सोमवार, 17 अक्टूबर 2016

बाजे भगत कड़ै गया ?

बाजे भगत कड़ै गया ?
सत्ते फत्ते नफे कविता सरिता अर ताई भरपाई फेर कट्ठे होगे शनिच्चर नै। सत्ते बोल्या - आज तो रात नै नांगलोई मैं रागनी कम्पीटीशन देख कै आया। फेर वे पहलम आले कम्पीटीशन कोन्या रहे। ईब तै लटके झटके, दो अर्थां आली बात, भद्दे अश्लील चुटकले अर भूंडी रागनी छागी इन कम्पीटीशनां पै। दूसरी बात या भी अक ईब पहलम आले गायक बी कोन्या रहे। फत्ते बोल्या - हां भाई राजकिशन गुमान - पुरिया का के मुकाबला था। कविता बोली - इन रागनियां मैं अर चुटकल्यां मैं महिला भी बहोत अपमानित करी जीवैं सैं। पूर्णमल के किस्से मैं एक 16 साल की लड़की का ब्याह 60 साल के बुढ़े तै करवा कै लेखक चाहवै सै अक वा पतिव्रता का फर्ज निभावै। पूर्णमल की वा लड़की रिश्ते मैं मौसी लागै सै। उस लड़की का झुकाव पूर्णमल की तरफ हो जाता है। इस सारे किस्से मैं पुरुषवादी पितृ सत्तात्मक परिवार के ढांचे की नज़र काम करै सै। उस लड़की की तरफ खड़या होके पूरा किस्सा देखण की जहमत कोन्या ठाई लेखक नै। दूसरे हिसाब तै न्यौं बी कह्या जा सकै सै अक लेखक का इस नज़र तै किस्सा बणावण का ब्योंतै कोन्या था। सविता बोली - कविता नै सही बात कही सै। सत्ते बोल्या - सुणण मैं आवै सै अक एक बै नांगलोई मैं बाजे भगत अर लखमी दादा मैं खींचगी। एक अंग्रेज इस प्रोग्राम का मुख्य अतिथि था। बाजे भगत छाग्या उड़ै। जिब ईनाम पहला बाजे ताहिं मिल्या तो बोल्या - ये सम्मान तो दादा लखमी नै ऐ फाब्बै सै। न्यौं कैहकै साफा अर डोगा दादा लखमी के पाहयां मैं धर दिया था। कविता बोली - एकाध बात तो बाजे भगत की सुणाद्यो कोएसा। सरिता बोली - शकुंतला दुष्यंत का किस्सा भी तो बाजे भगत नै रच्या था? ताई भरपाई बोली - सही बात सै उसनै ए लिख्या था। मेरी सास गाया करती एक गीत उस किस्से का। कविता बोली - ताई सुणा दे तेरे याद होगा।
ताई भरपाई सुणाती है - वह बताती है कि राजा दुष्यंत से शकंुतला कहती है कि महाराज बगैर माता-पिता की आज्ञा के मैं आपसे शादी कर रही हूं। आप मुझे धोखा तो नहीं दोगे? धोखा मत करना। उस मौके पर शकुंतला क्या जवाब देती है भला - पिया कर कै ब्याह की रीत, भूल मत जाइये हो। कदे तूं चूकै ना पढ़ गुणकै, मैं भी पछताऊं सिर धुन कै, कितै सुण कै बेरीत के गीत टूहल मत जाइये हो। अपने ब्याहे वर कै, नारी रह सहारे नर कै, पिया जी करकै अपनी जीत हूल मत जाइये हो। चम्पा चमेली चंदन के पोरे, हुस्न गुलशन यौवन मैं होरे, तूं भौंरे सुगंध के मीत, छोड़ फूल मत जाइये हो। बाजे भगत वाणी की, प्यास प्रेम रूप पाणी की, मेरै लाकै राणी की फीत, मिला धूल मत जाइये हो। सुणकै सारे टूहलगे। फत्ते बोल्या - लखमी की सुणल्यां, मांगे राम की सुणल्यां, मेहर सिंह की सुणल्यां फेर बाजे की बात तो ये आज पहली बार सुणीं सैं। बाजे तो घणा बढ़िया सांगी था। फेर बेरा ना लोगां नै क्यूं भुला दिया? ताई भरपाई बोली - म्हारे गाम का हरिजनां आला कुआं बी बाजे भगत नै सांग करकै पीस्से कट्ठे करकै बनवाया था। कविता बोली - सुणा है बाजे भगत की आवाज, लय, सुर, रचना, विषयवस्तु सब बहुत बढ़िया थे तो फेर आज वो गुमनाम क्यों होग्या? के कला के पारखी खतम होगे हरियाणा मां तै? भला हो रामफल चहल का उसनै हिम्मत करकै बाजे भगत की बात छापी तो सही।
सरिता बोली - फेर उसकी बातां नै ये मैना कैसेट आले भरदे तो कोन्या। देखी सै बाज़ार मैं बाजे भगत की कोए कैसेट? सारे बोले - ना देखी तो कोन्या। कविता बोली - तो फेर हरियाणा आले इतने अहसान फरामोश क्यूंकर होगे अक बाजे भगत सिंह जिसे ऊंचे कलाकार नै भूलगे? नफे सिंह बोल्या - हरियाणा आल्यां की ना बूझै। इनकी याददाश्त बहोतै कमज़ोर सै। ये अपने मां-बाप नै भुलदे वार कोन्या लावैं। बाजे भगत तो किस खेत की मूली सै। कविता बोली - नफे तनै तो इसीए बात भाया करैं। सारे माणस हरियाणा के इसे थोड़े ए सैं। रामफल चहल भी तो सै जिसनै बाजे भगत पै पूरी किताब छाप दी। उसतै पहलम एक डाक्टर सै मेडिकल मैं उसने भी बाजे पै कुछ छाप्या बताया। बाकी इन पाले, रणबीर अर बाली बरग्यां के कान खींचने चाहिएं जनता नै अक ये बाजे भगत की बात क्यूं ना सुणाते। सत्ते - ये कैहदे सैं अक हम के करां, या जनता ए कोन्या सुणकै राज्जी। कविता बोली - जनता तै हम हाथ जोड़ कै प्रार्थना करलें सैं अक वे बाजे नै न्यों ना मारैं। मांग करैं अक गायक उसकी बात बी सुणावैं। ताई भरपाई बोली - सांगी तो हरदेवा, धनपत अर चंद्र बादी बी हुए सैं अपने बख्तां के। मेरे तो मन मैं इसी बात आवै सै अक दो दो सांग इन सारे सांगियां के कोए एक किताब मैं छाप दे तो दो काम हो ज्यांगे। पहला तो या अक सारे सांगियां की बात एक जागां कट्ठी होज्यांगी। दूसरी बात या सै अक जनता बी सारे सांगियां के बारे मैं जानकारी हासिल कर लेगी। नफे बोल्या - इसा दाणी कौन सै जो इसी किताब छापैगा? सविता बोली - हरियाणा साहित्य एकैडमी कै हरियाणवी साहित्य एकैडमी नै करना चाहिए यू काम तो। कविता बोली - बड़ी सही बात कही सविता नै। नफे फेर बोल्या - कूण-कूण सुणै सै? कविता बोली - 50 पीस्से का एक पोस्टकार्ड आपां नै हरियाणा साहित्य एकैडमी, चंडीगढ़ के नाम पै गेरना चाहिए। जिब ये एमएलए दौरे पै आवैं तो लोगों नै उन ताहिं बी तो कहनी चाहिए ये बात। सारे उठ लिए अर बोले - बाजे भगत तो पाले धोरै ज़रूर गुवाणा सै।
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