जिब कोए माणस बाजार मैं जावै सै तो उसनै अपनी जेब का बेरा हो सै अर उसके हिसाब तै वो चीज खरीद ल्यावै। फेर मरीज के इलाज अर दवाइयां के बारे मैं यू नुस्खा काम कोनी आता। इस मामले मैं डा. कुदरतन एक बिचौलिये की भूमिका मैं सै। मरीज वाहे दवाई खरीदैगा जो डाक्टर उसनै लिख कै देवैगा। मरीज उसे कंपनी का एप्लाइन्स (दिल के वाल्व, कुल्हे, आंख के लैंस, हरनिया मैस, सर्जर खातर स्टेपलर) खरीदैगा जिस कंपनी के बारे मैं डाक्टर मरीज नै बतावैगा। पहलम के बख्ता मैं डाक्टर अर मरीज के बीच के बड़े मानवीय संबंध हुआ करदे। फेर आज इसा लागै सै जणों रक्षक भक्षक बणगे हों। वरना चाहे कितना ए पात्थर दिल डाक्टर हो वह लड़की सै अक लड़का सै पेट मैं, या बात बतावण की हिमाकत क्यूकर कर सकै सै? उसनै बेरा सै अक इसका मतलब सीधा-सा सै अक लड़की सै तो सफाई पक्की। अबोरसन करकै लड़की की घोट कै हत्या करण आले डाक्टर के बारे मैं तो के कह्या जा सकै सै? इन मरीजां अर डाक्टरां के बीच गिरते मानवीय मूल्यां का कारण या आज की बाजार व्यवस्था सै जिसके चालते बहोत अविश्वास अर अमानवीयता पैदा हुई सै। इन एप्लाइंसिज की व दवाइयां की बाजार मैं कीमत बहोत न्यारी-न्यारी सैं। जिब डाक्टर मरीज नै या बात बतावै सै अक यो लैंस पांच सौ रुपइये का देसी सै पर बाजार मैं देसी अर बदेशी कंपनियां के और भी लैंस सैं जिनकी कीमत सात अर दस हजार ताहिं की सैं तो मरीज नै यो तय कर पाना बहोत मुश्किल होज्या सै अक वो कुणसा लैंस लगवावै? हरनिया की मैस 700 से ले कै 2200 ताहिं की आवै सै तो कुणसी लुवावै। एक सर्जन नै गरीब मरीजां खातर माच्छरदानी की मैस दो रुपइये तै पांच रुपइये ताही की बणा दी तो भारत के सारे डाक्टरां मैं तहलका माचग्या अक या सर्जरी अनएथीकल सै। कहा यही जाता है कि हमनै तो मरीज ताहिं सारी आप्सन्ज दे दी। ईब मरीज जानै उसका काम जानै। असल मैं उसकी आप्सन्ज बंद कर दी जावैं सैं इस तरीके तै। किस-किस के वारे के न्यारे होवैं सैं अर क्यूकर होवैं सैं यू सारी दुनिया नै बेरा सै। दवाई का मामला लेवैं तो अस्पताल मैं एक दवाई जै 15 रुपइये का टीका सप्लाई हो सै तो बाजार मैं वोहे टीका 41 रुपइये का मिलै मरीज नै। अस्पताल मैं इन कीमतां पै मरीज नै दवाई कोन्या मिलती, क्यों? इस सवाल का जवाब लोगों नै टोहवणा पड़ैगा।
इसे तरियां ओपन हर्ट सर्जरी का मामला सै। इसमैं इस्तेमाल होवण आले वाल्व बहोत महंगे सैं। बड़ी मुश्किल तै हरियाणा के लोगां नै हरियाणा के इकलौते पीजीआईएमएस मैं या सुविधा मिली सै। मरीजों को वाल्वां नै ले कै अर दूसरे सामान नै ले कै घणे झंझट झेलने पड़ैं सैं खासकर गरीब मरीजां नै। जिन धोरै पीस्से का ब्योंत सै वे तो एस्कार्ट मैं गये अर इलाज करवा आये। गरीब क्यूकर जावै उड़ै? असल मैं मुफ्त इलाज नहीं सै जनता पहलम टैक्स अर रेवैन्यू के रूप मैं अपने इलाज की कीमत अदा कर दे सै। जनता का ओ हिस्सा जिस धोरै सबतै फालतू पीस्सा सै वो सबतै कम टैक्स अदा करै सै। फेर असल बात यू ‘मुफ्त इलाज’ बी कितना मुफ्त सै अर इसकी क्वालिटी किसी सै या बी एक बात सै।
आंकड़े या बात तो बतावैं सैं अक 26 प्रतिशत लोग गरीबी की रेखा तै नीचे जीवैं सैं इसका मतलब 54 लाख लोग हरियाणा मैं इसे सैं जो अपने इलाज पै एक बी पीस्सा खरच कोन्या कर सकदे। अर इतने ए और बी सैं जिनकी हालत बी घणी ए माड़ी सै तो हरियाणा की इस आबादी के दिलां के आपरेशन क्यूकर होवैं? आज के हिसाब तै तो रामदेव की शरण मैं जावण तै न्यारा इन धोरै कोए राह नहीं दीखता। फेर उसके शिविरां मैं जाकै ट्रेनिंग लेवण की फीस देवण का ब्यौंत बी कोन्या इनका। फेर तो ‘किस्मत’ मैं न्योंए मरना लिख राख्या था कह कै अर अपना आगला जनम सुधारैं? के करैं? इसका सीधा जवाब कइयां धोरै पाज्यागा। न्यों कर ल्यो अर न्यों कर ल्यो। फेर आज ताहिं तो कोए पारदर्शी अर पुख्ता इलाज का तरीका टोह नहीं पाये हम। इसपै और ज्यादा सोच-विचार करण की जरूरत सै अक इनके दिलां के घट्टे क्यूकर बंद होवैं? इनके खराब वाल्व क्यूंकर बदल जावैं। कई लोग कहन्ते पाज्यांगे अक सरकार इनके इलाज खातर इनका सामूहिक बीमा करवादे। कोए किमै बात कहदे सै। असल बात या सै अक सबतै फालतू बाजार व्यवस्था आले देशां मैं तो सेहत पै सरकारी खर्च हो सै 70 तै 80 प्रतिशत अर म्हारे बरगे देश मैं जिसके संविधान मैं समाजवादी व्यवस्था की बी बात करी गई सै उसमैं सेहत पै सरकारी खर्च हो 22 प्रतिशत तो ये बीपीएल आले क्यूकर इलाज करवा सकैं सैं। आई किमै समझ मैं अक गई सिर पर कै? मैं तो पहलमै कहूं था अक इतना आसान काम नहीं सै यू। इसपै सोच्यो अर खूब सोच्यो। किमै ना किमै रास्ता तो टोहना ए पड़ैगा। आज नहीं तो काल सही, काल नहीं तो परसों सही अर परसों नहीं तो तरसों सही।
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