म्हारे हरियाणा में जै एक छोरा बी हो तै न्यों कह्या जा सकै सै अक ‘एक आंख का के खोलणा अर के मूंदना।’ म्हारे प्रान्त मैं पुत्र की लालसा कोए भोली-भाली सी पवित्र इच्छा नही सै अर नाए या किसे मां के ‘दिल की पुकार सै’। या पुत्र लालसा तो एक पराधीन स्त्री की विवशता सै, मजबूरी सै। या पुत्र लालसा मासूम लड़कियां के खून मैं डूबी औड़ सै। पुत्र लालसा अर बेटी तै छुटकारा ये एक्कै सिक्के के दो पहलू बताये। म्हारे देश में परिवार का ढांचा पितृ सत्तात्मक ढांचा सै। या पितृसत्ता की दमन शक्ति इस ढाल की म्हारी मूल्य व्यवस्थावां का संचालन करै सै, बागडोर अपने हाथ में राक्खै सै। पतिव्रत धर्म के खूंटै कै बांध राक्खी सै औरत। खूंटे कै बांध कै उसके सारे के सारे सामाजिक अधिकार खोस लिए जावैं सैं। उसके कर्तव्य को नकार दिया जावै सै। ब्याह बस उसके साहमी जीवन यापन का एकमात्र रास्ता रहया है। पति के घर मैं वा बनी रहवै, उस घर में थोड़ी सी जगां उसकी खातर बी सुरक्षित रैहज्या इसकी खातर उसका बेटा पैदा करना बहोत जरूरी सै ना तै उसकी छुट्टी। म्हारे समाज मैं बेटे की खातर जो लाड़-प्यार अर मान-सम्मान सै उसकी कीमत बेटियां नै चुकानी पड़ै सै। लड़कियां नै अपने जीवित रहवण का अधिकार हासिल करना सै। आज के दिन उनका जीवित रैहणा उनके प्रियजनों की कृपा पै कै दया पै निर्भर करै सै। छोरी म्हारे घरां मैं अर समाज मैं कमोवेश अवांछित जीव सै। बेटा जन्म लेवते की साथ पितृ सत्ता का प्रतिनिधि सै अर बेटी उसके लिए एक चुनौती सै। बेटी के पैदा होवण तै ए पितृ सत्ता की चूल सी हाल जयां सैं। बेटे नै इस करकै प्यार अर सम्मान मिलै सै अक अन्याय अर असमानता पै टिके समाज मैं ताकत की पूजा होवै सै। दूसरे के सारे के सारे अधिकार खोसकै अर फेर उसकी रक्षा करना, दाता के रूप में उन ताहिं रोटी देना, दान देना, दया करना, ‘न्याय’ की देखभाल करना, इसनै बनाए राक्खण की खातर दंड देना आदि बात ना केवल म्हारे प्रांत में ‘स्वाभाविक’ मानी जावै सै बलक या तै एक ‘महानता’ मानी जावै सै।
म्हारी ‘महान भारतीय संस्कृति’ मैं स्त्रियां के सारे अधिकार हड़प कै पितृ सत्ता उनका पालन-पोषण करै सै, उनकी रक्षा करै सै इसे करकै पितृ सत्ता के प्रतिनिधि पुत्र नै अर उसकी मां नै तो आदर-सम्मान मिलै ए मिलै अर बेटी नै अर उसकी मां नै तिरस्कार मिलै समाज मैं। असमानता अर अन्याय पै टिके समाज मैं, शोषित अर उत्पीड़ित आदमी घृणा की नजर तै देख्या जावै सै। जै कोए वो अपनी औड़ तै मांग ठादे तो वा बात वा मांग अनधिकृत चेष्टा के रूप मैं देखी जावै सै। असल मैं तो न्याय अर अन्याय की परिकल्पना भी ताकत के दबदबे मैं ए अपना स्वरूप धारण करै सै। न्याय की परिकल्पना मैं ए अन्याय बद्धमूल होवै सै। सही अर गलत नै परखण