सोमवार, 17 अक्टूबर 2016

लत्तयां मैं आग


सत्ते, फते, नफे, सविता, सरिता, कविता अर ताई भरपाई फेर कट्ठे होगे शनिच्चर नै। फते बोल्या - सत्ते कित जारया था, कई दिन मैं दिख्या? सत्ते बोल्या - मेरे मामा का छोरा सै ना ओ जय प्रकाश, उसकी गेल्यां गया था। एक गाम के एक घर मैं कई म्हिने तै लत्तयां मैं आग लागै थी। उननै सारे सकपके करकै देख लिए थे फेर किसे बी स्याणे कै बात काबू कोन्या आई। कविता बोली - तो जयप्रकाश नै भेद पाड़ दिया के आग लागण का? सत्ते बोल्या - ओ तो बड़ी-बड़ी बातां का भेद पाड़ दे सै। सविता बोली - तो के साच्चे ए उसनै बेरा ला लिया अक लत्यां मैं आग क्यूकर लागै सै? सत्ते बोल्या - थारै यकीन नहीं आता तो सारा किस्सा सुणल्यो। एक अफसर धोरै जयप्रकाश का आणा-जाणा था कई बै वे इस ढाल के सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्यां पै एकाध घंटा बातचीत कर लिया करदे। अंध-विश्वासी थे, फेर जयप्रकाश जिब इसे केसां के बारे मैं बात करदा तो सोच-विचार करण नै मजबूर बी हो जाया करदे। उनकी पत्नी टीचर सै। कई बार वा बी बैठ कै बात सुणन लाग जाया करदी। उसकी बदली होगी। एक दिन उसे अधिकारी का फोन आया अर बोल्या - आड़ै एक घर मैं आग लागै सै। पेटी मैं धरे ओड़ लत्ते अर खूंटी पै टंगे औड़ लत्यां मैं आग लागज्या सै। मैंने खुद भी जांच-पड़ताल करकै देख ली, फेर बात कोन्या काबू आई। थाम अपनी पूरी टीम लेकै आज्याओ। भाड़ा हम दे देंगे। जय प्रकाश हर तीसरे दिन उड़ै गये तो मैं भी उनकी गेल्यां ए था। उड़ै वो अधिकारी भी था अर दो-तीन पुलिस आले बी मौजूद थे। जयप्रकाश नै उसतै उस केस पै लाम्बी बातचीत करी। उस पाछै पूरे घर का जायजा लिया। कई जले औड़ कपड़े बी देखे। कोए कपड़ा आधा जलरया था तो कोए पूरा का पूरा। जयप्रकाश नै पूरा परिवार इकट्ठा बिठा लिया। उस घर मैं मां-बाप, उनके तीन लड़के, तीन बहू अर पोते-पोतियां थीं। एक छोरा फौज मैं नौकरी पै था अर दो छोरे खेती का काम करैं थे। काम ठीक-ठ्याक था। 10 एकड़ जमीन थी। ट्रेक्टर बी था। 14-15 भैंस थी। दो भैंस दूध दे रही थी। उनके हिसाब तै घर मैं किसे चीज की कोए कमी नहीं थी। पड़ौसियों के घर मैं कोए खास आणा-जाणा नहीं था। एक अलग तै बैठक थी, उड़ै अकसर दोचार माणस बैठे रहया करदे। जयप्रकाश बोल्या - घर के एक-एक सदस्य तै अलग-अलग बात करना चाहूं सूं अकेले मैं। सारे बोले - ठीक सै। जयप्रकाश नै बारी-बारी तै एक-एक की गेल्यां बात करनी शुरू करी। जब ओ एक बहू तै बात करण लागरया था भीतर तो खूंटी पै टंगी हुई एक सलवार मैं आग लाग गी। उसनै बाहर आकै देख्या। उस कपड़े तै आवण आली गंध की जांच करी अर उसकै कुछ समझ मै बी आई बात। जिब फौजी की पत्नी का नंबर आया तो उसनै भीतर जावण तै मना कर दिया। पूरे परिवार नै उस ताहिं समझाया अक भीतर जावण मैं हर्ज कैसे? वा