सोमवार, 17 अक्टूबर 2016

मरीज अर कंपनी के बीच मैं दलाल डाक्टर


जिब कोए आदमी बाजार में जावै सै तो उसनै अपनी जेब का बेरा हो सै अर उसके हिसाब तै ए ओ चीज खरीद ले सै। फेर मरीज अर दवाइयां तथा उसके इलाज के बारे मैं या बाजार व्यवस्था कोन्या लागू होन्ती। आडै़ कुदरतन मरीज अर कंपनी के अर कै बाजार के बीच मैं डाक्टर एक बिचौलिये की भूमिका मैं सै। मरीज नै वोहे दवाई खरीद कै ल्यावणा पड़ैगा जो डाक्टर उसनै लिख कै देगा। मरीज उसे कंपनी का एप्लाइन्स (दिल का वाल्व, कूल्हे, घुटने, आंख के लैंस, हरनिया मैस, स्टेपलर सर्जरी के स्टेपलर) खरीदैगा जिस कंपनी के बारे में डाक्टर मरीज नै बतावैगा। किस ढंग तै बतावैगा। पहले के जमाने में मरीज अर डाक्टर के बड़े मानवीय संबंध हुआ करते। फेर आज रक्षक ही भक्षक होगे लागैं सैं वरना कितना ए पात्थर दिल इनसान हो ओ लड़की सै पेट मैं अक लड़का सै या बात मरीज नै बतावण की हिमाकत क्यूंकर कर सकै सै? उसने इतना तो साफ बेरा सै अक जै लड़की सै तो अबोरश पक्का सै अर छांट कै अबोरशन करकै लड़की की हत्या करण आले डाक्टर ताहिं तो कै कह्या जावै? शायद डिक्सनरी के सारे शब्द इस खातर नाकाफी सैं। इन मरीजां अर डाक्टरां के बीच के गिरते मानवीय रिश्त्यां का कारण या वर्तमान बाजार व्यवस्था सै जिसके चालन्ते समाज मैं बहोतै अविश्वास अर अमानवीयता पैदा होवण लागरी सै। एक तरियो या स्वाभाविक होकै बी असामाजिक अर अमानवीय तो पक्की सै। इन एप्लाइन्सिज की अर दवाइयां की बाजार मैं कीमतां मैं बहोतै फर्क सै। जिब डाक्टर मरीज नै न्यों बतावै सै अक यो लैंस 500 रुपये का देसी सै फेर बाजार मैं बदेशी अर देशी अच्छी कंपनियां के लैंस भी सैं जिनकी कीमत 7000 ताहिं सैं तो मरीज के जीन नै बहोत शाक्का होज्या सै अक औ कौन सा लैंस डलवावै? इस बात मैं डाक्टर की गाइड की भूमिका सै जो तय करै सै अक वो कौन सा ‘माल’ खरीदै अपनी खातर। आम तौर पै इसे हालात मैं अपने बूते की बात ना होन्तै होये भी मरीज 7000 का लैंस घलवावण नै मजबूर होज्या सै अर किमै बात हो अर कै इन्कवारी हो तै डाक्टर तो न्योंए कहवैगा अक हमनै तो मरीज ताहिं सारी आपसन्ज दे दी थी। सै ना अद्भुत खेल दलाली का। दलाली करो बी आर मानो बीअ मतना अक हम दलाली करां सां। इसा लागै सै अक या आपसन्ज़ आली बात क्यूकर बताई जा सै इसपै भी बहोत दारोमदार सै। मरीज नै के रोज-रोज वाल्व बदलवाणे सैं ओतो न्योंए सोचैगा अक म्हंगे तै महंगा चढ़ वाले। महंगे का अर क्वालिटी का रिश्ता बी हो सै मरीज के दिमाग मैं। इन एपलाइन्सिज की खरीद नै लेकै ढाल ढाल की चरचा होन्ती रैहवैं सैं। फेर बदेशी कंपनियां की टक्कर आज कै दिन लेना इतना आसान नहीं सै जितना कई बर आपां सोच ल्यां सां। फेर एक बात तो साफ सै अक किसे भी पारदर्शी तरीके के ना होवा तै मरीजां नै बहोतै संकटां का सामना करना पड़ै सै अर कई प्रैगमैटिक डाक्टरां के वारे के न्यारे होन्ते रहवैं सैं। सबनै बेरा फेर इसनै रोक्कै कूण?
