किसपै यकीन करां
धर्मबीर अखबार पढ़ण लागरया था। बेचैन था। पहले पेज पै तीन खबर पढ़ी उसनै। पहली खबर थी अक फलाणे गाम मैं फलाणे के घरां फलाणे नै फलाणे की छोरी गेल्यां जोर-जबरदस्ती करण की कोशिश करी। दूसरी खबर थी अक फलाणे गाम मैं फलाणे माणस नै फलाणे की बहू गेल्यां फलाणें के खेतां मैं काला मुंह कर्या। तीसरी खबर थी अक फलाणे शहर मैं फलाणे मोहल्ले की 10 साल की बच्ची गेल्यां बलात्कार हुया। फेर दो खबर थी अक फलाणे गाम मैं 14 लड़की तै असम तै बिहार तै, मध्यप्रदेश तै खरीद कै ल्या लिये अर पंद्रहमी काल ल्याये सैं खरीद कै। कहवण नै कहवैं सैं अक ब्याह कै ल्याये सां। इतणी वार मैं कर्मबीर आग्या अर औ राम राम करकै धर्मबीर तै बोल्या - सुणा के खबर सैं धर्मबीर। धर्मबीर नै कर्मबीर ताहिं अखबार का पहलड़ा पेज पकड़ा दिया। वे सारी खबर कर्मबीर पढ़-पढ़ा कै बोल्या - भाई कोए चाहे बुरा मानो चाहे भला मानो फेर बलात्कार घणे होवण के दो कारण सैं। धर्मबीर का ध्यान उस कान्ही गया। कर्मबीर बोल्या - एक तो ये लुगाई नौकरी करण के चक्करां मैं जिब तै बाहर जावण लाग्गी सैं जिब तैं बलात्कार फालतू होगे। दूसरा इस फैशन नै म्हारे देश का टिब्बा कर दिया। जिब तै ये छोरी अर बहू फैशन करकै बाहर लिकड़ण लाग्गी सैं, ये जीन पहर कै सड़कां पै घुम्मण लाग्गी सैं जिबै तै ये बलात्कार फालतू होगे। ओर बी दो-तीन लड़धू बैठे थे वे भी छुटदे की साथ बोले - कर्मबीर कति सोला आने सही बात कैहरया सै। आज काल की छोरी काबू ए मैं कोन्या रही। इनका घणा पां लिकड़ग्या, ज्याहें तैं ये इस ढाल की घटना फालतू होवण लाग्गी। एक जन्या बोल्या - तो के इलाज हो इसका। कर्मबीर बोल्या - इलाज तो जिबै होवै जिब ये बहू अर छोरी घर तै बाहर पां नहीं धरैं। इतनी बार मैं ज्ञान-विज्ञान आला राजेश बी आग्या अर ओ बी उनकी बात सुणण लागग्या। धर्मबीर धौरे रह्या कोन्या गया अर बोल्या - रै कर्मबीर भाई तेरी बात किमैं जंची कोन्या। कर्मबीर खावण सी नै आया - क्यूं सोचण मैं के दिक्कत सै तेरै। या सारी दुनियां तो न्योंए रुक्के मारै सै अब इन बीर-बानियां का घर तै बाहर पां लिकड़ग्या ज्यां तै बलात्कार बधगे। धर्मबीर बोल्या - कर्मबीर भाई घणा ठाड्डू मत ना बोलै। तनै अपनी बात पूरी कैह ली अर हमनै शांति तै तेरी बात सुनी। ईब तूं औरां की बात बी आराम तै सुण।
राजेश बोल्या - बात सही सै भाई। हां धर्मबीर बता तूं अपणी बात बता। धर्मबीर बोल्या - आज के अखबार मैं पांच बलात्कारां की कै छेड़खानी की खबर छपी सैं। इनमैं तै दो तै दो गामां मैं घरां धिंगताणै बड़कै करी औड़ घटना सैं, दो खेतां मैं हुई औड़ घटना सैं अर एक दस साल की बच्ची गेल्यां हुई औड़ घटना सै। फेर इस अखबार मैं छपी ये पांच खबर तो इसकी बातां की ताईद कोन्या करती। इन पांचों बलात्कारां का ना तो फैशन गेल्यां कोए संबंध अर ना बाहर जा कै नौकरी करण तै कोए मतलब। अर ये जितने रलधू आड़ै बैठे सैं ये भी कर्मबीर की हां मैं हां मिलावण लागरे सैं। एक जन्या बोल्या - हमनै के बेरा म्हारे सोनीपत के कालेज का म्हारा टीचर सै ओ कहै था