्याज पै पीस्से देवण की। बहोत खुश हुया सुरता अक ईब दोबारा ब्याह की तारीख नहीं आगै सरकानी पड़ैगी। मगर चौधरी नै एक मामूली सी शर्त लगा दी ब्याज पै पीस्से देवण की। सुणकै सुरते के पायां तले की धरती खिसकगी। करै तो के करै? इस शर्त नै मानै तो मुश्किल अर ना मानै तो ब्याह कोन्या होवै। घर क्यां तै सलाह करण की बात कही सुरते नै। चौधरी बोल्या - इसी बातां की सलाह नहीं करया करते ये तो गुप-चुप हो जाया करैं। दो दिन की मोहलत ले कै आग्या सुरता चौधरी पै। मां नै बी बेटे पै पूछनी चाही तो इशारे से मैं बताई सुरते नै बात। मां किमै समझी किमै नहीं समझी। खैर सुरता 10,000 रुपइये ले आया ब्याज पै। ब्याह होग्या। बहू आगी। घूंघट के म्हां कै अर फोटू मैं उसनै अपना घर आला देख लिया था। परिवार उनका भी गरीब था। पहली रात नै जो हुया उसनै देख कै तो रमलो हैरान रैहगी अर उसकै बहोत घणा गुस्सा आया। सुरते की जागां वो चौधरी आग्या उस कमरे मैं जिसनै ब्याज पै पीस्सा दिया था। उस औरत ने बहाना बना कै उस कमरे तै बाहर लिकड़ कै पैंडा छुटवाया। उसकी सासू ने बेरा लाग्या तो वा उल्टी बहू नै समझावण लागी - ए बहू इसपै 10,000 रुपइये उधार लिये सैं। क्यों घर की इज्जत खिंडावै सै। बहू बोली - 10,000 तमनै लिये सैं एक रात का मेरा सौदा करकै अर फेर मनैए उल्टा न्यों कहवो सो अक क्यों म्हारी इज्जत खिंडावै सै।
     इज्जत थामनै खिंडाई अपनी अर गैल मेरी बी। इज्जत पर तो हाथ गेरया उस बड्डे पंचायती नै जिसनै थारे तै ब्याज पै पीस्से दिये। खैर वा लड़की अगले दिन अपने पीहर चली गई और उसनै घर जा करकै सारी बात बता दी। छोरी के मां-बाप बहोत दुखी हुये। वे पांच-सात मौजिज आदमियां ने ले कै उस लड़की की ससुराल मैं पहोंचे। गाम के बुजुर्ग अर स्याणे माणस कट्ठे कर लिये। सारे लोगां का योहे था अक जो होगी उसपै माट्टी गेरो अर इनका घर बसण द्यो। जितने मुंह उतनी बात थी। फेर उस छोरी नै स्टैंड ले लिया अक वा उस घर मैं कोन्या रहवै। ईब तो दस हज़ार मैं एक रात का सौदा करया सै। कल को पता नहीं मेरे शरीर का कितने मैं सौदा कर लेंगे ये। सुरते के बाबू नै सुरते के ससुरे के पाहयां में अपनी पगड़ी टेक दी। वा लड़की बोली या पगड़ी जिब कित गई थी जिब मेरा सौदा करया था। कमाल की बात या थी अक सुरते के गाम की पूरे के पूरे की वा बहू इज्जत बनगी अर दूसरे कान्ही तै उसके अपने पीहर के गाम की बी वा इज्जत बनकै साहमी आई। अर दोनों गामां के लोग इज्जत बचावण मैं जुटगे।

     लड़की नै करड़ा स्टैंड लिया तो इन सबके तेवर बदलगे अर जितनी अपील थी इन पंचातियां की वे धमकियां मैं बदलगी। वे उस लड़की नै बतावण लाग्गे अक जै तनै यो रिश्ता तोड़ दिया तो तेरी गेल्यां के बण सकै सै। जिसनै ब्याज पै पीस्से दिये सैं इसकी गाम गुहांड में बहोज इज्जत सै अर ऊपर ताहिं पहोंच सै। जड़ उस छोरी नै कह दिया अक मनै मरना मंजूर सै फेर इसे कसाइयां के गाम मैं मनै कोन्या रहना। आगे की आगै देखी जागी। खैर उस छोरी नै उसके माता-पिता बी नाता तोड़ कै अपना घरां उल्टे लेगे। फेर इस सारे वाके नै कई सवाल समाज कै साहमी ल्या दिये। पहली बात तो याहे सै अक म्हारा समाज कित जा लिया? म्हारे समाज नै (दोनूं गामां की पंचायतां नै) उस छोरी को ही समझाने पर जोर क्यों दिया? क्या उस लड़की का तथाकथित पति और उसका परिवार किसी कानून के तहत सजा का दोषी नहीं? और सबसे बड़ी और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि उस ब्याज पर पैसे देने वाले चौधरी की पहली रात उस लड़की के साथ बिताने की मांग को समाज ने किस ढंग से देखा? इस पूरी बात में उसे किसी ने नहीं धिक्कारा। किसी ने उसकी इस घिनौनी हरकत की भर्त्सना नहीं की। आखिर ऐसा क्यों? सोचना चाहिए। कुछ करना चाहिए? समाज का बिगाड़ तेजी तै होण लाग र्या सै।

60 साल मैं के खोया, के पाया यो पन्दरा अगस्त फेर आया

60 साल मैं के खोया, के पाया
यो पन्दरा अगस्त फेर आया
सते फते नफे सविता कविता सरिता और ताई भरपाई फेर शनिवार नै जन चेतना केंद्र मैं कट्ठे होगे अर बात चाल पड़ी पन्दरा अगस्त पै। सते बोल्या - हमनै 47 मैं आज़ादी पन्दरा अगस्त नै पाई थी अर 66 मैं हरियाणा बण्या  जिसकी खातर भगत सिंह नै फांसी अर गांधी जी नै गोली खाई थी। ठारा सौ सतावण मैं आज़ादी की पहली जंग लड़ी लाखां लोगां नै कुर्बानी दी थी। किसान लड़े, कारीगर लड़े, बीर लड़ी, मर्द लड़े, राजे लड़े, रजवाड़े लड़े, लजवाणे के भूरा निंघाइयां लड़े। फते बोल्या - हरियाणा मैं भी तो बहोत से लोगां नै ज्यान की बाजी लाई थी। अपने खिडवाली गाम के ग्यारा लोग शहीद हुए। नफे बोल्या - के नाम थे उनके? सते बोल्या - इनके नाम थे बही शेख, लालू बालमीकी, तिरखा बालमिकी, मोहमा शेख, जुलफी मौची, सुनार रामबक्स, बेमा बालमिकी, इदुल मौची, मुफी औला पठान, मोहर नीलगर, सायर बालमिकी, अर सुंनाकी बालमिकी। खास बात तो या सै अक खिडवाली के कई मानसां धौरे बूझी इनके बारे मैं फेर किसे नै बेरा ए कोनी इनका। सविता बोली - म्हारे हरियाणा की यादाश्त कमजोर सै। इसे करके तो पूरे देश मैं 1857 राष्ट्रीय विद्रोह की 150वीं वर्षगांठ मनाई जावण लागरी सै अर हाम हाथ पै हाथ धरे बैठे सां । कविता बोली - और के मेवात मैं सदरुदीन किसान नै अपनी शहादत दी थी। ताई भरपाई बोली - 1857 अर 1947 के बीच मैं भी तो बहोत से लोगां नै कुर्बानी दी थी देश की आज़ादी की खातिर। हरियाणा के फौजी आजाद हिंद फौज मैं शामिल हुए। गांधी, नेहरू, भगत सिंह, अंबेडकर हर नै भी तो कुर्बानी दी।
फेर सवाल यू सै अक जिसी आजादी का सपना भगत सिंह हरनै देख्या था वा आजादी म्हारे पूरे भारत मैं अर म्हारे हरियाणा मैं आई अक नहीं? इस साठ साल की आजादी मैं के खोया के पाया? नफे बोल्या - और तो बेरा न फेर हरियाणा नै तो आर्थिक मोरचे पै तरक्की के सारे रिकाट तोड़ दिये। एयरकन्डीशन्ड जीवन शैली पै पहोंचग्या हरियाणा। घर मैं, कार मैं, स्कूल मैं, दफ्तर मैं, बाजार मैं, सारै एयरकन्डीशनर छागे। साइनिंग हरियाणा सै म्हारा आज। कविता बीच में बोल पड़ी - नफे बस बहोत होली तेरे साइनिंग हरियाणा की। इसका असली रूप बहोत दूसरा सै - सफरिंग हरियाणा। आर्थिक जगत मैं जित इतनी तरक्की करी सै उड़ै ए समाजिक स्तर पै आज बी हरियाणा बहोत पाछै सै। पाछले साल का लिंग अनुपात एक हजार पै आठ सौ बीस सै। पढ़े लिख्यां मैं यो अनुपात एक हजार पै छह सौ सतरां का सै। दलितां की हालत का के जिकरा सै। महिलावां पै घरेलू अर बाहरी हिंसा बढ़ती आवै सै। नफे बोल्या - कविता तनै तो हमेशा चीजां मैं मीन-मेख काढ़ण की आदत सी होगी। ताई भरपाई बोली - मीन मेख का सवाल नहीं सै। जिस आजादी अर तरक्की का तनै जिकर करया सै वह तो दस प्रतिशत आबादी धौरे मुश्किल तै पहुंची सै। हरियाणा के 90 प्रतिशत नै जिनमैं दलित, महिला अर युवा लड़के-लड़की शामिल सैं, उननै तो मेहनत करकै हरियाणा बनाया सै फेर इस तरक्की का फल तो चाख कै बी कोनी देख लिया। हमनै आजादी के संघर्ष मैं जो जनतांत्रिक अधिकार संविधान मैं हासिल करे थे वे कड़ै पहोंचे सैं म्हारे परिवारां मैं? या पिछड़ी सोच, रूढ़िवाद अर अंधविश्वास की जड़ता अर इसके रुखालीये स्वंभू पंचायतें इनै कड़ेै बड़ण दिये नागरिक अधिकार म्हारे परिवारां मैं? इननै तो आजादी सै अंतरजातीय ब्याह करण आल्यां नै फांसी तोड़ण की, फतवे करकै तबाह करण की, इननै आजादी सै दुलिना कांड की, गोहाना कांड की, हरसौला कांड की।
इन तथाकथित पंचायतां नै आजादी सै आसण्डा कांड की, जौन्धी मैं पति-पत्नी नै बाहण-भाई बणावण की। नये बास मैं माणस मरवावण की। रविदास कहगे - ऐसा चाहूं राज मैं, जहां मिलै सबन को अन्न। छोट बड़ो सब सम बसैं, रैदास रहै प्रसन्न। सोचना चाहिए साठ साल की आजादी का हरियाणा मैं के मतलब सै?---

सोमवार, 17 अक्टूबर 2016

खुड्डै लाइन


जिब बी किसे प्रदेश मैं राजपाट बदलै सै तो इस खुड्डै लाइन शब्द का बहोत इस्तेमाल होवण लागज्या सै। ऊं तो इस शब्द का इस्तेमाल सारे सरकारी महकम्यां मैं होवे सै चाहे ओ स्वास्थ्य का हो चाहे शिक्षा का हो चाहे रोडवेज का हो चाहे नगर पालिका का हो। फेर हरियाणा मैं एक खास बात और देखण मैं आवे सै अक म्हारे समाज का एक हिस्सा-प्रोपर्टी डीर (भूमाफिया), शराब के ठेकेदार (दारू माफिया), भट्ठे आले, कुछ पहलवान, कुछ सूदखोर अर और भी कुछ हिस्से इसी ए नस्लां के - इसा सैं जो बिना राजपाट की छत्रछाया के जी कोन्या सकदा। ढाई दिन राज बदले नै होए नहीं अर इस हिस्से कै ढीड आज्यां सैं, एक हाथ लाम्बी जीभ बाहर आज्या सै। रम्भावण लागज्या सैं। फेर यू अपने सढ़े बदले औड़ राज मैं टोहवण लागज्या सैं अर दो च्यार म्हिने मैं पटरी बिठा ए लेवैं सैं। उसनै या पटरी बिठावण में रत्ती भर भी शर्म महसूस नहीं होत्ती अर होवै बी क्यों? जिब हरियाणा मैं एमएल अर एमएलए तै मंत्री मंत्री तै मुख्यमंत्री बणण का कामयाब नुस्खा यो हो - चोर बजारी दस तोले शुद्ध बीज, पांच तोले खुदगर्जी की जड़, छह तोले रिश्वतखोरी के पत्ते हों, बीस तोले कोरी गपशप हों। इन सबनै मोमजस्ते में गेर कै खूब बारीक करके अर इसमैं पांच तोले दगा की भस्म मिलाई जा सै। इस ढालां यो कुल छप्पण तोले माल बणज्या सै। फेर पांच तोले बुजदिली, चार तोले फूल खुशामद, तीन तोले मक्कारी, दो तोले बेकफी के पत्ते कूट कै कपड़छाण कर जां, पन्दरा तोले अंधेरगर्दी की खाल हो पर हो निखालिस हिन्दुस्तानी। ये सारी चीज पार्टीबाजी के पाणी में तीन म्हिने भिगोई जा अर फेर 56 तोले पहलम आले चूर्ण मैं मिलाकै इनकी दो-दो तोले की गोली तैयार करी जावैं सैं। इन गोलियों का इस्तेमाल छब्बीस जनवरी, पन्दरा अगस्त नै तो करया ए करया जा सै। जन्म दिन पै भी करया जावै। यह सारी चीज हरियाणा मैं थोक में मिलैं सैं। रोला सै बस इनके सही-सही अनुपात का अर सेवन करण के बख्त का। कई बै इसके सेवण खातर जागां का भी ध्यान राखणा पड़ सकै सै ज्यूकर राजघाट पै जाके माथा टेकदे बरियां दो गोली सटक जाणा। यो नुस्खा बहोत कारगर सिद्ध होवै सै हरियाणा की राजनीति मैं। इब ताहिं तो इसे माहौल मैं हरियाणा का खाता पीता तबका बी जै ठाण बदलज्या सै तो उसकी के गलती सै?
हां तो बात शुरू हुई थी खुड्डै लाइन तै अर या बात आगी अक राजनीति मैं हरियाणा का हिस्सा पिस्से आल्यां का खुड्डै लाइन कोन्या लाग सकदा वो आपणा राह गोन्डा टोह लेवै सै नये राज मैं। असली खुड्डै लाइन का मामला आवै सै हरियाणा की ब्यूरोक्रेसी अर पुलिस के मामले मैं। मिस्टर एम अर मिस्टर एस दो आईएएस अफसर घणे दिनां मैं फेटे थे। दोनूआं नै देहरादून एकेडमी मैं कट्ठी ट्रेनिंग ली थी। ट्रेनिंग लेत्ते-लेत्ते दोनूं पक्के ढब्बी बणगे। ये दोनूं उस बैच मैं सबतै कुब्बधी थे। रोज किसे ना किसे का बेकूफ बना दिया करदे। एक का कांटा तै उड़ै ए फिट होग्या अर दूसरा सूटेबल मैच के चक्कर ओवरएज हुया हांडै सै। सुण्या सै अक देहरादून मैं ट्रेनिंग बड़ी फन्ने खां दी जा सै। इस देश के विकास के क्यूकर धक्का मारना सै यो सिखाया जा सै। लोग सीधे करके अर नकेल घाल कै क्यूकर राखने सैं यो सही-सही पढ़ाया जा सै। चाहे सेहत का मामला हो, चाहे शिक्षा का मामला हो, जड़ सारे महकम्यां का धर्राटा क्यूकर ठाया जा सकै सै। एकले माणस तै या ट्रेनिंग दी जा सकै सै। बेरा ना उड़ै और किमै सीखै सै अक नहीं फेर एक चीज तो सारे पूरी ढालां सीख ज्यां सै अक जनता नै कमरै तै बाहर बाट क्यूकर दिखवाया करैं। भोग क्यूकर लाया अर लवाया जाया करै। अपने तै तरले अफसर नै खुड्डै लाइन राक्खो अर अपने तै सीनियर अफसर के तलवे चाटो।
सीनियर अफसर के साहमी जूनियर अफसर का इसा हाल होज्या सै जिसा शेर अर बकरी का। सर सर तै न्यारा कोए हरफै मुंह तै नहीं लिकड़ कै देत्ता जूनियर अफसर कै। मंत्री के साहमी तो बड़ला अफसर बी गोड्डी घाल दै सै। हां तो मिस्टर एम अर एस देहरादून की बात करदे-करदे आजकाल की बातां पै आगे। एम नै बूझया - आजकाल त्तो यार की चांदी होरी दीखै सै। एस झट बोल्या - बस मेहरबानी सै मुख्यमंत्री जी की। किमै ऊपर आले की कृपा सै। एस नै एम तै बूझया - सुणा तेरा के हाल चाल सै। एम नै जवाब दिया - आप्पां नै पहलम आले मुख्यमंत्री के बख्तां मैं खूब काच्चे काटे। जितने दिन मैं डीसी रहया उस बीच तीन एकड़ जमीन ऊपरल्यां के रिस्तेदारां के नाम करवाई। कई मन्दिरां खातर धरती दिवाई ‘दान’ मैं। कई मर्डरां मैं असली नाम बाहर करवाये। फेर म्हारे बी ठाठ पूरे करवाये। आप्पां बी गंगा जी से नहा लिये। एस बोल्या - तो ओ पीस्सा किसे होटल मैं ला दिया अक धरती खरीद ली। एम बोल्या - मैंने तो अपनी खून-पसीने की कमाई बदेश मैं भेज दी। छोटी छोरी बदेश पढ़ण जारी सै ना। एस ने फेर बूझ लिया - आज काल कौन से महकमे मैं सै? एम बोल्या - आजकाल तो आपां खुड्डै लाइन सै। एस एम की बात सुणकै बहोत हंस्या। एम भी हंसके बूझण लाग्या - इसमैं इतना हंसण की के बात सै? एस बोल्या - जिन दिनां मैं तेरी चांदी होरी थी उन दिनां में मैं खुड्डे लाइन लागरया था। ईब मेरी चांदी होरी सै अर तों खुड्डै लाइन लागरया सै। फेर बख्त तो बदलै सै। सबर का फल मीठा होवे सै। या पोजीशन बदलते के वार लागै सै। एम बोल्या - बात तो सही सै। फेर खुड्डै लाइन होकै आराम तै रैहना आसान काम थोड़े ए सै। एस बोल्या - या तो नियति बणगी म्हारी। एक राज मैं खुड्डै लाइन अर दूसरे राज मैं वीआईपी ड्यूटी। एम बोल्या - कुछ भी हो बात ठीक कोन्या। खुड्डै लाइन तै टपकै के डर तै भी फालतू डर लागे सै। एस ने मजाक करया - मनै इसा लाग्गै सै अक जै न्योंए चालें गये तो कदे ये बदेशी कम्पनी हमनै सारयां ए नै खुड्डै लाइन ना लादें?

मरीज अर कंपनी के बीच मैं दलाल डाक्टर


जिब कोए आदमी बाजार में जावै सै तो उसनै अपनी जेब का बेरा हो सै अर उसके हिसाब तै ए ओ चीज खरीद ले सै। फेर मरीज अर दवाइयां तथा उसके इलाज के बारे मैं या बाजार व्यवस्था कोन्या लागू होन्ती। आडै़ कुदरतन मरीज अर कंपनी के अर कै बाजार के बीच मैं डाक्टर एक बिचौलिये की भूमिका मैं सै। मरीज नै वोहे दवाई खरीद कै ल्यावणा पड़ैगा जो डाक्टर उसनै लिख कै देगा। मरीज उसे कंपनी का एप्लाइन्स (दिल का वाल्व, कूल्हे, घुटने, आंख के लैंस, हरनिया मैस, स्टेपलर सर्जरी के स्टेपलर) खरीदैगा जिस कंपनी के बारे में डाक्टर मरीज नै बतावैगा। किस ढंग तै बतावैगा। पहले के जमाने में मरीज अर डाक्टर के बड़े मानवीय संबंध हुआ करते। फेर आज रक्षक ही भक्षक होगे लागैं सैं वरना कितना ए पात्थर दिल इनसान हो ओ लड़की सै पेट मैं अक लड़का सै या बात मरीज नै बतावण की हिमाकत क्यूंकर कर सकै सै? उसने इतना तो साफ बेरा सै अक जै लड़की सै तो अबोरश पक्का सै अर छांट कै अबोरशन करकै लड़की की हत्या करण आले डाक्टर ताहिं तो कै कह्या जावै? शायद डिक्सनरी के सारे शब्द इस खातर नाकाफी सैं। इन मरीजां अर डाक्टरां के बीच के गिरते मानवीय रिश्त्यां का कारण या वर्तमान बाजार व्यवस्था सै जिसके चालन्ते समाज मैं बहोतै अविश्वास अर अमानवीयता पैदा होवण लागरी सै। एक तरियो या स्वाभाविक होकै बी असामाजिक अर अमानवीय तो पक्की सै। इन एप्लाइन्सिज की अर दवाइयां की बाजार मैं कीमतां मैं बहोतै फर्क सै। जिब डाक्टर मरीज नै न्यों बतावै सै अक यो लैंस 500 रुपये का देसी सै फेर बाजार मैं बदेशी अर देशी अच्छी कंपनियां के लैंस भी सैं जिनकी कीमत 7000 ताहिं सैं तो मरीज के जीन नै बहोत शाक्का होज्या सै अक औ कौन सा लैंस डलवावै? इस बात मैं डाक्टर की गाइड की भूमिका सै जो तय करै सै अक वो कौन सा ‘माल’ खरीदै अपनी खातर। आम तौर पै इसे हालात मैं अपने बूते की बात ना होन्तै होये भी मरीज 7000 का लैंस घलवावण नै मजबूर होज्या सै अर किमै बात हो अर कै इन्कवारी हो तै डाक्टर तो न्योंए कहवैगा अक हमनै तो मरीज ताहिं सारी आपसन्ज दे दी थी। सै ना अद्भुत खेल दलाली का। दलाली करो बी आर मानो बीअ मतना अक हम दलाली करां सां। इसा लागै सै अक या आपसन्ज़ आली बात क्यूकर बताई जा सै इसपै भी बहोत दारोमदार सै। मरीज नै के रोज-रोज वाल्व बदलवाणे सैं ओतो न्योंए सोचैगा अक म्हंगे तै महंगा चढ़ वाले। महंगे का अर क्वालिटी का रिश्ता बी हो सै मरीज के दिमाग मैं। इन एपलाइन्सिज की खरीद नै लेकै ढाल ढाल की चरचा होन्ती रैहवैं सैं। फेर बदेशी कंपनियां की टक्कर आज कै दिन लेना इतना आसान नहीं सै जितना कई बर आपां सोच ल्यां सां। फेर एक बात तो साफ सै अक किसे भी पारदर्शी तरीके के ना होवा तै मरीजां नै बहोतै संकटां का सामना करना पड़ै सै अर कई प्रैगमैटिक डाक्टरां के वारे के न्यारे होन्ते रहवैं सैं। सबनै बेरा फेर इसनै रोक्कै कूण?
दवाइयां नै भी देखां यो यू अंतर साफ दिखायी देवण लाग रया सै। अस्पताल मैं जै एक दवाई 15 रुपये के टीके के रूप में सप्लाई करी जा सै तो बाहर की दुकान पै उसे दवाई की कीमत 41 रुपये सै। मतलब ढाई गुणा तै बी फालतू। फेर अस्पताल मरीजां नै इन कम कीमतां पै दवाई मुहैया क्यों नहीं करवाते? लागै सै यू बड्डा सवाल सै। भय अर भ्रष्टाचार मुक्त हरियाणा के नारे कै साहमी यू सवाल आंख मैं आंख घाल कै खड्या सै। देखियो के होगा। इसे तरिया ओपन हर्ट सर्जरी मैं इस्तेमाल होवण आले वाल्वां का मसला सै। बड़ी मुश्किल तै हरियाणा के लोगां नै हरियाणा के एकमात्र पीजीआई मैं याह सुविधा मिली सै। मरीजां नै वाल्वां नै लेकै अर दूसरे सामान नै लेकै काफी दिक्कतां का सामना करना पड़े सै। दिल्ली के अस्पतालां मैं नंबर नहीं आवै अर आ बी जावै तो प्राइवेट मैं खरचा बहोत सै। मरीज के रिश्तेदार इसनै किस्मत का खेल मानकै छाती मैं मुक्का मारकै बैठज्यां सैं। अमीर पीस्से आले जावैं सै अर प्राइवेट अस्पताल मैं सैड़ देसी अपना वाल्व बदलवा कै कई-कई साल की जिंदगी पाज्यां सैं। या उनकी किस्मत सै। यू किस्मत का खेल भी दूभांत करै सै दिल के मरीजां गेल्यां तो। बाजार का दस्तूर बताया अक जो दवाई ठीक क्वालिटी की सै अर जिसकी कीमत बी कम सै उसकी मांग बाजार मैं फालतू होनी चाहिये। फेर इसा होन्ता कोन्या। महंगी दवाई साल मैं नौ करोड़ की बिकैगी अर सस्ती दवाई तीन करोड़ की बिकैगी। मतलब साफ सै अक नौ करोड़ मैं कुछ हिस्सा उन दलाली आले डाक्टरां का भी होज्या सै। कंपनी की चांदी डाक्टर की चांदी, कंपनी के एमआर की चांदी। मरीज की कीमत पै खेल्या जावै सै यू सारा खेल।
एक खास बात और सै अक जितने कारपोरेट सैक्टर के अस्पताल सैं इनपै कोए रोक-टोक नहीं सै। कितनी ए फीस ल्यो। गरीब मरीजां नै देखो चाहे मत देखो। डाक्टरां की तनखा को कोए अनुमान कोन्या। जिब प्राइवेट सैक्टर ताहिं खुल्या चरण की छूट दे दी तो पब्लिक सैक्टर क्यूकर बचैगा? सरकारी अस्पतालां मैं, एम्ज मैं, पीजीआई मैं कूण इलाज करवावण जावैगा? ईब तै सुन्या सै एम्ज़ मैं भी यूजर चार्जिज का मामला गरमान्ता जावै सै। फेर तो गरीब मरीजां का कोए वाली वारिस नहीं बचैगा। अर इस गलतफहमी मैं भी नहीं रैहणा चाहिये अब या दुभान्त न्योंए चालती रहवैगी। जनता कै सारी बात समझ आन्ती जाण लागरी सैं। जनता की जागरूकता कै साहमी या दुभान्त घणे दिन कोन्या टिकै। गरीब जनता जरूर आगै आकै सरकारी खाते के अस्पतालां नै तहस-नहस होवण तै बचावैगी नहीं तो उसकी बीमारी का इलाज किते बी कोनी होवैगा।
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फेर के करां ?

गाम मैं सते, फते, नफे, सविता, सरिता, कविता अर धापां ताई एतवार नै कल्लेवार सी कट्ठे होज्याया करैं किमैं दुख-सुख की बतलावण की खातर। इस बैठक की एक खास बात सै अक इसमैं भागीदारी रलमफलम हुया करै। छोरी बी, बहू बी, ताई बी, दलित बी, बैकवर्ड बी, मुसलमान बी, पंजाबी बी, बिहारी बी, जाट बी, अर बाह्मण बी शामिल होवैं सैं अर अपनी बात खुलकै करया करैं। मेरे ख्याल मैं राम राज इसे ढाल की बैठकां आले गामां आला राज रह्या होगा कदे। फेर इब्बी कितै कितै इसे रामराज के खण्डर बचरे सैं अर यू गाम बी इनमां तै एक लाल्यो। बात बीमारी पै चाल पड़ी। ताई बोली मनै तो या सांस की बीमारी अर यू गठिया बा कोन्या टिक्कण देेन्ता। सारे डाक्टरां का इम्तिहान सा लेकै देख लिया फेर कोए आराम नहीं। देशी बी खाकै देखली। नेड़े धोरै कोए सरकारी अस्पताल बी कोन्या। रात नै कई बै बहोत दिक्कत बणज्या सै। फते बोल्या मनै तो या खाज कोन्या टिक्कण देन्ती। के थोड़े डाक्टरां धोरै हांड लिया। सते नै टोक दिया - मेडिकल मैं गया था।
फते मन सा मारकै बोल्या - उड़ के बी धक्के खालिये चमड़ी आले महकमे आले बी हार कै न्यों बोले - यासै तेरै अलरजी जो होसै अल्लाह की मरजी। सरिता एकदम कूद कै पड़ी - रामदेव जी का इलाज नहीं करया। फते बोल्या - कैम्प मैं जावण का तो ब्योंत कड़ै फेर ताई कै दो तीन बै टीवी पै सुन्या इसके बारे मैं उड़ै बी कोए जिकरा कोन्या पाया। नफे पेट नै पकड़ कै अर उठ कै चाल पड़या तो सविता बोली नफे जी थाम के सारी हाण पेट नै पाकड़ें हांडे जाओ सो? नफे बोल्या - बूझो मतना सविता जी। मरोड़ होरी सैं। तीन म्हिने हो लिये, दवाई खा खाकै या एसिडिटी की बीमारी और पाल ली। सविता बोली मेडिकल मैं दिखाकै आ। दखे मंगलवार आले दिन जाईये उड़ै एक लाम्बा सा डाक्टर बैठै सै। मैं तो जमा बारा बानी कर करदी उसनै। बोल मैं एक सत सै उसके तो आधा तो मरीज उड़ै ए ठीक होले सै। कविता ईब ताहिं चुपचाप सुनै थी वा बोली - ये तां सारी बीमारियां साडे पेके चे बी हैंगी। उथे तां डिगी दे पानी दी थांते पानी वी ट्यूबवैल दा पीन्दे नै।
नफे बोल्या - मेडिकल का एक डाक्टर सै अपने पड़ोसी गाम का ओ न्यों कहवै था अक उनके गाम मैं बी ये बीमारी खूब बधरी सै। अर ओ तो मनै न्यों कहवै था अक साफ पानी कोन्या गामां मैं इस करकै ये बीमारी सैं सारे कै गामां मैं। अर उसनै तो मेरे तै बूझया अक ट्यूबवैल का पानी पीओ सो ओ टैस्ट बी करवा कै देख्या सै अक ओ पीवण जोा बी सै अक नहीं? मैं न्यों समझया अक डाक्टर मजाक करै सै मेरी गेल्यां। ओतो न्यों कहवै था अक पानी नै उबाल कै पीया करो। उनै के बेरा अक कितना ईंधन चाहिये। कविता बोली - ये डिग्गी का पानी बी तां टैस्ट करवाके देखना चाहिये कि इसदी बी क्लोरीनेशन ठीक किती जान्दी है के नहीं। ताई बोली या के बला होसै? सविता नै बताया कि यू डिग्गी के पानी नै साफ करण का एक तरीका सै। कविता ने बताया कि उनके गाम खरल में ज्ञान विज्ञान वाल्यां ने एक सर्वे किता हैगा 500 घरां दा और उसमें ये बात उभर के आई हैगी कि इन परिवारां दा बीमारियां दे इलाज ते एक साल विच 11 लाख रपईये खर्चा आया हैगा। एक तां महंगाई इनी दूजे बीमारियां ज्यादा तीजे अस्पतालां, डाक्टरां ते दवाईयां दी कमी। साडे वरगे बन्दे की करन? नफे सिंह बोल्या - अस्पतालां का तो भट्ठा बिठा दिया। बात तो याबी सै अक जै ये बीमारी गन्दे पानी करकै होवैं सैं तो डाक्टर साफ पानी किततैं ल्यावैंगे। जिननै साफ पानी का इंतजाम करना सै उनकै तो ग्यारा-ग्यारा हजार की माला घालां सां आपा। सरिता बोली - तो फेर के करां/न्योंए बीमार होकै मरते रहवां?
सते बोल्या - हैल्थ सब सैंटर की कर्मचारी तै बूझां अक के करां? सरिता बोली - बूझल्यो। फेर ट्यूबवैल के पानी का टैस्ट क्यूकर होवै अर कड़ै होवैगा? डिग्गी का पानी बी टैस्ट करवाना चाहिये। अर एमएलए धोरै चालना चाहिये एक पीएचसी खुलै म्हारे गाम मैं अर म्हारी सीएचसी मैं पूरे डाक्टर लाये जां। सते बोल्या - लोग कहवैंगे ये ‘बैठक’ आले बी राजनीति करण लागगे। फते बोल्या - जै पीवण के साफ पानी की मांग करना अर बीमारी के इलाज खातर अस्पताल की मांग करना राजनीति सै तो फेर ठीक सै हम या बात मान लेंगे अक हम राजनीति करां सां। देखी जागी, मरना उं बी सै अर न्यूं बी सै तो कुछ करकै तो मरां। म्हारे बालक तो पेट पाकड़ें नहीं हांड्या करैंगे। बाकी आगली बैठक मैं चरचा करांगे। हम बिना बात की बातां पै तो गैहटा तारें रहवां सां फेर म्हारे जीवण मरण के सवालां नै आपां राजनीति का नाम देकै कन्नी काटना चाहवां सां। असल मैं हमनै अपने जिम्मे के काम करने त्याग दिये। कितने त्याही यां आपां! न्योंए एक दिन बामरी के कारण इस शरीर नै बी त्याग द्यांगे।

विकास अक विनास


आज काल विकास की बहोत चर्चा होरी सै। सारे पार्टियां आले विकास-विकास चिल्लाते हांडैं सैं। इस समाज मैं कसूती सड़ांध उठ ली ईब इसनै खुशबू तो कहवैं क्यूकर फेर क्यूं उठ ली इसमैं रोल मारज्यां सै। न्यों कोए नहीं बतांतां कि उनके हिसाब तै विकास का के मतलब सै? कोए कहवै सै मैं रेल चलाद्यूंगा फेर क्यां खातर? लोगां ने ज्याण खपावण का रेल कै तलै कट कै मरण का आसान तरीका पाज्या इस खातर रेल ल्यावांगे के आपां? दबी जबान मैं एस वाई एल का बी जिकरा होसै। फेर इस बात का कोए जिकरा नहीं करदा अक हरियाणा नै कुल कितना पानी चाहिए सै। कितना पानी आज हरियाणा धोरै सै अर कितना पानी एसवाईएल तै हमनै थ्यावैगा? एक अनदाजे के हिसाब तै हरियाणा में 400 मिलियन एकड़ फुट पानी की कुल जरूरत सै। हरियाणा धोरै लगभग 200 मिलियन एकड़ फुट पानी सै। एसवाईएल जै खुद बी जावै तो उसमैं 17 कै 23 मिलियन एकड़ फुट पानी और मिलज्यागा। बाकी चाहिए 177 मिलियन एकड़ फुट पानी। यू किततै आवैगा? इसपै म्हारे नेतावां का के कहना सै? म्हारे हरियाणा की सिरसा की स्पिनिंग मिल बंद, हांसी की मिल बंद, रोहतक की स्पिनिंग मिल बंद, सोनीपत की एटलस फैक्टरी खिंच-खिंच कै सांस लवण लागरी सै उड़ै 5000-6000 कर्मचारी थे ईब 700-800 रैहगे बताये। पानीपत का हथकरघा उद्योग तीन चौथाई तै बंद हो लिया अर बाकी बी बस। फरीदाबाद की आधे तैज्यादा फैक्टरी बंद होली कै बंद होवण आली सैं। असैम्बली मैं बजट पेश करतियां नै म्हारे पाछले वित्त मंत्री जी नै स्वीकार करया अक खेती की पैदावार मैं खड़ोत सैं। इस सबके चालते, बेरोजगारी कसूती ढाल बधण लागरी सै। जो हरियाणा नै चांद पै पहोंचाने की बात करैं सै, वे कोए हरियाणा का विश्वसनीय खाका तो बतावैं अक या बेरोजगारी की समस्या न्यों दूर होवैगी।
हम पढ़ लिखगे फेर बी हरियाणा मैं घणेए अनपढ़ लोग सैं। पढ़ लिख कै बी आपां पूरे नागरिक बने अक नहीं सिपै मनै तो कई बर अपने ऊप्पर शक होवण लागज्या सै अक आपां अधखबड़े माणस तो नहीं सां? इस पढ़ाई लिखाई नै म्हारे ताहिं चाहे और किमै सिखाया हो चाहे नहीं सिखाया हो कन्या की पेट मैं ए हत्या करना खूब आच्छी ढाल सिखा दिया। वा कहावत सै ना अक ‘हाथ कंगन नै आरसी के अर पढ़े लिखे नै फारसी के’ हरियाणा मैं पुरुष महिला लिंग अनुपात 865 सै 2001 की जनगणना के हिसाब तै अर 820 सै 0 तै 6 साल के बीच मैं। यो लिंग अनुपात पढ़े लिखे लोगां मैं और बी गड़बड़ बताया। इसतै साफ सै अक या म्हारी पढ़ाई लिखाई हमनै औरतां की दुश्मन बणावै सै अर हम उसनै गर्भ मैं ए खतम करद्यां सां। जै इसी पढ़ाई आग्गै बी पढ़ाई जागी तो कोन्या चाहन्ती हरियाणा के लोगां नै इसी पढ़ाई। क्यूं बताओ हरियाणा की बहादर वीरांगनाओं तम इसी पढ़ाई की तरफदारी करोगी? दलितां का हाल तो और बी माड़ा सै। आरक्षण के बावजूद पिछडे़ सैं वे। प्रथम श्रेणी के कुल कर्मचारी हैं 235 जो कि इस वर्ग के कुल कर्मचारियां का 0.40 प्रतिशत है। फेर जै इसा लूला लंगड़ा विकास करना सै जिसमैं सौ मां तै 15 तो बिना काम करें काच्चे काट्टें अर बाकी 85 काम करकै बी छिकलें फेर बी उनका पेट कोनी भरै रामजी तो इसा विकास भाई रणवीर नै तो चाहिए ना बाकी जनता जनार्दन जानै अक वा किसा विकास चाहवै सै जे और किमै घणा कैह दिया तो कदे या म्हारे ए पुतले फूंक्कण लागज्या। मनैं पूरा विश्वास सै अक जनता बावली नहीं सै या सारी बात समझै सै। जड़ बात या सै कि जनता स्यानी सै या न्यारी बात सै अक कदे-कदे वा बावली बात करदे सै अर फेर उसका हरजाना बी जनता खुद भुगतै सै ये म्हारे नेता नहीं भुगतते। तो बात विकास की थी।
हरियाणे का विकास ईब ताहिं किस दिशा मैं था या सोच्चण की बात सै। टीवी सैक्स, हिंसा अर नशे का प्रचार रोज करै म्हारे घरां बड़कै। हरित क्रांति नै फायदा 10-15 प्रतिशत का करया नुकस्यान फालतू कराया या बात थोड़ी-थोड़ी ईब समझ आवण लाग्गी सै म्हारै। धरती थोथी होगी, पानी कई सौ फुट नीचै चल्या गया अर कै चौआ आग्या, पैदावार मैं खड़ोत पर लागत कई गुना बधगी, फसल की कीमत ना मिलती ये सारे विकास के मुद्दे सैं। इनपै जिब ताहिं खुलकै चरचा गाम-गाम मैं नहीं होवैगी इतनै डबलयू टीओ के पकड़ाये औड़ फूल की खेती के टोट्क्यां तै काम कोनी चालै। हाल के विकास के नाम पै 2 एकड़ आले किसान की मर सै। नहीं सै तो कोए बतावै एक न्यों नहीं सै। जनता अर किसान नेतावां तै जात गोत भूलकै ये सवाल विकास के बारे मैं नहीं करना शुरू करैगी तो नेता विकास के नाम पै जनता नै भका-भका के अपना विकास करें जांगे अर बेरोजगार न्योंए धक्के खावैंगे अर सल्फास की गोली खाकै इस विकास के गुण गावैंगे, कर्मचारी की छंटनी बदस्तूर जारी रहैगी। जनता इस सबनै विकास कहवैगी अक विनाश कहवैगी या जनता जाणै।
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पुत्र लालसा


