म्हारा बढ़ता व्यापार - भूख का चढ़ता बुखार
सारी दुनिया के लेवल की अर म्हारी लोकल आर्थिक स्तर पै कति माणस नै भींच्चण आली परिस्थितियां मैं तो बढ़ता ब्यौपार अर ऊंची छलांग मारता आर्थिक विकास बढ़ती भुखमरी की कान्ही धकेल कै ले ज्यावण लागरया सै। नहीं? मेरी बात झूठी सै? बे सिर पैर की सै? चलो हो सकै सै थारली बात ठीक हो फेर म्हारा इतहास तो हमनै याहे बात बतावै अर समझावै सै अक इस मुक्त व्यापार व्यवस्था के तहत म्हारे बरगे गर्म देशां तै करया औड़ कृषि निर्यात अर इसकी बढ़त हमेशा म्हारे जिसे देशां मैं खाद्यान्न उत्पादन मैं अर उसकी म्हारे देश के नागरिकां ताहिं उपलब्धता मैं गिरावट का ए कारण बनी अर म्हारे तीसरी दुनिया के देशा के जनगण-ताहिं कुपोषण के मुंह मैं धका दिया। कई जागां तो जनता अकाल के मुंह मैं भी झोंक दी इसनै। के कह्या - इन बातां मैं दम कोन्या। माड़ी सी आंख खोल कै अपणे चारों कान्हीं देखण का कष्ट तो करले मेरे बीरा। कई कृषि के क्षेत्र के माहिर लोगां नै इस बात का अंदाजा 1990 के दशक के शुरू में म्हारे साहमी प्रस्तुत कर दिया था अक इस आर्थिक संकुचन कारी माहौल के चालते भारत मैं व्यापार उदारीकरण के साथ म्हारी खाद्य सुरक्षा कमजोर पड़ैगी। आज के दिन या बात सही साबित हुई सै।
आंध्र प्रदेश का उदाहरण म्हारै साहमी सै। किसे नै कहया सै ना अक हाथ कंगन नै आरसी के अर पढ़े लिखे नै फारसी के। 1998 के बाद उड़ै पांच हजार तै बी फालतू ऋण (कर्ज) के मारे औड़ किसान अर खासकर कपास की खेती करणिया किसान आत्महत्या करने पै मजबूर हुए सैं। यो हाल तो जिब था जिब चंद्रा बाबू नायडू पूरे हिंदुस्तान का सबतै काम्मल हाईटैक मुख्यमंत्री था। उड़े की सरकार ने विश्व बैंक की गेल्या राज्य स्तर का ढांचागत कार्यक्रम लागू करण का समझौता कर राख्या था जिसके तहत उसनै बिजली के रेटां मैं पांच बर बढ़ोतरी करी थी जबकि इसे बख्त के बीच कपास की कीमत नीचे नै आई अर आधी रैहगी। पंजाब मैं भी खासतौर पै कपास उत्पादक पट्टी मैं, किसानां की आत्महत्यावां की एक हजार तै फालतू केस हुए थे। इसे तरियां केरल के वायनाड मैं 2001-2005 के बीच आत्महत्या की 1250 तै फालतू वारदात हुई थीं। उड़ै कहवा चाय तथा काली मिर्च उत्पादक किसान, विश्व की मंडी मैं इन उत्पादां की कीमतां मैं भारी गिरावट तै तबाह हो करकै हताशा मैं आत्महत्या का सहारा लेवण पै मजबूर हुए थे। म्हारे देश मैं इन दूसरे देशां मैं जान आली फसलां की खपत नाम लेवा थी। खास बात या भी थी अक म्हारे देश के इन किसानां नै फालतू मार झेलनी पड़ी थी क्योंकि 2003 के आन्ते आन्ते फसलां की खरीद बेच के धंधे मैं बहुराष्ट्रीय कंपनी पां जमावण के हालात मैं थी अर कहवा उत्पादक के हाथ अपनी पैदावार की खातर 1999 के मुकाबले मैं चौथाई हिस्सा दाम आवै अर चाय और काली मिर्च की खेती करणियां कै एक तिहाई दाम हाथ आवैं थे।
पाछले छह सालां मैं भारत ने गेहूं अर चावल का रिकार्ड निर्यात कराया सै अर इन दोनूं बुनियादी नाजां का विश्व निर्यात मैं भारत का हिस्सा काफी बढ़या सै। खास बात गौर करण की सै अक एक कान्ही तो इस दौर मैं भारत मैं कृषि उत्पादन की वृद्धि मैं कसूती गिरावट आवण लागरी थी दूजे कान्हीं 2002 अर 2003 के दो सालां मैं भारत ने 2 लाख टन नाज का निर्यात करया। उसके कुल निर्यात मैं नाज का हिस्सा पांचवें हिस्से तै बधकै चौथे पै पहोंचग्या। यू क्यूकर हो पाया? पैदावार कम अर निर्यात फालतू। म्हारे देशवासियां नै भूखे राख कै ए यो संभव हो सकै था। किसान अर मजदूरां की आय मैं भारी गिरावट आई। भारत मैं नाज की प्रति व्यक्ति खपत बहोत नीचै चली गई। बड़े पैमाने पै निर्यात हुया, गोदामां मैं नाज पड़या सिड़ै, लाखां टन अनाज नै मुस्से खागे फेर गरीब किसान मजदूर भूख तै मरदा रहया। काम के बदले नाज बरगी बढ़िया स्कीमां का भी बैंड बजा दिया।
चारों कान्हीं संकट बध्या। हाईटैक मुख्यमंत्री तै जी भरग्या जनता का अर पाछले चुनाव मैं जनता नै केंद्र की सत्ता मैं बदलाव ल्याकै इस बात की अपेक्षा करी थी अक वर्तमान सरकार किसानां की आत्महत्यावां का कोए पुख्ता इलाज टोहवैगी। जनता का जनादेश अर संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार। दो साल हो लिए लोग मुंह बायें बाट देखैं सैं। हरियाणा मैं किसानां की इस संकट करकै आत्महत्यावां की पिछाण करण की क्षमता कोन्या। ना तो ये जितने युवा लोग-लुगाई सल्फास की गोली खा-खा कै मरण लागरे सैं, इन मां तै दो तिहाई किसानां के बेटा-बेटी सैं। आई किमै समझ मैं? गेर रै गेर पता गेर अर बाज्जी पूरी कर। इसकी तो आदत सै इसा लिखण की। देखियो मेरे बीरा ताश की बाज्जी नहीं ज्यान की बाज्जी का सवाल सै।
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