खेती में मशीनीकरण तेजी से हुआ और हरित क्रांति का दौर शुरू हुआ। हरित क्रांति ने बहुते नुकसान किये हैं मगर किसानी के एक हिस्से को लाभ भी बहुत हुआ है। एक नया नव धनाढय वर्ग पैदा हुआ है हरियाणा में जिसका हरियाणा के हरेक पक्ष पर पूरा कब्जा है। जो दो तारीख नै पाई मैं बी अपने जलवे दिखावैगा। ईन्ही के दायरों में अलग-अलग जातों के नेताओं का उभरना समझा में आता है। मसलन चौधरी देवीलाल ‘जाटों के नेता’, चौधरी चान्द राम दलितों के नेता - उनमें भी एक हिस्से के। पंडित भगवतदयाल शर्मा पंडितों के नेता, राव वीरेन्द्र सिंह अहीरों के नेता आदि। इस धनाढय वर्ग का एक हिस्सा आढ़तियों में शामिल हो लिया सै। यह कम जमीन वाले किसान की कई तरह से खाल तार रहया सै। इसी धनाढय वर्ग में से कुछ भट्ठों के मालिक हो गये हैं, दारू के ठेकों के ठेकेदार हैं, प्रोपर्टी डीलर बन गये हैं। नेताओं के बस्ता ठाउ भी इन्हीं में से हैं। इनके और भी कई तरह के बिजनैस हैं। इनका जीवन एसी कमरों में गुजर रह्या सै। हर तरह के दांव-पेच लगाने में यह तबका बहुत माहिर होग्या। जिन लोगों की हाल में जमीनें बिकी हैं उन्होंने पैसा इन्वैस्ट करने का मन बनाया मगर पैसा लगाने की उपयुक्त जगह न पाकर वापस गांव में आकर मकान का चेहरा ठीक-ठ्याक कर लिया और एक 8-10 लाख की कार ले ली। जिनके पास कई एकड़ जमीन थी और संयुक्त परिवार था उन्होंने सिरसा की तरफ या कांशीपुर में या मध्यप्रदेश में खेती की जमीनों में यह पैसा लगा दिया। कुछ लोगों ने 200-300 गज का प्लाट शहर में लेकर सारा पैसा वहां मकान बनाने पर खर्च कर दिया। आगे क्या होगा उसका? किसै नै चिन्ता कोन्या। दबंगों और मौकापरस्तों के समूह हरेक कौम में पैदा हुए हैं। इनका वजूद जातीय, गोत्रों और ठोले पाने की राजनीति पर ही टिक्या सै। ज्यादातर गांवों में सड़कें पहुंच गई हैं बेशक खस्ता हालत में हैं बहुत-सी सड़कें। किसी-किसी गांव में चार पहियों के वाहनों की संख्या भी बढ़ी है। टीवी, अखबार का चलन भी गांव के स्तर पर बढ़ा है। सीडी प्लेयर तो बहुत से घरों में मिल जाएंगे। माइग्रेटिड लेबर की संख्या ग्रामीण क्षेत्र में भी बढ़ रही है। किसानों के एक हिस्से में अहदीपन बढ़ रहा है। गांव की चौपालों की जर्जर हालत हमारे सामूहिक जीवन के पतन की तरफ इशारा करती हैं। नशा, दारू और बढ़ता संगठित सेक्स माफिया सब मिलकर गांव की संस्कृति को कुसंस्कृति के अंधेरों में धकेलने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। छांटकर कन्या भ्रूण हत्या के चलते ज्यादातर गांवों में लड़कियों की संख्या कम हो रही है। बाहर से खरीद कर लाई गई बहुओं की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। पुत्र-लालसा बहुत प्रबल दिखाई देती है यहां के माइंड सैट मैं। हर 10 किलोमीटर पर शर्तिया छोरा के लिए गर्भवती महिला को दवाई देने वाले मिल जाएंगे। ऊंची से ऊंची पढ़ाई भी हमारे दकियानूसी विचारों में संेंध लगाने में असफल रही लगती है। हमारे आपस के झगड़े बढ़े हैं। इस सबके चलते महिलाओं पर घरेलू हिंसा में बढ़ोतरी हुई है। महिलाओं से बलात्कार व छेड़छाड़ आदि के केस बढ़े हैं जिनमें से ज्यादातर केस दर्ज ही नहीं हो पाते। 30-40 ट्रक ड्राइवर हरेक गांव में मिल जाएंगे। एड्स की बीमारी के इनमें से ज्याातर वाहक हैं। सुबह से लेकर शाम तक ताश खेलने वाली मंडलियों की संख्या बढ़ती जा रही है। युवा लड़कियों का यौन शोषण संगठित ढंग से किया जा रहा है तथा सेक्स रैकेटिंग गांव गांव तक फैल गये हैं। इसे अलावा युवा लड़कियों में शादी से पहले गर्भ की तादाद बढ़ रही है। मौखिक तौर पर कुछ डाक्टरों का कहना है कि इस प्रकार के केसिज़ में 50 प्रतिशत से ज्यादा परिवार के सदस्य, रिश्तेदार, पड़ोसी ही होते हैं जो यौन शोषण करते हैं। युवा लड़कियों का यौन उत्पीड़न हरियाणवी ग्रामीण समाज की भयंकर तसवीर पेश करता है। गांव के युवाओं लड़के-लड़कियों को अपनी स्थगित ऊर्जा का सकारात्मक इस्तेमाल करने का कोई अवसर हमारी दिनचर्या में नहीं है। केबल टीवी ज्यादातर बड़े गांव में पहुंच गया है। टीवी में आ रही बहुत-सी अच्छी बातों के साथ-साथ देर रात बहुत-सी जगह बल्यू फिल्में दिखाई जाती हैं। युवाओं में आत्महत्या के केसिज़ बढ़ रहे हैं। महिलाओं के दुःख-सुख की अभिव्यक्ति महिला लोकगीतों में साफ झलकती दिखाई देती है।
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