म्हारे हरियाणा में जै एक छोरा बी हो तै न्यों कह्या जा सकै सै अक ‘एक आंख का के खोलणा अर के मूंदना।’ म्हारे प्रान्त मैं पुत्र की लालसा कोए भोली-भाली सी पवित्र इच्छा नही सै अर नाए या किसे मां के ‘दिल की पुकार सै’। या पुत्र लालसा तो एक पराधीन स्त्री की विवशता सै, मजबूरी सै। या पुत्र लालसा मासूम लड़कियां के खून मैं डूबी औड़ सै। पुत्र लालसा अर बेटी तै छुटकारा ये एक्कै सिक्के के दो पहलू बताये। म्हारे देश में परिवार का ढांचा पितृ सत्तात्मक ढांचा सै। या पितृसत्ता की दमन शक्ति इस ढाल की म्हारी मूल्य व्यवस्थावां का संचालन करै सै, बागडोर अपने हाथ में राक्खै सै। पतिव्रत धर्म के खूंटै कै बांध राक्खी सै औरत। खूंटे कै बांध कै उसके सारे के सारे सामाजिक अधिकार खोस लिए जावैं सैं। उसके कर्तव्य को नकार दिया जावै सै। ब्याह बस उसके साहमी जीवन यापन का एकमात्र रास्ता रहया है। पति के घर मैं वा बनी रहवै, उस घर में थोड़ी सी जगां उसकी खातर बी सुरक्षित रैहज्या इसकी खातर उसका बेटा पैदा करना बहोत जरूरी सै ना तै उसकी छुट्टी। म्हारे समाज मैं बेटे की खातर जो लाड़-प्यार अर मान-सम्मान सै उसकी कीमत बेटियां नै चुकानी पड़ै सै। लड़कियां नै अपने जीवित रहवण का अधिकार हासिल करना सै। आज के दिन उनका जीवित रैहणा उनके प्रियजनों की कृपा पै कै दया पै निर्भर करै सै। छोरी म्हारे घरां मैं अर समाज मैं कमोवेश अवांछित जीव सै। बेटा जन्म लेवते की साथ पितृ सत्ता का प्रतिनिधि सै अर बेटी उसके लिए एक चुनौती सै। बेटी के पैदा होवण तै ए पितृ सत्ता की चूल सी हाल जयां सैं। बेटे नै इस करकै प्यार अर सम्मान मिलै सै अक अन्याय अर असमानता पै टिके समाज मैं ताकत की पूजा होवै सै। दूसरे के सारे के सारे अधिकार खोसकै अर फेर उसकी रक्षा करना, दाता के रूप में उन ताहिं रोटी देना, दान देना, दया करना, ‘न्याय’ की देखभाल करना, इसनै बनाए राक्खण की खातर दंड देना आदि बात ना केवल म्हारे प्रांत में ‘स्वाभाविक’ मानी जावै सै बलक या तै एक ‘महानता’ मानी जावै सै।
म्हारी ‘महान भारतीय संस्कृति’ मैं स्त्रियां के सारे अधिकार हड़प कै पितृ सत्ता उनका पालन-पोषण करै सै, उनकी रक्षा करै सै इसे करकै पितृ सत्ता के प्रतिनिधि पुत्र नै अर उसकी मां नै तो आदर-सम्मान मिलै ए मिलै अर बेटी नै अर उसकी मां नै तिरस्कार मिलै समाज मैं। असमानता अर अन्याय पै टिके समाज मैं, शोषित अर उत्पीड़ित आदमी घृणा की नजर तै देख्या जावै सै। जै कोए वो अपनी औड़ तै मांग ठादे तो वा बात वा मांग अनधिकृत चेष्टा के रूप मैं देखी जावै सै। असल मैं तो न्याय अर अन्याय की परिकल्पना भी ताकत के दबदबे मैं ए अपना स्वरूप धारण करै सै। न्याय की परिकल्पना मैं ए अन्याय बद्धमूल होवै सै। सही अर गलत नै परखण की कसौटियां मैं ए खोट हो सै। प्रतिष्ठित ‘न्याय’ नै चुनौती दे कै असली न्याय की मांग साहमी रखना आसान काम कोन्या। इसमें एक चुनौती सै अर घणा ए जोखिम भी छिप्या हुआ सै। म्हारा धर्म, शास्त्र, राष्ट्र, परिवार, ज्ञानी, पंडितां तै ले कै अपने यारे-प्यारयां के क्रोधित होवण का खतरा इसमैं सारी हाण सिर पै मंडराए जावै सै। मां अर बेटे के पवित्र रिश्ते का सार के सै, मातृ भक्तां के स्त्री द्वेष नै देख कै इसका बेरा लागज्या सै। भाई अर बाहण के गद्गद् रिश्त्यां का बेरा जिब पाट्टै सै जिब बाहण जमीन मैं अपना हिस्सा मांग ले सै। पिता अर पुत्र के अधीन रहवैगी, कदे न्याय नहीं मांगैगी, पति के अधीन रहवैगी, योहे सै ‘स्त्री धर्म’ अर योहे सै ‘पतिव्रत धर्म’। बाप, भाई, पति अर पुत्र के संरक्षण का सार योहे सै। अर असल मैं स्त्रियों के दुर्भाग्य का आधार भी योहे सै। इसे करकै लड़कियां बोझा सैं अर उनकी हत्या भी होवै सै।
इस म्हारे पितृसत्ता के ढांचे की नैतिकता स्त्री दासता नै सुनिश्चित करण का काम करै सै। पितृ सत्तात्मक परिवार मैं दोहरे मापदंड हों सैं मूल्य व्यवस्था के। या पुरुषां ताहिं तो स्वेच्छाचारिता अर निरंकुश अधिकार देवैं सैं अर स्त्रियां के सारे अधिकारां का निषेध करै सै। कदे बी स्वतंत्र नहीं रैहणा सै। उसनै साध्वी रैहणा, गुण कर्म युक्त रैहणा अर अनाचारी, पर स्त्रीगामी, अनपढ़ पति की सेवा में तत्पर रैहणा सै (मनुस्मृति पांचवां चक्र, श्लोक 154)। वा थोड़ी सी बी कटु भाषिणी, स्पष्ट वक्ता हुई नहीं अक घर मैं रैहवण का अधिकार खोदे सै। (9.81) जो स्त्री प्रमत्त, पागल कै रोगी पति की आज्ञा नहीं मानती तो पुरुष नै यो अधिकार सै अक वो उसनै वस्त्र आभूषणादि विहीन करकै, तीन म्हिने ताहिं घर तै काढ़ दे। (9 78) स्त्रियां के बारे मैं इसे विचार शास्त्र अर ग्रन्थां मैं ए कोन्या भरे पड़े फेर पढ़े-लिखे, सुशिक्षित अर तथाकथित आधुनिक लोगां के दिमागां मैं भी घर कररे सैं।
गीता प्रेस गोरखपुर की प्रकाशित ‘नारी शिक्षा’, स्त्रियां की खातर कर्तव्य-शिक्षा, दाम्पत्य जीवन का आदर्श आदि किताब बड़े पैमाने पै छापी जावण लागरी सै। ‘पति व्रत धर्म’ अर ‘स्त्री धर्म’ का प्रचार करण आली ये किताब म्हारे संविधान की मूल प्रतिज्ञावां के खिलाफ सैं अर धड़ल्ले तै बिकण लागरी सैं।
स्त्री दास्तां पै टिके इस पितृ सत्तात्मक परिवार का मुख्य सार व्यक्तिगत संपत्ति की रक्षा अर उसमैं अपना मालिकाना हक बना कै राक्खण का सै। या संपत्ति वंशधर नै ए मिलै इसकी खातर स्त्री का अनिवार्य कर्तव्य सै अक वा पुत्र जरूर पैदा करै।

बल्ले बल्ले रेशनलाइजेशन


बल्ले बल्ले रेशनलाइजेशन
कई दिनांते एक शब्द पढ़ण अर सुणन मैं आ वै सै - रेशनलाइजेशन। बेरा सै के मतलब सै इसका? शिक्षा के जगत मैं इसका मतलब सै शिक्षा जगत का सुधारीकरण। स्कूली शिक्षा मैं जितने बिगाड़ पैदा होंगे उन सबकी एकै राम बाण दवाई सै अर वा सै शिक्षा का सुधारीकरण अर सुधारीकरण का मतलब सै शिक्षा का निजीकरण। कहवण नै कहया जा सै अक शिक्षा मैं सुधार करया जागा अर गुणवत्ता ल्याई जावैगी। बालकां की पढ़ाई लिखाई अर उनका ठीक-ठ्याक सा रोजगार येहे दो चिंता सै घणखरे मां-बापां की। शिक्षा का गिरता स्तर, आपाधापी अर नकल, पेपर लीकेज, प्रमाण पत्र अर डिग्रीयां की बिक्री स्कूल स्तर तै ले करके उच्च स्तर ताहिं की प्रतियोगी परीक्षावां के परीक्षा परिणामां में हेराफेरी अर और बेरा ना के-के होवण लागरया सै। एक बर की बात सै अक रमलू ताई की चाक्की राहवण चाल्या गया। घरां ताई एकली थी। पानी ल्यावण का बख्त होरया था। ताई ने सोच्ची अक इतनै रमलू चाक्की राहवे इतनै पाणी की दोघड़ भर ल्याऊं। ताई पाणी नै चाली गई। रमलू नै भूख लागरी थी। भूख-भूख मैं जोर की चोट लागगी अर चाक्की के पाट के तीन टूट होगे। सोची ले रोटी खा ल्यूं। बोइहया मैं तै रोटी ले ली तो ऊपर नै उठ्या तो ऊपर घीलड़ी लटकै थी उसका सिर लाग्या अर वा पड़कै फूटगी। फेर सोच्ची अक कढावणी मां तै मलाई तारके उसकी गेल्यां रोटी खाल्यूं। कढावणी मैं तै मलाई तारण लाग्या तो कढ़ावणी लुढकगी अर सारा दूध गया हारे मैं। इतनै बाहर ताई की आवाज सुणी रमलू नै तो उसनै सोच्ची चाल भाजले आली ताई। भाजते-भाजते रमलू ताई की गेल्यां देहलियां पै भिड़ग्या। ताई की दोघड़ पड़वै फूटगी। तो ताई माथै हाथ मारकै बोली - रे रमलू तनै रोल्यूं। तो रमलू छुटद्या ए बोल्या - ताई ईब्बै कैसे ज्यूं-ज्यूं भीतर बड़ैगी त्यूं त्यूं रोवैगी। फेर बात थी म्हारी स्कूली शिक्षा की हालत की तो जितना गहराई मैं जावांगे जितना भीत्तर बड़कै देखांगे उतना ए रोवणा बी फालतू आवैगा।
सवाल यू है सै अक करया के जावै? हाथ पै हाथ धरकै बैठे रहवां। हाथ-पां हिलावां तो किन मुद्या पै हिलावां? गैलयां बात या बी सै अक आपां सबतै पहलम इस समस्या नै ठीक-ठीक जागां तै समझल्यां। हां तै इस रेशनलाईजेशन के नाम पै अध्यापक छात्र अनुपात 1ः60 कर दिया अर इस ढालां अध्यापकां का भी वर्क लोड बढ़ा दिया। एक और तरीका सै। मान लिया प्लस टू के स्कूल जिनमैं साइंस बी सै सौ स्कूल सैं। इनमैं 55 बायोलोजी के, चालीस कैमिस्ट्री के अर 35 फिजिक्स के लैक्चरर सैं। इसमैं होना तो यू चाहिये था अक कम तै कम 25 स्कूलां मैं तो तीनों सबजैक्टां के टीचर लाये जात्ते। उलटा ये सौ टीचर सौ स्कूलां मैं न्यारे-न्यारे ला दिये। जिस स्कूल मैं कैमिस्ट्री का टीचर कोन्या। तो बालक क्यूं दाखला लेंगे $2 मैं साइंस मैं। जिब बालकां नै दाखिला नहीं लिया तो उस स्कूल मैं वो कैमिस्ट्री आला टीचर बी सरप्लस होग्या।
म्हारे हरियाणा मैं कितने स्कूल सैं बेरा सै के? कोनी बेरा। मास्टर जी धोरै बूझ कै देख। उसनै बी कोनी बेरा। हां तै हरियाणा मैं 8710 प्राथमिक, 1455 माध्यमिक, 1751 उच्च अर 1090 वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय सैं। इन मा तै बहुत से स्कूलां के मुखिया पद कई-कई बरस तै खाली पड़े सैं। मिडल स्कूल मैं 8 साल पहलम मुख्याध्यापक लाये थे। उस पाछै कोए पदोन्नति नहीं करी। प्राथमिक विद्यालयों के हैड टीचर के पद समाप्त करण की गुप्त योजना घड़ी जावण लागरी बताई। स्कूल का स्तरोन्यन (दर्जा बढ़ाई) राजनैतिक आधार पै करी जावै सै अर उड़े अध्यापकां के पद स्वीकृत नहीं करे जान्दे। प्राध्यापक कोन्या भेजे सरकार नै इस करे कै ज्यादातर ग्रामीण विद्यालयों मैं विज्ञान अर वाणिज्य संकाय बंद करने पड़े सैं। गुणवत्ता बढ़ावण के नाम पै पहली जमात तैए अंग्रेजी पढ़ावण अर कम्प्यूटर शिक्षा देवण का काम बहोत बड़ी उपलब्धी के रूप में पेश करया जावै सै। अंग्रेजी शिक्षा शुरू करण का दावा आत्मवंचना के अलावा कुछ नहीं सै। कोरा थोथा नारा सै। सच्चाई तो या सै अक छटी तै दसवीं जमात तक अंग्रेजी अनिवार्य विषय बताया, फेर पूरे प्रदेश मैं अंग्रेजी अध्यापक का एक बी पद स्वीकृत नहीं सै। पहली तै ले के दसवीं जमात ताहिं। देख्या कमाल। दूजे कान्हीं कम्प्यूटर शिक्षा के जरिये डाटा इन्फोटेक व हाइट्रोन का धंधा जरूर जमवा दिया अर गेल्यां ए अपणा बी जमा लिया। कम्प्यूटी की फीस न दे पावण करकै निर्धन बालक पढ़ाई छोड़ देवण की खातर मजबूर करे जावैं सैं। खासकर दलित वर्ग के बालक अर लड़कियां इसके सबतै बड्डे शिकार सैं। दो बरस हो लिए फेर किसे बी नये खोले गये अर कै स्तरोन्नत करे गये। विद्यालय मैं अध्यापकां-प्राध्यापकां के पद स्वीकृत नहीं हो लिये। क्यों? इसका जवाब कौन देवै। बिल्ली के गल मैं घंटी कौन बांधै? दूसरे स्कूलां मां तै प्रतिनियुक्ति पै अध्यापक भेज राखे सैं। नतीजा यू हुया अक कौवा चल्या हंस की चाल, अपणी बी भूल बैठ्या, ना पुराने स्कूल मैं ठीक पढ़ाई चाल रही अर नये मैं तो चालै ए क्यूकर थी।
सैमस्टर प्रणाली बिना सोचे-समझे लियाये। इम्तिहान मैं आब्जैक्टिव टाइप विधि लियाये। तैयारी कोए कर नहीं राखी। डीपीईपी प्रोग्राम पढ़ण बेठा दिया, ईब सर्व शिक्षा अभियान नै पढ़ण बिठा देंगे। बेरा ना जनता इननै कद पढ़ण बिठावैगी अर पहलम की ढालां स्कूल अपनी रहनुमाई मैं चलावैगी। ओ दिन एक ना एक दिन आवैगा जरूर। मेरे बीरा ताश खेलते-खेलते इन बातां पै बी चरचा तो करे लिया करो। आम तौर पै कहया जा सै अक मास्टर पढ़ाते कोन्या स्कूलां मैं। याहे बात न्यों बी कही जा सके सै अक म्हारी सरकार अर म्हारी जनता कोन्या चाहती अक सरकारी स्कूलां मैं पढ़ाई हो। जिस दिन ये दोनूं धड़े चाहवैंगे, उस दिन स्कूलां की हालत जरूर सुधरैगी अर असल मैं असली रेशनलाइजेशन शिक्षा जगत मैं होवैगा।

