किसे भी सभ्य समाज की अपने नागरिकां के प्रति या जिम्मेवारी बनै सै अक हरके नागरिक की सेहत बढ़िया राखण की खातर उन ताहिं बढ़िया स्वास्थ्य सेवावां का सिस्टम खड्या कर्या जावै अर इसकी साथम साथ शिक्षा, रोजगार अर न्यायपालिका का सिस्टम बढ़िया हो। सबकी खातर जिबै बढ़िया जनतंत्र बण सकै सै म्हारे देश में जड़ै लगभग कुल जनसंख्या का 17 प्रतिशत 40 साल की उमर तै पहलम मौत का शिकार होज्यां सैं। फेर सच्चाई तो किमै ओर सै अर संवेदनशील माणस नै तो जमा हिला कै धरदे सै। आनंद बाजार पत्रिका मैं 29 अगस्त नै एक खबर छपी थी अक क्यूकर कैंसर के मरीज के इलाज की दवाइयां (मोरफीन 5,50,000 अर मोरकोन्टीन 52,00,000) जो विश्व स्वास्थ्य संगठन नै भेजी थी अर जो मरीजां ताहिं मुफ्त दी जावनी थी भारत के सब सरकारी अस्पतालां मैं, चितरंजन कैंसर अस्पताल के स्टोर मैं पड़ी पायी गई। इनकी एक्सपायरी की तारीख भी खत्म होली सै। मेरे तो कसूता झटका लाग्या थारै बेरा ना किमै हुआं सै अक नहीं। ये दवाई हरेक दुकान पै कोन्या मिलती अर कैंसर के दर्द मैं बहोत कारगर होवैं सैं। जिसका ब्यौंत था वे तो खरीद लें बाजार मैं फेर जिसका ब्यौंत नहीं खरीदण का वो जाओ झाड़ फूंक आल्यां धोरै अर फेर न्यों कैहकै उननै मूर्ख बी बताओ अक ये इक्कीशवीं सदी मैं इलाज खातर झाड़-फूंक आल्यां धोरै जावैं रै। विश्व स्वास्थ्य संगठन नै जवाब तलबी तो करी सै। फेर इसतै भी फालतू चिंता की बात तो यासै अक दवा जगत का जो माफिया सै जिसनै ये दवाई अस्पतालां मैं कोन्या पहोंचण दी उसका के कर्या जा? कंपनियां के मुनाफे बधावण खातर यू माफिया बेरा ना केके खेल रचै सै अर आपां बी राज्जी होकै इसके म्यूज़िक पै ढुंगे मारण मैं वार कोन्या लावन्ते। इसे माहौल मैं बी सैं कुछ लोग कुछ डाक्टर जिनकी मानवता बचरी सै जो जी ज्यान तै मरीजां की खातर लागरे सैं। इसाए एक अस्पताल सै श्रमजीवी अस्पताल बंगाल के बेलूर मैं। जब वे मरीज नै दाखिल करैं सैं तो मरीज नै पीस्से जमा करावण की कोन्या कहते। जिब मरीज इलाज कराकै जावै सै तो लाखां का बिल कोन्या थमांते उसके हाथ मैं बल्कि बाकी अस्पतालां तै पांच-छै गुणा कम फीस लागै सै उड़ै। दिल की बाईपास सर्जरी के उड़ै कुल 25000 रुपये सैं परेशन तै पहलम का अर बाद का खर्चा मिलाकै। इस अस्पताल आले जै किसे मरीज की अस्पताल मैं मौत होज्या तो उसके रिश्तेदारां नै कई हजार का बिल कोन्या पकड़ान्दे। अखबारां मैं पढ़ी सै अक फलाने कारपोरेट अस्पताल में मरीज के रिश्तेदारां नै लाश कोन्या मिली क्योंकि उन धोरै अस्पताल के बिल के एक लाख अस्सी हजार रुपये कोन्या थे। बाईपास सर्जरी के इन कारपोरेट अस्पतालां मैं एक लाख तै लेकै साढ़े तीन लाख ताहिं रुपये का बिल आवै सै। असली लागत पै 100 प्रतिशत मुनाफा लेल्यो फेर इसमैं तो 500 तै अर 1000 प्रतिशत ताहिं का मुनाफा बतावैं सैं। मरदा के ना करदा। देने पड़ैं सैं। फक्र होना चाहिए हमनै श्रम जीवी बरगे अस्पतालां पै। इसा ए सा एक अस्पताल आंध्रप्रदेश के नैल्लोर शहर में बताया जिसका नाम सै डाक्टर शैशा रेड्डी अस्पताल। उड़ै बी बतावैं सैं अक माणस की देखभाल अर इलाज बहुत कम पीस्से मैं होज्या सै। काश हरियाणा मैं बी कोए इसा अस्पताल हो जित इसे ढाल का इलाज बढ़िया इलाज सस्ते मैं होन्ता हो। फेर हरियाणा की इसी किस्मत कड़ै सै? आड़ै डाक्टरां नै घोट कै पेट मैं ए छोरी मारण तै फुरसत कड़ै सै?
फेर इसा अस्पताल खोल्या जा सकै सै इसका उदाहरण तो म्हारे साहमी बंगाल अर आंध्रप्रदेश के डाक्टरां नै पेश करे दिया। देखो हरियाणा की जनता अर हरियाणा के डाक्टर कद इसा उदाहरण पेश करैंगे? सुणण मैं आया सै अक हरियाणा का इकलौता मैडीकल कालेज इस मामले मैं हांगा लार्या सै। बेरा ना यू ड्रग माफिया पार बी पड़ण दवैगा अक नहीं। मरीज अर कंपनी के बीच मैं डाक्टर दल्ला सै। बाकी चीजां मैं तो खरीददार अपनी खरीद की ताकत के हिसाब तै 2 रुपये का न्हाण का साबुन खरीद ले अर 100 रुपये का साबुन बी खरीद सकै सै। फेर बीमारी के मामले मैं या च्वायश कोन्या उस धोरै। जिस कंपनी की अर जिस ढाल की अर जितनी महंगी-सस्ती दवाई डाक्टर कहवैगा वाहे खरीदनी पड़ैगी उसनै। एक एलर्जी की गोली होसै सैटरीजीन जिसकी 10 गोलियां की कुल लागत 1.50 रुपये बताई। तो उसकी कीमत घणी तै घणी 4.50 रुपये हो सकै सै। फेर या बाजार मैं 28 तै लेकै 31 रुपये की बेची जावै सै। मेरा हिसाब माड़ा कमजोर रह्या सै। इसका हिसाब लाकै देख लियो अक कितने सौ प्रतिशत का मुनाफा कमाया जावण लागर्या सै। इसे तरियां एड्स की दवाई अमेरिका की कंपनी बेचै 30,000 डालर मैं एक साल की दवाई अर भारत की सिपला की कंपनी बनावै एक डालर रोज की कीमत की दवाई। मतलब 365 डालर कीमत साल की दवाई की। आई किमै समझ मैं अक जम्हाई आवण लागगी।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें