उच्च शिक्षण संस्थानां मैं पिछड़यां की खातर केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री अर्जुन संह की आरक्षण की घोषणा नै देश भर मैं तूफान सा ल्या दिया। यो तूफान समझ मैं आवण आली बात तो सै फेर इसके करकै सामाजिक वैमनस्य अर विभेद की जो परतें खुली सैं उनतै भविष्य की एक डरावनी अर भयानक तसवीर तो साहमी दिखाई दी सै। सवर्णां की ये अभिव्यक्तियां भारत के समाज के संघटन के प्रति घणी चिंता पैदा करण आली सैं। मेरे हिसाब तैं ये आण आले दिनां मैं के होगा भारत मैं उसका ट्रेलर तो जरूर सैं। या भी बात साफ होगी अक एक विभेदपरक सामाजिक संरचना मैं वंचितों नै आगै ल्यावण की कोए भी कार्यवाही निरापद नहीं हो सकती। जिननै ईब ताहिं इस समाज पै अपणा कब्जा जमा कै राख्या सै उनके पेट मैं दरद तो जरूर होवैगा। वर्ण व्यवस्था पै जिस हिन्दू समाज की नींव हो तो म्हारे बरगे तथाकथित ऊंची जाति के लोग इस आरक्षण नै क्यूकर गले तै नीचै तार सकैं सैं? मेरे हिसाब तै हम इन्हीं दलितां की वंचितां की मेहनत की कीचड़ मैं उगे औड़ कमल सां। देश की आबादी की 18 प्रतिशत ऊंची जातियां का आज भी 85 प्रतिशत सरकारी सेवावां पै कब्जा सै अर वे देश की 90 प्रतिशत संपत्ति की स्वामी सैं।
शहीदे आजम भगत सिंह नै तो फांसी तै पहलम जेल की मेहतरानी के हाथ की रोटी खावण की इच्छा जाहिर करी थी। उसका कहना था अक मेरी मां नै तो बचपन मैं मेरी गंदगी साफ करी थी परंतु या तो मेरे बड़े होवण पै भी मेरी गंदगी साफ करती रही सै इस करकै इसका दरजा मेरी मां तै भी ऊंचा सै। काश! हम भगत सिंह तै कुछ सीख ले पान्ते। इसे करकै निश्चित रूप तै इस प्रक्रिया मैं सामाजिक अन्तः संघर्ष अर द्वंद्व तो उभरैंगे। फेर बौद्धिक अर आधुनिक कहे जावण आले सवर्ण तबके की तरफ तै जिसी प्रतिक्रियाएं आवण लागरी सैं उनतै इसा लागै सै अक यथास्थिति नै तोड़ण की माड़ी सी कोशिश भी बहोत घणी बिचलनकारी सै। इस प्रसंग नै वीपी सिंह द्वारा मंडल कमीशन नै लागू करण के दस साल पहलम के उस बख्त की बहस फेर ताजा कर दी। इसे करकै इसके विरोधी इसनै मंडल-दो का भी नाम देवैं सैं। कई नए सवाल बी खड़े करे सैं। इन बहसां मैं प्रतिभा, योग्यता अर स्तर नै लेकै उठे कुछ बेमानी सवाल सैं जिनके पाछै कोए वैज्ञानिक तर्क नहीं सै। खास बात या सै अक ये सवाल और घणे जोर शोर तै ठाये जावण लागरे सैं। कोए बूझै रामायण किसनै लिखी? महाभारत किसनै लिखी? कबीर कौण था, रैदास कौन था?
एक शिकायत या बी करी जा सै अक सरकार नै प्रारंभिक शिक्षा का स्तर क्यूं नहीं सुधार्या? कितना बढ़िया होन्ता जै या शिकायत पूरे दमखंम की साथ दस-बीस साल पहलम ठाई जान्ती। न्यौ बी कहवैंगे अक ईब छुआछूत कड़ै सै? तो पूनम अर उसका पति इन खाप पंचातियां तै क्यों ल्हुकते हांडैं सैं? दस एमबीबीएस करैं औड़ सवर्ण डाक्टरनी 10 दलित डाक्टरां तै ब्याह तो करकै दिखावैं जै छुआछूत खत्म होगी सै तो। फेर न्यों कहवैं सैं अक आरक्षण आले घटिया डाक्टर बणैंगे। कोए बूझणिया हो इम्तिहान तो सार्यां खातर एकसा हो सै। इम्तिहान के नंबरां मैं आरक्षण कोन्या। तो जै घटिया डाक्टर कोए बनै सै तो वो तै इम्तिहान लेवणियां का कसूर हुया। बाकी इसमैं कोए शक नहीं अक सामाजिक न्याय का मामला गंभीर सै। बाबू जगजीवन राम नै एक मूर्ति का उद्घाटन कर्या था तो बाद मैं वा गंगा जल तै धोकै पवित्र करी गई थी। क्रीमी लेयर की बी बात खूबै आई सै। दलित के आरक्षण तै जो दो च्यार परसैंट लोग आये सैं वे भी जाते रहवैंगे। पिछड़ा वर्ग मैं या क्रीमी लेयर की बात थोड़ी बहोत सोची जा सकै सै। सवर्णां मैं कमजोर तबक्यां खातर बी आरक्षण की बात सोची जानी चाहिए। प्राइवेट कालेजां मैं अर प्राइवेट सेक्टर मैं बी आरक्षण की बात सोचनी चाहिये। पब्लिक सेक्टर मैं नौकरी बचीए कोन्या। एक बै एक डाक्टर अर एक इंजीनियर एक बस मैं सफर कैरैं थे। एक सीट पै बैठे थे। डाक्टर बोल्या यू शीशा बंद करदे मेरै जुखाम होर्या सै। इंजीनियर बोल्या - मैं तो खुल्या राखूंगा। मनै गर्मी लागै सै। दोनूं झगड़ पड़े। कंडक्टर आया अर बूझ्या के बात क्यूं झगड़ो सो? डाक्टर बोल्या - शीशे पै रोल्ला सै। यू कहवै सै खुल्या राख मैं कहूं सूं बंद करदे। तो कंडक्टर बोल्या - पहलम न्यों तो देखल्यो शीशा सै बी अक नहीं। शीशा कोन्या इस खिड़की मैं। कड़ै सैं नौकरी?
सौ का जोड़ यो सै अक केरल नै विधानसभा मैं एक बिल पास कर्या सै इस आरक्षण नै ले कै उस पै गौर कर्या जाना चाहिए। बख्त की नजाकत समझणा बहोत जरूरी सै।
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