खाट का आंदोलन
खाट ग्रामीण आंचल मैं सबतै आरामदेह उपकरण सै, जिसका इस्तेमाल थक हारकै आये किसान अर कामगार के विश्राम करण की खातर अर सोवण की खातर करया जा सै। गाम की चौपाड़ मैं कै बैठकां मैं लोग खाटां पै बैठकै ए गपशप करया करैं अर होक्के की घूंट मारें जाया करैं। जिन बख्तां मैं सोफा अर बैड नहीं आये थे उन बख्तां तै खाट का रिवाज चाल्या आवै सै। इसकी कीमत बी घणी ना सै अर गाम का कोए बी माणस इसनै खुद बी बना सकै सै।
सितंबर की पन्दरा तारीख धोरै सी चित्तौड़गढ़ के अचलपुरा गाम मैं दलितां नै एक खास ढंग तै अपना प्रतिरोध दर्ज करवाया। नेड़े धोरे के गामां के लोग जो दलित समुदाय के थे अपनी साथ खाट ले कै आये। ये खाट धोरै-धोरै बिछाकै इनपै बैठे अर गाम गुहांड मैं सामन्ती उत्पीड़न के खिलाफ क्यूकर आवाज़ ठाई जावै इसपै चर्चा करी। खास बात या रही अक इस बैठक मैं स्टेज का काम भी खाट तैए लिया गया। न्यूं देखां तो आड़ै ‘खाट’ प्रतिरोध के एक प्रतीक के रूप मैं उभर कै आई। इस प्रतीक की ताकत नै समझण की खातर हमनै उत्तरी भारत के यथार्थ तै रूबरू होना पड़ैगा। पूरे उत्तरी भारत मैं दलित समुदाय राजनीतिक ए नहीं, आर्थिक अर सामाजिक वंचना के भी शिकार रहे सैं अर आज बी सैं - दुलीना, हरसौला, गोहाना इसकी जीती जागती तसबीर सैं। मुख्य रूप तै सत्ता प्रतिष्ठानां के दायरे तै बाहर रहवण आला यू वर्ग आर्थिक तौर पै संसाधन विहीन रहया सै। कृषि प्रधान आर्थिक व्यवस्था मैं धरती गुजर बसर की सुरक्षा अर खुशहाली का ए स्रोत नहीं होत्ती बल्कि समाज मैं माणस की हैसियत का भी प्रतीक होया करै।
आज़ादी के बाद भी उत्तर भारत मैं भूमि सुधार की दिशा मैं कोए ठोस कदम कोन्या ठाये गये जिस करकै दलितां की स्थिति मैं कोए विशेष बदलाव कोन्या आया। फेर आरक्षण के चलत्ते दलितां मैं जो राजनीतिक नेतृत्व उभर कै आया, प्रशासनिक तन्त्र मैं उनकी जो थोड़ी हिस्सेदारी बधी, उस करकै इनमैं अस्मिता बोध विकसित होना लाजमी बात थी। दलित समुदाय नै एक दौर सै जिब खुद की पहल करकै नये ढाल के काम-धंधे अपनाये अर अपने खून पसीने तै आर्थिक बेहतरी के जतन करे। इस बदलाव नै म्हारी पुरानी सामाजिक व्यवस्था अर मान मूल्यां ताहीं गंभीर चुनौती दी सै। इसकी सबतै फालतू बेचैनी सामंती शक्तियां मैं देखी जा सै। एक सवाल तै उठै ए सै दिमाग मैं अक इसा सर्वसुलभ उपकरण सै खाट फेर इसपै बैठण ना देवण की मनाही का असल मैं के मतलब सै? जै इसकी गहराई तै पड़ताल करां तै बेरा लागैगा अक छुआछूत कहवण की खातर खत्म हुई सै। हरियाणा के किसे गाम का लेखक नै बेरा कोनी जित छत्तीस जात के लोग एक कुएं तै पानी भरकै ल्यांदै होवैं। हो सकै सै एकाध गाम हो इसा। जै कोए इसा गाम हो तै एक पोस्ट कार्ड लिखकै जरूर गेरियो। मन्दिरां मैं दलितां के जावण पै रास्सा छिड़ज्या। असल मैं म्हारे सामाजिक ढांचे मैं दलितां की उपेक्षा अर वर्जना मौजूद सै जिस करकै दलित अमानवीय अर त्रासद जीवन जीवण नै मजबूर सैं। इसमैं असल मैं सवर्ण लोगां का भी अमानवीकरण निहित सै। या जात ढेरयां आला कुड़ता सै जितनै पहरे रहवैगा समाज उतनै खाजले कुत्ते की ढालां दुखी रहवैगा।
खाट पै बैठण की लड़ाई असली मैं एक दलित की वैयक्तिक गरिमा की लड़ाई सै। उसके आत्म सम्मान का मसला सै। या बात आज समाज नै समझनी बहोत जरूरी सै। दलित नै हाशिये पै गेर कै समाज का विकास अधखबड़ा अर बेसुरा रहवैगा, इस बात मैं शक की कति गुंजाइश नहीं सै पर फेर बी म्हारे या बात जचती कोन्या। इसे करकै हरियाणा मैं इननै दाबकै राखण के करतब म्हां बीच कै सामन्ती तबके दिखात्ते रहवैं सैं। समाज करवट लेवण लागरया सै। दलित, महिला, युवा आज के दौर मैं बाजारीकरण के सबतै फालतू शिकार हो रे सैं। दूजे कान्ही ये वंचित तबके अंगड़ाई बी लेवण लागरे सैं। अपने आत्म सम्मान अपनी मानवता अपनी इंसानियत बचा कै राखनी सै तो खाट आंदोलन बरगे आंदोलनां मैं तहेदिल तै शामिल होना पड़ैगा आज, आज नहीं तो काल, काल नहीं तो परसों। किसे नै कहया सै अक जब सन् की रस्सी न्यारी-न्यारी पड़ी हो सै तो कुछ नहीं कर सकदी फेर इसनै कट्ठा करकै जब एक रस्सा बना दिया जावै सै तो यो बड़े-बड़े हवाईजहाजां नै खींच ले ज्यावै सैं। सामाजिक असमानता सामाजिक असुरक्षा की जननी सै। जै समाज मैं सुरक्षा लयानी सै तो सामाजिक असमानतावां कै खिलाफ आवाज़ ठावणी बहोत जरूरी सै, फेर ठावै कौण? या तो सब चाहवैं सैं अक समाज मैं भगत सिंह हटकै पैदा होज्या पर, पड़ौसियां के म्हारै नहीं। म्हारे बालकां नै कैरियर बणावण तै कड़ै फुरसत सै।
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