सोमवार, 17 अक्टूबर 2016

फिलम अर समाज के विल्लेन


कोए बी फिलम ठाकै देखल्यो! उसमैं एक हीरो पावैगा - जवान, ताकतवर अर गुणां तै भर्या। ऊं चाहे दुबला पतला हो फेर उसके घूंस्या तैं बड़े-बड़े दारा पहलवान बी चित होज्यां सैं। हर हाल मैं जीत हीरो की होन्ती दिखाई जावै सै। असली दुनिया मैं तो इसतै ठीक उल्टा होन्ता दीखै सै हमनै। फिलम तै न्यारी इस ढाल की बात सपने मैं तो हो सकैं सैं। फेर वा फिलमै के हुई जो जनता जनार्दन नै असलियत तै कोसां दूर ना खींच कै लेज्या। हरेक फिल्म मैं एक बुरा (भुण्डा) माणस जरूर पावैगा। हाफ टेम तै पहलम नहीं तो हाफ टेम पाछै पावैगा। इसनै जनता जनार्दन विल्लेन कह्या करै। पाछले पचास साल की बनी फिलमां पै एक नजर मारकै देखां तो इसा लागै सै अक इस विल्लेन का रूप-रंग बख्त के हिसाब तै बदलता आया सै। विल्लेन किसा होगा - या बात उस बख्त के हालात गेल्यां जुड़ी बताई गई। आमतौर पै समाज मैं सबतै फालतू जुलम करण आले नै ए फिलमकार विल्लेन बनाता आया सै। हीरो शुरू मैं असली जिंदगी तै जितना दूर हुआ करता, विल्लेन असली जिंदगी के उतने ही नजदीक। देश की आजादी आई। उस पाछै शुरू-शुरू मैं जो फिलम बनी उनका विल्लेन था जमींदार।
वो सफेद धोती-कुर्ता पहर कै, मूंछा पै तांव देन्ता दिख्या करदा। पत्थर-दिल जमींदार हुक्का गुड़गुड़ाता, गरीबां की जमीन हड़पता। मजदूर औरतां का बलात्कार करता। कै गाम का सरमायेदार, सूदखोर हुया करता ज्यूकर मदर इंडिया का कन्हैया लाल। फेर जमाना आया कारखाने का। औद्योगिक क्रांति हुई फ्रांस मैं अर मशीन का जमाना आया। इस दौर का विल्लेन बन्या कारखाने का मालिक। वो मजदूरां के खून-पस्सीने तै बने महलां मैं रहया करता। पैंट कोट आला यो विल्लेन मजदूर यूनियन मैं फूट डलवाता, मार-पिटाई करवाता। कारखानेदार के रंग-ढंग न्यारे थे। उसतै आगला विल्लेन आया डाकुआं का सरदार। काले लत्ते, काला टीका अर हाथ में बंदूक, रात नै दारू मैं मस्त। खून खराबा, चोरी, बलात्कार उसके कारनामे हुआ करदे। सहज-सहज उस विल्लेन नै फेर शहरी रूप ले लिया। वो पुरानी कीमती मूर्तियां अर जेवर चुराकै बेच्या करता। देश की जानकारी विदेशां मैं बेच्या करता। नशीली दवाई ल्याकै भारत मैं बेचता। हथियारां का गल्त धंधा करता, बड़े-बड़े होटलां के नीचे खुफिया गुफावां मैं अपना अड्डा बनाता। लाल-हरे बटन दबाये जाते, दरवाजे खुलते अर बंद हो जान्ते अपने आप फेर जाकै कितै विल्लेन धौरे पहोंच्या जाया करदा। यो विल्लेन कदे आधा गंजा तो कदे मात्थे पै सांप बिच्छु बनवाये हुआ करता। आज के विल्लेन मैं अर हीरों मैं फरक करना मुश्किल होग्या।
आज की फिल्मां का विल्लेन साफ धौले लत्ते पहनै सै। गरीबां की बस्तियां जलवान्ता वार कोन्या लान्ता। दंगे करवावण मैं माहिर पावैगा। ढाल-ढाल के घोटाले करवान्ता पावैगा। इतना बुरा अक उसकै साहमी बुराई बी चक्कर खाज्या। एक और तरहां तै न्यूं बी कह्या जा सकै सै अक सहज-सहज विल्लेन हीरो बनता चाल्या गया। भीख मांगण की जागां बूट पालिश करकै जीवन जीवण का सपना देखण आले बालक अर कै लैंप पोस्ट की रोशनी मैं भी पढ़कै अपना कैरियर बनावण का जतन करने आले किशोर जब युवक बने तो उननै बेरोजगारी हाथ आई। यो पढ़या-लिख्या बेरोजगार ‘श्री 420’ तै अपनी यात्रा शुरू करता हुआ ‘मेरे अपने’ 1971 अर ‘अंकुश’ 1985 मैं गलियों अर मोहल्यां मैं गुंडा गरदी करदा पावै सै। उसमैं फासीवादी राजनीति के कुचक्र मैं फंसण की संभावनाएं पैदा होवन्ती लागैं सैं। बीसवीं सदी के अंत तक आन्ते-आन्ते वो अपराध की दुनिया का स्थायी बाशिंदा बणज्या सै। बूट पालिश करण नै गरिमापूर्ण जीवन जीणे का अवसर समझण आला वो बच्चा गाभरू होकै स्मगलर (दीवार: 1975) बनता दीखाई दे सै। आज के दिन ओ एक कदम और आगै बध लिया अर माफिया गिरोह का सदस्य बणज्या सै (सत्या: 2000)। जिसतै क्रांति की उम्मीद करी जावै थी वो माफिया गिरोह का बॉस बण्या बैठया सै (कंपनी: 2002)। कंपनी बतावै सै अक माफिया गिरोह मैं काम करने वाले महानगरां के गरीब बस्तियां मैं रहवण आले वे युवक सैं जिनकी खातर जिंदगी के दूसरे सारे रास्ते बंद हो लिए।
फिल्मी विल्लेन का चाहे जो रूप हो, अंत मैं उसे की हार होन्ती दिखावैं सैं। फेर असली दुनिया मैं आमतौर पै विल्लेन की जागां हीरो पिटज्या सै। एक खास बात और सै अक असली जिंदगी का विल्लेन पुलिस, वकील, ठेकेदार, कारखान्यां के मालिक इन सबनै अपनी मुट्ठी मैं राखै सै। जनता जनार्दन उसके साहमी लाचार सै। यो विल्लेन सै भ्रष्ट राजनीति का नेता। आई किमै समझ मैं?

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