महिलावां के अधिकारां की बात करां तो साफ-साफ बात साहमी आ जावै सै अक इनके समाज मैं दोयम दरजे के अधिकार सैं। जायदाद मैं अधिकार भी कहवण नै तो न्यों कहया जावै सै अक पीहर अर सासरे मैं दोनूं जगां सै। फेर पीहर मैं धरती छोरी भाइयां के नाम तरवा देवै सै। जो एकाध ना तरवावै तो उसनै मार दें सैं। उसकी गेल्यां समाज बहिष्कारी बरगा व्यवहार किया जावै सै। सासरे मैं जायदाद मैं अधिकार जिब सै जिब उसका पति मर ज्यावै। इसका मतलब वा पहलम तो या माला फेरै अक पति जी का स्वर्गवास तावला सा हो ताकि जायदाद मैं मेरा बी हिस्सा हो सकै। कौन महिला सै जो चाहवैगी अपने पति की मौत? अर एक खास बात और सै। कई बर उसके पीहर मैं हिस्से के खिलाफ म्हारे नेतावां नै अर इन खाप के चौधरियां नै कानून पास करवावण की बी कोशिश करली। यो सै म्हारा महिला सशक्तीकरण का असली चेहरा। ये सैं नंबर वन हरियाणा मैं नंबर वन महिला के अधिकार। फेर एक बात और आई मेरे दिमाग मैं अक जो पीहर मैं जायदाद का अधिकार नहीं रहया महिला का तो वा महिला कित जावैगी जो शादी नहीं करवाना चाहती।
एक होनहार छोरी सै। रिसर्च करना चाहवै सै। ब्याह शादी कोन्या करवाना चाहती तो उसका जायदाद मैं हक कड़ै बचैगा? आजकाल तो बिना ब्याह शादी के ‘लिव इन कप्पल’ बहोत बढ़ते जावण लागरे सैं तो उस छोरी का अधिकार कित मिलैगा - पीहर मैं अक उस तथाकथित सासरे मैं? इसतै एक बात साफ उभर कै आवै सै अक महिला का जायदाद मैं अधिकार इबै नंबर दो का सै। म्हारी परंपरावां की दुहाई दैकै आपां इसनै दोयम दर्जे का ए राखना चाहवैं सैं। एक बात याद आगी इसे बात पर। एक फकीर था गाम मैं। एक दिन फकीर को एक नई-नई आई बहू नै भिक्षा देवण तै इनकार कर दिया। फकीर बी पुराने फकीर कोन्या रैहरे। फकीर बिगड़ग्या। खूब लाल पीला होग्या। गाल मां कै बड़बड़ान्ता चाल पड़या। थोड़ी सी दूर गया था अक राह मैं फकीर नै उस बहू की सासू फेटगी। बस के था। भरया पड़या था फकीर। देखते की साथ बोल्या - तुम्हारी बहू की या मजाल अक वा फकीर नै भिक्षा देवण तै मना कर दे। के मेरे बरगा फकीर मुट्ठी भर आट्टे अर रोटी के एक टुकड़े तै भी गया गुजरा सै। सिर पै बिठा राखी सैं थामने ये बहू। के जमाना आग्या। घर-घर मैं बहुएं करता-धरता होगी। बड़े छोटे का कोए लिहाजै नहीं बच्या। फकीर की बात सुणकै सासू का पारा सातमे आसमान पर चढ़ग्या। सासू बोली - फकीर जी बहोत गल्त करया बहू नै। यो क्यूकर कर दिया? उसकी इतनी औकात कद तै होगी? थाम चालो मेरी साथ। फकीर कै माड़ी आस बंधी अक ले बणैगी किमै बात। सासू के सिर पै लकड़ियां का गट्ठर उसनै अपने सिर पै ले लिया। सास्सू नै रास्तेभर बहू को पानी पी-पीकर कोस्या। खूब गालियां दी। उसकी सात पुश्तों तक को नहीं छोड्या। घर पहौंचते की साथ वह उससे लकड़ियों का गट्ठर लेकै भीतर गई अर बहू ऊपर बरस पड़ी। उसकी बहोत लानत-मानत की। जी भरकै खरी खोटी सुनाई। बोली - तेरी या जुर्रत अक तूं घर आये संत नै भिक्षा देवण तै मना करदे। फकीर नै सोच्या - आज उसके पौ बारा होगे। कई दिनां तक भिक्षा नहीं मांगनी पड़ै। आखिर मैं सासू नै बहू तै फारिग होकै फकीर की सुध ली। बाहर आकै बोली - मेरे जीवन्ते जी मना करण आली वा कौण सै? मना करूंगी तो मैं मना करूंगी। जाओ दफा हो आड़े तै। कोई भिक्षा-दिक्षा नहीं है। बड़ी आयी मेरे रहते मना करने वाली। नवाबजादी कहीं की। फकीर चाल पड़या माड़ा सा मुंह लेकै। इस सारी बात मैं बात या सै अक बहू नै कोए अधिकार नहीं। भिक्षा देवण का भी अधिकार नहीं। म्हारी परंपरावां मैं सासू अर ननद को इस बात की खातिर तैयार करया जावै सै अक वे बहू नै ठोक पीट कै हिसाब सर राखैं। पितृ सत्तामक ढांचे मैं मुखिया द्वारा ये पावर डेलीगेट कर राखी सैं साहू अर नन्द ताहिं। आई किमैं समझ मैं अक ईब्बी न्यों कहवोगे अक औरत औरत की दुश्मन हो सै। या सही बात कोन्या। सोचो दिमाग पै जोर देकै।
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