ज़हरीले पेंट के कारनामे


यह पूंजीवादी औद्योगिक सभ्यता भले ही बाहर से चमक दमक आली नजर आती हो लेकिन इसके कितने घातक प्रभाव हमारे जनजीवन पर पड़ रहे हैं उसका किसी को अहसास नहीं है। इसके भीतर का कालापन बहोत वारी समझ मैं आवै सै। इसनै हवा, धरती अर पाणी सब मैं जहर घोल कै गेर दिया। प्रदूषण का धर्राटा सा बांध राख्या सै। वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के अंतर्गत काम करने वाले स्वायत्त संगठन क्वालिटी कौंसिल ऑफ इंडिया - क्यू सी आई - की हालिया रिपोर्ट ऐसा ही सच बयां करै है। पिछले पांच सालों के दौरान दिल्ली, कोलकाता, मुंबई, चेन्नई, हैदराबाद, बंगलूर आदि महानगरों में लगभग चौबीस हजार बच्चों की स्वास्थ्य जांच-परीक्षण तै बेरा पाट्या सै अक 51 फीसदी बच्चों के रक्त में जहरीले सीसे की मात्रा घातक स्तर तक पहोंच ली है। इन बारह वर्ष से कम उमर के बालकां के खून मैं जो सीसे की मात्रा 10 माइक्रोग्राम पर डेसी लिटर हो तो उससे बुद्धि-लब्धि (आई क्यू) में चार से छह इकाई की कमी आ ज्यावै सै। इसके चलते बच्चों के स्वाभाविक विकास और बौद्धिक स्तर पर घातक प्रभाव पड़ रे सैं। यो सारा काम ल्हुकमा ल्हुकमा होरया था। मुनाफे की खातर ये कम्पनियां कड़े ताहिं गिर सकैं सैं इसका अन्दाजा लाया जा सकै सै। चौंकाने वाली बात यह है कि यदि यह सर्वेक्षण न होता तो अभिभावकों को इस बात का अहसास ही नहीं होता कि उनके बच्चों के असामान्य व्यवहार की वजह के है? रिपोर्ट बताती है कि स्कूल की दीवारों, स्कूल की बसों, खेल के मैदान में लगे झूलों, खिलौनों तथा घरों की दीवारों में लगाये गये पेंट की वजह से समस्याएं साहमी आई हैं। रिपोर्ट बताती हैं कि भारत में उत्पादित होने वाले अस्सी प्रतिशत पेंट में सीसे की मात्रा घातक स्तर तक शामिल सैं। वास्तव में सीसे वाली पेंट की समस्या से जूझने वाले प्रमुख पेंट उत्पादक देशों में चीन, ताइवान और मलेशिया भी शामिल बताये। चीन और ताइवान में सीसायुक्त पेंट बनाने के लिए बाकायदा कानूनी प्रावधान लागू किये गये सैं। लेकिन भारत में ऐसा कोई कानून नहीं बनाया गया इब ताहिं। असल में सीसायुक्त पेंट की लागत सामान्य पेंट के मुकाबले 25 फीसदी अधिक आवै है, इसलिए अपने मुनाफे को बढ़ाने के लिए पेंट उत्पादक कंपनियां सीसे का उपयोग धड़ल्ले से करण लागरी सै। लेकिन इस दिशा में न तो सरकार और न ही पर्यावरण संगठनों में कोई सार्थक पहल करी है।
इस सर्वेक्षण को करवाने वाली क्वालिटी कौंसिल ऑफ इंडिया ने वाणिज्य मंत्रालय से इस दिशा में अविलम्ब कानून बनाने की मांग करी सै ताकि देश मैं सीसायुक्त पेंटों का उत्पादन अनिवार्य हो सके। भला हो अक कानून बनाने की सिफारिस तो करी। देखियो कानून कितने साल मैं बनैगा। खास बात या सै अक पीले पेंट मैं सीसे की मात्रा खतरनाक स्तर तक बताई अर सफेद पेंट मैं सीसे की मात्रा न्यूनतम पाई गई। इसके अलावा अमरीका अर दूसरे देशां की तर्ज पर पेंट में सीसे की मात्रा के न्यूनतम मानक यथाशीघ्र घोषित किये जावैं जो कि अब तक भारत में भयावह स्तर तक विद्यमान हैं। आई किमै समझ मैं अक नहीं। हुक्के पर बैठ के चरचा करनी पड़ैगी इन सब बातां की। म्हारे नेतावां ताहिं बताना पड़ेगा अक यू के खेल सै इन कम्पनियां का? कुछ तो लगाम इनकै कसी ए जानी चाहिये। ये बेलगाम छोड़दी तो दो साल मैं भारत नै पढ़ण बिठा देंगी।

प्रार्थना गऊ माता की


जनता नै मेरी राम राम। कई दिन मैं क्यों सोचदी रही अक मैं अपनी अरदास किसपै करूं, बहोत सोच्या फेर न्यूं समझ मैं आया अक जनता जनार्दन तै फालतू कूण हो सकैं सैं तो दो-च्यार बात करना चाहूं सूं। ध्यान तै गऊ माता की बात या जनता सुनैगी इसी मनै उम्मीद सै। मैं श्री गोशाला ट्रस्ट भिवानी की गोशाला मैं अपना जीवन बसर करण लागरी सूं। मेरे बरगी 1200 कै लगभग गां सैं। हम सारी मिलकै 8 क्विंटल दूध रोज पैदा करां सां जो बाजार कै भा तै लगभग 30 लाख रुपइये का एक म्हिने का बणै सै। इस म्हारी गोशाला मैं ऊंची नस्ल के सांड सैं अर शंकर, थापर अर साहीवाल नस्ल की 20-20 लीटर दूध देवण आली गऊ सैं जो प्रदर्शनियां मैं पहले के दूजे स्थान का इनाम ले कै आवें सैं। म्हारी गोशाला मैं गऊआं के भी नाम धर राखै सैं। एफ-12, रेशमा, बिमला, साधना, रामकुमारी, रेखा, हसीना जो 24-25 कि. दूध रोज देवैं सैं इनाम मिले सैं। जिब म्हारी ये बाहण इनाम ले कै आवैं सैं तो म्हारी सारी गऊआं की छाती फूल कै कुप्पा सी होज्या सै अर म्हारी रोज देखभाल करणिया 150 मजदूरां कान्हीं देख कै म्हारी आंख्यां मैं आंसू आज्यां सैं। दिन-रात एक करकै ये गोशाला मैं अर म्हारी देखभाल मैं, सान्नी सघानी मैं लाग्गे रहवैं सैं। इस म्हारी गोशाला कै धोरै 800 एकड़ जमीन बी सै अर या बहोते घणी उपजाऊ सै। इस धरती मैं जिब खेती लहलावै सै तो म्हारी बी खुशी का ठिकाना कोन्या रैहन्ता। गेहूं, चना, सरसों, अरहर, ज्वार अर बाजरा पैदा करैं सैं ये मजदूर अर बाजार मैं हर साल इसकी 23 लाख के लगभग की बिक्री होज्या सै। इसमां तै कुछ जीवन ठेके पै बी दई जावै सैं। इसतै बी घणी ए आमदनी होवै सै कितनी इसका मनै सही-सही बेरा कोन्या। इस बात का जनता गोशाला के खाते देख कै बेरा ला सकैं सैं। म्हारी ताहिं तो मालिक कदे खाता नहीं दिखान्ते। फेर ईब तो न्यू सुन्या सै अब जनता धोरै सूचना का अधिकार बी दे दिया सरकार नै तो उसके तहत बेरा लिया जा सकै सै खात्यां का। हां तो बात गोशाला की आमदनी पै चाल रही थी।
इस गोशाला धोरै 138 के लगभग व्यापारिक दुकान सैं जिनतै 20 तै लेकै 25 लाख रुपइये की आमदनी होन्ती बतायी। ऊपर तै बढ़िया नस्ल के बाछड़े अर गऊ बेच कै भी घणी ए आमदनी होज्या सै। बस न्यू मानले जनता अक दोनूं हाथां अर दोनू पाह्यां म्हारी गोशाला पीस्से दिन रात कमावण लागरी सै। अर कमावै बी क्यूं ना? बिना पीस्से आज कोए नहीं बूझता। बाजार व्यवस्था आग्गी जिसमें पीस्से का ए बोलबाला सै। बिना पीस्से आल्यां की कोए जात नहीं बूझता। ज्यूकर म्हारे मैं तै बी  जो 23 किलो के 24 किलो दूध देवै सैं उनकी तो मालिक खूब खल अर दाणे तै खातिरदारी करै सै अर म्हारी बरगी जो दो-च्यार किलो दूध देवैं सैं उनकी खातर तो खल बी कदे-कदे देखण नै मिलै सै। वे बीमार होज्यां तो मालिक सैड़ फैड़ दे सी डाक्टर ने बुलाकै टीका लुआदें अर दवाई दिवा देवैं अर म्हारे बरगी बीमार होज्या तो पड़ी-पड़ी रम्भायें जावां सां दर्द मैं फेर कोए बूझ नहीं सै म्हारी।
पशुधन तै बी खूब कमाई करै सै म्हारी गोशाला। ज्यूकर गोबर की खाद बेचकै, माट्टी की खुदाई की बिक्री तै, नाज अर हरया चारा बेच कै। एकाध बर मैं बैठी-बैठी सोचूं सूं अक कोए बख्त था जिब या गोशाला म्हारे बरगी लावारिस, बेसहारा, बीमार, बूढ़ी, लंगड़ी गऊआं की सेवा करण खातर बनायी गयी थी। हरियाणा के समाज मैं खेती के काम मैं बुलध का बहोत काम था उन बख्तां मैं। हल की खेती थी। गऊं बिना बुलध नहीं थे तो हमनै समाज मैं गऊ माता का दर्जा मिलग्या।
असल मैं धर्म खूब भुनाया जावण लागरया सै पीस्सा कमाई खातर ईसपै फेर कदे चर्चा करूंगी। हां तै यू बहोत बड्डा कारखाना बणग्या। इस गोशाला धोरै 5 ट्रेक्टर सैं (बुलधां की खेती ये बी छोडगे), आधुनिक मशीन सैं, कृषि यंत्र, ट्राली, गऊआं का दूध काढण की मशीन, बायो गैस संयंत्र जो 25 किलो वाट का बतावै सैं जो सारी गोशाला नै एक साथ बिजली तै जगमगा दे सै, चैप कट्टर, ग्राइंडर अर मिक्सचर, मार्शल गाड्डी सैं। के कहने मालिकां के। उनके तो तीजां के से कटरे सैं। इस संस्था मैं जो 150 मजदूर काम करैं सैं उनकी हालत म्हारे बरगी गायां बरगी सै अर मालिकां की हालत 24 किलो दूध आली गायां बरगी सै। 16-16 घंटे काम अर 30 तै ले के 50 रुपये की मजदूरी। ना कोए छुट्टी, ना कोए बोनस, ईएसआई की कोई सुविधा ना। जनता नै मेरी अपील सै अक जिब थारे हलके मैं ये गोशाला आले आवैं तो म्हारी हालत का अर इन मजदूरां की हालत का जिकरा तो करियो। अर म्हारे नेता आवैं तो उनतै बी बूझियो तो सही अक एक गऊ माता की पुकार थी उसके बारे मैं उनका के कैहणा सै? 29 सितम्बर 1998 नै मंत्री मेनका गांधी बी आई थी उसनै बूझया अक बूढ़ी अर बीमार गऊएं कित सैं? इस गौशाला मैं बूढ़ी अर बीमार गाऊ एक बी ना देख कै मेनका कै बी आंसू आगे। अर वा फेर बोली - मैं आड़े दूध की डेयरी कोन्या देक्खण आई बल्कि सकारात्मक पशु सेवा देक्खण आई सूं। मेरी बिनती सै जनता तै अक यो डेयरी उद्योग तो बना दिया मालिकां नै फेर इसमैं श्रम कानून तो ईब ताहिं लाग्गू कोनी होए। करियो ताश खेलने बंद करकै म्हारी बरगी गऊ माता की अपील पै बी थोड़ा-सा ध्यान।
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पाला खाप का


यह गोत की गात मैं शादी का मामला आखिर पिछले आठ-दस साल मैं क्यों इतना जोर पकड़ग्या? इसके घणे कारण हो सकैं सैं। जब-जब समाज मैं आर्थिक और सामाजिक संकट बढ़े सैं तब-तब इनसे जूझने के प्रयास भी तेज हो जाते हैं। इस संकट से जूझने के प्रयासों की मुख्य तौर पर तीन दिशाएं देखी जा सकती हैं। पहली दिशा है जिसमें समाज का बड़ा हिस्सा इस संकट का समाधान अपनी पुरानी परम्पराओं में ढूंढने लगता है। मतलब समाज को फिर से चौहदवीं सदी की तरफ ले जाने के प्रयास तेजी पकड़ने की कोशिश करते हैं। दूसरी दिशा के लोग यह मानते हैं कि ‘कुछ नहीं होना-हवाना’। ऐसा ही है। इसे बदला नहीं जा सकता। मतलब, ये लोग ‘देयर इज नो आलटरनेटिव’ अर्थात् ‘टीना सिन्डरोम’ के शिकार हैं। साथ ही यह भी सच है कि इन लोगों को वर्तमान दौर बहुत ‘सूत’ आ रहा है और इनकी पांचों आंगली घी मैं सैं इसलिए ये इस संकट से जूझने की बात नहीं करते। तीसरी दिशा है समाज को आगे बढ़ाने की, पिछड़े अवरोधों को पार करके संतुलित विकास की तरफ ले जाने की। वर्तमान संकट में बढ़ती असमानताओं के चलते हुए सीमान्त किसान में वर्गीय चेतना का विकास होने की मूलभूत संभावनाएं बढ़ रही हैं। इस वर्ग को गोत-नात का सांचा इस संकट से लड़ने के लिए ‘ओछी जूती’ के रूप में दिखाई देता है और इसका खुद का अनुभव इसे ऐसा सोचने पर मजबूर करता है। किसान में वर्गीय चेतना पैदा ना हो इसलिए यहां के शासक वर्ग भी यही चाहते हैं कि वह चौहदवीं सदी की ओर मुड़ कर अन्धी गली में घूमता रहे और इस संकट के जनक शासकों की तरफ देखने की हिम्मत ही न कर सके। इसीलिए उत्तर भारत के किसान की वर्गीय चेतना को कुन्द करने के लिए गोत की गोत में शादी के एकाध अपवाद को बड़ी व सारे समाज की गम्भीर समस्या बना कर पेश किया जा रहा है ताकि यह इसी में उलझे रहें। याद हो तो पंजाब के किसान ने कई बरसों पहले अपनी किसानी मांगों को केन्द्र में लाने के लिए चण्डीगढ़ को घेरने की योजना बनाई थी। हरियाणा के किसान ने उसकी अम्बाला के इलाके में आव-भगत करके अपनी सहानुभूति का प्रदर्शन किया था। उस घिराव के कुछ दिन बाद ही भिन्डरांवाला जी अमृतसर में उभरते हैं और पूरी दिशा खालिस्तान की तरफ बदल दी जाती है और पंजाब की किसानी की एकता को काफी गहरी ठेस पहुंचती है जिसके सदमे से वह आज तक नहीं उबर पाई है। लगता है पूरे उत्तर भारत की किसानी के संकट को अपनी सही दिशा पर जाने से रोकने के लिए यह जात पात गोत-नात के मुद्दे सामने लाकर इनकी एकता को तोड़ने का बड़ा षड्यंत्र है और हम इसके शिकार हो गये हैं। अपने तुच्छ राजनैतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए दबंग तबकों का यह खेल है। सोचो किसान साथियो। सोचो। सोच्चण की फुरसत किसनै सै। गेर रै गेर पत्ता गेर। हरफां के पूछड़ ठा-ठा कै देखण लागरे सैं? सांझ नै एक अद्धा भीतर अर फेर ये सारी बात बाहर। के जरुरत सै माथा मारण की। याहे तो म्हारा शासक वाहवै सै अक ये खापां की रैली अटैंड करें जा अर दारु पीकै लुढ़के पड़े रहवैं।

जागी महिला

जागी महिला हरियाणे की
पाछले हफते तीन बात दिमाग पर छाई रहीं। उठते-बैठते, गामां की बैठकां मैं, कालेज मैं कैंटीन पर सारी जागां इन बातां का जिकरा था। एके बात तो महिला आरक्षण बिल के बारे मैं थी। इस बिल नै लेकै पूरे हिन्दुस्तान मैं तहलका सा माचग्या। इस बिल नै लेकै राज्य सभा मैं हंगामा हुआ कसूती ढाल की सर्कस हुई, बिल राज्य सभा मैं पाड़ कै बगा दिया फेर राज्य सभा मैं यो बिल पास होग्या। बिल पास हुए पाछै महिलावां नै खूब खुशी मनाई। सारी पाटियां की महिलाएं जमकै नाच्ची। फेस इस बिल के पास होवण आले दिन घणी छोटी छोटी छोरी कुपोषण के कारण मरगी। इसे दिन एक आदमी नै अपनी पत्नी, बेटी अर मां ताहिं इसलिए जला दिया अक उसकी बीमार पत्नी नै दूध पीवण की इच्छा जताई थी। सपा अर राजद के सांसदां नै सीन खड़या करण मैं कसर नहीं छोड्डी। बोले जो आरक्षण मैं आरक्षण बिना यो बिल पास होग्या तो म्हारी पारलियामैंट मैं अमरीका आला माहौल हो ज्यागा। घणीए परकटियां संसद मैं आज्यांगी। उंचे तबक्यां की ये महिला बिहार के गाम की महिला का दुख दरद क्यूकर जान सकै सै? उसका दुख तो राबड़ी देवी जान सकै सै। अनिल अम्बानी के कुन्बे की महिला नै के बेरा उनके दुख-दरद का। परकटि तो संसद मैं साड़ी की अर कै मेकअप की अर कै फेर किट्टी की बात करैगी। संसद मैं आम जनता के मुद्दै जिब बेरा ए कोनी तो किततै ठावैंगी? असल मैं बात यासै अक आरक्षण मैं आरक्षण करवाकै ये लोग अपना वोट बैंक बचाकै राखना चाहवैं सैं अर राबड़ी देवी बरगी क्रिमी लेयर की महिलावां खातर राह बनाया चाहवैं सैं। एक तरफ तो क्रिमी लेयर तैं दुखी दीखैं सैं ये अर दूसरी तरफ अपनी जात्यां की क्रिमी लेयर की महिलावां की हिमायत मैं खड़े दीखैं सैं। फेर ये पुरुषों मैं क्रिमी लेयर पर तो चरचा कोन्या करते? असल बात तो या सै अक महिला किसे बी जाति की क्यों ना हो या मरदां तै फालतू संवेदनशील तो होवे ए सै। उसकी संवेदनाएं इन मोल्ड़ां कै समझ मैं कोन्या आ सकतीं। बेतुके बयान इब्बी दिये जावैं सैं अक करल्यो कितनी रिजरवेशन फेर बी चालै तो मरदां कीए गी। इब तो महिला की कतिए बूझ कोन्या फेर कम तै कम सलाह तो करैगा। एक कदम तो आगै सरकैगी बात। दूसरी बात या सै अक महिला को किसे जाति, धर्म, देश, प्रांत, जात, गोत के दायरे मैं बांध कै देखना किसे टूटे औड़ चश्में तै देखना तो मूर्खता ए कही जा सकै सै। महिला नै दुनिया के इस कोने तै लेकै उस कोने ताहिं किसे ना किसे वक्त पै, किसे ना किसे बहाने, कदे ना कदे कुछ इसा झेल्या होसै जो इननै एकीकृत करै सै। इस करकै उननै बांट कै देखण की घणी सी जरूरत नहीं सै। असली सौ की बात या सै अक यो सारा विरोध महिला की खातिर आगे की जगहां बणण के डर का सै। मरदां की खातिर यो स्वीकार करना आसान कड़ै सै अक महिलाएं उनकी बराबरी मैं आकै बैठ ज्यावैं। कई नेता सैं म्हारे देश मैं जो इन्दिरा गान्धी के प्रधानमंत्री बनने, फेर प्रतिभा पाटिल के राट्रपति बनने अर मीरा कुमार के लोकसभा अध्यक्ष बनने के सदमे तै इब्बै बाहर नहीं आ लिए सैं। इस पितृसत्ता समाज मैं इन लोगां की प्रतिक्रिया समझ मैं आ सकै सै। पंचायतां आले आरक्षण पर भी इसे सवाल उठे थे। पर एक बात तो साफ सै अक हरियाणा मैं जिन पंचायतां की सरपंच महिला थी खासकर दलित महिला या कमजोर तबके की महिला उनकी परफोरमैंस बेहतर रही, स्वास्थ्य, शिक्षा, जनता हित के मुद्दे साहमी ल्यावण मैं। पहलम तो घर मैं दबोचे रहो अर घूंघट मैं दबोच कै राखो अर फेर कहो अक हम तो पहलमैं कहवां थे अक इसके बसका पंचायत चलाना कित सै? एक बात साफ सै अक हरियणा मैं महिला नै अपना वजूद असरट कर दिया सै या किसे कै गलै उतरो अर चाहे मत उतरो। उसकी कीमत बी चुकाई सै अर आगै और बी चुकानी पड़ैगी। शाबाशी हरियाणे की महिलावां नै। जुल्मो-सितम नहीं सहेंगी महिला अब हरयाने की, आगे बढ़कर बात करेंगी महिला अब हरयाणा की, खेतों में खलिहानों में दिन-रात कमाई करती हैं, फिर भी दोयम दर्जा हम बिना दवाई मरती हैं, बैठी-बैठी नहीं सहेंगी महिला अब हरयाणे की। देवी का दर्जा देकर इस देवी को किसने लूटा, सदियों से हम गयी दबाई समता का दावा झूठा, दहेज की बलि नहीं चढ़ेंगी महिला अब हरयाणे की। इंसान बन गए हैवान आज होते हैं अत्याचार, यहां देखो नैया डूब रही अब हम थामेंगी पतवार, यहां अबला बनकर नहीं मरेंगी महिला अब हरयाणे की। आगे बढ़े ये कदम हमारे पीछे ना हटने पाएंगे, जो मन धार लिया हमने अब करके वही दिखायेंगे, रणबीर सारी बात लहेंगी महिला अब हरयाणे की।
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इज्जत गाम की