बोली - मैं नहीं जाऊं चाहे कुछ भी होज्या। फेर पूरे परिवार नै दबाव बनाया तो वा गई भीतर। भीतर जातै उसनै जयप्रकाश पै गुस्सा होकै कहया - कहो क्या कहना है। जयप्रकाश नै कहया - बैठ जाओ और आराम से बात करो। आप तो मुझे ऐसे धमका रही हैं जैसे मैंने ही आपका कुछ बिगाड़या हो। जो आप चाहती हैं उसमैं बाधा तो आपका परिवार डाल रहा है। आप अपना ही नुकसान कर रही हो। आपने अभी जो सूट जलाया है, 200-400 रुपये का नुकसान किया है। वह एकदम बोली - इसका मतलब आग मैं लगाती हूं। मैं अपना नुकसान क्यों करूंगी? उसने कहा - यह तो मैं जानता हूं कि आग आप लगाती हैं और क्यों लगाती हैं। फेर मैं तेरे मुंह तै सुनना चाहूं सूं। तेरी पूरी मदद करूंगा अर किसे नै बताऊं बी कोन्या। फेर बता तो सही वा बोली - मेरी मदद करनी सै तो मनै करवाद्यो न्यारी। उसने कहा - तुम न्यारी होना चाहती हो? वा बोली - हां। मैं बीए तक पढ़ी हूं और कोई नहीं इतना पढ़ा-लिखा। मेरी दोनों जेठानी अनपढ़, जेठ आठ पास अर पति 10 पास। सबमै छोटी होवण करके घरका सारा काम मनै करना पड़ै सै। मेरे बाबू ने कहया भी था अक मेरी छोरी नै पढ़ाई का काम करया सै, और नहीं। जिब तो फौजी के घरके न्यों बोले अक या तो फौजी की गेल्यां ए रहवैगी। फेर एक दिन बी उसकी गेल्यां कोन्या भेज्या। सारी तनखा फौजी अपनी मां नै दे दे सै। मेरे ताहिं एक बी पीस्सा कोन्या दिया। मैं पीहर चली गई और कहा कि जब तक न्यारी नहीं करोगे मैं नहीं आऊं। ये बोले - मेरी बाहण की शादी हो लेण दे फेर न्यारे हो ज्यांगे। 8 म्हिने हो लिए शादी नै।
इब आप ही बताओ मैं ज्यादा पढ़ी लिखी, इन दोनों से सुंदर भी मैं, इन दोनों से ज्यादा दहेज ल्याई, मेरा पति बी नौकरी करै और काम करूं मैं? इनका नौकरानी की ढालां ज्यूकर ये मेरे ऊपर अफसर लागरे हों। जयप्रकाश नै तसल्ली दी अक न्यारी करवाद्यांगे। उसनै दोस्त अधिकारी तै बात करी। उस बहू के सुसरे को अंदर बुलाया अर सारी बात बताई। सुसरे नै कहया - सारा काम या बहू ए करै सै के? उसको कहा - फेर बहू को कुछ नहीं कहना सै। जै कुछ कहया तै वा कुछ बी सोच सकै सै। न्यारी करण मैं नुकसान कैसे? ससुर बोला - मनै बता देती मैं कर देता, इतना पवाड़ा करण की के जरूरत थी। जयप्रकाश बोल्या - म्हारे समाज मैं बहुआं नै सुसरे गेल्यां बात करण की इजाजत कड़ै सै? ससुर बोल्या - आज ही न्यारी कर द्यूं सूं। उसनै कहया - म्हिने-बीस दिन पाछै कर दिये। बहू नै मैं समझा द्यूंगा। किसे नै बेरा बी नहीं लागैगा। ससुरा मान गया। जयप्रकाश नै बहू को अकेला बुलाया और कहा - सब ठीक हो जायेगा। अब कुछ ना करना। बहू नै जयप्रकाश का धन्यवाद करया अर हंसण लागगी। फते बोल्या - वा आग क्यूकर लाया करदी? सत्ते बोल्या - सारी बात आजै बूझैगा या फेर कदे सही।

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