हाथ कंगन नै आरसी के अर पढ़े-लिखे नै फारसी के। उसकी छोड़ सुण एक दिन की पांच खबरां मैं तो ये बात गलत पाई गई सैं फेर आपां एक हफ्ते की अखबारां की रिपोर्ट कट्ठी करकै देखल्यां, उनमैं भी, मेरे आली बात सही पावैगी अक बलात्कारां का जीन के फैशन तै अर लुगाई के नौकरी पै जावण तै ताल्लुक नहीं सै। कर्मबीर फेर गुस्से से मैं आकै बोल्या - मैं तो फेर बी कहूं सूं अक जै लुगाई घर तै बाहर नौकरी खात्तर नहीं जात्ती तो उसपै बलात्कार नहीं होत्ते। अर इस फैशन नै बी जलती मैं घी का काम करया सै। धर्मबीर बोल्या - कर्मबीर भाई तूं ठाड्डा सै, तेरा रुतबा सै, तूं पीस्से आला सै ज्यां तै ये रलधू तो बात तो तेरी ए मानैंगे फेर इसका मतलब यो कति नहीं सै अक तेरी ए बात साच्ची सै। साच्ची बात तो सै मेरी फेर तूं मान चाहे मत मान।
एक दिन मनै अखबार मैं या बी पढी थी अक लड़कियां अर बच्चियां गेल्यां बलात्कार उनके पड़ौसी, कै जानकार, कै रिश्तेदार करणिया फालतू सैं। अर उस अखबार मैं न्यों बी लिख राखी थी अक घर की चारदीवारी भीतर भी महिलावां पै खूबै अत्याचार होवैं सैं। अर ये बलात्कार की घटना बी घर-परिवारां मैं घाट ना होत्ती। कर्मबीर जो बात कहवै सै ना अक बीरबानी नै तो घर मैं ए रैहणा चाहिए बाहर नौकरी पै नहीं जाणा चाहिए तो महिला अपने घर-परिवार मैं भी सुरक्षित कोन्या। खबरां के हिसाब तै दो महिलावां गेल्यां तो उनके घर मैं ए बलात्कार हुए। इस सारे मामले की जड़ घणी डूंघी सै। यू पुरुषवादी समाज मैं औरतां नै भोग की चीज समझण का मामला सै। औरत नै घर की चारदीवारी मैं बंद करकै बात बणैगी इसा मनै तो दीखदा कोन्या। इस तरियां ड्रेस कोड लाये का बी कोए फर्क पड़ेगा मनै तो कोन्या लागता। बाकी कर्मबीर जै औरतां नै फेर बी घर मैं कैद करकै राखणा चाहवै सै तो इसकी मर्जी। बलात्कार का ताल्लुक बाहर अर भीतर तै नहीं सै कई और बातां तै सै। औरत सुरक्षित तो कितै बी कोन्या। क्यूं? इसका जवाब चाहिए। कर्मबीर बोल्या - इसका जवाब कूण दैवैगा? राजेश बोल्या - कूण के देवैगा। के रामजी आवैगा जवाब देवण। उसनै प्रसाद चखण तै कड़े फुरसत सै इसी बातां पै विचार करण ताहिं। हमनै खुद बैठकै इन सब बातां पै विचार करना पड़ैगा। अब आखिर हम करण के लागो सां? छोरी का पेट मैं कत्ल करते हम कति नहीं हिचकदे। हम हत्यारे सां या बात मानण नै तैयार कोन्या। इसे ढाल हम औरत नै बराबर का इनसान मानण नै तैयार कोन्या। उसनै उसके नाम तै पुकारण नै तैयार कोन्या। कर्मबीर बोल्या - बात नै पलटै मत ना। राजेश बोल्या - यू एकला बलात्कार का मामला कोन्या, यू औरत का समाज में के स्थान सै इस गेल्यां बी जुड्या मामला है। कर्मबीर उठता-उठता बोल्या - कितनी ए बात करल्यो फेर बात सही वाहे सै जो मनै कही थी। इतनी कैहकै कर्मबीर चाल पड्या। राजेश अर धर्मबीर उसनै जात्ते नै देखते रहे।
राजेश बोल्या - धर्मबीर घबरावै ना। म्हारी बात सही सै। कर्मबीर बरगे फांचर ठोक नहीं मानते तो कोए बात ना बाकी बहोत सैं जो ईब इन बातां नै समझण लागे सैं।
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