गाम की इज्जत की आजकल बहोत चर्चा सै। जिसनै देखै ओए इस गाम की इज्जत के बोझ तलै बैस्कयां सा दीखै सै। बेरा ना चाणचणक देसी गाम की इज्जत की इतनी चिन्ता क्यों होगी हम सबनै? करनाल के सैशन जज के फैसले नै आग मैं और देसी घी का तड़का ला दिया। इसमैं कोए दो राय नहीं हो सकदी अक चाहे कितना ए बड्डा कसूर करदे कोए उस ताहिं कानूनी अदालत तै न्यारा दण्ड देवण का अधिकार और किसे नै म्हारा संविधान नहीं देत्ता। तो मनोज अर बबली नै चाहे कितना ए बड्डा अपराध करया हो उनका कत्ल करण का अधिकार किसे नै नहीं मिल जात्ता। इस हिसाब तै करनाल के सैशन जज का फैंसला ऐतिहासिक फैंसला सै इसमें रति भर बी शक नहीं हो सकदा। रही बात गाम की इज्जत की, इसके मायने के सैं इन सारी बातां पर चरचा की जरूरत सै। इसतैं पहलम एक बात और साफ तौर पर समझण की जरूरत सै अक या दुनिया परिवर्तनशील सै। इसमैं बदलाव आते रहे सैं अर आगै बी आते रहवैंगे। तो बात गामां की अर गामां की इज्जत की थी। आज के हाल होरया सै गामां का इसपै चरचा की जरूरत सै। बरोने अर सिसाने के बारे मैं तो मनै पक्का बेरा सै अक इन गामां की शामलात जमीन पर दबंग लोगां के कब्जे होरे सैं अर इस समाज का, किसे गाम का ब्योंत नहीं रहर्या अक ये कब्जे हटवाले। म्हारे स्वयम्भू पंचायतां की ताकत का मनै अन्दाजा नहीं वे ये कब्जे हटवा सकैं सैं अक ना? घर तो कोए बच नहीं रह्या हां माणस कोए बेशक बचरया हो इस दारु की मार तै अर औरतां का जी ए जानै सै अक उननै के-के सहना पड़रया सै। गाम मैं छोरियां का गालां मां कै स्कूल मैं जाना दिन दिन मुश्किल होता आवै सै। एडस की बीमारी के मरीज गामां में बधण लागरे सैं। गाम मैं ओटड़े कूद कै बदमाशी करनिया अर औरतां की गेल्यां छेड़छाड़ करनियां का संगठित माफिया खड़या होग्या जिसका सामना करण का ब्योंत घटदा जाण लागरया सै। सैक्स के दल्ले गाम गाम मैं पैदा होगे अर मासूम युवतियां इस रैकेट की शिकार होवण लागरी सैं। महिलावां पर घरेलू हिंसा बढ़ती जाण लागरी सै। उन पर यौन अत्याचार बढ़े सैं। डाक्टरां तै बात करण पर बेरा लाग्या अक बिना ब्याही लड़कियां के गर्भपात की संख्या बढ़ी सै। अर इनमैं कसूरवार घरआले, रिस्तेदार अर पड़ौसी 50 प्रतिशत तैं ज्यादा बताये। इतना बुरा हाल क्यों हो लिया गामां का?
के कहना सै म्हारे बुजुर्गां का, म्हारे समाज के ठेकेदारां का? समाज सुधारकां का? म्हारे मन तो साफ सैं फेर क्यों इतनी गंदगी फैलगी? म्हारी नजर मैं तो कोए खोट नहीं फेर बलातकार करण आले लोगां की हिम्मायत मैं एसपी अर डीसी कै ट्राली भर-भर कै कूण लेज्यावै सै? दारू पीवणिया, लड़की गेल्यां छेड़खाणी करनियां अर पीस्से खावणिया नै सरपंच कोण बणावै सै? अर फेर ये म्हारे तथाकथित समाज सुधारक कित सोये रहवैं सैं? गाम मैं सुलफा, दारु अर स्मैक कूण बिकवावैं सैं? गाम की छोरियां अर बहुआं की गेल्यां भूंडे मजाक करकै टोंट कूण कसै सै? सुसरा बहू नै एकली देख कै बहु की इज्जत पर हाथ क्यों गेरै सै? खेत-क्यार मैं कमजोर तबक्यां की औरतां गेल्यां जोर-जबरदस्ती कूण करै सै? नामर्दी जवानां मैं क्यों बढ़दी जावै सै? और बी बहोत से मुद्दे सैं जिनपै समाज के ठेकेदार चुप सैं। बेरोजगारी रोज के पांच सात युवक-युवतियां नै मौत के मुंह मैं लेज्या सै। आपां उसनै आपस की तकरार का मामला समझां सां। दहेज नै जीणा मुहाल कर दिया औरतां का। छांटकै महिला भू्रण हत्या नै कई विकृतियां पैदा करदी समाज मैं। समाज सुधार इन नौजवानां नै मौत के फतवे सुणा-सुणा कै कोन्या होवै। इनकी ऊर्जा का समाज की खातर सकारात्मक रूप मैं इस्तेमाल करकै ऐ समाज सुधारक इसा समाज बणावैं जित माणस का बैरी माणस ना रहवै सोच्या जा सकै सै। नये औजार होंगे इस नये समाज सुधार आन्दोलन के। हमनै मानवतावादी, समतावादी अर वैज्ञानिक नजर के दमपै आगै बढ़ना होगा। पुराने राछ-बाछां तै काम कोन्या चालैगा।
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लचीली परम्परा


पहल्यां जमानै मैं ब्याह तैं पल्हयां छोरा देखण अर सगाई करण खातर नाई जाया करदा। जै वो ब्याह की बात पक्की कर दिया करदा तो वाए पत्थर की लकीर होया करदी। वा म्हारी महान् परम्परा होया करदी। कै तीन-तीन दिनां तक बरात रूकया करदी। ब्याह आले के अलावा दूसरे घरां के बरातियां खातर एक-एक दिन की रोटी करया करदे अर उसमैं सौ-सौ बराती होया करदे। उस टेम घड़ी, साइकल अर ब्हौत-सा दहेज देण का रिवाज था। कई-कई साल बीत जाया करदे छोरा बहू का मुंह देखण खातर तरसा करदा। चढ़ी रात आणा अर मुंह अंधेरै चले जाणा यो ही रिवाज था। म्हारै पहल्यां या ऐ रिवाज होया करदा कै नानी का गोत टाल्या करदे अर गैलयां दादी का गोत भी। उस टैम की घणी ऐ परम्परा गिणवाई जा सकैं सैं। जाटयां कै तो यांए रिवाज सै के एक खेड़े के गोत का छोरा उसी खेड़े के गोत की छोरी गैलयां ब्याह नहीं कर सकता। अर गाम के खेड़े के गोत का छोरा दूसरै गाम की अपणे गाम के दूसरे गोत तै सम्बंध राखण आली छोरी गैलयां ब्याह कर सकै सै। इसनै अंग्रेजी मैं मजोर्टिज्म की ताकत कहैया करैं सैं। उण दिनयां म्हारै खेड़े आलां का आछ्या बोलबाला होया करदा। पर समचाणा के खेड़े के गोत आल्यां की परम्परा तैं ब्होत पहल्यां ए धत्ता बता दिया था। एक पंचायत 1911 मैं बरोना मैं होई थी जिसका मुद्दा गाम्यां आल्यां की पढ़ाई का था। इस पंचायत मैं और भी कई मुद्दे थे जिसका मनै घणा-सा बेरा कोनी। फेर एक पंचायत सिसाणा गाम मैं सन् 60 के आले-दिवाले होई थी। इस पंचायत नै तो जमां ए परम्परा का तार-तार कर दिया था। बरात मैं पांच ही जणे जाण लागे। अर एक रूपैया मैं सगाई तै लेके बिदाई तक सारे वाणे कर दिये। ब्होत ऐ भुंडा काम करैया इस पंचायत नै। मनै तो लागे सै के नानी का गोत भी इसै पंचायत मैं टालण की बात होई थी। फेर गरीब जाटयां नै तो इस बात तैं ब्होत ए फायदा होया होगा। इस फैसले तें ब्होत-सी रिवाज धरी की धरी रहगी थी। आज फेर 40-50 सालां बाद एक संकट आया सै ब्याह कै मामला मैं ब्होत से सवाल उठे सैं।
अंतरजातीय ब्याह के बारै मैं के फैसलां लेणा चाहिए? भाई-चारा हो उस गाम मैं अर भाईचारे के गोत मैं ब्याह होणा चाहिये कै कोनी होणा चाहिये? खेड़े के गोत के स्वाभिमान नै भेट चढ़ण देणा चाहिये?, पड़ोस के गाम मैं ब्याह होणा चाइये?, गाम के गाम अर गोत की गोत मैं ब्याह होज्या तो मारण कै अलावा ओर के करणा चाइये? इण सवालां पै आजके टेम की जरूरतां नै ध्यान मैं राखकै अगर रिवाजां नै बदल्या जावै तो जात समुदाय का घणा ए हिस्सा राहत की सांस लेगा। किमै तो सोचो पंचायतियों।
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साइंस सबकी सै


म्हारी साइंस, थारी साइंस, पूर्वी साइंस, पश्चिमी साइंस, कई तरां की साइंस की बात चालती रही सैं अर आगै बी चालती रहवैंगी। फेर थोड़ा सा दिमाग खुरचने तै समझ मैं आवै सै अक साइंस सबकी सै। ‘साइंस इज यूनिवर्सल’। इसनै देशां की अर इलाक्यां की सीमावां मैं बान्ध कै देखना सही कोन्या। मैं यू सवाल पूछना चाहता हूं कि या जो घड़ी हाथ पर बान्ध कै घूमण लागरया सै बेरा सै इसकी खोज किसनै करी थी अर कौनसे देश मैं हुई थी? ईब आल्ले दिवाल्ले क्यों देखण लागग्या बता? इसकी खोज इटली में हुई अर इसे करकै फेर इंग्लैंड नै अंगड़ाई ली अर सब पिछाड़ दिये। म्हारा सारा कच्चा माल सस्ते दामां पै लगे समुन्द्री जहाजां मैं भर भर के नै। ये परम्परावां आले बहोत चिल्लाये थे उड़ै बी फेर उड़ै का समाज म्हारे की ढालां बोतडू समाज नहीं था। लालू जी नै अर ममताजी नै जितनी भाप के इंजन की रेल चलवाई सैं ये सारे बन्द करवाद्यो। ये तो बदेशी धरती पै उपजी सैं अर पाश्चात्य संस्कृति का खेल सै इनमैं। खुर्दबीन की खोज का बेरा सै कित हुई थी? गेर रै गेर पता गेर। इस रणबीर की बातां मैं मत आ जाईयो। खाप के पंचातियां की बस मानते जाईयो क्योंकि वे दिमाग तै सोच्चण आली बातै कोन्या कहते। खैर! खुर्दबीन की खोज नहीं होत्ती तो म्हारा आगे का विकास रुक जाता। नीदरलैंड जगहां सै जित इस खुर्दबीन की खोज हुई बताई सै। या बी म्हारे प्यारे देश भारत की खोज कोन्या। ये जितने माइक्रोस्कोप सै लैबां मैं सबनै ठाकै बाहर फैंक दयो म्हारे खापी भाइयो। फेर इननै बाहर फैंकण का के मतलब सै, इसका बी अन्दाजा होगा ना आपां नै? बैरोमीटर तै टॉरिसलो नै मौसमी खबरां के बारे मैं जानने का रास्ता साफ करया। कैहद्यो कोन्या चाहन्दा यू बैरोमीटर हमनै। टैलीग्राफ की खोज नै फ्रांस की शान बढ़ाई सै। बेरा सै अक नहीं? नहीं बेरा तो ईब तो बेरा पाटग्या। करवादे ये सारे तारघर बन्द। फ्रांस तै म्हारा के लेना-देना? इटली के पी टैरी नै टाइपराइटर का मॉडल बणा दिखाया सै। करवाद्यो टाइपराइटर आल्यां की दुकान बन्द। माचिस की खोज बी बदेशां मैं हुई बताई। मत ल्याओ अपने घर मैं माचिस। करवाद्यो माचिस बनाने के कारखाने बन्द। साईकिल के बनाने आले का नाम मैकलिन गया बताया तो यो नाम बी पश्चिमी कल्चर का सै, इस करकै साइकिल का बहिष्कार बी करो। आवै सै किमै समझ मैं अक न्योंए बैंडण लागरया सूं? फैक्स मशीन 1843 मैं तैयार होगी थी कित ईजाद हुई न्यों तो मनै बी कोन्या बेरा पर इतना पक्का सै अक भारत देश महान मैं तो इसकी खोज नहीं हुई। ये जो भारतीय संस्कृति की जफ्फी पायें हांडैं सैं इनके हरेक के घर मैं फैक्स मशीन धरी पाज्यागी। ये म्हारे कई बाबू जी सैं जो बड्डे धर्म प्रचारक माने जाते हैं। ये भी तड़के तै लेकै सांझ ताहीं साइंस ने गाल बके जावैं सैं। अतिभौतिकवाद नै न्यों कर दिया अर न्यों कर दिया। अर हम भी सैड़ देसी उनकी हां मैं हां मिलाद्यां सां। ये जो साइंस नै कोसैं सैं पाणी पी पी कै, येहे विज्ञान का सबतै फालतू इस्तेमाल खुद करैं सैं। म्हारे भारत के वातावरण मैं सही के सैं अर गल्त के सै इस पर बातचीत अर बहस के तरीके तो काढ़ने पड़ैंगे। एक सिविक समाज, एक सभ्य समाज का निर्माण भारत मैं अर खासकर हरियाणा मैं या बख्त की मांग सै अर इसमैं वैज्ञानिक दृष्टिकोण की विवेक की अर तर्क की अहम भूमिका रहेंगी। आई किमै समझ मैं?
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किमै तो सोचो !