की कसौटियां मैं ए खोट हो सै। प्रतिष्ठित ‘न्याय’ नै चुनौती दे कै असली न्याय की मांग साहमी रखना आसान काम कोन्या। इसमें एक चुनौती सै अर घणा ए जोखिम भी छिप्या हुआ सै। म्हारा धर्म, शास्त्र, राष्ट्र, परिवार, ज्ञानी, पंडितां तै ले कै अपने यारे-प्यारयां के क्रोधित होवण का खतरा इसमैं सारी हाण सिर पै मंडराए जावै सै। मां अर बेटे के पवित्र रिश्ते का सार के सै, मातृ भक्तां के स्त्री द्वेष नै देख कै इसका बेरा लागज्या सै। भाई अर बाहण के गद्गद् रिश्त्यां का बेरा जिब पाट्टै सै जिब बाहण जमीन मैं अपना हिस्सा मांग ले सै। पिता अर पुत्र के अधीन रहवैगी, कदे न्याय नहीं मांगैगी, पति के अधीन रहवैगी, योहे सै ‘स्त्री धर्म’ अर योहे सै ‘पतिव्रत धर्म’। बाप, भाई, पति अर पुत्र के संरक्षण का सार योहे सै। अर असल मैं स्त्रियों के दुर्भाग्य का आधार भी योहे सै। इसे करकै लड़कियां बोझा सैं अर उनकी हत्या भी होवै सै।
इस म्हारे पितृसत्ता के ढांचे की नैतिकता स्त्री दासता नै सुनिश्चित करण का काम करै सै। पितृ सत्तात्मक परिवार मैं दोहरे मापदंड हों सैं मूल्य व्यवस्था के। या पुरुषां ताहिं तो स्वेच्छाचारिता अर निरंकुश अधिकार देवैं सैं अर स्त्रियां के सारे अधिकारां का निषेध करै सै। कदे बी स्वतंत्र नहीं रैहणा सै। उसनै साध्वी रैहणा, गुण कर्म युक्त रैहणा अर अनाचारी, पर स्त्रीगामी, अनपढ़ पति की सेवा में तत्पर रैहणा सै (मनुस्मृति पांचवां चक्र, श्लोक 154)। वा थोड़ी सी बी कटु भाषिणी, स्पष्ट वक्ता हुई नहीं अक घर मैं रैहवण का अधिकार खोदे सै। (9.81) जो स्त्री प्रमत्त, पागल कै रोगी पति की आज्ञा नहीं मानती तो पुरुष नै यो अधिकार सै अक वो उसनै वस्त्र आभूषणादि विहीन करकै, तीन म्हिने ताहिं घर तै काढ़ दे। (9 78) स्त्रियां के बारे मैं इसे विचार शास्त्र अर ग्रन्थां मैं ए कोन्या भरे पड़े फेर पढ़े-लिखे, सुशिक्षित अर तथाकथित आधुनिक लोगां के दिमागां मैं भी घर कररे सैं।
गीता प्रेस गोरखपुर की प्रकाशित ‘नारी शिक्षा’, स्त्रियां की खातर कर्तव्य-शिक्षा, दाम्पत्य जीवन का आदर्श आदि किताब बड़े पैमाने पै छापी जावण लागरी सै। ‘पति व्रत धर्म’ अर ‘स्त्री धर्म’ का प्रचार करण आली ये किताब म्हारे संविधान की मूल प्रतिज्ञावां के खिलाफ सैं अर धड़ल्ले तै बिकण लागरी सैं।
स्त्री दास्तां पै टिके इस पितृ सत्तात्मक परिवार का मुख्य सार व्यक्तिगत संपत्ति की रक्षा अर उसमैं अपना मालिकाना हक बना कै राक्खण का सै। या संपत्ति वंशधर नै ए मिलै इसकी खातर स्त्री का अनिवार्य कर्तव्य सै अक वा पुत्र जरूर पैदा करै।
Aap sahi me dard wali nas pe ungli rakhte ho sahab, bade bade logo ki cheekh nikal jati hai. :)
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