सोमवार, 17 अक्टूबर 2016

किसानी का संकट

किसानी का संकट
फर्रुखाबाद, कानपुर देहात, कन्नौज, इटावा, अर उन्नाव जिल्यां के किसान उत्तरप्रदेश में पैदा होवण आले आलू का 60 प्रतिशत पैदा करैं सैं। पहलम मैं वे कृषि के वैज्ञानिकां धोरै अपनी फसल बधावण के टोटके बूझया करदे, ईब कैन्यों बूझैं सैं अक आलू की पैदावार कम क्यूकर करां। उल्टे बांस बरेली नै। ये सन 2002 की बात सैं। शीत घरां मैं 69 लाख टन आलू भरया पड़या था अर 25 लाख टन खेतां मैं पड़या सड़ण लागरया था। इसे ढाल एक बात और जिब चौ. चरण सिंह प्रधानमंत्री थे, जिब लोगां ने ईख-खेत मैं फूंक्या था। ईख के दाम पिटगे थे। झोटा बुग्गी का भाड़ा बी पूरा कोन्या होवै था। न्योंए गिहुआं के भा पिटे। एक बै चावल पिटया अर सिरसम की तो बूझो ऐ मतना। किसान ज्यूकर म्हारे देश का रिवाज सै, वो अपना सिर पाकड़ कै अपनी किस्मत नै रोवण लागज्या सै कै सल्फास की गोली खा कै ऊपर बख्त तै पहोंच जावै सै। किसान की फूटी किस्मत का मामला यू सै ए कोन्या। फसल आच्छी फेर बी टोटा। असल मैं केंद्र सरकार की बुद्धि भ्रष्ट होंती जावण लागरी सै। विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष अर डब्ल्यूटीओ की शर्त मानण के नाम पै उसनै अपने किसान अनाथ बनावण का ठेका ठा लिया।
सब्सिडी खत्म करण के नाम पै उसनै खाद के कारखाने बंद करवा दिये खाद पै सब्सिडी खत्म करकै। किसानां ने म्हंगे दर पै खाद मिल्या, खपत फालतू चाहिए, बिजली अर पानी की दर बधा दी। फेर बिजली पानी बख्त पै मिलज्या किसानां नै इसकी कोए जिम्मेदारी नहीं सै सरकारां की। बधे औड़ बिलां नै उसूलना उसका काम सै अर जै सहकारी बैंकां की किस्त जमा नहीं करवाई हो तो 21 दिन ताहिं जेल मैं बंद करण का काम सैड़ फैड़ तैड़ देसी करदें सैं। फेर एक खास बात या सै अक इन शर्तां नै लादण आला देश अमरीका कुछ औरे करण लागरया सै। अमरीका की सरकार नै सरकार द्वारा दी जावण आली किसानां की सब्सिडी मैं बढ़ोतरी कर दी। 2002 मैं अमरीका नै अपने ‘फार्मर्स विधेयक’ के माध्यम तै अपने किसानां ताहिं 300 बिलियन डालर की दी जावण आली 58 फीसदी तै बधा कै उसमैं 173.5 बिलियन डालर का इजाफा कर दिया। इसतै न्यारा दूसरे देशां की मंडी पै कब्जा जमावण की खातर अमरीका न्यारी-न्यारी फसलां नै भी सब्सिडी देवै सै। मिसाल के तौर पै एक टन सोयाबीन के पाछै 193 डालर की सब्सिडी देवै सै अर सोयाबीन नै 155 डालर प्रति टन के हिसाब तै बदेशां मैं बेचै सै। इसका नतीजा साफ सै अक दूसरे देशां का जिसमैं भारत बी सै, सोयाबीन धरया का धरया रैहज्या सै। सोने पै सुहागा यो सै अक म्हारे देश के महान अर्थशास्त्री न्यौं कहवैं सैं अक जै म्हारे देश का किसान इतना आलसी अर बेकूफ सै अक ओ अमरीका के किसानां तै महंगा सोयाबीन तैयार करै सै तो उसका खामियाजा ग्राहक क्यों भरै? जै अमरीका का किसान