दवाइयां नै भी देखां यो यू अंतर साफ दिखायी देवण लाग रया सै। अस्पताल मैं जै एक दवाई 15 रुपये के टीके के रूप में सप्लाई करी जा सै तो बाहर की दुकान पै उसे दवाई की कीमत 41 रुपये सै। मतलब ढाई गुणा तै बी फालतू। फेर अस्पताल मरीजां नै इन कम कीमतां पै दवाई मुहैया क्यों नहीं करवाते? लागै सै यू बड्डा सवाल सै। भय अर भ्रष्टाचार मुक्त हरियाणा के नारे कै साहमी यू सवाल आंख मैं आंख घाल कै खड्या सै। देखियो के होगा। इसे तरिया ओपन हर्ट सर्जरी मैं इस्तेमाल होवण आले वाल्वां का मसला सै। बड़ी मुश्किल तै हरियाणा के लोगां नै हरियाणा के एकमात्र पीजीआई मैं याह सुविधा मिली सै। मरीजां नै वाल्वां नै लेकै अर दूसरे सामान नै लेकै काफी दिक्कतां का सामना करना पड़े सै। दिल्ली के अस्पतालां मैं नंबर नहीं आवै अर आ बी जावै तो प्राइवेट मैं खरचा बहोत सै। मरीज के रिश्तेदार इसनै किस्मत का खेल मानकै छाती मैं मुक्का मारकै बैठज्यां सैं। अमीर पीस्से आले जावैं सै अर प्राइवेट अस्पताल मैं सैड़ देसी अपना वाल्व बदलवा कै कई-कई साल की जिंदगी पाज्यां सैं। या उनकी किस्मत सै। यू किस्मत का खेल भी दूभांत करै सै दिल के मरीजां गेल्यां तो। बाजार का दस्तूर बताया अक जो दवाई ठीक क्वालिटी की सै अर जिसकी कीमत बी कम सै उसकी मांग बाजार मैं फालतू होनी चाहिये। फेर इसा होन्ता कोन्या। महंगी दवाई साल मैं नौ करोड़ की बिकैगी अर सस्ती दवाई तीन करोड़ की बिकैगी। मतलब साफ सै अक नौ करोड़ मैं कुछ हिस्सा उन दलाली आले डाक्टरां का भी होज्या सै। कंपनी की चांदी डाक्टर की चांदी, कंपनी के एमआर की चांदी। मरीज की कीमत पै खेल्या जावै सै यू सारा खेल।
एक खास बात और सै अक जितने कारपोरेट सैक्टर के अस्पताल सैं इनपै कोए रोक-टोक नहीं सै। कितनी ए फीस ल्यो। गरीब मरीजां नै देखो चाहे मत देखो। डाक्टरां की तनखा को कोए अनुमान कोन्या। जिब प्राइवेट सैक्टर ताहिं खुल्या चरण की छूट दे दी तो पब्लिक सैक्टर क्यूकर बचैगा? सरकारी अस्पतालां मैं, एम्ज मैं, पीजीआई मैं कूण इलाज करवावण जावैगा? ईब तै सुन्या सै एम्ज़ मैं भी यूजर चार्जिज का मामला गरमान्ता जावै सै। फेर तो गरीब मरीजां का कोए वाली वारिस नहीं बचैगा। अर इस गलतफहमी मैं भी नहीं रैहणा चाहिये अब या दुभान्त न्योंए चालती रहवैगी। जनता कै सारी बात समझ आन्ती जाण लागरी सैं। जनता की जागरूकता कै साहमी या दुभान्त घणे दिन कोन्या टिकै। गरीब जनता जरूर आगै आकै सरकारी खाते के अस्पतालां नै तहस-नहस होवण तै बचावैगी नहीं तो उसकी बीमारी का इलाज किते बी कोनी होवैगा।
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