पूरे गांव में यह चर्चा का विषय बन गया। कुछ पुरुष कह रहे हैं कि क्या इस गांव को अमरीका बनाओगे? पुरुषों का खासा हिस्सा यही चाहता था कि कमला रामफल भाई-बहन बन जाएं। मगर औरतों का बड़ा हिस्सा इसके खिलाफ था। कई औरतों ने कहा - अब यह कैसे हो सकता है? वे आपस में बातें करती हैं और क्या कहती हैं भला - पेट मैं पलै साथ मैं क्यों तुम दो ज्यानां नै मार रहे। गया बदल जमाना क्यूं पाप की माला गल मैं डाल रहे? बालक का रिश्ता के होगा भाण-भाई बनावैं सैं। भाण-भाई के रिश्ते कै बी क्यों कालस लगावैं सैं। गाम में जो बड़े पंचायती वे घणे दुष्कर्म करावैं सैं। छेड़खानी-बलात्कार पै ना कदे पंचायत बुलावैं सैं। कंस रूपी ये पंचायती बिकलाने मैं पिना धार रहे। राठी और दहिया बीच ब्याह ये णुरतै होत्ते आये सैं। चौटाला गाम मैं कई नै आपस मैं ब्याह रचाये सैं। हरेक गाम मैं गोत पन्दरा गये आज ये गिनाये सैं। किस किसनै बचावांगे ये सवाल गये ईब ठाये सैं। क्यों इन मासूमां ने बिना बात के फांसी तार रहे। परम्परावादी सोतै बैल की खेती ल्यादयो हटकै रै। जंग लागै चाकू तै ओरनाल काटो सब डटकै रै। पुराना घाघरा कड़ै गया गोत क्यों थारै अटकै रै। इतने गोत क्यूंकर बचैंगे बात म्हारै योह खटकै रै। ना पुराना ठीक सारा इसपै नहीं कर विचार रहे। इतनी प्यारी छोरी लाग्गै क्यों पेट मैं इनै मार रहे? खरीद कै ल्याओ यू पी तै जिब ना गोत विचार रहे। ब्याह-शादी मुश्किल होरे ना नये नियम धार रहे। गोतां की सीमा ये टूटैंगी लोग खड़े-खड़े निहार रहे। रणबीर बरोनिया पै पंचायती पिना ये तलवार रहे। सरोज कमला की बचपन की दोस्त सै। वा कैनेडा मैं सै। वह एक वेबसाइट पर कमला के बारे में जानकारी हासिल करले सै। अंग्रेजी के अखबार ‘दि ट्रिब्यून’ में भी खबर पढ़ै है। वह कमला के बारे में बड़ी चिंतित हो जाती है। वह कमला को एक पत्र लिखती है। क्या लिखती है भला - रोज पढ़ूं खबर कमला अंग्रेजी के अखबार मैं। महिला फांसी तोड़ी जावैं बिकलाने के दरबार मैं। संविधान की खुल कै नै पंचायत नै धज्जियां उड़ाई हैं। राजनैतिक नेतावां नै चुप्पी मामले मैं खूब दिखाई हैं। जमा शरम नहीं आई है जहर मिलाया घरबार मैं। प्रशासन खड़या देखै क्यों मेरै समझ नहीं आया है। संविधान का चौड़े मैं पंचायत नै मजाक उड़ाया है। ना कोए कदम ठाया है इस झझर की सरकार नै।
कोर्ट मैं ब्याह करया था पंचायत नै आज तोड़ दिया। भाण-भाई का उसनै इसमैं व्यर्थ नाता जोड़ दिया। रामफल जमा मरोड़ दिया गोतां की तकरार नै। परम्परावादी रूढ़िवादी रणबीर ये नाश करैंगे हे। आगली पीढ़ी के बालक घाटा किस ढाल भरैंगे हे। के बेरा कितने लोग मरैंगे हे पंचायत की हुंकार मैं। दस गामां पंचायत के अध्यक्ष गांव बरवाना के प्रणान कर्मबीर को जब पता लगता है इस फैसले का तो उन्हें बहुत दुख होता है। वे इस तालिबानी फरमान से सहमत नहीं। के कहवैं सै भला - अठगामा पंचात राठी की विकलाना फरमान गल्त बतावै। बरवाना का प्रधान कर्मबीर कोन्या सुर मैं सुर मिलावै। दसगामे नै कोए लेना-देना ना तालिबानी फरमान तै। राठी दहिया मैं ब्याह होवैं चाहूं बताया हिंदुस्तान तै। बण कसाई इंसान तै क्यूं बिकलाना घणी धौंस दिखावै। राठी दहिया के छोरा-छोरी आपस मैं खूब बयाह रचावैं। कोए बन्दिश कोन्या पंचायती हम खोल कै बात बतावैं। हम बिकलाने मैं समझावैं सडांध फैसले मैं तै घणी आवैं। कमला-रामफल पति-पत्नी भाण-भाई बनाना ठीक नहीं। संविधान सै भारत का इसका मजाक उड़ाना ठीक नहीं। उत्पात मचाना ठीक नहीं इस ढाल की बात सुनावै। निजाम पुर गाम दिल्ली मैं उड़ै जाकै खुद देख लियो। पिछड़ी समझदारी त्याग कै उड़ै जाके माथा टेक लियो। चौबीस नै फैसले नेक कियो रणबीर बरोनिया समझावै।
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फेर वार होज्यागी


आजकाल सारा हरियाणा घणा कसूता जोर लारया सै अक म्हारे सिर पर जो कलंक सै यो किसे तरियां दूर होवै। सरकार नै भी महिलावां खातिर कई योजना लागू करली अक क्यूकरै यो लिंग अनुपात का मामला सुधरज्या। घणीए एनजीओ कमर कसरी सैं अक हम जागरुकता ल्याकै इस लिंग अनुपात मैं सुधार करांगी। समाज का हरेक हिस्सा लांगड़ कसरया सै फेर या समस्या उड़े कि उड़े खड़ी लागै सै मनै अर महिलावां पर जोर जबरदस्ती अर अत्याचार का दौर बढ़ता लागै सै। किसे नै गीत लिख्या मैं कुदरत का वरदान सूं वस्तु नहीं बेकार की, मुझे मत मारो मैं तो जननी सूं संसार की। बात या बी सै अक औरत एक खुद में औरत सै फेर इसा के साक्का होया अक या अपने पेट मैं अपनी बेटी नै मारण नै मजबूर सै अर यो सारा हरियाणा लाठा ठारया अक छांट कै महिला भ्रूण हत्या ना होवै। फेर 2010 के जनवरी-फरवरी के आंकड़े रोहतक जिले के तो न्योंए कहवैं सैं अक ये सारे प्रयत्न घणे कारगर सिद्ध कोन्या होरे। समझ मैं नहीं आत्ता अक मां खुद भी एक नारी होत्ते होए क्यूकर बेटी की बलि खातर मजबूरी मैं तैयार होज्या सै? ममता की वा जीती जागती मूरत सै फेर बी इस हत्या मैं हत्या की भागीदार बनै सै। हो सकै सै अक म्हारे समाज मैं लड़की का असुरक्षित जीवन भी उसकी मजबूरी का एक कारण हो। इसे मैं वा क्यूकर पैदा करै अपनी बेटी नै? भगवती पुर की महिलावां नै 8-10 साल पहलम बताया था अक डाक्टर पैदा होवण तै लेकै इतनै ब्याही नहीं जात्ती इतनै तो न्यारी ढाल की चिन्ता सताएं जावैं अर ब्याह करे पाछै दूसरे ढाल की चिन्ता नींद हराम राखैं, करां तो के करां? समझ नहीं आत्ती अक क्यूकर एक बाप उस दूध का करज भूल ज्यावै सै जो उसनै अपनी मां का पीया था वा भी तो एक औरत सै। बाप क्यों अपने दिल के टुकड़े की हत्या के लिए मजबूर वहशी बण कै खड़या हो ज्यावै सै। वा डाक्टर जिसको जीवनदाता की उपाधी दी इस समाज नै वो चन्द सिक्कों की खातिर अपना ईमान बेचता हांडै। उन तै बात करकै देखो तो उनका अपना लोजिक सै छोरी पेट मैं मारण का इसपै फेर कदे बात करांगे। ये म्हारे कानून के रुखाले वकील साहेबान जिनका पेशा जनता को न्याय दिलवाणा सै वे भी इस अन्याय कान्हीं तैं मुंह फेरगे अपना फरज भूलगे। गुनहगार के हक मैं खड़े पाओ सो बहोतै माड़ी बात सै। कितने डाक्टरां की सजा करवाई सै आज ताहिं हरियाणा मैं? यूं छोरी मार-मार कै कौनसे संसार की कल्पना सै म्हारे धोरै बिना औरत के संसार की? पुलिस जनता की रखवाली फेर छोरी जनता का हिस्सा नहीं सै म्हारे समाज मैं तो अजन्मी छोरी का खाता कित के होवण लागरया सै पर पुलिसिया की खुद की मानसिकता महिला विरोधी हो तैं वो किततै बचाव करैगा अजन्मी लड़की का। क्यूकर चित्कार सुनैगी उसनै अजन्मी छोरी की। ये म्हारे रागनी गायक बी कुछ नहीं गात्ते इतने बड़े सामाजिक मुद्दे पै। एक राकेश किलोईया गावै सै एक रागनी जिसमैं अजन्मी छोरी अपनी मां नै कसूरवार ठहरावै सै। यो पूरा सच नहीं सै। पूरा सच सै एक इस छान्ट कै महिला भ्रूण हत्या खातिर यो पूरा समाज जिम्मेदार सै एकली मां नहीं। इस बारे मैं और सही हिसाब की रागनी लिखी जावैं अर गाई जावैं याहे अपील सै म्हारे रागनी गायकों को। या चुप्पी समाज की बहोत खतरनाक सै। महिला रहित या कम महिलावां आला समाज किस्सा होगा, इसकी कल्पना करना बहोत मुश्किल सै। थाली बजा कै काम कोन्या चालै। म्हारे सामाजिक ढांचे मैं मूलभूत बदलाव करने पड़ैंगे। अर उसकी खातर लम्बा संघर्ष करना पड़ैगा। दो-दो बी अर चोपड़ी-चोपड़ी बी तै काम कोन्या चालै। बालक बी होज्या अर साधनी बी रहज्या आली फिलोसफी काम कोन्या देवै। हम महिला सशक्तिकरण के नाम पर बहोत आडम्बर करण लागरे सां। इन आडम्बरां तै बाहर लिकड़ कै असल मैं महिला ताहिं बराबर का दरजा समाज नै करना पड़ैगा।
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नंबर वन हरियाणा


खेती में मशीनीकरण तेजी से हुआ और हरित क्रांति का दौर शुरू हुआ। हरित क्रांति ने बहुते नुकसान किये हैं मगर किसानी के एक हिस्से को लाभ भी बहुत हुआ है। एक नया नव धनाढय वर्ग पैदा हुआ है हरियाणा में जिसका हरियाणा के हरेक पक्ष पर पूरा कब्जा है। जो दो तारीख नै पाई मैं बी अपने जलवे दिखावैगा। ईन्ही के दायरों में अलग-अलग जातों के नेताओं का उभरना समझा में आता है। मसलन चौधरी देवीलाल ‘जाटों के नेता’, चौधरी चान्द राम दलितों के नेता - उनमें भी एक हिस्से के। पंडित भगवतदयाल शर्मा पंडितों के नेता, राव वीरेन्द्र सिंह अहीरों के नेता आदि। इस धनाढय वर्ग का एक हिस्सा आढ़तियों में शामिल हो लिया सै। यह कम जमीन वाले किसान की कई तरह से खाल तार रहया सै। इसी धनाढय वर्ग में से कुछ भट्ठों के मालिक हो गये हैं, दारू के ठेकों के ठेकेदार हैं, प्रोपर्टी डीलर बन गये हैं। नेताओं के बस्ता ठाउ भी इन्हीं में से हैं। इनके और भी कई तरह के बिजनैस हैं। इनका जीवन एसी कमरों में गुजर रह्या सै। हर तरह के दांव-पेच लगाने में यह तबका बहुत माहिर होग्या। जिन लोगों की हाल में जमीनें बिकी हैं उन्होंने पैसा इन्वैस्ट करने का मन बनाया मगर पैसा लगाने की उपयुक्त जगह न पाकर वापस गांव में आकर मकान का चेहरा ठीक-ठ्याक कर लिया और एक 8-10 लाख की कार ले ली। जिनके पास कई एकड़ जमीन थी और संयुक्त परिवार था उन्होंने सिरसा की तरफ या कांशीपुर में या मध्यप्रदेश में खेती की जमीनों में यह पैसा लगा दिया। कुछ लोगों ने 200-300 गज का प्लाट शहर में लेकर सारा पैसा वहां मकान बनाने पर खर्च कर दिया। आगे क्या होगा उसका? किसै नै चिन्ता कोन्या। दबंगों और मौकापरस्तों के समूह हरेक कौम में पैदा हुए हैं। इनका वजूद जातीय, गोत्रों और ठोले पाने की राजनीति पर ही टिक्या सै। ज्यादातर गांवों में सड़कें पहुंच गई हैं बेशक खस्ता हालत में हैं बहुत-सी सड़कें। किसी-किसी गांव में चार पहियों के वाहनों की संख्या भी बढ़ी है। टीवी, अखबार का चलन भी गांव के स्तर पर बढ़ा है। सीडी प्लेयर तो बहुत से घरों में मिल जाएंगे। माइग्रेटिड लेबर की संख्या ग्रामीण क्षेत्र में भी बढ़ रही है। किसानों के एक हिस्से में अहदीपन बढ़ रहा है। गांव की चौपालों की जर्जर हालत हमारे सामूहिक जीवन के पतन की तरफ इशारा करती हैं। नशा, दारू और बढ़ता संगठित सेक्स माफिया सब मिलकर गांव की संस्कृति को कुसंस्कृति के अंधेरों में धकेलने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। छांटकर कन्या भ्रूण हत्या के चलते ज्यादातर गांवों में लड़कियों की संख्या कम हो रही है। बाहर से खरीद कर लाई गई बहुओं की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। पुत्र-लालसा बहुत प्रबल दिखाई देती है यहां के माइंड सैट मैं। हर 10 किलोमीटर पर शर्तिया छोरा के लिए गर्भवती महिला को दवाई देने वाले मिल जाएंगे। ऊंची से ऊंची पढ़ाई भी हमारे दकियानूसी विचारों में संेंध लगाने में असफल रही लगती है। हमारे आपस के झगड़े बढ़े हैं। इस सबके चलते महिलाओं पर घरेलू हिंसा में बढ़ोतरी हुई है। महिलाओं से बलात्कार व छेड़छाड़ आदि के केस बढ़े हैं जिनमें से ज्यादातर केस दर्ज ही नहीं हो पाते। 30-40 ट्रक ड्राइवर हरेक गांव में मिल जाएंगे। एड्स की बीमारी के इनमें से ज्याातर वाहक हैं। सुबह से लेकर शाम तक ताश खेलने वाली मंडलियों की संख्या बढ़ती जा रही है। युवा लड़कियों का यौन शोषण संगठित ढंग से किया जा रहा है तथा सेक्स रैकेटिंग गांव गांव तक फैल गये हैं। इसे अलावा युवा लड़कियों में शादी से पहले गर्भ की तादाद बढ़ रही है। मौखिक तौर पर कुछ डाक्टरों का कहना है कि इस प्रकार के केसिज़ में 50 प्रतिशत से ज्यादा परिवार के सदस्य, रिश्तेदार, पड़ोसी ही होते हैं जो यौन शोषण करते हैं। युवा लड़कियों का यौन उत्पीड़न हरियाणवी ग्रामीण समाज की भयंकर तसवीर पेश करता है। गांव के युवाओं लड़के-लड़कियों को अपनी स्थगित ऊर्जा का सकारात्मक इस्तेमाल करने का कोई अवसर हमारी दिनचर्या में नहीं है। केबल टीवी ज्यादातर बड़े गांव में पहुंच गया है। टीवी में आ रही बहुत-सी अच्छी बातों के साथ-साथ देर रात बहुत-सी जगह बल्यू फिल्में दिखाई जाती हैं। युवाओं में आत्महत्या के केसिज़ बढ़ रहे हैं। महिलाओं के दुःख-सुख की अभिव्यक्ति महिला लोकगीतों में साफ झलकती दिखाई देती है।

आट्टण

एक बात तो साफ सै अक माणस एक सामाजिक प्राणी सै। माणस अर पशु मैं योहे फर्क सै अक माणस अपने भले-बुरे की खातर अपने समाज पर बहोत निर्भर रहवै सै। असल मैं पशु जगत के घणे ठाड्डे-ठाड्डे बैरियां के रैहत्ते अर बख्त-बख्त पै आवण आले हिम युग जिसे भयंकर प्राकृतिक उपद्रवां तैं बचण की खातर उसके दिमाग नै जो उसकी मदद करी सै उसमैं मनुष्य का समाज के रूप मैं संगठन बहोत घणा सहायक सिद्ध हुया सै। इस समाज नै शुरू मैं कमजोर माणसां की ताकत को सैंकड़ों आदमियों की एकता के माध्यम तै बहोत घणा बना दिया। इसे एकता की ताकत के दम पर माणस अपने प्राकृतिक अर दूसरे बैरियां तै छुटकारा पा ग्या। पर आज इस समाज नै प्राकृतिक अर पशु जगत के दूसरे बैरियां तै रक्षा पावण मैं मदद देत्ते होएं बी अपने भीतर तै इसे बैरी पैदा कर लिए जिननै इन प्राकृतिक अर पाशविक बैरियां तै भी फालतू माणस की जिन्दगी नरक बणावन का काम करया सै। समाज का अपने भीतर के माणसां के प्रति न्याय करना पहला फरज सै। न्याय का यो मायना होना चाहिये अक हरेक माणस अपने श्रम के फल का उपयोग कर सकै। लेकिन आज हम उल्टा देख रहे सां। धन वा चीज सै जो माणस के जीवन की खातर बहोत जरूरी सै। खाणा, कपड़ा, मकान ये सारी चीजां सैं जिन ताहीं असली धन कहना चाहिये। असली धन के उत्पादक वेहे सैं जो इन चीजां का उत्पादन करैं सैं। किसान असली धन का उत्पादक सै क्योंकि ओह माट्टी नै अपनी मेहनत के दम पर गिहूं, चावल, कपास के रूप मैं बदल दे सै। दो घन्टे रात रैहत्ते खेतां मैं पहोंचना। जेठ की तपती दोफारी हो, चाहे पोह का जाड्डा हो, ओ हल जोतै कै ट्रैक्टर चलावै, पाणी लावै, जमीन नै कस्सी तै एकसार करै अर उसके हाथां मैं कई-कई आट्टण पड़ ज्यावैं फेर बी ओ मेहनत तै मुंह नहीं चुरात्ता क्योंकि उसनै इस बात का का बेरा सै अक धरती मां के दरबार मैं रिश्वत कोन्या चालती अर न चाल सकती। धरती स्तुति प्रार्थना तै अपने दिल ने खोल कौन्या सकदी। या निर्जीव मिट्टी सोने के गिहूं, बासमति चावल अर अंगूरी मोतियां के रूप मैं देवे सै जिब धरती मां देख लेवै सै अक किसान नै उसकी खातर अपणे शरीर के कितने घणे पस्सीने बहा दिये, कितनी बर थकावट करकै उसका बदन चूर-चूर होग्या अर कस्सी चाणचणक उसके हाथ तै छूटगी। गिहूं का दाणा-दाणा कठ्ठा करना हो सै। एक जागां दस बीस मन धरया औड़ कोन्या मिलता। जिब एक बर तो फसल नै देख कै किसान का जी बी खिल उठै सै। महीन्यां की मेहनत के बोझ तलै दबे उसके बालक बड़ी चाह भरी नजरां तैं इस नाज नै देखैं सैं। वे समझैं सैं अक दुख की अन्धेरी रात कटने वाली सै अर सुख का सवेरा साहमी सै। उननै के बेरा अक उनका यो नाज उनके खावण खातर कोन्या। इसके खावण के अधिकारी सबते पहलम वे स्त्री-पुरुष सैं जिनके हाथ मैं एक बी आट्टण कोन्या, जिनके हाथ गुलाब केसे लाल अर मक्खण बरगे मुलायम सै, जिनकी जेठ की दोफारी एसी तलै कै शिमला मैं बीतै सै। जाड्डा जिनकी खातर सर्दी की तकलीफ नहीं ल्याता बल्कि मुलायमी कीमती गर्म कपड़यां तै सारे बदन नै ढक कै आनन्द के सारे राह खोल दे सै। अर यू किसान आत्महत्या करण ताहिं फांसी खावण खातर जेवड़ी टोहत्ता हांडै सै के सल्फास की गोली खाकै निबटारा पाले सै। ऊपर ऊपर तै सब मेर दिखावैं सैं किसान के नाम पै। फेर असल मैं सारे उसकी खाल तारु सैं। किसान कै पड़े ये आट्टण एक दिन जरूर रंग दिखावैंगे।