भारत के मध्यम वर्ग मैं सस्ता सोयाबीन उपलब्ध करवा सकै सै तो इसका लाभ उसनै जरूर ठावना चाहिए। उसनै भारत के ‘आलसी’ किसान तै के लेना देना? फेर या सच्चाई साहमी कोन्या आन्दी अक म्हारे भारत देश का किसान नकारा कोन्या, म्हारे देश की सरकार नकारी सै जो अपने किसानां नै दी जावण आली तमाम सुविधा भूमंडलीकरण की नीतियां के दबाव मैं समाप्त करण लागरी सै अर अमरीका जो सारे कायदे कानूनां नै अर समझौत्यां नै धत्ता बता के अपने किसानां की सब्सिडी बधावण लागरया उसके खिलाफ मुंह बी कोन्या खोलती। नतीजा किसानां द्वारा रोज आत्महत्या सल्फास की गोली खा कै।
म्हारी सरकार ने सब्सिडियां पै ए कुल्हाड़ी कोन्या चलाई, इसके साथ-साथ किसानां की फसल की खरीद बी करीब-करीब बंद करकै छोटे अर मध्यम किसान बाज़ार के हवालै कर दिये। मंडी नै खुली लूट की छूट मिलगी। मंडी के आढ़तियां के शोषण तै किसान आच्छी ढालां वाकिफ सैं। चिट बी मेरी पिट बी मेरी। हरेक ढालां किसान की मर सै। किसे नै कहया सै ना अक चाहे खरबूजे पै चाकू पड़ै अर चाहे चाकू पै खरबूजा पड़ै कटना तो खरबूजे नै ऐ हो सै। तो किसान की मंडी मैं लूट बी इसे ढालां की सै। देन्ती हाणा बी उसकी लूट अर लेन्ती हाणा बी उसकी लूट। हरित क्रांति के दुष्परिणाम ईब साहमी आवण लाग लिये। लागत बधती गई अर भा बढ़े कोन्या। दूसरा कीटनाशक दवाइयां के, कैमीकल खाद के अंधाधुंध इस्तेमाल नै धरती की उपजाऊ ताकत कम कर दी। पानी का स्तर घणी डूंघै चल्या गया। पैदावार मैं खड़ौत आगी। जड़ खेती तै किसान की जो पहलम गुजर-बसर हो जाया करती उसपै सवालिया निशान लाग लिया। फसल चक्र बदलन की वकालत अर ओरगेनिक फार्मिंग का शगूफा छोड़ दिया गया बिना सोचे-समझे। असल मैं दूसरे देशा की जरूरत तय करण लागरी सै अक म्हारे किसान नै खेत मैं के बोवणा चाहिए। एक और बात होगी अक इन सारी बातां के चालदे जो भी किसान अपनी फसल नै जल्दी-जल्दी मंडी मैं लेजा कै बेच्चण नै मजबूर सै उसनै तो घाटे का सौदा करना ए पड़ै सै। आढ़ती की मनमानी का शिकार होना पड़ै सै।
भारत के अलग-अलग प्रदेशां मैं किसानां की आत्महत्यावां कै पाछै उनका निकम्मापन, उनका अैहदी पना नहीं सै। उसकी इस करकै फसल आच्छी नहीं हुई यू कारण कोन्या। असल मैं कारण तो यू सै अक फसल घणी बढ़िया होगी फेर मंडी मैं उसके दाम इतने गिरगे अक उसकी लागत बी कोन्या मिलती। इसमैं किस्मत का रोला नहीं सै यू नीतियां का रोला सै। लाखां परिवारां पै तलवार लटकै सै अर इनकी साथ खेत मजदूरां की जिंदगी बद तै बदतर होत्ती आवै सै। राशन की व्यवस्था ऊं चौपट करदी सरकार नै। समस्या और भी गंभीर होगी। यूपीए सरकार क्यूकर सामना करैगी यू जनता आण आले बख्तां मैं देखैगी। देख भी ली। बदल ल्यादी। बदल नै और भी तेजी ल्यादी। थोड़ी लिखी नै ज्यादा समझियो।

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