यह पूंजीवादी औद्योगिक सभ्यता भले ही बाहर से चमक दमक आली नजर आती हो लेकिन इसके कितने घातक प्रभाव हमारे जनजीवन पर पड़ रहे हैं उसका किसी को अहसास नहीं है। इसके भीतर का कालापन बहोत वारी समझ मैं आवै सै। इसनै हवा, धरती अर पाणी सब मैं जहर घोल कै गेर दिया। प्रदूषण का धर्राटा सा बांध राख्या सै। वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के अंतर्गत काम करने वाले स्वायत्त संगठन क्वालिटी कौंसिल ऑफ इंडिया - क्यू सी आई - की हालिया रिपोर्ट ऐसा ही सच बयां करै है। पिछले पांच सालों के दौरान दिल्ली, कोलकाता, मुंबई, चेन्नई, हैदराबाद, बंगलूर आदि महानगरों में लगभग चौबीस हजार बच्चों की स्वास्थ्य जांच-परीक्षण तै बेरा पाट्या सै अक 51 फीसदी बच्चों के रक्त में जहरीले सीसे की मात्रा घातक स्तर तक पहोंच ली है। इन बारह वर्ष से कम उमर के बालकां के खून मैं जो सीसे की मात्रा 10 माइक्रोग्राम पर डेसी लिटर हो तो उससे बुद्धि-लब्धि (आई क्यू) में चार से छह इकाई की कमी आ ज्यावै सै। इसके चलते बच्चों के स्वाभाविक विकास और बौद्धिक स्तर पर घातक प्रभाव पड़ रे सैं। यो सारा काम ल्हुकमा ल्हुकमा होरया था। मुनाफे की खातर ये कम्पनियां कड़े ताहिं गिर सकैं सैं इसका अन्दाजा लाया जा सकै सै। चौंकाने वाली बात यह है कि यदि यह सर्वेक्षण न होता तो अभिभावकों को इस बात का अहसास ही नहीं होता कि उनके बच्चों के असामान्य व्यवहार की वजह के है? रिपोर्ट बताती है कि स्कूल की दीवारों, स्कूल की बसों, खेल के मैदान में लगे झूलों, खिलौनों तथा घरों की दीवारों में लगाये गये पेंट की वजह से समस्याएं साहमी आई हैं। रिपोर्ट बताती हैं कि भारत में उत्पादित होने वाले अस्सी प्रतिशत पेंट में सीसे की मात्रा घातक स्तर तक शामिल सैं। वास्तव में सीसे वाली पेंट की समस्या से जूझने वाले प्रमुख पेंट उत्पादक देशों में चीन, ताइवान और मलेशिया भी शामिल बताये। चीन और ताइवान में सीसायुक्त पेंट बनाने के लिए बाकायदा कानूनी प्रावधान लागू किये गये सैं। लेकिन भारत में ऐसा कोई कानून नहीं बनाया गया इब ताहिं। असल में सीसायुक्त पेंट की लागत सामान्य पेंट के मुकाबले 25 फीसदी अधिक आवै है, इसलिए अपने मुनाफे को बढ़ाने के लिए पेंट उत्पादक कंपनियां सीसे का उपयोग धड़ल्ले से करण लागरी सै। लेकिन इस दिशा में न तो सरकार और न ही पर्यावरण संगठनों में कोई सार्थक पहल करी है।
इस सर्वेक्षण को करवाने वाली क्वालिटी कौंसिल ऑफ इंडिया ने वाणिज्य मंत्रालय से इस दिशा में अविलम्ब कानून बनाने की मांग करी सै ताकि देश मैं सीसायुक्त पेंटों का उत्पादन अनिवार्य हो सके। भला हो अक कानून बनाने की सिफारिस तो करी। देखियो कानून कितने साल मैं बनैगा। खास बात या सै अक पीले पेंट मैं सीसे की मात्रा खतरनाक स्तर तक बताई अर सफेद पेंट मैं सीसे की मात्रा न्यूनतम पाई गई। इसके अलावा अमरीका अर दूसरे देशां की तर्ज पर पेंट में सीसे की मात्रा के न्यूनतम मानक यथाशीघ्र घोषित किये जावैं जो कि अब तक भारत में भयावह स्तर तक विद्यमान हैं। आई किमै समझ मैं अक नहीं। हुक्के पर बैठ के चरचा करनी पड़ैगी इन सब बातां की। म्हारे नेतावां ताहिं बताना पड़ेगा अक यू के खेल सै इन कम्पनियां का? कुछ तो लगाम इनकै कसी ए जानी चाहिये। ये बेलगाम छोड़दी तो दो साल मैं भारत नै पढ़ण बिठा देंगी।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें