सोमवार, 17 अक्टूबर 2016

खून की बी जात हो सै के

खून की बी जात हो सै के
म्हारे हरियाणा मैं जात के ठेकेदार बहोत पैदा होगे ज्यूकर साम्मण के म्हिने मैं गिज्जाई पैदा हो जाया करैं। इन जात के ठेकेदारां की गलेट लागैं सैं। अर भला ये के कहवैंगे अक अपणा मारै छां मैं गेरै। इनतै कोए बूझणिया हो मरे पाछै किसी छां अर किसा घाम? पर हम बिना सोचैं समझें इनकी हां मैं हां मिलाद्यां सां। ये ठेकेदार अपणी अपणी जात्यां नै सिस्से के बढ़िया फ्रेम मैं लवा कै कौम की सेवा करण की सूं खान्ते हांडै सैं। कई बै तो इसा सा लाग्गण लागज्या सै अक जणों तै पूरा ए हरियाणा जात्यां मैं बंट कै खड़या होग्या अर जो माणस जातपात मैं यकीन नहीं करता उसनै हरियाणा मैं रैहण का कोए हक नहीं बचरया। गामां मैं भी माणस जात पै, गोत पै, ठोले पै, पान्ने पै कसूती ढाल तनकै खड़े होज्यां सै माड़ी सी बात पै। जागां-जागां हरिजणा के बान्ध-बान्ध दिये जावैं सैं, बस्ती की बस्ती जला दी जावैं सैं। जात के नाम पै बलात्कारी बचाए जाण लागरे सैं। निकम्मे, चोर, ठग जात का साहरा ले कै चौधरी माणस बणे हांडैं सैं। ब्लैक करकै चौखा काला धन कमा लिया। भला हो बंशीलाल जी का जो दारू बन्दी करदी। ब्लैक की दारू नै बहोतै जन्यां के काच्चे कटवा दिये थे। एक खास बात और सै इन ठेकेदारां की अक दो चार पहलवान बी जरूर पावैंगे इनकी गेल्यां। आजकाल के सामाजिक सांस्कृतिक माहौल पै बी इनका कब्जा सै। आज की राजनीति मैं बी इनकी पूरी दखलन्दाजी बताई।
म्हारे गाम मैं बी ईसा ए जात का एक ठेकेदार था चौधरी रामपत। उसकी फुकांड़ मैं घास जल्या करदी। मजाल सै जै कोए हरिजन उसकी बैठक मैं खाट पै बी बैठज्या। म्हारे गाम की दलित सरपंच बी उसके साहमी धरती पै बैठी हमनै देखी थी कई बर। उसके खेतां मैं कोए पां टेक कै तो दिखाद्यो। बेरा ना किसे हरिजन के बालक नै उसकै बालकपन मैं किसी चोंहटकी सी भर राखी थी अक हरिजन का नाम आया नहीं अर वो फड़क्या नहीं। कुछ दिन पाछै भाई कै भैंसां की डेरी खोल्लण का सौक चढग्या। एक झीमरां का बालक सान्नी सप्पानी अर धार काढ़ण ताहिं राख लिया। कुछ दिन पाछै झीमर का बालक बीमार होग्या तो धार कूण काढ़ै? पड़ौस मैं हरिजनां का छोरा अत्तर था पूरा जवान गाभरू। पांच-सात दिन धार उसनै काढ़ी। एक दिन उसकी मां रामपत ठेकेदार कै घरां किमै चीज मांगण चाली गई, उस बख्त रामपत की बहू किढ़ावणी मां तै दूध काढण लागरी थी बालकां की खातिर। अत्तर की मां बी ऊंकै धोरै जा खड़ी हुई तै उसका पल्ला किढ़ावणी कै जा लाग्या। बस फेर के था रामपत की बहू नै तो जमीन आसमान एक कर दिया। वा बोली - म्हारी किढ़ावणी बेहू करदी अर और बेरा ना केके सुनाई उसनै। अत्तर की मां बिचारी कुछ नहीं बोली पर मनै मन न्यों सोच्चण लाग्गी अक जिब मेरा छोरा धार काढ़ै तो बाल्टी बी बेहू ना होन्ती अर ना दूध बेहू होन्ता अर मेरे पल्ले तै किढ़ावणी बेहू होज्या सै। रामपत की बहू नै जणो तै अत्तर के मां के दिल की बात सुणली। वा हटकै फेर बोली - काच्ची चीज बेहू कोन्या हुया करदी पाक्की औड़ चीज बेहू होज्यां सैं। अत्तर की मां फेर बी बोल चुप्पाकी रही।