किसान का के कसूर


जीवनदायिनी प्रकृति और उसके द्वारा प्रदत्त प्राकृतिक संसाधनों के बेहताशा उपयोग ‘अन्य उपभोक्तावाद’ की तेज रफतार नै न केवल प्रदूषण बढ़ा दिया है बल्कि जलवायु में बदलाव आने से धरती तप रही सै। इसका सबसे बड़ा कारण धन के लालचियों का स्वार्थ सै जो प्रदूषण का जनक है। जिसने खुद उनको और पूरे विश्व को भयंकर विपत्तियों के जाल में फंसा दिया सै। उससे निकल पाना उन लालचियों के बूते से बाहर की बात सै। आज पूरी मानव जाति का अस्तित्व खतरे में सै। विकास के केन्द्र में आज पर्यावरण क्षरण और जलवायु परिवर्तन का सवाल होना चाहिए। क्योंकि जब तक विकास का ईको फ्रैंडली मॉडल नहीं अपनाया जायेगा इस संकट से छुटकारा पाना बहुत मुश्किल काम सै। सोचने का विषय है कि समूची दुनिया पर संकट मंडरा रह्या सै। आखिर कौन हैं इसके ज्यादा जिम्मेदार? पढ़े-लिखे लोग ज्यादा जिम्मेदार सैं। पंजाब को ‘फूड बावल’ के नाम से जाना जाता है। वहां पर ग्रामीण सम्पन्नता के पीछे बढ़ती कर्जदारी की दास्तां छुपी हुई सै? कृषि वैज्ञानिक और नीति निर्धारक वर्तमान संकट को स्वीकार करते हुए घबराते लगते हैं क्योंकि शक की सुई आखिर में उनकी तरफ घुमैगी। पिछले सालों में पंजाब कृषि विश्वविद्यालय किसानों को पैदावार बढ़ाने के बारे में कहता रहा है। हमें बार-बार बताया गया कि जब ज्यादा पैदावार होगी तो आमदनी भी बढ़ैगी। मगर यह सच नहीं था। दुर्भाग्यवश किसी में इतना साहस नहीं था कि जो गल्त वायदे साल दर साल किये जा रहे थे उनके खिलाफ बोलें। जबकि पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों को तो छठे वेतन आयोग के बकाया पैसे भी दिए गये तथा उनकी महीने की तन्खा में भी इजाफा किया गया। वहीं पंजाब का कमेरा किसान बहुत बड़े कर्ज के बोझ के नीचे दबता चला गया। अब वक्त आ ग्या सै अक पंजाब कृषि विश्वविद्यालय को तथा सरकारों को इस किसानी संकट का जिम्मेदार ठहराया जाये और उनसे उनका सामाजिक दायित्व न निभाने का अहसास करवाया जाए। हमारे नीति निर्धारकों के तथा कृषि वैज्ञानिकों के हाथ बहुत से किसानों के खून से सने सैं। प्रोफैसर शेरगिल ‘इन्सटीच्यूट फॉर डवलैपमैंट एंड कम्यूनिकेशन इन चंडीगढ़’ की रिपोर्ट कई अखबारों में छपी थी। इस रिपोर्ट में बताया गया सै कि किसानी कर्ज पिछले दस साल में पांच गुणा बढ़ग्या सै। क्या यह साफ-साफ नहीं इशारा करता है कि हमारा पंजाब में अपनाया जा रहा ‘कृषि का फ्रेम’ डिफैक्टिव सै? हमारे वैज्ञानिक कृषि के एनपीके मॉडल से आगे क्यों नहीं देख रहे तथा जमीन के बांझपन को ठीक करते हुए वातावरण को ठीक क्यों नहीं कर रहे? हमारे कृषि वैज्ञानिक पंजाब के किसानों की मदद न करके खाद कम्पनियों की तथा कीटनाशक बनाने वाली दवा कम्पनियों को ही लाभ पहुंचा रहे सैं। सदियों से भारत का किसान कर्जे के नीचे रहा है और अपनी अगली पीढ़ी को वह यह कर्ज ट्रांसफर करता आया सै। पहले सूदखोर होते थे जो जोंकों की तरह व्यवहार करते थे और किसानों का खून चूसते थे और समाज वाले किसानी को अपने जख्मों की मरहम पट्टी के लिए बिल्कुल अकेला छोड़ देते थे। किस्तों में राहत मिलती रही सै। सन् 40 के दौर में पंजाब में छोटूराम नै किसानी के कर्ज माफ करने का साहस किया। आजादी के बाद हरित क्रान्ति नै किसानी को कॉमरशियल खेती के तरीके में धकेल दिया। पिछले कर्ज के मुकाबले इस दौर के कर्ज के बढ़ने की रफतार बहुत तेज रही है। कमाल की बात है कि एक और खेती में पैदावार बढ़ी वहीं दूसरी ओर किसानी कर्ज भी उतनी ही तेजी से बढ़ता गया। शायद यकीन नहीं होगा। यह बात तो पक्की सै कि इस कर्ज का बड़ा हिस्सा खेती के कारण ही सै। और कई बार किसान के पास कोई विकल्प नहीं रहता सिवाय खुदकुशी करने के। पिछले एक दशक में एक लाख से अधिक किसानों ने हिन्दुस्तान में मजबूरी में आत्महत्याएं की सैं। वो खेती का मॉडल कौन सा सै जिसमैं किसान पर कर्ज चढ़े ही नहीं? आपके सुझावों का इन्तजार सै।

लत्ता कोन्या औढूं


आठ-दस किल्ले। चौखा काम चाल रहया। तीन भाई दो बाहण। बड्डे का ब्याह होरया। एक दिन किसे बात पर सल्फास की गोली खा कै जात्ता रहया। मां-बाप बहोत दुखी। छोटा छोरा नफे 16 साल का दसमीं मैं पढ़ै। एक कान्ही तो उस ताहिं न्यों कहया करदे अक बड्डी भाभी मां बरोबर। तेरहवीं आले दिन तै दो दिन पहलम सुगबुगाहट शुरू होगी अक नफे का लत्ता उढ़ावांगे। कमला की उमर 27 साल की अर वो सोलह साल का। कमला नाटगी लत्ता औढ़ण तै। ढाल-ढाल की चरचा। म्हारी परम्परा की नाक कटा दी अर और बेरा ना के-के। कितै और निशाने साध राखे सैं। आजकाल म्हारे जाट गोतां के कुछ भाईयां नै हरियाणा की संस्कृति की चिंता बहोत सतावण लागरी सै। गांव का ताना बाणा छिन्न-भिन्न होत्ता जावण लागरया इसकी बहोत चिन्ता सै। परम्परा का कौण सबतै बड्डा रुखाला इसका बहोत बड्डा कम्पीटिशन-सा होरया सै। 18 तारीख नै रात नै एनडीटीवी चैनल पर तो एक पंचायती नै आड़े ताहिं कह दिया अक हमनै हिन्दुआं की पुरानी किताबां तै कोए लेना-देना नहीं। हमतो आर्य सैं। वैदिक संस्कृति नै मानां सां हम तो। किसे नै कहया अक स्वामी दयानन्द नै तो छुआछूत के खिलाफ संघर्ष करया तो उस पर तो माट्टी गेर दी। पंचातियां धोरै कोए जवाब नहीं था। फेर सवाल आया अक ईब ताहिं एक बी इसा केस हो जित बहन-भाई नै आपस मैं ब्याह करया हो? तो भी घुमा-फिरा कर बात करी, सीधा जवाब कोन्या दिया अक यो केस सै बहन अर भाई के ब्याह का। गाम के गाम मैं अर गोत के गोत मैं ब्याह का भी बस एकला मनोज अर बबली का केस सै ओर कोए इसा केस नहीं बता पाए पंचायती। बार-बार दुहाई दी जा रही थी अक भाईचारे के गोतों में शादी करने से हमारी परम्पराओं का अपमान होता है। खेड़े के गोत का सम्मान करना हमारी परम्परा रही है। सीम कै लागदे दूसरे गोत के गाम मैं भी शादी न करना म्हारी परम्परा रही सै। चार गोतों को छोड़कर शादी करना म्हारी परम्परा रही है। तीन दिन की शादी करना हमारी परम्परा रही है। आर्य समाज के शादी के नियम कहते हैं कि शादी के वक्त बराबरी की हैसियत से लड़का लड़की एक-दूसरे के साथ पति-पत्नी का संबंध स्वीकार करेंगे। विवाह व्यवस्था कसूते संकट मैं सै। गोत-नात जात-पात सब कुछ देख द्याख कै करे औड़ ब्याह एक-दो साल के भीतर तलाक पर आकै खड़े होज्यां सैं। क्यों? के जवाब सै म्हारे धोरै? समाज मैं कुदरतन विकास के कारण जो बदलाव आवैं सैं उनको रोकना ठीक नहीं होत्ता। जनता कै जिब समझ मैं आज्या सै तो वा बदलाव स्वीकार करले सै म्हारे पंचायती भाई स्वीकार करो चाहे मत करो। चाहे कितने ए फरमान जारी करल्यो? फरमान की आड़ मैं कत्ल करने आल्यां नै बचावण की कोशिश करनियां नै या कुदरत माफ कोन्या करै। या जद्दोजहद सदियां तै चालती आई सै इस समाज मैं, इसनै कोए नहीं रोक सकदा। रोक सकदे तो बल्दां की खेती तै के थोड़ा प्यार था हमनै। फेर बख्त बदल लिये। समझदार हैं वो लोग जो वक्त से पहले वक्त की धार पहचान कर अपने आप को बदल लेते हैं। इसलिए लत्ता औढ़ण तै इन्कार करण आली महिला को कुलच्छनी कहने की बजाए उसको शाबाशी देओ अक उसनै आज के बख्ता मैं इस अन्यायकारी परम्परा कै खिलाफ आवाज बुलन्द करी। बेमेल विवाह तो है ही यह। कई बार जवान होने पर देवर अपनी मर्जी की शादी भी कर लेता है। उस औरत को अपनी मर्जी से चुनाव करने का कोई हक नहीं है। इन परम्पराओं की समीक्षा आज के समय की मांग है। लोग इसमें मौजूद अन्याय की जगहों को अब पहचानने लगे हैं। देखना यही है कि इस विवाह संस्था के संकट से हम किस तरह से निबटते हैं। समाज को आगे ले जाने वाले रास्तों का चुनाव करते हैं या पीछे ले जाने वाले रास्तों का?
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बदलाव करैगी जनता


एक बार गांव में एक शादी में गया तो कई लोग इकट्ठे हो गये और बात चल पड़ी गांव की जिंदगी पर। नफेसिंह ने कहा - गांव में कुछ बातों का मजा ही अलग होता है। ताश में बूढ़ों की जीत का। ब्याह में औरतों के गीत का और बासी खिचड़ी के साथ सीत-लस्सी का मजा ही अलग होता है। भगा करके ट्रैक्टर मोड़ने का, गोड्डे से गन्ना तोड़ने का, और जोहड़ मैं सांझी फोड़ने का मजा ही अलग होता है। दूध देने में भैंस भूरी का, ब्याह में साग-पूरी का, पार्टी में चिकन तंदूरी का मजा ही अलग होता है। कुंडी में सौटा रगड़ने का, भाग कर भैंस पकड़ने का और मास्टरजी के आगे अकड़ने का मजा ही कुछ और होता है। तीन चीजों से डरना चाहिए - आग, पानी और बदनामी। तीन चीजों पर कभी मत हंसो - अपाहिज, भिखारी और विधवा। तीन चीजों को उठाने से पहले सोचो - कसम, कदम और कलम। तीन चीजों से दूर रहो - बुरी संगत, चुगली और पराई औरत। तीन चीजों के लिए मर मिटो - वचन, देश और दोस्त। तीनों को कभी छोटा मत समझो - कर्ज, फर्ज और दुश्मन। तीन चीजों के लिए लड़ो - आजादी, ईमानदारी और इन्साफ। तीन चीजों के लिए तैयार रहो - दुख, मुसीबतें और मौत। तीन चीजों के लिए सख्त मेहनत करो - प्यार, इम्तिहान और संवेदनशीलता। तीन चीजों के लिए मेहनत करनी जरूरी - अपना काम, प्यार और इम्तिहान। हरियाणा मैं मजाक करने का भी अपना ही अन्दाज सै। राम जी नै बी नहीं बक्सै। जिब मिंह ना बरसै तो कहंगे - ओ ताऊ बरस ज्या न क्यूं भा खारया सै। जिब बरसण लागै अर बरसेंए जा तो कहवैगा - ओ फूफा इब थम्बैगा अक नहीं। इसे ढाल याड़े का माणस हाथ नहीं पसारैगा। हाथ पसारने तै ब्रह्म तेज घटज्यासै कहते। भिखारी का कितै मान नहीं होत्ता। कृपण को कहते हैं यश प्राप्त नहीं होता। विषय को धन कहां भला, कड़ै शुभ दर्जा व्यभिचारी का। काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह सबतै बड्डे दुश्मन बताए। मांगना मरने के बराबर बताया गया।
विद्या पढ़ना और पढ़ाना परम्परा सै म्हारी, कोए बात ना जै याद नहीं आरी। दान करना अर करवाना भी म्हारी परंपरा रही सै। या बात दूसरी सै अक पाछले बीस साल मैं हमनै एक टका बी दान का नहीं दिया। बात का बतंगड़ बनाने में भी कुछ लोग बहोत होशियार बताये। मतलब निकलै गर्ज मिटै, ना प्रण निभाते यारी का। आड़ै लातां के भूत बातां तै कोन्या मान्या करते। एक बात सै दही कै भामै कपास खाणा। 47 तै लेकै ईब ताहिं जितने इलैक्शन हुए सैं, महारे नेता जनता के भामै कपास ख्वा कै ऐश करण लागरे सैं। बड़े-बड़े न्यों कहगे चलै ना कदे अकेला बाट। बाट की कीमत दूसरे बाटां गोल्यां होसै। औघट घाट का नहाणा न्यारा ए होसै। ईब औघट घाट के होसै यू कून बतावै। मोड्डे और कानपाड़ों का प्रदेश सै म्हारा हरियाणा। डोरी गन्डे और झाडयां का बोलबाला सै। जित ये हों उड़ै बिना लंगवाड़यां के काम नहीं चाल सकदा। इनतै बी बहोत से लोग गौरव महसूस करैं सैं। कितनी समृद्ध सै म्हारी कल्चर। छोटा समझ सांप मारण का ना करना चाहिये टाला। जितना छोटा उतना खोटा सबका देख्या भाला। यो माणस कै डंक मारदे लीला पड़ज्या छाला। नस-नस के मैं जहर फेलज्या, होवै ज्यान का गाला। के अग्नि का छोटा होसै कोन्या देर बदन मैं। चालै हवा पतंगे उछलैं आग फेलज्या बन मैं। शहर नगर और गाम फूंक कै राख बनादै छन मैं। पानी गेर बुझाणी चाहिये बड़ी समझ कै मन मैं। सच की पहचान करना मुश्किल काम सै। हरिश्चन्द्र नै सच के कारण कष्ट उठाये भारया। सच के कारण रामचन्द्र फिरया बन मैं मारया-मारया। सच के कारण राजा नल नै भोगे दुख घणे भारी। जल बिन ताल, दीप बिन मंदिर, वृक्ष नहीं बिन छाया। ज्ञान प्रेम बिन दिल सूना, जीव बिन सूनी काया। घर सूना संतान बिना न्यूं कई जागां लिख्या पाया।
बिना खूशबू ना फूल सहावै अर बाग किसा बिन माली। बिना जनता राज सूना, पेटी बिना सिपाही। बिन सवार सजै ना घोड़ी, बिना हाली खेती बोड़ी। बिना घी किसी मिठाई। अपना मारै छां मैं गेरै। मरे पाछै किसी छां अर किसा घाम? कोए चाहे कितना ए बड्डा चौधरी बन्या रहो जनता चाहवै तो एक दिन मैं धूल चटादे। देवीलाल कई बै हीरो बनाया जनता नै अर कई बै जीरो बी बनाया। बाकियां की तो बिसातै के थी। तो इन खाप आल्यां नै बी अपनी लक्षमण रेखा समझनी पड़ैगी कदे दही कै भामै खुदे कपास खाज्यां ना। जनता कितनी ए बावली हो कितनी ए अनपढ़ हो फेर इसकी कोमन सैंस है इसका कोए मुकाबला नहीं। जनता समाज मैं उठी बहस पर पैनी नजर जमारी सै। बदलाव करे सैं जनता नै पहलम बी अर ईब्बी अपने हिसाब के बदलाव वा करैगी।
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चिंता समाज की


