सोमवार, 17 अक्टूबर 2016

चाल तरक्की की

चाल तरक्की की
गाम मैं सते, फते, सविता, सरिता, कविता अर धापां ताई, शनिचर नै सब बैठक मैं आये अर आराम तै बैठ कै दुःख-सुख की बतलाये अक न्यारे ढाल के आंकड़े कठ्ठे करकै ल्यावण की जिम्मेदारी किस किसनै नहीं निभाई। ताई धापां या बात देखकै बड़ी दुःखी होई अक सब कठ्ठे करकै ल्यारे थे। जो आंकड़े कठ्ठे करके नहीं ल्यावैगा ओ एक किलो बरफी खवावैगा या शर्त थी। ताई बोली तो सते बतावैगा अपनी बात। सते बोल्या - सारी दुनिया के स्तर पै प्रति व्यक्ति सालाना कितनी आमदन सै बेरा सै? सारे गुटर-गुटर देखैं इसकी कान्हीं। बोल्या - बस! तो ले हम बतावैं सैं - 5120 डालर सै। भारत मैं प्रति व्यक्ति आय कितनी सै? इबकै तो कविता बतावैगी। कविता बोली - पक्का तो बेरा ना फेर या 500 डालर के करीब होनी चाहिए। सते नै बतया - हां 560 डालर सै। दुनिया मैं भारत का स्थान 162वां सै बस 29 देश भारत तै तलै बताये। सूरता बी आग्या था वो बोल्या - तूं ये आंकड़े कड़े तै ल्याया भाई? ये तो कोरी बकवास सै। ‘साइनिंग इंडिया’ इतना नीचै क्यूकर हो सकै सै? सते बदेशी कम्पनियां धोरै पीस्से लेरया सै ज्यां करकै भारत के बारे मैं इतनी घटिया अर झूठी बात करै सै। सते बोल्या - ये आंकड़े वर्ल्ड डेवलपमैंट इंडीकेटर-2003 तै ल्याया सूं। सूरता बोल्या - यो इंडीकेटर तै अंग्रेज छापते होंगे ना? म्हारी आस्था सै अक म्हारा देश तै कसूती ढालां दुनिया मैं ‘शाइन’ करण लागरया सै। सते ये झूठे आंकड़े नहीं चालैंगे भाई। सते बोल्या - कहवै तो रिपोर्ट ल्याकै दिखाद्यूं। सूरता बोल्या - के फरक पड़ै सै। जिब म्हारी आस्था सै अक तक्षिला अर नालंदा की म्हारी इतनी बढ़िया परम्परा का कोए मुकाबला नहीं दुनिया मैं तो ईब इस रिपोर्ट पै क्यूंकर यकीन कर ल्यूं? या हमनै बदनाम करण की साजिस सै। ताई बोली किसे रफड़े मैं फंसगे। आस्था का अर विज्ञान का जिब बी कोए टकराव हुया तो कुरबानी तो विज्ञान नै फालतू दी फेर जीत बी विज्ञान कीए होई। जिब ब्रूनो नै दुनिया कै साहमी या बात कही अक धरती के चौगिरदें सूरज नहीं घूमता उल्टा धरती सूरज के चारों कान्हीं घूमै सै तो उस बख्त के कट्टरपंथियां नै ब्रूनो जिन्दा जला दिया था। इसे तरियां गैलिलियो ताहीं भी फांसी की सजा सुना दी थी। इबै इन आंक्ड़यां पै आंगली कोए नहीं ठावैगा।
सरिता नै अपनी बात शिक्षा पै कही - भारत मैं दुनिया की आबादी का 16 8 फीसद रहवै सै फेर दुनिया के वयस्क निरक्षरां मैं तैं 34 फीसदी भारत मैं सैं तो भारत महान कड़े तै होग्या? 94 विकासशील देशां के शिक्षा सूचकांक मैं भारत का स्थान 76वां सै। तृतीय ‘टरसरी’ स्तर की शिक्षा मैं प्रवेश का अनुपात दुनिया का 23 फीसदी सै अर भारत मैं यो 10.5 फीसदी सै। क्या कहने भारत के! सूरते पै फेर कोनी टिक्या गया अर बोल्या - तूं किततै ल्याई सै ये आंकड़े? सरिता बोली - यूनेस्को की रिपोर्ट, एजुकेशन फॉर आल-2003-2004 मैं तै ल्याई सूं मेहनत करकै नै। अर सुनल्यो भ्रष्टाचार सूचकांक के हिसाब से दुनिया के 102 देशां मातै भारत 71वें स्थान पै सै। सिर्फ 31 देश सैं जो भ्रष्टाचार मैं भारत तै आगै सैं। यू आंकड़ा ट्रांसपेरैंसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट 2003 तै लिया गया सै। ईबी कुछ कहना सै सूरत सिंह जी नै इन आंकड़या के बारे मैं? कोरी आस्था के दम पै कदे बी दुनिया कोनी चाली। सूरत सिंह कुछ कहना चाहवै था तो ताई बोली - एकबै सारे बोल लेवैं फेर दूसरा गेड़ा आवैगा।
कविता की बारी आई अर वा बोली - विदेशी ऋण का बोझ भारत पै 1998-1999 मैं 9823 करोड़ डालर था, जो 2003 जून ताहीं बधकै 10960 करोड़ डालर पै पहोंचग्या। 1998 मैं मार्च ताहीं देश के धनवानां पै बकाया कर 47444 करोड़ रुपइये था जो 2002 के 21 मार्च ताहीं बधकै 86342 करोड़ रुपइये होग्या। ये सारे आंकड़े मनै आर्थिक सर्वे 2002-2003 तैं कठ्ठे करे सैं। दूजे कान्हीं किसानां की 4500 हजार करोड़ के लगभग की सबसिडी पै जूत बजा राख्या सै। कम तै कम जिब म्हारे नेता गाम मैं आवैं तो इन बातां पै इनका के कहना सै हमनै बूझना तो चाहिए।
फते कई वार का मसकोड़े से मारै था, उसका नम्बर आया तो उसनै बताना शुरू करया - म्हारे बरगे 62 देशां के सूचकांक के आधार पै वैश्वीकरण की कटारी चाले पाछे के विकास का किस्सा घणा दर्दनाक सै। इन देशां मैं दुनिया की 80 फीसदी आबादी रहवै सै। 2001 में भारत का स्थान 49वां था फेर भला हो एनडीए की सरकार का अक 2002 मैं यो 57वां होग्या अर 2003 मैं यो 61वां होग्या। सुरते कै आज बेरा ना के होरया था बोल्या - सारी काट करोगे अक किमै आच्छी बात बी बताओगे? ईब आच्छी कड़े तैं घड़ां सुरते की खातर?

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