सोमवार, 17 अक्टूबर 2016

खाप और महिला


पितृसत्ता महिला, पुरुष के जीवन पर गहरी छाप छोड़ती है और इन दोनों को तयशुदा भूमिका मैं फिट कर देती है। कसूती तरियां ढाल देती है महिलाओं को। एक व्यक्ति के रूप में महिला पुरुष अपने लिए कौनसा और कैसा जीवन चुनैं, किसे कामों को पसन्द करैं और आपस मैं किसा रिश्ता पसन्द करैं हरियाणा के समाज मैं इसकी कोए गुंजाइश नहीं है। पितृसत्ता के द्वारा रच्या गया सारा माहौल महिलावां पै ढाल-ढाल के रंग की हिंसा नै बढ़ावा देवै है। इस माहौल नै ठीक करना बहोत जरूरी है ना कि इसको और बिगाड़ दें हम। यो खराब माहौल क्यूकर ठीक कर्या जा सकै सै यो विचार करने का गम्भीर मामला है।
फेर एक बात सही सै अक अपनी मरजी तै ब्याह करने वालों की हत्या करने वालों को सम्मानित करना समस्या का समाधान तो किसी भी सभ्य समाज में नहीं बताया जा सकता। एक खास बात और सै अक इस पितृसत्तात्मक व्यवस्था मैं सिर्फ महिला ही नहीं पुरुष बी पीड़ित हैं। इस करकै या माहौल ठीक करना, पितृसत्ता को चुनौती देना दोनूआं के हक मैं है। इस करकै पितृसत्ता को चुनौती देना, इसनै झकझोरना अर आखिर मैं इसको ढाह कर जनतांत्रिक प्रणाली कायम करना बहोत जरूरी है ताकि महिला पुरुष समानता आले समाज की स्थापना की तरफ कदम बढ़ाये जा सकैं, संघर्ष मिलजुल कै कर्या जा सकै। स्वभाविक है कि इन हालातां मैं महिलाएं अर पुरुष अपनी-अपनी धार्मिक परम्परावां मैं जात के रीति रिवाजां मैं अर कायदे कानूनां मैं घिरते जान लागरे सैं और हम सबकी एक इन्सान की छवि और घणी खराब होवण लागरी सै।
संविधान मैं दिये गये म्हारे ज्यादातर नागरिक अधिकार कागजी सैं। ये अधिकार हरियाणा के 80 प्रतिशत से भी फालतू परिवारां मैं परिवार की दहलीज लांघ कर अन्दर नहीं घुस पाये। इसका श्रेय म्हारे हरियाणा की खाप पंचायतों को और म्हारे दकियानूसी विचारों को जाता है। इस मामले मैं हरियाणा नम्बर वन सै। इंदौर की शाहबानों का केस, मुजफ्फरनगर की इमराना का केस, जौन्धी, आसन्डा, नयाबास, लिस्ट बहोत लाम्बी सै। कानून इनके हक मैं होते हुए इनको इनके हक नहीं मिले। संघर्ष करना पड़रया सै।
इन बातां नै महिलावां के साहमी एक बात तो साफ करदी अक उनके हक मिलना इन धर्मों, जात गोत अर खाप पंचायतां के रहमोकरम पर है नाकि म्हारे देश के कानून पर। शाहबानों अर सोनिया हर के केस तै महिलावां की अपने वजूद की लड़ाई की इच्छाशक्ति साहमी आई सै। एक बात और साफ होगी अक महिलावां पर और युवा लड़कियां पर होवण आली हिंसा अर महिलावां की घटती हुई संख्या को ठीक करना है तो महिला को संघर्ष करने का बीड़ा उठाना पड़ैगा।
जैविक लिंगभेद से सामाजिक लिंगभेद तक पहुंचने के इतिहास और सामाजिक सांस्कृतिक आधारां नै समझ कर ही हम इस मुद्दे पर कुछ ठोस काम सोच अर कर सकां सां। मानव विरोधी, महिला विरोधी, दलित विरोधी, युवा विरोधी, गरीब विरोधी इतिहास को बदलने अर उसकी जागां समता के मानवीय मूल्यों को हटकै स्थापित करने की बहोत जरूरत है। समाज मैं आये बिगाड़ को ठीक करने का हथियार खाप के ये फतवे नहीं हो सकदे। इसपै बैठ के विचार करना पड़ैगा। दिमाग पर जोर देकै विचार करने तै परहेज छोड़ना पड़ैगा। आई किमै समझ मैं! महिला और पुरुष दोनूआं की लामबन्दी जरूरी सै, इस समाज मैं आये बिगाड़ को ठीक करने की खातर। इसनै ठीक करने के बी कई नुस्खे लेकर घूमैं सैं म्हारे बरगे। मूलभूत समाज सुधार बिना काम कोन्या चालै। इसपै फेर कदे सही।

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