आजकल लोगां नै समाज की बहोत चिन्ता होरी सै। रमलू, ठमलू, नफे, सते, फते, सरिता, सविता, बबीता अर ताई धमलो पाछै क्यों रहवैं थे। रमलू बोल्या - आजकल गिहूं की पैदावार किल्लेवार कम होगी। मजे की बात कोन्या रही खेती मैं। बस धिंगताना सा होरया सै। ठमलू बोल्या - सही कहवै सै रमलू। पैदावार कम होगी, खेती मैं इस्तेमाल होवण आली चीजां की कीमत दस गुणा बधगी। जीना मुश्किल होग्या। गाभरू छोरे अर बहू सल्फास की गोली खा-खा कै मरण लागरे सैं। सरिता बोली - या सल्फास की गोली तो बनावनी ए बन्द कर देनी चाहिए। नफे बोल्या - म्हारी कौण सुनै सै। सविता बोली - बिना बात की बातां पर काटकड़ उतरया रहवै सै। अर सल्फास की गोली की कान्ही किसे का ध्यानै कोन्या जात्ता। सते बीच मैं बोल पड़या - समाज का सत्यानाश होण मैं कसर तो किमै रही नहीं। सरिता बोली - समाज शब्द का इस्तेमाल बहोत होरया सै आजकल। समाज तै तेरा के मतलब सै? नफे बोल्या - समाज का मतलब म्हारा समाज। म्हारे का मतलब ईब तम लाल्यो। सते - के मतलब लावां? समाज का मतलब हरियाणे का समाज? नफे - हां न्यों बी कहया जा सकै सै। पर...। सविता बोली - पर के खोल कै बता के कहना चाहवै सै। सरिता बोली - मैं जानूं सूं इस नफे नै सारी हान घुमा फिरा कै बात करैगा। नफे बोल्या - अरै क्यूं मेरा मुंह खुलवाओ सो। हरियाणा मैं समाज का मतलब जाट समाज तै न्यारा और के हो सकै सै? सरिता बोली - फेर म्हारा बाहमनां का समाज कित जागा? फते बोल्या - म्हारे दलितां के समाज की तो पहलमैं जागां कोन्या गांव के समाज मैं रही सही कसर नफे नै पूरी करदी। बबीता बोली - म्हारे पंजाबियों के तो कई गांव हैं हरियाणा में, हमारे रीति-रिवाजों का क्या होगा? रमलू बी कहने लाग्या - भाई गोत की गोत मैं ब्याह तो कति बी गले तै तलै कोन्या उतरै।
गांव की गांव मैं ब्याह क्यूकर पुगैगा? सीम कै लागते भाईचारे का हिसाब बी देखना पड़ैगा। सरिता बोली - तूं बी रमलू इन खापियां की भाषा बोलता दीखै सै। मनै न्यूं बता कितने के ब्याह होलिए गोत की गोत मैं? रमलू - घणे तो हुए कोन्या एकाध हुआ सै। फेर ये तो लीख गेरण लागरे सैं। इनका इन्तजाम तो पहलमैं करना होगा। सरिता - आच्छा रमलू न्यूं बता इन खापां का असर कितने के जिल्यां मैं होगा? रमलू गिनावण लाग्या - रोहतक, जीन्द, कैथल, पानीपत, करनाल, कुरुक्षेत्र, सोनीपत अर झज्जर। फेर अटकग्या। सरिता - ये तो आठ हुए। बेरा सै कितने जिले सैं हरियाणा मैं? रमलू - 16। सरिता बोली - कौन-सी दुनिया मैं रहवै सै। 20 जिले सैं हरियाणा मैं। बाकी जिले तो शामिल कोन्या थारे इस अभियान मैं। अर इन आठ जिल्यां मैं भी ना तो पंडितां की या समस्या, ना बनिया की या समस्या, ना पंजाबियां की या समस्या। ना दलितां की या समस्या। फेर तो नफे की बात सही लागै सै अक या जाट समुदाय की समस्या सै। पूरे हरियाणावासियां की समस्या तो सै कोन्या इनके रीति रिवाजां के हिसाब तै। नफे बोल्या - हरियाणा इज नॉट इक्वल टू पंजाबी, बनिया और दलित - हरियाणा इज इक्वल टू जाट। नहीं मानै जो बात जाट की, बस तैयारी करल्यो बाईकाट की। जाट ईब कानून गेल्यां फाईट करैं, साथ ना दे जो ढिबरी उसकी टाइट करैं। विरोधी का बहिष्कार डे नाइट करैं, लैफ्ट के समझै सै इसनै बी राईट करैं। चुन्नी उढ़ा बहु बनाल्यां चलै दस्तूर म्हारा, सात फेरे बी उकाल्यां के करले वेद थारा। सरिता बोली - नफे तूं तो इतना बावला ना था जितनी बावली बात तूं आज करण लागरया सै। मान लिया हरियाणा मैं जाट मैजोरिटी मैं सैं फेर इसका मतलब यो तो कोन्या एक सब पर अपना लंगोट घुमाओगे।
हरियाणा मैं बी इसे कई गांव सैं जित गांव की गांव मैं ब्याह हो सैं। हरियाणा मैं बी कई समुदाय सैं जित मामा-बुआ के बालकां मैं ब्याह होंसैं। बनिया अर बाहमनां के गोत की गोत मैं ब्याह के अपवाद के नहीं होत्ते? होसैं फेर उनमैं बालकां नै मारण का रिवाज कोन्या। लचीलापन सै। बालकां का ब्याह करवादें सैं। नफे बोल्या - फेर तो उनकै तो गोत की गोत मैं शादियां की ग्लेट-सी लागती होंगी। सरिता बोली - तेरे गाम के बाहमनां मैं अर बनिया मैं के हाल सै? तनै बेरा सै। बात का बतंगड़ मत बनाओ इस गोत के गोत मैं ब्याह नै अर इसनै अपवाद मानकै दूसरी कौमां की ढालां लचीलापन ल्याओ। बख्त की मांग तो याहे सै नफे सिंह बाकी तूं जानै अर थारे नेता जानैं। जनता की आवाज तो याहे सै जो मैं कहरी सूं। फेर थारी समझ मैं कोन्या आवै। नफे तेरी बुद्धि पर तरस आवै सै मनै।

सामाजिक न्याय


सामाजिक न्याय को परिभाषित करना मुश्किल काम सै। सामाजिक न्याय का मतलब सै अक समाज मैं सारे माणसां नै चाहे वे स्त्री हों या पुरुष हों, इस धर्म के हों या उस धर्म के हों, इस जाति के हों या उस जाति के हों - सबको समान रूप तै जीने का अर अपना विकास करने का मौका मिलना चाहिये। ऐसा तभी हो सकै सै जब समाज मैं वर्ग-भेद समाप्त हो, मनुष्य द्वारा मनुष्य का शोषण समाप्त हो। शायद 1935 मैं इस शब्द का इस्तेमाल करया गया जब संयुक्त राष्ट्र मैं संयुक्त राष्ट्र सामाजिक सुरक्षा अधिनियम पास करया गया। बेरोजगारी, बीमारी, शिक्षा, लैंगिक समानता, वृद्धावस्था के लिए बीमा आदि मुद्दे शामिल करे गये थे। 1938 मैं न्यूजीलैंड मैं प्रयोग हुआ तथा बृहद सामाजिक सुरक्षा पद्धति के विकास को राष्ट्र विकास मैं शामिल किया गया। इसकी अलग-अलग अवधारणाएं आज भी मौजूद सैं। दलितों, स्त्रियों, आदिवासियों, गरीब सवर्णों आदि को विभिन्न प्रकार के आरक्षण देकर उन्हें सामाजिक अन्याय से बचाया जा सकता है। लेकिन क्या या समझ सही सै? क्या वास्तव मैं सामाजिक न्याय की मांग पूरी नहीं हो सकदी जब तक वर्ग, वर्ण, जाति, लिंग, धर्म, सम्प्रदाय इत्यादि के आधार पर करे जाने वाले भेदभाव को समाप्त न किया जाए? सवाल यो भी सै अक के वर्तमान व्यवस्था को कायम रखते हुए लोगों को सामाजिक न्याय उपलब्ध करवाया जा सकै सै? क्या यो जरूरी नहीं अक वर्तमान समाज व्यवस्था को बदलकर बराबरी अर भाईचारे आली इसी न्यायपूर्ण समाज व्यवस्था कायम करी जावै जिसमैं किसी के द्वारा किसी का दमन और उत्पीड़न न हो? फेर सवाल उठै सै अक के यो सम्भव सै? जै हां तो क्यूकर? अन्याय का विरोध और न्याय की मांग असल मैं वोहे कर सकै सै जो या बात जानै सै अक न्याय के सै? सामाजिक न्याय असल मैं के सै इस बात को सही परिप्रेक्ष्य मैं समझना बहुत जरूरी सै। एक कान्ही यो सवाल देश की सभ्यता और संस्कृति से जुड़ा हुआ है तो दूसरी तरफ किसी देश की अर्थव्यवस्था और संवैधानिक व्यवस्था से भी गहन रूप से जुड़ता है। क्या दलितों को सवर्णों के विरुद्ध, पिछड़ों को अगड़ों के विरुद्ध, स्त्रियों को पुरुषों के विरुद्ध, एक धर्म सम्प्रदाय को दूसरे धर्म सम्प्रदाय के विरुद्ध लोगों को लड़ाकर किसी न्यायपूर्ण समाज व्यवस्था की स्थापना की जा सकती है? नहीं तो वर्तमान को सही-सही विश्लेषित करना बहुत जरूरी हो जाता है। आज का दौर समझना बहुत जरूरी है। वर्तमान में भूमंडलीकरण, उदारीकरण तथा निजीकरण की पूंजीवादी प्रक्रियाओं के चलते हमारे देश पर एक तरफ माओवाद का खतरा मंडरावण लागरया सै तो दूसरी तरफ धर्म अर संस्कृति के नाम पर सामाजिक न्याय की पुरानी व्यवस्थाओं को मजबूत बनाने वाली फासीवादी शक्तियों का प्रभाव बढ़ रहा है। इसके विरुद्ध एक स्वस्थ, प्रगतिशील, धर्मनिरपेक्ष तथा जनतांत्रिक राष्ट्रवाद को अपनाना हमारे लिए जरूरी हो गया है क्योंकि नवसाम्राज्यवादी और नवफासीवादी शक्तियों की मार अंततः उन्हीं लोगों पर पड़नी है जो सामाजिक अन्याय के शिकार हैं। मगर यही ताकतें धर्म, सम्प्रदाय, वर्ण, जाति, रंग, लिंग, नस्ल, भाषा अर क्षेत्र के आधार पर लोगां नै बांटण अर जनता नै एकजुट ना होवण देवण मैं कामयाब होरी सैं। इसी हालत मैं सामाजिक न्याय की खातर करे जाने आले संघर्ष का इसा कौन सा रूप हो सकै सै जो देश नै बाहरी गुलामी तै अर जनता नै भीतरी अन्याय तै बचा सकै? बड़ा अर जटिल सवाल सै। भारत मैं सामाजिक न्याय की बात करण आले बहोत से लोग वर्ग की बात कोन्या करते बल्कि वर्ण की बात करैं सैं। ये वर्ण व्यवस्था नै सामाजिक अन्याय का मूल कारण समझैं सैं। ये ऊंची जातियों के खिलाफ नीची जातियों की राजनीति की बात करैं सैं। यह तो विडम्बना ही है कि ऊंची जाति के लोग यह समझते हैं कि उन्हें दलित को नीचा समझने का हक सै। उनकी इस दुर्भावना को दूर करना बहुत जरूरी सै। क्यूकर? फेर मुश्किल जगह सै। मूल सवाल यो सै अक हमनै जातिवाद को दूर करना सै अक जारी रखना सै? जातिवादी राजनीति तै तो यो खत्म होवण तै रहया। इसनै खत्म करण की खातिर जाति के आधार पर नहीं हमनै वर्ग के आधार पर संगठित होना बहोत जरूरी सै। अनेक देशां का अनुभव बतावै सै अक जिब ताहिं गरीब किसान और खेत मजदूर मिलकर संघर्ष नहीं करते तब तक दोनूआं की दशाओं मैं मूलभूत परिवर्तन सम्भव नहीं है। कुछ लोग न्यों भी कहवैं सैं अक सामाजिक न्याय का नारा सामाजिक अन्याय नै जारी राखण की खातर दिया गया सै। समाज के जै वे लोग जिन-जिन के खिलाफ अन्याय होरया सै वे मिलकै लड़ैं तो सामाजिक न्याय का नारा अन्याय को बनाए रखने का काम नहीं करैगा। हरियाणा ज्ञान विज्ञान समिति द्वारा चलाया जा रहया समाज सुधार आन्दोलन नये नवजागरण के विचार से लैस होकर इस काम मैं जुटरया सै। समाज के सब तबकों खासकर आधारभूत तबकों को शामिल करके इस तरफ कदम बढ़ाये जा रहे हैं। आप भी साथ दें। ‘दूसरी दुनिया सम्भव सै’ का विचार आपके सहयोग तै आगै बढ़ सकै सै।

कट्टरपंथ का बोलबाला

कट्टरपंथ का बोलबाला
आजकल हिन्दू कट्टरपंथ अर मुस्लिम कट्टरपंथ अपने-अपने ढंग तै लोगां ताहिं पहोंचण लागरया सै अर बहोतै गैर वैज्ञानिक ढंग तै तथ्यां नै मरोड़-तरोड़ कै लोगां की भावनावां तै सोचे-समझे ढंग तै खिलवाड़ करया जाण लागरया सै। 1983 मैं बनी गोपाल सिंह की रिपोर्ट आज 2006 मैं भी प्रासंगिक लागै सै क्योंकि ये तथ्य आज बी कमोबेश उसे एसे सैं। खास बात या सै अक ये तथ्य खुद मैं बहोत चौंकावण आले सैं अर ‘तुष्टीकरण’ जिसे जुमल्यां का अर इसके मांह कै ढाये गये सवालां का जवाब बी इनके मांह कै अपने आप बोलता दिखाई दे सै। नमूने के तौर पै लिये गये जिल्यां में जेड़ै मुस्लिम आबादी 17.32 प्रतिशत सै, उसकी तुलना मैं ‘प्राथमिक’ स्कूल के स्तर पै या न्यों कहवै अक कक्षा एक तै आठमी कक्षा ताहिं मुसलमानां का पंजीकरण कुल पंजीकरण का 12.39 प्रतिशत सै। इसे ढाल एक तै पांचवीं तक शिक्षा अधूरी छोड़कै जावण आले मुसलमान विद्यार्थियां की दर अर सामान्य समुदायां की दर बराबरै सी थी। उत्तर प्रदेश के च्यार जिल्या - हमीरपुर, नैनीताल, रामपुर अर सहारनपुर मैं शिक्षा अधूरी छोड़ण आले सामान्य बालकां की दर 78 प्रतिशत थी अर मुसलमान बालकां की दर 90 प्रतिशत थी। उदाहरण के राज्यां मैं 11.28 प्रतिशत की मुसलमान जनसंख्या के मुकाबले मैं कक्षा 10 मैं शामिल हुए मुसलमान विद्यार्थी 4 प्रतिशत थे। माध्यमिक स्कूल स्तर अर्थात् कक्षा 9 तै 12 पै मुसलमान विद्यार्थियां का पंजीकरण उनकी संख्या 18.56 प्रतिशत की तुलना में 10.56 प्रतिशत था। उच्च माध्यमिक स्तर अर्थात् कक्षा 12 पर बोर्ड की परीक्षा मैं शामिल हुए मुसलमान विद्यार्थी कुल संख्या का 2.49 प्रतिशत थे।
सर्वेक्षित राज्यां मैं उनकी जनसंख्या 10.3 प्रतिशत तै यो बहोत थोड़ा था। सामान्य उत्तीर्णता प्रतिशत 60.76 की तुलना मैं इन परीक्षावां मैं उत्तीर्ण मुसलमान विद्यार्थियां का प्रतिशत 50.74 था। इसे ढालां एमबीबीएस के स्तर पै 8 राज्यां तै संबंधित 12 विश्वविद्यालयां तै प्राप्त सूचनावां तै मालूम पाटी अक इस परीक्षा में शामिल मुस्लिम विद्यार्थियां का प्रतिशत कुल विद्यार्थियां का 3.44 था जो उनकी जनसंख्या 9.55 प्रतिशत की तुलना मैं काफी कम था। इसे ढालां देखैं तो 1971 तै लेकै 1979 ताहिं आईपीएस की भर्ती मैं अर्थात् नौ साल मैं तै केवल पांच सालां मैं ए आईपीएस भर्ती मैं मुसलमानां का प्रतिनिधित्व था। उनकी 11.20 प्रतिशत जनसंख्या की तुलना मैं यो 2 प्रतिशत का आंकड़ा काफी अपर्याप्त औसत कहया जा सकै सै। और बी घणे ए आंकड़े इस रिपोर्ट मैं अलग-अलग क्षेत्रां के बारे मैं दिये गये सैं। आड़ै या बात बहोत जरूरी सै अक हम अपने विवेक अर तर्क का इस्तेमाल करकै ए किसे बात का आकलन करां ना कि भावनावां पै बहकै। हिन्दू-मुस्लिम के कृत्रिम बंटवारे म्हारे बीच मैं खड़े कर दिये गये इन धार्मिक कट्टरपंथियां द्वारा बरना कोए भी मनुष्य का बच्चा भाषा, धर्म, जाति, रंग अथवा धन के आधार पै किसे भी जाति अर कै धर्म तै जन्म तैए संबंध कोन्या राखता। वो केवल मनुष्य के बच्चे के रूप मैं ए पैदा होवै सै। बच्चों के मन मैं विचार जातपात के बड़े बडेरयां द्वारा अपने विश्व दृष्टिकोण के हिसाब तै भरे जावैं सैं। एक नये बच्चे नै जाट, ब्राह्मण, हरिजन कै पंजाबी, बंगाली, हिन्दू, ईसाई कह देना गल्त बात सै।
भाषावां का ज्ञान बी बालक अपने बड्यां धोरै ए सीखै सै। प्राकृतिक तौर पर तो वो मनुष्य का ए बालक होवै सै। एक ईसाई के बालक नै जै कोए पंजाबी हिन्दू गोद लेले पैदा होन्ते की साथ तो बड्डा हौके वा बालक पंजाबी हिन्दू बन ज्यागा। जै उस ताहिं पंजाब के पूर्वजां की कुर्बानियां के बारे मैं बताया जावै तो वो पंजाबी भाषा अर हिन्दू धर्म की रक्षा की खातर जीवन बलिदान करण नै तैयार हो ज्यागा जबकि उसके मां-बाप ईसाई थे अर उनकी भाषा अलग थी। सवाल यू सै अक म्हारी सामाजिक चेतना का विकास किसे ढाल का होसै अर क्यूकर होसै? हिन्दू कट्टरपंथ नै मुसलमानां के बारे मैं कुछ मिथ्या धारणाएं फैलाई ज्यूकर मुसलमान राजाओं नै हिन्दुआं का अपमान करण की खातर मंदिर तोड़े, भारत मैं इस्लाम का प्रचार तलवार के दम पै करया। ये च्यार-च्यार शादी करकै बीस-बीस बालक पैदा करैं सैं। ये बहोत खूंखार हों सैं। इस इस्लाम करकै ए दुनिया मैं आतंकवाद फैलण लागरया सै। इनमैं घणी सी सच्चाई कोन्या। फेर ये बात सुणकै मुस्लिम कट्टरपंथियां नै बी मौका पा ज्या सै मुसलमानां की भावना भड़कावण का। सोमनाथ का मंदिर तोड़ण मोहम्मद गजनवी गजना शहर तै आया था। राह मैं बहुत सारे हिन्दू मंदिर पड़े होंगे। उसनै ये सब मंदिर क्यों ना तोड़े? राह मैं बामियान की विशाल बुद्ध की मूर्तियां भी देखी होंगी, उनकै हाथ क्यों नहीं लाया? सोमनाथ मंदिर क्यों चुन्या? राह मैं मुल्तान की जामा मस्जिद भी टूटी थी दो मुसलमानां की लड़ाई मैं। एक गजनवी था। करीब 200 करोड़ के हीरे-जवाहरात लूटे सोमनाथ मंदिर मैं अर यों कहकै अक मुसलमान धर्म मैं मूर्ति पूजा को मान्यता नहीं अर मंदिर तोड़ दिया। जै इस्लाम इतना प्यारा था तो मस्जिद क्यों तोड़ी गजनवी नै? उसकी फौज मैं एक तिहाई हिन्दू क्यों थे? 12 सिपहसलारां मां तै 5 हिन्दू थे तिलक, सौंधी, हरजान, राणहिंद आदि मंदिर की लूट पाछै उड़े एक हिन्दू राजा की नियुक्ति करी गजनवी नै। क्यों अर कैसे की साथ जै आकलन करया जावै तो वो सही तसवीर खींच दे सै अक धार्मिक कट्टरवाद चाहे हिन्दू धर्म का सै अर चाहे मुस्लिम धर्म का सै या मानवता विरोधी सै। कोई धर्म हमनै माणस मारना नहीं सिखाता फेर बी सांप्रदायिक दंग्या मैं सबतै फालतू माणस मारे जावैं सैं। क्यों? सोचो मेरे बीरा आखिर या मारकाट क्यों?
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