सोमवार, 17 अक्टूबर 2016

मौत के बीज


म्हारे देश के बड्डे-बड्डे लोग भूमंडलीकरण नै जादू की छड़ी समझैं सैं। उनके मन मैं पक्की जंचरी सै अक इस जादू की छड़ी के दम पै भारत देश की गरीबी दूर करी जा सकै सै अर लागै सै जंच म्हारे भी रही सै अक विदेशी पूंजी म्हारे देश मैं आर्थिक आज़ादी ल्यावैगी अर हम खुशहाल हो ज्यांगे। फेर खूंटा ठोक कै या बात घाट जंचै सै अर इसका कारण बी सै। कारण सै अक हमनै साहमी पड़ी चीज बी कोण्या दीखती। म्हारे साहमी दक्षिण पूर्वी एशियाई देशां की मिसाल सैं। इन देशां नै भूमंडलीकरण की कौली म्हारे तै पहलम भरी थी। जो जो बात उन ताहिं बताई गई उननै वे सारे नेग-जोग करे। सहज-सहज आज इन देशां के बैंक, वित्तीय संस्था, उद्योग-धंधे अर आड़े ताहिं अक प्राकृतिक संसाधन भी बहुराष्ट्रीय कंपनियां के हाथां मैं पहोंचगे। या बात भी देखण की सै अक ये घणखरी कंपनी बड्डे, विकसित पश्चिमी देशां की सैं। थाइलैंड, कोरिया मैं किसानां के जी नै शाका होग्या। पंजाब, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश मैं 2000 हजार तै फालतू किसानां नै दुखी होकै आत्महत्या कर ली। पंजाब यूनिवर्सिटी के प्रोफैसर गोपाल अय्यर नै इन आत्महत्याओं की जांच करे पाछै जो कारण बताए सैं वे सैं - बार-बार फसल का नुकसान, रोजाना लगातार बढ़ता कर्ज का बोझ, नकली बीज अर कीटनाशक, बीज बोवण तै पहलम उनकी पूरी जांच नहीं करी गई, परिवार पै निर्भर लोगां की संख्या, कर्ज देवण आली कंपनियां की ऊंची ब्याज दर। उड़ीसा के बालासोर जिले के उदय डे नै धान की प्रो एग्रो किस्म 120 रुपइये बोरी के हिसाब तै खरीददारी करी। उस ताहिं बताया गया था अक इसतै 35-40 क्विंटल धान पैदा होवैंगे। फेर उसकी पैदावार सिर्फ 8 क्विंटल रही। कृषि अधिकारी नै कह्या अक फसल खराब होवण का कारण मौसम था, इसमैं कम्पनी के हाथ अड़ावै। इस सबके चालते उदय बैंक का कर्जा कोन्या उल्टा कर पाया। बात सोच्चण की या सै अक ये बीज म्हारे साच्चे हिम्माती बीज सैं अक ये म्हारी मौत के बीज सैं? बीज खेती का आधार हों सैं। कोए भी नया बीज बाजार मैं ल्यावण तै पहलम छः-सात सालां ताहिं उसकी आजमाइश होणी चाहिये अर जांच होणी चाहिये। मुनाफाखोर कम्पनियां बीजां नै पहलमै सच्चे शंकर बीज के नाम तै किसानां नै बेच देवैं सैं। फेर असल बात या सै अक किसानां ताहिं साच्ची बात कोण्या बताई जात्ती। किसान भी फालतू पैदावार के लालच में फंस ज्यावैं सैं। फेर जिब पूरी की पूरी फसल धोखा दे ज्यावै सै तो उनके साहमी मौत तै न्यारा कोए चारा नहीं रैहत्ता। अर जिन बीजां नै ओ अपणी जिन्दगी के बीज समझै था वे उसकी मौत के बीज बणज्यां सैं।
ये बीजां के ब्यौपारी कीटनाशक, खाद अर कर्ज की सुविधा भी दिलावैं सैं अर चारों कान्ही तै किसान नै चूट-चूट कै खावैं सैं। अर ईब तै ये बड्डी-बड्डी कम्पनी गामां मैं भी अपणे पां पसारण लागरी सैं। इन कम्पनियां की सांठ-गांठ सरकार तैं भी सै। जब किसान सरकारी एजेंसी तै मदद मांगण जावैं सैं तो सरकार की ये एजेंसी भी बीज कै बीज कम्पनियां नै दोष देवण की जागां मौसम अर दूसरी चीजां नै दोषी ठहरावण लागज्यां सैं। आत्महत्या करण आले कै अपणा गुर्दा बेच कै कर्ज तारण आले ज्यादातर किसान छोटे किसान सैं जो कई बै बाधे कै साझे की धरती ले कै खेती करैं सैं। ईब तै किसानां के परिवारां नै किसान की आत्महत्या पाछै जो मुआवजा मिल्या करदा ओ भी बंद कर दिया बतावैं सैं। सरकार का कहना सै अक किसान परिवार नै पीस्सा दिवावण खातर जानबूझ कै आत्महत्या करण लागरे सैं। ईब इसतै बड्डा मज़ाक दुनिया मैं के हो सकै सै? म्हारी सरकार के दिमाग का दिवालियापन कह्या जा सकै सै इस ढाल का सोचना।
असल मैं बीज पै कब्जा करण की पूरी लड़ाई की जड़ मैं फालतू तै फालतू मुनाफा कमावण का लालच सै। लोगां की भलाई, जन-कल्याण, जय जवान-जय किसान, ये सारे नारे कितै पाछै छूट लिये लागैं सैं। आज खेती जगत मैं होवण आले सारे खोज भी इन भीमकाय कम्पनियां के हाथ मैं सैं। नई खोजां का राह भी और घणा मुनाफा कमावण का सै। आच्छे अर साच्चे वैज्ञानिकां की आवाज अर विचार दबाए जावण लागरे सैं। ये साइन्सदान तरां-तरां तै दुखी करे जावैं सैं। शोध अर अनुसंधान की खात्तर पीस्से की जरूरत हो सै फेर पीस्सा तो इने कम्पनियां धोरै कट्ठा होर्या सै म्हारी नई उदारीकरण अर भू-मंडलीकरण की नीतियां करकै। म्हारा दुश्मन ताकतवर सै। हमनै अपनी आंख खोलकै देखणा पड़ैगा अक देश मैं के होवण लागर्या सै। जै ये बीज भी म्हारे हाथां मां तै लिकड़गे तो इस दुनिया मैं आम आदमी का के होगा? मेरे यकीन सै अक यू देश आत्महत्या नहीं करैगा, यू संघर्ष करैगा, नई राह दिखावैगा।

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