सोमवार, 17 अक्टूबर 2016

लय सुर मैं बतलाये

लय सुर मैं बतलाये
सत्ते, फते, नफे, मुरारी लाल, अली बक्स, सविता, कविता, सरिता अर धापां ताई सब शनिवार की बैठक मैं आये। कविता अपनी बात कहना शुरू करती है - बिना लड़ाई सुणले ताई, पार म्हारी जाणी ना। सरिता उसके सुर में सुर मिलाकर एकदम कहती है - हमनै ताई मारै महंगाई, काट्या मांगै पाणी ना। मुसद्दी लाल कहता है कि मेरे दिल की बात कैह दिती। पहले दे मुकाबले हुण गुजारा बहोत मुश्किल है। सविता कौनसा पीछे रहने वाली थी, उसने बात कुछ इस तरह फरमाई-या महंगाई बेकारी तो, घणी कसूती मार करै। लुटेरे की जात मुनाफा, जात भूल कै वार करै। राम नाम की माला देकै, बेड़ा अपना पार करै। राजनीति से हमको लूटै, दूर रहो प्रचार करै। नफे सिंह से कहां चुप रहा जा सकता था। बहुत बेचैन हो रहा था, वह बोला - टाटा की जाई या महंगाई, हमनै नब्ज पिछाणी ना। अली बक्स कह उठा बहुत खूब। क्या छन्द में छन्द मिलाया है। इस महंगाई ने तो किबला हद कर दी।
सरिता ने कहा - ये कीमतें तो इस राज में भी बढ़ती ही जा रही हैं। गैस सिलेंडर की कीमत 290 से ऊपर चली गई है। अलीबक्स और सरिता की बात सुनकर सत्ते भी जोश खा गया और सुनाने लगा - आज म्हारी थारी तनखा, दो-तीन गुणी घटज्या सै। दबकै बाहणा कोन्या खाणा, कीमत दूनी घटज्या सै। क्यों म्हारे जिस्यां की जिन्दगी, अलूणी कटज्या सै। नये लुटेरे पैदा होगे पुराने राजा राणी ना। वाह भाई सत्ते चाला पाड़ दिया। सही बात सै खेती मैं जो चाहिये उसकी कीमत बधती जावै, म्हारी फसल की कीमत घटती आवै, किसान मंडी मैं खड़या लखावै। कविता नै बी छोंक ला दिया। अलीबक्स ने गला साफ किया और पूरे सुर में गाने लगा - जाट बाह्मण का झटका, हम सुणते गलियारे मैं। हिन्दू-मुस्लिम का फटका, मिलै हरियाणा सारे मैं। यो प्रोमोशन का लटका, कहै ना रलता थारे मैं। इसी गुट बंदी होसै गन्दी, रोकै कुन्बा घाणी ना।
अपना गाना गाने के बाद अलीबक्स ने फरमाया - एक बार एक गरीब औरत की बेटी सरोज रोने लगी। वह भूखी थी। घर में खाने को कुछ था नहीं। उसकी मां ने उसे बहलाने-फुसलाने की बहुत कोशिश की मगर वह लड़की सरोज रोती रही। मां ने उसको दो-चार थप्पड़ बी लगाये पर रोना बंद नहीं किया। इतनी देर में पड़ोसन आ गई और पूछा कि लड़की क्यों रुआ रखी है? सरोज की मां बोली - रोटी मांगै सै। पड़ोसन ने कहा - फेर दे दे नै रोटी। मां बोली अक रोटी कित सै? पड़ोसन ने दो मिनट सोचा और बोली - आच्छा तो सरोज को वहां ऊपर टांड पर बिठा दे। सरोज की मां बोली - वहां क्या रोटी धरी सै? पड़ोसन बोली - एक बार बिठा तो सही। मां ने सरोज को टांड पर बैठा दिया। सरोज रोती तो रही पर उसका रोने का सबब बदल गया। जल्दी ही सरोज ने कहा - मां मुझे टांड से नीचे उतार दे रोटी चाहे मत दिये। सरोज की मां ने सरोज को नीचे उतार दिया। सरोज ने रोना बंद कर दिया। यह टोटका सुनकर अलीबक्स ने कहा - जब हम रोटी और रोजगार मांगते हैं तो हमें म्हारे नेता हमनै जात-पात-धर्म आदि की बात करकै टांड पर बिठा देते हैं और हम लड़ते रहते हैं वहां और फिर मांग करते हैं टांड से नीचे उतारे जाने की। हमें उतार दिया जाता है टांड से और तब तक हम अपनी रोटी, अपने रोजगार की बात भूल चुके होते हैं। रोना बंद कर देते हैं।
नफे सिंह बोल्या - बिल्कुल ठीक बात कही सै। अलीबक्स नै अक पहलम तो आपां नै इस जात-पात के टांड पर से उतरना चाहिये पर उस लड़की सरोज की तरह रोना बंद नहीं करना चाहिये। अपनी असली तकलीफां पै कट्ठे हो जाना चाहिये। और ईब मेरी बी सुणल्यो - हिरण की डार भली हो, रल मिल कै चालै भाई। माणस जूनी ले कै भी क्यों एकला हालै भाई। बैरी एक तोड़ण नै, टांड बीच मैं डालै भाई। चौधर कितै माल बिकाऊ, घर कसूते घालै भाई। ये कमजोरी हमनै खोरी, या समझण मैं हाणी ना। ताई धापां इन सबकी बात चुपचाप सुणण लागरी थी। बहोत मजा आया उसनै इतनी काम्मल-काम्मल बात सुणकै। फेर रह्या उसतै बी कोन्या गया अर वा बोली - मतभेद भूलकै हमनै, एक मंच पर आणा हो। किसानमजदूर सब भाई, मिलकै साथ निभाणा हो। हरियाणा आगै बढ़ैगा ले एकता का बाणा हो। हक लेन की म्हारी लड़ाई, ना पाछै कदम हटाणा हो। कहै धापां ताई फेर बचैगी महंगाई माणस खाणी ना।
सबने बहोत जोर-जोर से तालियां बजाई। मुसद्दी लाल बोला ताई तो छिपी रुस्तम निकली। हमें क्या पता था ताई भी इतनी लय और सुर में बातें कर लेती है। धापां ताई ने कहा - बख्त की बात हो सै। लय सुर मैं बात करने का गुण तै हरेक मैं हो सै। फेर मौका ए कित मिलै सै इस ढाल की बात करने का। लगे रहवां सां काम मैं ‘कोल्हू के बैल की तरियां’। ना दिन का बेरा ना रात का बेरा। कहया करैं ना अक दबी मूस्सी कान कटावै ओ हाल सै म्हारा तै। लाचारी मैं बेरा ना के के नुकसान ठाणा पड़ै सै। इस सारे मामले मैं किसा लय अर सुरताल बणैगा। इसपै इतना एक कह्या जा सकै सै अक इसी धुन लिकड़ैगी जो आज ताहिं ना ते लख्मी दादा तै लिकड़ी अर ना बाजे भगत तै।
सरिता बोली - माणस करोड़पति तै रातों रात कै एक दो साल मैं ए काला धन कमाकै क्यूकर अरबा पति होज्यां सै इसका तो जिकरा ए कोन्या रहया कितै। फेर जै कोए धौली कमाई करकै अपना हक मांगै तो लाठीचार्ज। वो सुर बी न्यारा ए हो सै। जड़ लोगां नै एक लय अर सुरताल मैं बतलाना पड़ैगा जिबै यो बहरा राजपाट कुछ सुणैगा।

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