सोमवार, 17 अक्टूबर 2016

बदलाव करैगी जनता


एक बार गांव में एक शादी में गया तो कई लोग इकट्ठे हो गये और बात चल पड़ी गांव की जिंदगी पर। नफेसिंह ने कहा - गांव में कुछ बातों का मजा ही अलग होता है। ताश में बूढ़ों की जीत का। ब्याह में औरतों के गीत का और बासी खिचड़ी के साथ सीत-लस्सी का मजा ही अलग होता है। भगा करके ट्रैक्टर मोड़ने का, गोड्डे से गन्ना तोड़ने का, और जोहड़ मैं सांझी फोड़ने का मजा ही अलग होता है। दूध देने में भैंस भूरी का, ब्याह में साग-पूरी का, पार्टी में चिकन तंदूरी का मजा ही अलग होता है। कुंडी में सौटा रगड़ने का, भाग कर भैंस पकड़ने का और मास्टरजी के आगे अकड़ने का मजा ही कुछ और होता है। तीन चीजों से डरना चाहिए - आग, पानी और बदनामी। तीन चीजों पर कभी मत हंसो - अपाहिज, भिखारी और विधवा। तीन चीजों को उठाने से पहले सोचो - कसम, कदम और कलम। तीन चीजों से दूर रहो - बुरी संगत, चुगली और पराई औरत। तीन चीजों के लिए मर मिटो - वचन, देश और दोस्त। तीनों को कभी छोटा मत समझो - कर्ज, फर्ज और दुश्मन। तीन चीजों के लिए लड़ो - आजादी, ईमानदारी और इन्साफ। तीन चीजों के लिए तैयार रहो - दुख, मुसीबतें और मौत। तीन चीजों के लिए सख्त मेहनत करो - प्यार, इम्तिहान और संवेदनशीलता। तीन चीजों के लिए मेहनत करनी जरूरी - अपना काम, प्यार और इम्तिहान। हरियाणा मैं मजाक करने का भी अपना ही अन्दाज सै। राम जी नै बी नहीं बक्सै। जिब मिंह ना बरसै तो कहंगे - ओ ताऊ बरस ज्या न क्यूं भा खारया सै। जिब बरसण लागै अर बरसेंए जा तो कहवैगा - ओ फूफा इब थम्बैगा अक नहीं। इसे ढाल याड़े का माणस हाथ नहीं पसारैगा। हाथ पसारने तै ब्रह्म तेज घटज्यासै कहते। भिखारी का कितै मान नहीं होत्ता। कृपण को कहते हैं यश प्राप्त नहीं होता। विषय को धन कहां भला, कड़ै शुभ दर्जा व्यभिचारी का। काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह सबतै बड्डे दुश्मन बताए। मांगना मरने के बराबर बताया गया।
विद्या पढ़ना और पढ़ाना परम्परा सै म्हारी, कोए बात ना जै याद नहीं आरी। दान करना अर करवाना भी म्हारी परंपरा रही सै। या बात दूसरी सै अक पाछले बीस साल मैं हमनै एक टका बी दान का नहीं दिया। बात का बतंगड़ बनाने में भी कुछ लोग बहोत होशियार बताये। मतलब निकलै गर्ज मिटै, ना प्रण निभाते यारी का। आड़ै लातां के भूत बातां तै कोन्या मान्या करते। एक बात सै दही कै भामै कपास खाणा। 47 तै लेकै ईब ताहिं जितने इलैक्शन हुए सैं, महारे नेता जनता के भामै कपास ख्वा कै ऐश करण लागरे सैं। बड़े-बड़े न्यों कहगे चलै ना कदे अकेला बाट। बाट की कीमत दूसरे बाटां गोल्यां होसै। औघट घाट का नहाणा न्यारा ए होसै। ईब औघट घाट के होसै यू कून बतावै। मोड्डे और कानपाड़ों का प्रदेश सै म्हारा हरियाणा। डोरी गन्डे और झाडयां का बोलबाला सै। जित ये हों उड़ै बिना लंगवाड़यां के काम नहीं चाल सकदा। इनतै बी बहोत से लोग गौरव महसूस करैं सैं। कितनी समृद्ध सै म्हारी कल्चर। छोटा समझ सांप मारण का ना करना चाहिये टाला। जितना छोटा उतना खोटा सबका देख्या भाला। यो माणस कै डंक मारदे लीला पड़ज्या छाला। नस-नस के मैं जहर फेलज्या, होवै ज्यान का गाला। के अग्नि का छोटा होसै कोन्या देर बदन मैं। चालै हवा पतंगे उछलैं आग फेलज्या बन मैं। शहर नगर और गाम फूंक कै राख बनादै छन मैं। पानी गेर बुझाणी चाहिये बड़ी समझ कै मन मैं। सच की पहचान करना मुश्किल काम सै। हरिश्चन्द्र नै सच के कारण कष्ट उठाये भारया। सच के कारण रामचन्द्र फिरया बन मैं मारया-मारया। सच के कारण राजा नल नै भोगे दुख घणे भारी। जल बिन ताल, दीप बिन मंदिर, वृक्ष नहीं बिन छाया। ज्ञान प्रेम बिन दिल सूना, जीव बिन सूनी काया। घर सूना संतान बिना न्यूं कई जागां लिख्या पाया।
बिना खूशबू ना फूल सहावै अर बाग किसा बिन माली। बिना जनता राज सूना, पेटी बिना सिपाही। बिन सवार सजै ना घोड़ी, बिना हाली खेती बोड़ी। बिना घी किसी मिठाई। अपना मारै छां मैं गेरै। मरे पाछै किसी छां अर किसा घाम? कोए चाहे कितना ए बड्डा चौधरी बन्या रहो जनता चाहवै तो एक दिन मैं धूल चटादे। देवीलाल कई बै हीरो बनाया जनता नै अर कई बै जीरो बी बनाया। बाकियां की तो बिसातै के थी। तो इन खाप आल्यां नै बी अपनी लक्षमण रेखा समझनी पड़ैगी कदे दही कै भामै खुदे कपास खाज्यां ना। जनता कितनी ए बावली हो कितनी ए अनपढ़ हो फेर इसकी कोमन सैंस है इसका कोए मुकाबला नहीं। जनता समाज मैं उठी बहस पर पैनी नजर जमारी सै। बदलाव करे सैं जनता नै पहलम बी अर ईब्बी अपने हिसाब के बदलाव वा करैगी।
---

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें