सोमवार, 17 अक्टूबर 2016

फेर वार होज्यागी


आजकाल सारा हरियाणा घणा कसूता जोर लारया सै अक म्हारे सिर पर जो कलंक सै यो किसे तरियां दूर होवै। सरकार नै भी महिलावां खातिर कई योजना लागू करली अक क्यूकरै यो लिंग अनुपात का मामला सुधरज्या। घणीए एनजीओ कमर कसरी सैं अक हम जागरुकता ल्याकै इस लिंग अनुपात मैं सुधार करांगी। समाज का हरेक हिस्सा लांगड़ कसरया सै फेर या समस्या उड़े कि उड़े खड़ी लागै सै मनै अर महिलावां पर जोर जबरदस्ती अर अत्याचार का दौर बढ़ता लागै सै। किसे नै गीत लिख्या मैं कुदरत का वरदान सूं वस्तु नहीं बेकार की, मुझे मत मारो मैं तो जननी सूं संसार की। बात या बी सै अक औरत एक खुद में औरत सै फेर इसा के साक्का होया अक या अपने पेट मैं अपनी बेटी नै मारण नै मजबूर सै अर यो सारा हरियाणा लाठा ठारया अक छांट कै महिला भ्रूण हत्या ना होवै। फेर 2010 के जनवरी-फरवरी के आंकड़े रोहतक जिले के तो न्योंए कहवैं सैं अक ये सारे प्रयत्न घणे कारगर सिद्ध कोन्या होरे। समझ मैं नहीं आत्ता अक मां खुद भी एक नारी होत्ते होए क्यूकर बेटी की बलि खातर मजबूरी मैं तैयार होज्या सै? ममता की वा जीती जागती मूरत सै फेर बी इस हत्या मैं हत्या की भागीदार बनै सै। हो सकै सै अक म्हारे समाज मैं लड़की का असुरक्षित जीवन भी उसकी मजबूरी का एक कारण हो। इसे मैं वा क्यूकर पैदा करै अपनी बेटी नै? भगवती पुर की महिलावां नै 8-10 साल पहलम बताया था अक डाक्टर पैदा होवण तै लेकै इतनै ब्याही नहीं जात्ती इतनै तो न्यारी ढाल की चिन्ता सताएं जावैं अर ब्याह करे पाछै दूसरे ढाल की चिन्ता नींद हराम राखैं, करां तो के करां? समझ नहीं आत्ती अक क्यूकर एक बाप उस दूध का करज भूल ज्यावै सै जो उसनै अपनी मां का पीया था वा भी तो एक औरत सै। बाप क्यों अपने दिल के टुकड़े की हत्या के लिए मजबूर वहशी बण कै खड़या हो ज्यावै सै। वा डाक्टर जिसको जीवनदाता की उपाधी दी इस समाज नै वो चन्द सिक्कों की खातिर अपना ईमान बेचता हांडै। उन तै बात करकै देखो तो उनका अपना लोजिक सै छोरी पेट मैं मारण का इसपै फेर कदे बात करांगे। ये म्हारे कानून के रुखाले वकील साहेबान जिनका पेशा जनता को न्याय दिलवाणा सै वे भी इस अन्याय कान्हीं तैं मुंह फेरगे अपना फरज भूलगे। गुनहगार के हक मैं खड़े पाओ सो बहोतै माड़ी बात सै। कितने डाक्टरां की सजा करवाई सै आज ताहिं हरियाणा मैं? यूं छोरी मार-मार कै कौनसे संसार की कल्पना सै म्हारे धोरै बिना औरत के संसार की? पुलिस जनता की रखवाली फेर छोरी जनता का हिस्सा नहीं सै म्हारे समाज मैं तो अजन्मी छोरी का खाता कित के होवण लागरया सै पर पुलिसिया की खुद की मानसिकता महिला विरोधी हो तैं वो किततै बचाव करैगा अजन्मी लड़की का। क्यूकर चित्कार सुनैगी उसनै अजन्मी छोरी की। ये म्हारे रागनी गायक बी कुछ नहीं गात्ते इतने बड़े सामाजिक मुद्दे पै। एक राकेश किलोईया गावै सै एक रागनी जिसमैं अजन्मी छोरी अपनी मां नै कसूरवार ठहरावै सै। यो पूरा सच नहीं सै। पूरा सच सै एक इस छान्ट कै महिला भ्रूण हत्या खातिर यो पूरा समाज जिम्मेदार सै एकली मां नहीं। इस बारे मैं और सही हिसाब की रागनी लिखी जावैं अर गाई जावैं याहे अपील सै म्हारे रागनी गायकों को। या चुप्पी समाज की बहोत खतरनाक सै। महिला रहित या कम महिलावां आला समाज किस्सा होगा, इसकी कल्पना करना बहोत मुश्किल सै। थाली बजा कै काम कोन्या चालै। म्हारे सामाजिक ढांचे मैं मूलभूत बदलाव करने पड़ैंगे। अर उसकी खातर लम्बा संघर्ष करना पड़ैगा। दो-दो बी अर चोपड़ी-चोपड़ी बी तै काम कोन्या चालै। बालक बी होज्या अर साधनी बी रहज्या आली फिलोसफी काम कोन्या देवै। हम महिला सशक्तिकरण के नाम पर बहोत आडम्बर करण लागरे सां। इन आडम्बरां तै बाहर लिकड़ कै असल मैं महिला ताहिं बराबर का दरजा समाज नै करना पड़ैगा।
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