थोड़े से दिन पाछै रामपत चौधरी करड़ा बीमार होग्या। बवासीर की तकलीफ थी खून घणाए पड़ग्या दो-तीन दिन मैं। लाल मुंह था ओ जमा पीला पड़ग्या। ना चाल्लण की आसंग रही। घर के उसनै मैडीकल मैं लेगे। भर्ती होग्या। खून टैस्ट हुया। ढाई ग्राम खून का नम्बर (हिमोग्लोबिन) पाया चौधरी साहब का। डयूटी आला डाक्टर बोल्या दो शीशी खून की चाहियें तुरत। चौधरी साहब नै डाक्टर तै बूझया - डाक्टर साहब। यू खून मोल नहीं मिलज्या। डाक्टर बोल्या - माणस का माणस के खून चढ़ै सै हाथी का खून थोड़ा चढ़ाणा सै। ब्लॅड की खातर उसके दोनूं छोरे बी कन्नी काटगे। उसनै सी एम की कोठी तै बी फोन करवाया। ब्लॅड बैंक मैं उसके ग्रुप का खून नहीं था। डाक्टर नै बेटे समझाए अक जिब थाम अपणे बाप खातर खून दे कै राज्जी कोन्या तो और कोए कौण देवैगा? फेर छोरे तो जमा नहीं मान्ने। रामपत की छोरी नांगलोई ब्याह राखी थी वा हाल चाल बूझण आई थी तो एक बोतल तो उसनै दिया। डाक्टर बोले दो बोतल और चाहिये।
दोनूं बेट्यां नै सलाह करी अक कुछ जुगाड़ करया जा। घूम फिरकै वे दो रिक्से आल्यां नै पाकड़ ल्याये चार सौ-चार सौ रूपइयां मैं। उननै न्यूं बी बेरा था अक ये दोनूं कई बै खून दे कै जा लिये ब्लॅड बैंक मैं। खून दे दिया उननै तो रिकार्ड मैं नाम लिखावण लाग्गे तो एक नै लिखाया रामचन्द्र सन आफ धर्म सिंह वाल्मिकी अर दूसरे नै लिखवाया रूप चन्द्र वल्द कन्हैया हरिजन। दोनूं बेटे एक बर तो हिचके पर फेर सैड़ दे सी दोनों बोतल ले कै वार्ड मैं पहोंचगे। डाक्टर नै वे दोनूं बोतल चढ़ा दी रामपत कै। उसके दोनूं बेट्यां कै जाड्डा चढ़रया था अक जै बाबू नै बूझ लिया अक यू किसका खून सै तो के जवाब देवांगे। फेर रामपत तो न्यों ए बड़बड़ान्दा रहया - तावले से चढ़वा द्यो खून। मनै बचाल्यो -।
आगले दिन रूप चन्द अपणे बकाया पीस्से लेवण ताहिं आया तो रामपत नै बूझ लिया अक क्यांके पीस्से? रूपचन्द ने सारी बात बतादी रामपत ताहिं। रामपत नै बूझया - तेरी जातके सै भाई तो रूपचन्द नै अपनी बी बतादी अर राम चन्द्र की बी बतादी। रामपत तो चुप खींचग्या। भींत बोलै तो रामपत बोलै। पीस्से दिवा के रूप चन्द सैड़ दे सी फारिंग करवा दिया अर अपना मन समझाया - खून मैं जातपात किसी? खून तो सबका ए एक सा हो सै। सवाल यूहे सै अक फेर यू जात्यां पै खामैखा का रोल्ला क्यूं? असली बात याहे सै अक हम बंटे रहवां जात्यां मैं अर लड़दे रहवां आपस मैं अर ऐश करनिया इनके नाम पै काच्चे काटें जावैं। फेर हमनै कड़ै फुरसत सै ये सारी बात सोच्चण की। ताश खेल्लण तै फुरसत मिलै तो किमैं सोचां। सोच कै देख लियो आच्छी ढालां-या जात ढेरयां आला कुड़ता सै इतनै इसनै तार कै नहीं फैंकांगे डेरयां तै पैंडा कोन्या छूटै। बख्त बदलगे। हम कद बदलांगे?

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