सोमवार, 17 अक्टूबर 2016

म्हारी प्राचीन संस्कृति-आखिर खतरा किंघान तै ?


कर्मबीर अर चांदकौर मैं बड़ी लड़की की शादी की चर्चा होवण लागज्या सै। लड़का आस्ट्रेलिया मैं कम्प्यूटर की कम्पनी मैं काम करै सै। लड़की एमएससी कर चुकी सै। कन्यादान पै बात चाल पड़ै सै। कर्मबीर की राय सै अक कन्यादान करना सही बात सै अर हमनै जै समाज मैं रहना सै तो लोगां का दिया औड़ कन्यादान लेना बी पड़ैगा हम मनाहीं कोन्या कर सकदे। पर चांदकौर का कहना सै अक जिब लड़का अर लड़की बराबर माने जांसैं तो लड़की का दान ही क्यों करया जावै? यो कन्यादान का रिवाज तो नाबराबरी का प्रतीक सै। जिब तक कन्यादान का रिवाज समाज मैं रहैगा उस बख्त तक महिला का दोयम दर्जा तो रहवै ए रहवै। कर्मबीर चांदकौर को कहता है कि तेरे ऊपर पश्चिमी संस्कृति का भूत चढ़ग्या दीखे सै। हरियाणा के गाम इसे तावले अमरीका कोन्या बणण देवां हम। दोनूआं मैं बातचीत अर बहस होवै सै। या बातचीत सवाल जवाब का रूप अख्तियार करले सै। क्या कहते हैं भला।
कर्मबीर: कन्यादान धर्म माणस का बिना रिवाजां ना जिया जा। 
चांदकौर: लड़का लड़की बराबर सैं तो छोरा ना दान मैं दिया जा।
कर्मबीर: कन्यादान की रस्म सदा घर म्हारे मैं मनती आई या
छोरी कुहांवै सै धन पराया मुनियां नै बात बताई या
चाहूं रिवाज निभाई या कन्यादान सारी जागां दिया जा।
चांदकौर कर्मबीर की बात सुनकर हंस पड़ै सै अर वा कहवै सै अक सही बात नै भी पश्चिमी संस्कृति का मुखौटा पहरा के खारिज करण का बड़ा आसान तरीका काढ़ लिया सै हमनै। कै फेर पिछड़ी रुग्न मानसिकता नै ए हम अपनी संस्कृति मान कै महिला की साथ अन्याय करते रहवां सां। आज जो बाजारवादी अपसंस्कृति अश्लीलता परोसण लागरी सै टीवी पै उसके विरोध मैं आपां इस पिछड़ी रुग्न मानसिकता के हिम्माती होकै महिला की गेल्यां और घणा अन्याय करां सां। महिला जिब बालक नै जनम देसै तो उसके शरीर में कुछ परिवर्तन होवैं सैं अर उसनै आच्छे पौष्टिक आहार की जरूरत होवै सै। म्हारे आड़ै पुराना रिवाज सै अक लड़का पैदा होगा तो जच्चा नै दस किलो घी मिलैगा अर लड़की पैदा होवैगी तो उसनै पांच किलो घी मिलैगा। के यो रिवाज सही सै? के यो महिला के साथ दुर्भात करण आला रिवाज नहीं सै? इसनै परम्परा के नाम पै ढोना कितना सही सै? इसे तरियां बालक के जनम पै घुट्टी प्यावण का रिवाज सै फेर बालकां के डाक्टर डा. खोसला बरगे बतावैं सैं अक इस घुट्टी का कोए फायदा कोनी उल्टा नुकसान हो सकै सै। तो के हमनै इस रिवाज के चिपके रहना चाहिए। जिब बालक पैदा होसै तो इसकी औरनाल हम जंग लागे दरांत तैं काट्या करते अर कई बालक इस करकै टैटनस की बीमारी का शिकार होकै मर जाया करदे। जिबतै हमनै इस बात का बेरा लाग्या सै हमनै यू रिवाज छोड़ दिया। क्यूं यातै म्हारी परम्परा थी ना? कर्मबीर हमनै देखना पड़ैगा अक म्हारी प्राचीन संस्कृति मैं कौन सी बातें आज म्हारी खातर सही सैं अर कौनसी हमनै नुकसान पहुंचावैं सैं। कई बर जनता नै बी गुमराह करकै उसके नुकसान की बातां नै बी कई लोग जनता के हक की बतावैं सैं तो के करया जावै? ज्यूकर सती प्रथा नै आज बी कुछ लोग ठीक बतावैं सैं अर इसे ढाल सहशिक्षा का भी विरोध करैं सैं। ये सारी बात हमनै विवेक तैं अर वैज्ञानिक नजरिये तैं परखनी पड़ैगी।
चांदकौर: एक तरफ कहैं दोनूं बराबर छोरा अर ये छोरी।
कदम कदम पै दुभांत क्यूं रिवाज कै भीतर होरी।
उनपै बूझां बने हांडैं जो थोरी खून म्हारा क्यों पिया जा।
चांदकौर कहती है कि जो हमारी संस्कृति के ठेकेदार हैं वही दारू के भी ठेकेदार हैं। जो लड़कियां के जीन पहरण के विरोध का ठेका लेरे सैं वेहे जीन के बड़े-बड़े शोरूमां के मालिक सैं। जो गऊ हत्या के विरोध का ठेका ठाये हांडैं सैं उनके चमड़े के जूत्यां के बड़े-बड़े शोरूम सैं। जो महिला नै घर मैं बोच के राखना चाहवैं सैं वेहे इसके शरीर नै टीवी पै बनियान अर जांघिये के विज्ञापन की साथ बेचैं सैं। या दोहरी नैतिकता सै म्हारे ठेकेदारां की, इसका तोड़ खुलासा तो करना ए पड़ैगा। फेर कर्मबीर ठहरया पक्का पुरातनपंथी ओ के कहवै सै भला?
कर्मबीर: छोरा ब्याह कै ल्यावै छोरी नै या रिवाज चाली आवै देख! म्हारी परम्परा पै आंगली जिद्दां मैं तूं मतना ठावै देख।
उल्टे बांस बरेली ले ज्यावै मुंह अपना नहीं सिया जा।
चांदकौर कहती है कि थारे बरगे दकियानूसी नाश करण लागरे सैं हरियाणे का। समझ जाओ ईब बख्त सै ना पाछै पिछताओगे।
चांदकौर: जो हुये पुराने और बने बेड़ी सोचो उनके बारे मैं।
बीर गई सै सदा सताई ई बी देना चाहो आरे मैं।
आगै आई जग सारे मैं रणबीर लिख्या ना उल्टा लिया जा।
कर्मबीर चांदकौर की बहस सुनकर पड़ौस का रघबीर बी आ जावै सैं अर बात बातां मैं चांदकौर की तरफदारी करण लागज्या सै। कर्मबीर नै या बात आच्छी कोन्या लागती अर ओ जोर-जोर के बोलै सै अक तम ज्ञान-विज्ञान समिति आले इन औरतां नै सिर पै बिठाकै क्यूं म्हारे घरां का नाश करवाओ सो। फेर ये बात हम इस गाम मैं कोन्या पुग्गण देवैं चाहे तम कितना ए जोर ला लियो। रघबीर कर्मबीर ने समझावै सै अक चांदकौर की बात कौन-सी गलत सै?
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